Expected Credit Loss Model: भारतीय रिज़र्व बैंक ने देश की बैंकिंग व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए ECL यानी Expected Credit Loss Model की फाइनल गाइडलाइन्स जारी कर दी हैं। यह नया सिस्टम 1 अप्रैल 2027 से लागू होने जा रहा है, जिसका सीधा असर Reserve Bank of India के अधीन काम करने वाले सभी बैंकों पर पड़ेगा। खासतौर पर State Bank of India और Bank of Baroda जैसे PSU बैंकों के शेयर्स में इस खबर के बाद गिरावट देखी गई है।
देखा जाए तो यह केवल एक साधारण नियम नहीं है, बल्कि बैंकिंग सेक्टर की अकाउंटिंग प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव है। अब तक बैंक जिस तरीके से लोन देते थे और उसकी अकाउंटिंग करते थे, वो पूरी तरह बदलने वाला है।
क्या है ECL Model और क्यों है जरूरी
Expected Credit Loss यानी ECL एक ऐसा सिस्टम है जिसमें बैंकों को भविष्य में होने वाले नुकसान का अनुमान पहले से ही लगाना होता है। अभी तक भारतीय बैंक Incurred Loss Model पर काम करते थे। इसका मतलब समझिए – पहले डिफॉल्ट होता था, फिर बैंक प्रोविजनिंग करते थे। लेकिन अब बैंकों को लोन देते वक्त ही यह सोचना होगा कि यह पैसा वापस आएगा भी या नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि यह सिस्टम ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप है। दुनिया भर के विकसित देशों में यह पहले से लागू है। अब भारत भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
आरबीआई ने तीन मुख्य चीजों को इंटीग्रेट किया है – Asset Classification (एसेट वर्गीकरण), Provisioning (प्रोविजनिंग) और Income Recognition (आय मान्यता)। पहले ये तीनों अलग-अलग थे, अब इन्हें एक साथ जोड़ दिया गया है।
90 दिन का नियम अब भी बरकरार
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि NPA यानी Non-Performing Asset का 90 दिन वाला नियम अभी भी वैसा ही रहेगा। अगर कोई बोरोअर 90 दिनों तक प्रिंसिपल या ब्याज की रकम नहीं चुकाता है, तो वह लोन एनपीए में क्लासिफाई होगा। लेकिन बदलाव यह है कि पहले बैंक 90 दिन के बाद प्रोविजनिंग करते थे, अब उन्हें 90 दिन से पहले ही प्रोविजनिंग करनी होगी।
अगर गौर करें तो यह बदलाव बैंकों को ज्यादा सतर्क बनाएगा। अब किसी को भी आसानी से लोन नहीं मिल पाएगा। बैंक को पहले से ही रिस्क एसेसमेंट करना होगा।
तीन स्टेज में काम करेगा ECL Model
आरबीआई ने ECL को तीन स्टेज में विभाजित किया है, जिसे समझना बेहद जरूरी है।
Stage 1 – Performing Loans (सामान्य लोन): इसमें वे सभी लोन आते हैं जो अभी तक सही तरीके से चल रहे हैं। बोरोअर नियमित रूप से EMI भर रहा है। लेकिन इकोनॉमी की स्थिति, युद्ध, AI का असर जैसे कारणों से भविष्य में खतरा हो सकता है। ऐसे लोन्स के लिए बैंकों को अगले 12 महीने का Expected Loss कैलकुलेट करना होगा।
उदाहरण के तौर पर समझें – Infosys जैसी कंपनी को अगर किसी बैंक ने ₹100 करोड़ का लोन दिया है और अब तक सब कुछ ठीक चल रहा है। हर महीने की किस्त समय पर आ रही है। लेकिन अचानक AI का जमाना आने से USA से आने वाले ऑर्डर्स कम होने की संभावना है। तो बैंक को अब इस रिस्क को देखते हुए प्रोविजनिंग करनी होगी, भले ही अभी तक कोई डिफॉल्ट नहीं हुआ है।
Stage 2 – Under-Performing Loans (प्रदर्शन में गिरावट): इसमें वे लोन आते हैं जहां अभी 90 दिन नहीं हुए हैं, लेकिन बोरोअर ने भुगतान करना बंद कर दिया है। मान लीजिए किसी ने 30 दिन तक पेमेंट नहीं किया। अभी तो यह एनपीए नहीं है, लेकिन खतरे के संकेत हैं। इस केस में बैंक को Lifetime Expected Loss कैलकुलेट करना होगा और तुरंत प्रोविजनिंग करनी होगी।
Stage 3 – Credit Impaired (क्रेडिट खराब): यहां पर लोन पहले से ही डिफॉल्ट हो चुका है। 90 दिन से ज्यादा समय हो गया है या फिर डिफॉल्ट होने के बिल्कुल कगार पर है। ऐसे मामलों में बैंक को Full Lifetime Loss की प्रोविजनिंग करनी होगी। अगर ₹50 करोड़ का लोन है, तो पूरे ₹50 करोड़ को लॉस मानकर अपने प्रॉफिट से काटना होगा।
प्रोविजनिंग की गणना कैसे होगी
समझने वाली बात यह है कि प्रोविजनिंग की गणना तीन मुख्य factors के आधार पर होगी:
Probability of Default (PD) – डिफॉल्ट होने की संभावना क्या है? अगर किसी गरीब व्यक्ति को लोन दिया है तो संभावना ज्यादा हो सकती है। अगर किसी स्थिर नौकरी वाले IT प्रोफेशनल को दिया है तो कम।
Loss Given Default (LGD) – डिफॉल्ट होने पर कितना नुकसान होगा?
Exposure at Default (EAD) – डिफॉल्ट के समय कितना अमाउंट बकाया होगा?
इन तीनों के आधार पर mathematical calculation से प्रोविजनिंग की रकम तय होगी। पहले तो सिस्टम बहुत आसान था कि डिफॉल्ट हो गया, प्रोविजनिंग कर दो। अब यह काफी complex हो गया है।
Income Recognition में भी बदलाव
अब पेपर प्रॉफिट दिखाने का जमाना खत्म हो गया है। पहले क्या होता था – अगर किसी कंपनी ने पिछले 5 सालों से नियमित रूप से हर साल ₹10 करोड़ चुकाए हैं, तो बैंक साल की शुरुआत में ही मान लेता था कि इस साल भी ₹10 करोड़ आ जाएंगे। यह पेपर पर प्रॉफिट दिखा दिया जाता था।
लेकिन अब अगर थोड़ा भी रिस्क बढ़ा, तो Interest Income को कम करना होगा। बैंक inflate करके नहीं दिखा सकता कि इतना पैसा आने वाला है। जब actual में आएगा, तभी उसे income में गिना जाएगा।
Evergreening of Loans पर सख्ती
एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब लोन की evergreening नहीं हो सकेगी। यह क्या होता है? मान लीजिए किसी व्यक्ति ने क्रेडिट कार्ड पर ₹2 लाख खर्च कर दिए और अब चुका नहीं पा रहा। तो वह दूसरे क्रेडिट कार्ड से या किसी अन्य बैंक से लोन लेकर पहले वाले का भुगतान कर देता है।
यही चीज कंपनियां भी करती हैं। ₹5 करोड़ का लोन नहीं चुका पा रही हैं तो दूसरे बैंक से लोन लेकर पहले वाले को चुका देती हैं, ताकि डिफॉल्ट न हो। अब बैंकों को इस पर सख्ती से नजर रखनी होगी।
NPA Upgrade में सख्त नियम
अगर कोई बोरोअर 6 महीने तक भुगतान नहीं करता था और फिर वापस से भुगतान शुरू कर देता है, तो पहले उसे तुरंत Normal Category में रख दिया जाता था। अब ऐसा नहीं होगा। जब तक वह पूरा pending payment नहीं कर देता, तब तक उसे NPA Category में ही रखा जाएगा।
इसके अलावा, सभी बैंकों को एक uniform system अपनाना होगा। लोन classification और default classification सभी बैंकों में एक जैसा होगा।
PSU Banks के शेयर्स में गिरावट क्यों
शेयर मार्केट ने इस खबर पर नेगेटिव रिएक्शन दिया है। खासतौर पर PSU Banks के शेयर्स गिरे हैं। इसकी वजह साफ है – इस नए सिस्टम से बैंकों का Reported Profit कम हो जाएगा। ज्यादा provisioning करनी होगी, जिससे profit margins घटेंगे।
चिंता का विषय यह भी है कि बैंक अब उतनी आसानी से लोन नहीं दे पाएंगे। Capital पर pressure आएगा। System upgrade की cost भी उठानी होगी क्योंकि अब Data Analytics और AI की मदद से complex calculations करनी होंगी।
बैंकों पर Short Term और Long Term असर
Short Term में नुकसान:
- Profit में कमी आएगी
- Capital Adequacy Ratio पर दबाव बढ़ेगा
- Lending capacity घटेगी
- System upgrade का खर्च उठाना होगा
Long Term में फायदा:
देखा जाए तो लंबी अवधि में यह बदलाव फायदेमंद है। बैंकों की Balance Sheet मजबूत होगी। 2015 से 2018 के बीच जो huge losses हुए थे, उनकी पहले ही भनक नहीं लगी थी। बाद में जब सब सामने आया तो बहुत बड़ा झटका लगा। अब ऐसे shocks कम होंगे।
Lending Discipline आएगी। बैंक अब randomly risky लोगों को लोन नहीं देंगे। Proper risk assessment होगी। हैरान करने वाली बात यह है कि यह सिस्टम पहले से ही developed countries में लागू है और काफी successful रहा है।
ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप
आरबीआई का यह कदम भारतीय बैंकिंग को global accounting standards के करीब ले जाता है। IFRS 9 (International Financial Reporting Standards) के तहत यह model पहले से ही कई देशों में लागू है।
राहत की बात यह है कि RBI ने implementation के लिए लगभग एक साल का समय दिया है। 1 अप्रैल 2027 से यह लागू होगा, जिससे बैंकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल जाएगा।
आम आदमी पर क्या होगा असर
सवाल उठता है कि इस बदलाव का आम आदमी पर क्या असर होगा? शुरुआत में लोन लेना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। बैंक ज्यादा सावधानी बरतेंगे, ज्यादा documents मांगेंगे, income verification ज्यादा strict होगी।
लेकिन अगर आपकी financial profile अच्छी है, stable income है, तो आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। उल्टा, इससे बैंकिंग system ज्यादा stable होगा, जो लंबे समय में सभी के लिए अच्छा है।
2015-18 के संकट की पृष्ठभूमि
इस बदलाव को समझने के लिए 2015 से 2018 के बीच की स्थिति याद करनी होगी। उस दौरान भारतीय बैंकों के NPA का आंकड़ा खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था। Huge corporate loans डिफॉल्ट हो गए थे। लेकिन समस्या यह थी कि यह सब पहले दिखाई नहीं दे रहा था। बैंक अपनी balance sheets में ये losses छिपाते रहे।
जब सब कुछ सामने आया तो बैंकों को huge provisioning करनी पड़ी। शेयर प्राइस गिर गए। Depositors में panic फैल गया। इसी को देखते हुए RBI ने तय किया कि ऐसा forward-looking system लाया जाए जो पहले से ही problems को identify कर सके।
मुख्य बातें (Key Points)
- RBI ने Expected Credit Loss (ECL) Model की final guidelines जारी की हैं जो 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगी
- बैंकों को अब backward looking system से हटकर forward looking system अपनाना होगा
- तीन स्टेज ECL Model लागू होगा – Performing, Under-Performing, और Credit Impaired loans के लिए अलग-अलग provisioning
- 90 दिन का NPA नियम वैसा ही रहेगा लेकिन provisioning 90 दिन से पहले ही करनी होगी
- PSU Banks के शेयर्स में गिरावट देखी गई क्योंकि short term में profit margins घटेंगे
- Long term में यह banking system को मजबूत बनाएगा और lending discipline लाएगा
- Evergreening of loans और paper profit दिखाने पर सख्त रोक लगेगी
- बैंकों को Probability of Default, Loss Given Default और Exposure at Default के आधार पर provisioning calculate करनी होगी













