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The News Air - Breaking News - Putin-Trump Call: ईरान के 11 टन यूरेनियम पर रूस का बड़ा प्रपोजल

Putin-Trump Call: ईरान के 11 टन यूरेनियम पर रूस का बड़ा प्रपोजल

90 मिनट की फोन बातचीत में पुतिन ने ट्रंप को दिया बड़ा ऑफर - ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम रूस की कस्टडी में जाएगा, लेकिन क्या अमेरिका मानेगा?

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 1 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, सियासत
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Putin-Trump Call
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Iran Uranium Deal : यूएस-ईरान का जो वॉर चल रहा है, वह अभी सुलझने का नाम नहीं ले रहा। और इसमें सबसे बड़ा मुद्दा है – एनरिच्ड यूरेनियम का। बोला यह जा रहा है कि ईरान बहुत जल्द न्यूक्लियर बॉम्ब बना सकता था और इसीलिए यह पूरा अटैक प्लान किया गया।

देखा जाए तो 2 महीने बाद भी जब चीजें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, तब एक नया ट्विस्ट सामने आया है। रिसेंटली ईरान के फॉरेन मिनिस्टर अब्बास अराची रूस गए और वहां व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। और उसके बाद अब पता चलता है कि पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच 90 मिनट का फोन कॉल हुआ है।

खबर यह है – “In 90-Minute Call, Putin Offers Trump Help With Iran’s 11-Tonne Uranium.” यह एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि सारा मामला अगर हम देखें तो ईरान का यही कहना है कि हम न्यूक्लियर बॉम्ब बना नहीं रहे। हमारे पास जो एनरिच्ड यूरेनियम है वो सिर्फ पीसफुल, सिविलियन परपज के लिए है।

90 मिनट की बातचीत में क्या हुआ?

सबसे पहली बात – हुआ क्या? जैसा कि बताया गया, 90 मिनट की बातचीत हुई ट्रंप और पुतिन के बीच। और यहां पर व्लादिमीर पुतिन ने प्रपोज कर दिया कि जो ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम स्टॉकपाइल फहान में रखा हुआ है, उसको कस्टडी में ले लेगा रूस।

मतलब अगर दुनिया माने – स्पेशली ट्रंप अगर मान लें – तो यहां पर रूस जो है, ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम का स्टॉकपाइल अपने अंडर में ले लेगा ताकि ईरान उसका गलत इस्तेमाल न कर सके।

अगर गौर करें तो यहां पर किस तरह से ग्रेट पावर राइवलरी, न्यूक्लियर डिप्लोमेसी और मिडिल ईस्ट की जियोपॉलिटिक्स – सब कुछ एक साथ ओवरलैप कर रही है। इसका यह एक बड़ा उदाहरण है।

एनरिच्ड यूरेनियम क्या होता है और ईरान के पास कितना है?

इसको समझने से पहले आपको जानना पड़ेगा – एनरिच्ड यूरेनियम के बारे में क्या होता है? जब हम एनरिच्ड यूरेनियम की बात करते हैं तो इसका मतलब क्या है?

जो नेचुरल यूरेनियम होता है U-235, उसका 0.7% जो है वो एनरिच्ड यूरेनियम होता है। नेचुरल यूरेनियम में भी एनरिच्ड यूरेनियम की परसेंटेज 0.7% ऑलरेडी रहती है।

लेकिन अगर आपको मान लीजिए न्यूक्लियर एनर्जी प्रोड्यूस करनी है, न्यूक्लियर इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस करनी है तो उसके अंदर जो फ्यूल लगता है एनरिच्ड यूरेनियम का, वो 3 से 5% कम से कम होना चाहिए।

और अगर हम बात करें कि जो वेपन ग्रेड वाला है – जिससे न्यूक्लियर बॉम्ब बनता है – तो उसमें 90% एनरिचमेंट होनी चाहिए।

ईरान का करंट पोजीशन: ईरान के पास 11 टन का एनरिच्ड यूरेनियम है। लेकिन इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि इसमें से जो 440 किलो है, वो 60% प्योरिटी को ऑलरेडी पार कर चुका है।

समझने वाली बात है कि ईरान काफी नजदीक है न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने के। 60% का मतलब है कि आप वेपन ग्रेड के काफी ज्यादा नजदीक हैं। ब्रेकआउट टाइम बहुत कम है – मतलब बहुत छोटे समय में यहां पर आप न्यूक्लियर बॉम्ब कभी भी बना सकते हैं।

यह ग्लोबल क्राइसिस क्यों है?

इसके पीछे का बैकग्राउंड समझिए। क्या हुआ था कि यहां पर न्यूक्लियर डील ऑलरेडी हो गई – JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) – ओबामा के समय 2015 में। ईरान, यूएस और बहुत सारी यूरोपियन पावर्स मिलकर यह डील किए थे।

उसमें यही कहा गया था कि जो ईरान है वो एक लिमिट तक ही एनरिचमेंट करेगा और इसकी पूरी देखभाल IAEA (International Atomic Energy Agency) के द्वारा देखी जाएगी। इसके बदले में जो ईरान है, उसके ऊपर से सैंक्शंस हट जाएंगे।

प्रॉब्लम तब स्टार्ट हुई जब ट्रंप आए पहले टर्म में – 2018 में उन्होंने इस डील से वॉकआउट कर दिया। कहा कि यूएस इसका पार्ट नहीं है क्योंकि इससे कुछ होने वाला नहीं है।

इसका नतीजा यह निकला कि उसके बाद क्योंकि ईरान के ऊपर सैंक्शंस लगे, और उसी के आक्रोश में ईरान ने बढ़-चढ़कर खूब सारा एनरिच्ड यूरेनियम तैयार करना स्टार्ट कर दिया। कोशिश यही थी कि यहां पर जल्द से जल्द न्यूक्लियर बॉम्ब बनाया जाए।

मान के चलिए अगर ईरान न्यूक्लियर वेपन बना लेता है तो? तो उसके बाद सऊदी अरब क्या मानेगा? वो तो कहेगा कि हमें सबसे बड़ा खतरा है, हमें भी बनाना चाहिए। फिर तुर्की भी बनाएगा। मिडिल ईस्ट एक प्रकार से मल्टी-न्यूक्लियर रीजन बन जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि आज के डेट में कोई नहीं है – एक्सेप्ट इजराइल – तो एक प्रकार से सबके पास न्यूक्लियर बॉम्ब आने लग जाएंगे। इसकी वजह से नॉन-प्रोलिफरेशन जो नॉर्म है, वो ब्रेक हो सकता है।

पुतिन का प्रपोजल क्या है?

अब इस पूरे सिनेरियो को देखिए और इस कॉन्टेक्स्ट में समझिए कि पुतिन अब ट्रंप को क्या कहना चाह रहे हैं। पुतिन ने 90 मिनट के कॉल में यह सजेशन दिया ट्रंप को कि ईरान अपना जो एनरिच्ड यूरेनियम है, वो रूस को ट्रांसफर कर सकता है।

क्योंकि जैसा मैंने बताया कि अभी जो खबर आई थी, वो यह है कि अब्बास अराची जो फॉरेन मिनिस्टर हैं ईरान के, वो गए थे रूस। अभी जस्ट दो-तीन दिन पहले की बात है और वहां पर पुतिन से बातचीत की, मुलाकात की।

तो हो सकता है उसमें उन्होंने यह बात रखी होगी पुतिन के सामने कि अगर आप ट्रंप से बात करोगे तो यह प्रपोजल रख देना कि हम अपना जो एनरिच्ड यूरेनियम है – ऑब्वियस सी बात है, वो अमेरिका को तो देंगे नहीं – तो वो ये चाह रहे थे कि उसको रूस को दे दिया जाए।

क्योंकि ईरान को रूस के ऊपर विश्वास है। तो रूस क्या करेगा? उसको स्टोर करके रख लेगा, उसको मॉनिटरिंग करेगा, प्रिवेंट करेगा कि वेपनाइज न किया जाए उसको।

यह मायने क्यों रखता है?

यहां ध्यान देने वाली बात है – इतना मायने क्यों रखता है यह प्रपोजल?

पहला – इमीडिएट बेसिस पर जो न्यूक्लियर का खतरा है, वो हट जाएगा। क्योंकि पूरा का पूरा जो मामला है, ये जो वॉर है, वो क्यों हुआ? वो इसीलिए हुआ क्योंकि ट्रंप ये कह रहे थे कि कभी भी ईरान न्यूक्लियर बॉम्ब बना लेगा और इसीलिए हमने हमला कर दिया।

तो एक प्रकार से जो इमीडिएट खतरा है न्यूक्लियर रिस्क का, वो अब खत्म हो जाएगा।

दूसरा – वॉर अवॉइड हो जाएगा। क्योंकि वॉर को लेकर जो सॉल्यूशन ढूंढा जा रहा है, वो तब तक नहीं निकलेगा जब तक ये न्यूक्लियर वाला मसला सॉल्व नहीं हो जाता। आप भले कितने भी मुद्दे सुलझा लो, अल्टीमेटली लेके-देके सारा मुद्दा इसी पर आ जाता है।

तो अगर यह मुद्दा सुलझ जाता है, रूस के पास चला जाता है तो एक प्रकार से वॉर भी खत्म हो जाएगा।

तीसरा – यहां पर मिडिल पाथ चुनने की कोशिश की है। मतलब ईरान जो है, वो फुल डिसआर्मेंट को रिजेक्ट करता है और यूएस न्यूक्लियर बिल्ड-अप को रिजेक्ट करता है। तो ये एक कॉम्प्रोमाइज सॉल्यूशन आप कह सकते हैं।

लेकिन इसमें प्रॉब्लम क्या है?

प्रॉब्लम है ट्रस्ट का। यूएस रूस के ऊपर क्या ट्रस्ट करेगा? नहीं करेगा। रूस जो है, वो न्यूट्रल एक्टर की तरह नहीं है। ऐसा मानना है कि जो रूस है, अल्टीमेटली वो ईरान की मदद कर देगा।

तो इसमें एनफोर्समेंट का इशू है कि अगर ईरान मान लो धीरे से कोई यूरेनियम अपने पास रख लिया, रूस से ले लिया वापस, तो उसकी कंप्लायंस कौन करेगा? वेरिफाई कौन करेगा? क्योंकि रूस और ईरान तो मित्र हैं।

ट्रंप का क्या रिस्पांस आया?

अब इसको लेकर ट्रंप का क्या रिस्पांस आया फोन कॉल पर? देखो, ट्रंप ऐसा नहीं है कि उन्होंने तुरंत रिजेक्ट कर दिया कि “नहीं, हम तुमको कैसे दे सकते हैं यूरेनियम, ये एक्सेप्टेबल नहीं।” ये सारी चीजें नहीं हुईं।

लेकिन हां, उन्होंने इनडायरेक्ट वे में कुछ वैसा ही कह दिया। उन्होंने एकनॉलेज किया कि पुतिन ने ऐसा प्रपोजल रखा है। लेकिन साथ ही साथ उन्होंने रूस को ये सलाह दे दी कि “भाई देखो, अभी आप इन सब में मत पड़ो। आपका ऑलरेडी वॉर चल रहा है यूक्रेन के साथ। तो उस वॉर को पहले सुलझाने की कोशिश करो।”

तो ये क्या दिखाता है?

पहला – यूएस और रूस में काफी बड़ा मिसट्रस्ट है। बहुत ज्यादा प्रॉब्लम है दोनों देशों के बीच में।

दूसरा – डिप्लोमेटिक डिस्टेंसिंग भी है। ट्रंप जो है, वो रूस को अवॉइड करना चाहते हैं। जियोपॉलिटिकल जो लेजिटिमेसी है मिडिल ईस्ट में, वो रूस के अंडर में न आ जाए, रूस और ताकतवर न बन जाए – वो एक तो ट्रंप की स्ट्रेटजी है।

तीसरा – स्ट्रेटेजिक प्रायोरिटाइजेशन। मतलब कि यूक्रेन वॉर जो है, वो अभी अर्जेंट बेसिस पर सॉल्व होना चाहिए। ये एक बेसिक प्रायोरिटी हो सकती है।

जियोपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट – बड़ी तस्वीर क्या है?

ओवरऑल इसका जियोपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट देखोगे तो ये भी काफी इंटरेस्टिंग है।

यूएस-ईरान कॉन्फ्रंटेशन: मिलिट्री टेंशन बढ़ रहा है। नेवल डिप्लॉयमेंट हो रहे हैं। इकोनॉमिक सैंक्शंस लग रहे हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा: अभी तक सुलझा नहीं है। ऑयल फ्रीली पास नहीं हो रहा है। और अल्टीमेटली इसका जो रिपल इफेक्ट है, वो आपको ऑयल के प्राइसेस में देखने को मिलेगा।

अभी तो मैं कल देख रहा था – $125 प्रति बैरल। पिछले चार-पांच वर्षों में सबसे हाईएस्ट लेवल पर यह पहुंच गया। ऑलदो यह थोड़ा सा फिर गिरा। मतलब ये ऊपर-नीचे चल ही रहा है। ऐसा लग ही नहीं रहा कि यहां पर जो ऑयल के प्राइसेस हैं, वो कम होने का नाम ले रहे हैं।

न्यूक्लियर डेडलॉक: यूएस चाहता है कि जीरो एनरिचमेंट हो। ईरान का पोजीशन है कि “नहीं, हमारा ये सॉवरेन राइट है।” तो इसकी वजह से काफी ज्यादा टेंशंस देखने को मिल रही हैं।

रूस इसके अंदर क्यों एंटर करना चाहता है?

खैर, लास्ट में क्वेश्चन ये आता है कि रूस इसके अंदर क्यों एंटर करना चाहता है?

सिंपल सी चीज है कि यहां पर वो ग्लोबल डिप्लोमेटिक ब्रोकर की तरह एक्ट कर रहा है ताकि उसका इन्फ्लुएंस वेस्ट एशिया में और ज्यादा बढ़े। यहां पर जो बैलेंसिंग है – मतलब ईरान के साथ भी टाइज रख रहा है और यूएस के साथ डिप्लोमेटिक इंगेजमेंट करता रहता है।

और साथ ही साथ यूएस डोमिनेंस को काउंटर करना चाहता है कि अगर वो इस तरह का स्टेप लेगा तो ऑब्वियस सी बात है, रूस का वर्चस्व यहां पर बढ़ेगा।

वैसे मैं आपको बता दूं, ये अगर आप देखोगे तो जो 90 मिनट की कॉल हुई दोनों के बीच में, उसमें पुतिन ने ये सलाह दी ट्रंप को कि “देखो, ये जो मामला है ईरान वॉर का, वो काफी ज्यादा एक्सट्रीमली डैमेजिंग कॉन्सिक्वेंस होंगे इसके। मतलब अगर आप इसको जारी रखोगे तो और प्रॉब्लम हो सकती है।”

तो इस तरह की भी बातें यहां पर हुई हैं।


मुख्य बातें (Key Points)

• पुतिन-ट्रंप के बीच 90 मिनट की फोन बातचीत में Iran Uranium Deal का प्रपोजल

• ईरान के पास 11 टन एनरिच्ड यूरेनियम, जिसमें से 440 किलो 60% प्योरिटी पार कर चुका है

• रूस ने ऑफर किया कि ईरान का यूरेनियम स्टॉकपाइल अपनी कस्टडी में ले सकता है

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• यूएस-रूस के बीच ट्रस्ट की कमी इस डील की सबसे बड़ी बाधा


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: ईरान के पास कितना एनरिच्ड यूरेनियम है?

ईरान के पास कुल 11 टन एनरिच्ड यूरेनियम है, जिसमें से 440 किलोग्राम ने 60% एनरिचमेंट लेवल पार कर लिया है। यह वेपन ग्रेड (90%) के काफी करीब है और इसीलिए अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बना हुआ है।

Q2: पुतिन ने ट्रंप को क्या प्रपोजल दिया?

90 मिनट की फोन कॉल में पुतिन ने सुझाव दिया कि ईरान अपना पूरा एनरिच्ड यूरेनियम स्टॉकपाइल रूस को ट्रांसफर कर सकता है। रूस इसे अपनी कस्टडी में रखेगा और मॉनिटर करेगा ताकि इसका वेपनाइजेशन न हो सके।

Q3: ट्रंप ने इस प्रपोजल पर क्या जवाब दिया?

ट्रंप ने प्रपोजल को सीधे रिजेक्ट नहीं किया लेकिन इनडायरेक्टली मना कर दिया। उन्होंने पुतिन को सलाह दी कि पहले यूक्रेन वॉर को सुलझाएं। इससे साफ है कि यूएस को रूस पर भरोसा नहीं है और वो नहीं चाहते कि मिडिल ईस्ट में रूस का प्रभाव बढ़े।

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