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The News Air - Breaking News - Petrol Price Hike 2026: ₹77,280 करोड़ मुनाफे के बाद भी क्यों बढ़ रहे दाम?

Petrol Price Hike 2026: ₹77,280 करोड़ मुनाफे के बाद भी क्यों बढ़ रहे दाम?

तेल कंपनियों ने कमाए हजारों करोड़, लेकिन मिडिल क्लास की जेब हो रही खाली - जानें पूरा सच

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
बुधवार, 3 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, बिज़नेस
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Petrol Price Hike 2026
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Petrol Price Hike: देश की तीन सबसे बड़ी तेल कंपनियों Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL ने वित्त वर्ष 2026 में ₹77,280 करोड़ का बंपर मुनाफा कमाया है। लेकिन इसी दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं और कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम पांच महीने में 84 फीसदी बढ़ गए हैं। मिडिल क्लास पर महंगाई का तिहरा प्रहार हो रहा है।

देखा जाए तो 2026 की शुरुआत भारतीय मध्यम वर्ग के लिए महंगाई के तूफान लेकर आई है। एक पुरानी कहावत है कि मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, लेकिन इस बार तो मुसीबतें बंडल पैक में आ रही हैं। पेट्रोल, डीजल और कमर्शियल LPG – तीनों की कीमतों में एक साथ उछाल ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।

दिलचस्प बात यह है कि ये सारे झटके उस वक्त लगे हैं जब तेल कंपनियों की बैलेंस शीट हरी-भरी हो रही है। सवाल उठता है – क्या यह ग्लोबल संकट है या पॉलिसी का ब्लंडर?

🔍 यह भी पढ़ें- Petrol Diesel Price Hike: CM Vijay ने केंद्र पर साधा निशाना, चुनाव बाद दाम बढ़ाना अन्याय

पेट्रोल-डीजल की कीमतें: 4 साल बाद टूटा बर्फ

मई 2022 से लेकर अप्रैल 2026 तक लगातार 49 महीनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें जमी हुई थीं। दुनिया में युद्ध होते रहे, कच्चे तेल के दाम ऊपर-नीचे होते रहे, लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें टस से मस नहीं हुईं।

अब ध्यान देने वाली बात यह है कि यह स्थिरता कब तक बनी रही। असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव खत्म होने के ठीक 16 दिन बाद ही कीमतों में इजाफा शुरू हो गया।

सिर्फ दो हफ्तों में पेट्रोल ₹7.5 प्रति लीटर से ज्यादा महंगा हो गया। दिल्ली में इस समय पेट्रोल ₹102 से ऊपर मिल रहा है। RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी के सदस्य राम सिंह ने तो चुनाव से पहले ही साफ-साफ कहा था कि यह प्राइस फ्रीज केवल राजनीतिक है और चुनाव के बाद झटका लगना तय है।

कमर्शियल गैस सिलेंडर: 5 महीने में 84% की छलांग

अगर गौर करें तो सबसे घातक वार कमर्शियल गैस सिलेंडर पर हुआ है, जिस पर सामान्यतः लोग कम चर्चा करते हैं। जनवरी 2026 में कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹1,691.50 का था। 1 जून 2026 को यह ₹3,113.50 हो गया। यानी सिर्फ पांच महीनों में 84 फीसदी की ऐतिहासिक वृद्धि।

यह वृद्धि केवल ढाबा मालिकों की समस्या नहीं है। फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FHRAI) ने चेतावनी दी है कि अगर कीमतें ₹3,500 पार कर गईं तो देश के 30% छोटे रेस्टोरेंट और ढाबे 6 महीने के अंदर-अंदर बंद हो जाएंगे।

समझने वाली बात यह है कि आप भले ही घर पर डोमेस्टिक सिलेंडर इस्तेमाल करते हों, लेकिन दफ्तर के नीचे चाय पीते हैं, वीकेंड पर ढाबे पर खाना खाते हैं या बेकरी से ब्रेड लेते हैं – वहां यही कमर्शियल सिलेंडर इस्तेमाल होता है। जब दुकानदारों की इनपुट कॉस्ट 84% बढ़ेगी तो वह घाटा आपकी जेब से ही वसूलेंगे।

🔍 यह भी पढ़ें- Petrol Price Hike: ₹100 के पार पेट्रोल, PNG-CNG की सब्सिडी खत्म, मिडिल क्लास की जेब पर डबल अटैक

छोटू सिलेंडर: गरीबों पर एक और प्रहार

5 किलो वाला छोटू सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं फुटपाथ पर रेड़ी लगाने वाले, चाय बेचने वाले, छोटे कैटरर्स और वे छात्र जो शहरों में कमरा लेकर रहते हैं। 1 मई को एक झटके में इस सिलेंडर को ₹261 महंगा कर दिया गया। दिल्ली में इसकी रिफिलिंग अब ₹354.50 की हो रही है।

एक छोटे चाय वाले या ढाबे वाले का कैलकुलेशन देखिए:

विवरणपुरानी लागतनई लागतवृद्धि
प्रति सिलेंडर₹93.50 (लगभग)₹354.50₹261
महीने में 60 सिलेंडर₹33,600₹49,290₹15,690

यानी एक छोटे दुकानदार की मासिक लागत ₹15,690 बढ़ गई है। यह बोझ वह अपनी जेब से तो नहीं उठाएगा – आखिरकार आपकी चाय की कीमत बढ़ेगी।

🔍 यह भी पढ़ें- CNG Price Hike: 15 दिन में चौथा झटका, Petrol 100 पार

तेल कंपनियों का मुनाफा: रिकॉर्ड तोड़ कमाई

अब बात करते हैं उस विरोधाभास की जो इस पूरे मामले को और भी संदिग्ध बनाता है। सरकार और तेल कंपनियां लगातार एक नैरेटिव बेच रही हैं कि वे घाटे में हैं। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, इसलिए दाम बढ़ाना जरूरी है।

लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं:

कंपनीFY 2024 मुनाफाFY 2026 मुनाफाQ4 FY26 (YoY वृद्धि)
IOC + BPCL + HPCL₹81,000 करोड़₹77,280 करोड़₹19,470 करोड़ (41% ↑)

वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में इन कंपनियों ने ₹19,470 करोड़ का मुनाफा कमाया, जो साल-दर-साल 41% की वृद्धि दिखाता है। शेयर बाजार में इनके स्टॉक्स रॉकेट बने हुए हैं।

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यहां ध्यान देने वाली बात है – जब मुनाफा कॉर्पोरेट्स का हो और घाटा जनता का, तो क्या यही हमारा नया आर्थिक मॉडल है?

कंपनियों की दोहरी चाल: मुनाफे का गणित

इन कंपनियों के मुख्यतः दो वर्टिकल होते हैं:

1. रिफाइनिंग: कच्चा तेल खरीदना और उसे रिफाइन करना। इसमें ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) इतना तगड़ा रहा कि कंपनियों ने छप्पर फाड़ कमाई की।

2. मार्केटिंग: पेट्रोल पंप और रिटेल में तेल बेचना।

कंपनियों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चा तेल $69 प्रति बैरल से उछलकर $113-114 प्रति बैरल तक पहुंच गया। इसी वजह से उन्हें पेट्रोल पर ₹20 और डीजल पर ₹100 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।

लेकिन यहां पेंच है – जब अक्टूबर 2023 से दिसंबर 2024 तक कच्चे तेल के दाम गिरकर $74 प्रति बैरल आ गए थे, तो उस समय पेट्रोल-डीजल के दाम घटाए थे क्या? बिल्कुल नहीं। HPCL ने खुद स्वीकार किया कि उस तिमाही में उनका मुनाफा तीन गुना बढ़ गया था।

कंपनियों का गेम प्लान बेहद सिंपल और क्रूर है:

  • जब कच्चा तेल सस्ता हो → कीमत मत घटाओ, प्राइस फ्रीज रखो और रिकॉर्ड मुनाफा कमाओ
  • जब तेल महंगा हो → अंडर रिकवरी का रोना रोओ और सारा बोझ जनता पर डाल दो
घरेलू vs कमर्शियल LPG: राजनीतिक दांवपेच

घरेलू LPG (14.2 kg वाला लाल सिलेंडर) सरकार पॉलिटिकली सेंसिटिव मानती है क्योंकि वहां सीधे वोट बैंक का कनेक्शन है। इसीलिए उसे सब्सिडी देकर ₹913 पर फ्रीज करके रखा गया है।

लेकिन कमर्शियल LPG का कोई चुनावी सुरक्षा कवच नहीं है। इसे सीधे मार्केट लिंक कर दिया गया। यानी कॉर्पोरेट के घाटे की भरपाई उस छोटे दुकानदार और मिडिल क्लास से की जा रही है जो पलटकर सवाल नहीं पूछता।

💡 यह भी पढ़ें- LPG Price Today: गैस सिलेंडर ₹60 महंगा, बुकिंग के नियम भी बदले

टाइमिंग का खेल: चुनाव और कैलकुलेटर

टाइमिंग इतनी सटीक है कि कोई भी फिल्म डायरेक्टर रीटेक नहीं लेगा। 49 महीनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहीं। क्यों? क्योंकि देश में तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं तय करता, बल्कि चुनाव आयोग का इलेक्शन शेड्यूल तय करता है।

जब तक राज्यों में चुनाव का शोर रहता है, तेल कंपनियों का घाटा अदृश्य रहता है। लेकिन जैसे ही EVM पर जनता का वोट लॉक होता है, तेल कंपनियों का कैलकुलेटर अनलॉक हो जाता है।

Nayara Energy जैसी प्राइवेट रिफाइनर ने मार्च 2026 से ही अपने प्राइसेस हाइक करने शुरू कर दिए थे। लेकिन सरकारी कंपनियों ने इंतजार किया – जनता के वोट डालने का। राजनीति का यह चक्रवात बार-बार घूमता है और इसके केंद्र में पिसता है मिडिल क्लास।

टैक्स का जाल: आधा लीटर पेट्रोल, आधा लीटर टैक्स

पेट्रोल की कीमत का ब्रेकअप देखिए:

घटकराशि (लगभग)
बेस प्राइस (कच्चा तेल + रिफाइनिंग)₹45-50
सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी₹19.90
डीलर कमीशन₹4
स्टेट VAT (दिल्ली)₹15-16
कुल (लगभग)₹85-90

इस टेबल को देखकर साफ होता है – पेट्रोल की कीमत का लगभग 50% हिस्सा सिर्फ टैक्स है। यानी आधा लीटर पेट्रोल और आधा लीटर टैक्स।

सरकार कहती है कि आपदा के समय टैक्स बढ़ाना पड़ता है। लेकिन अप्रैल 2025 में केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी ₹2 प्रति लीटर बढ़ा दी। फिर मार्च 2026 में पश्चिम एशिया संकट आने पर टैक्स में ₹10 की कटौती की गई।

रुकिए – यह कटौती आम उपभोक्ताओं के लिए नहीं थी। यह ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के घाटे को पाटने के लिए कॉर्पोरेट राहत थी। मई 2026 में एक्साइज ड्यूटी फिर से ₹2 बढ़ा दी गई।

GST का सवाल: क्यों नहीं आती राहत?

सवाल उठता है – पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता? वित्त मंत्री कहती हैं कि वह तैयार हैं लेकिन राज्य सरकारें तैयार नहीं हैं।

अब भारत का पॉलिटिकल मैप देखिए – मैक्सिमम स्टेट्स BJP शासित हैं। लेकिन चाहे BJP शासित राज्य हो या विपक्ष शासित, कोई भी अपना VAT यानी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी छोड़ना नहीं चाहता।

अगर पेट्रोल-डीजल को अधिकतम GST स्लैब (28%) में भी ले आया जाए तो आज पेट्रोल की कीमत ₹20-25 प्रति लीटर कम हो जाएगी। लेकिन कोऑपरेटिव फेडरलिज्म की बातें केवल किताबों में अच्छी लगती हैं। जब रेवेन्यू की बात आती है तो सभी जनता की जेब की तरफ देखने लगते हैं।

मिडिल क्लास पर कुल प्रभार: सालाना ₹22,000 का बोझ

महंगाई की मार वास्तव में “Death by 1000 cuts” जैसी है। धीरे-धीरे हर तरफ से मारने जैसी। अगर केवल मंथली एडिशंस को कैलकुलेट करें:

मदमासिक वृद्धिवार्षिक वृद्धि
कार/बाइक फ्यूल₹300-500₹3,600-6,000
डेली कम्यूट (ऑटो/कैब/स्कूल वैन)₹200-400₹2,400-4,800
ग्रोसरी और सब्जियां (डीजल प्राइस इफेक्ट)₹200-400₹2,400-4,800
डाइनिंग और डिलीवरी₹300-600₹3,600-7,200
कुल (न्यूनतम)₹1,000-1,900₹12,000-22,800

न्यूनतम अनुमान के हिसाब से भी एक मध्यम वर्गीय परिवार पर सालाना ₹12,000 से ₹22,000 का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। क्या आपकी सैलरी उसी रफ्तार से बढ़ रही है?

भारत का 65% माल परिवहन सड़कों के जरिए होता है। जब डीजल का दाम बढ़ता है तो सुई से लेकर स्टील तक सब कुछ महंगा होता है।

मिडिल क्लास की त्रासदी: न गरीब, न अमीर

भारतीय मिडिल क्लास की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह इतना गरीब नहीं है कि सरकार उसे अपनी मुफ्त योजनाओं का लाभार्थी बना दे। और वह इतना अमीर भी नहीं है कि उसे ₹100-200 के पेट्रोल-डीजल से फर्क न पड़े।

वह ईमानदारी से टैक्स भरता है। लेकिन जब रिटर्न की बात आती है तो उसे मिलता है – महंगा तेल, महंगी शिक्षा, महंगा भोजन। वह न तो अपनी कॉस्ट को किसी और पर फॉरवर्ड कर सकता है (क्योंकि वह सैलरीड एंप्लॉई है) और न ही सड़कों पर उतरकर आंदोलन करता है।

सरकार का तर्क: अंडर रिकवरी का सच

सरकार के विश्लेषक तर्क देते हैं कि अंडर रिकवरी को भी देखिए – कंपनियों ने पुराना घाटा सहा है। इस आधे सच को पूरा करते हैं।

जब अक्टूबर 2023 से दिसंबर 2024 तक कच्चे तेल के दाम गिरकर $74 प्रति बैरल आ गए थे, तो उस समय कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम घटाए थे क्या? बिल्कुल नहीं।

HPCL ने खुद स्वीकार किया कि उस तिमाही में उनका मुनाफा तीन गुना बढ़ गया था। कंपनियों का गेम प्लान बेहद सिंपल है:

  • जब कच्चा तेल सस्ता हो → प्राइस फ्रीज रखो और रिकॉर्ड मुनाफा कमाओ
  • जब तेल महंगा हो → अंडर रिकवरी का रोना रोओ और सारा बोझ जनता पर डालो
कमर्शियल सिलेंडर: बिना नाटक के मार

कमर्शियल सिलेंडर पर तो कोई प्राइस फ्रीज का नाटक भी नहीं था। वहां हर महीने की 1 तारीख को सीधे बाजार लिंक्ड रिवीजन हो जाता है। जब वैश्विक कीमतें बढ़ीं तो बिना किसी बफर के सीधे उपभोक्ताओं की गर्दन पर तलवार चला दी गई।

यही कारण है कि आज कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹3,113 पर आकर खड़ा है। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया की मांग जायज है कि छोटे फूड वेंडर्स और ढाबों के लिए कमर्शियल गैस पर टैक्स घटाया जाना चाहिए। वरना जो दुकानें बंद होंगी, वे बड़े पैमाने पर बेरोजगारी का संकट पैदा करेंगी।

समाधान: क्या किया जा सकता है?

समस्याएं गंभीर हैं, लेकिन समाधान भी मौजूद हैं:

1. पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाना: यह कोई विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी होनी चाहिए। राज्य और केंद्र को अपनी जिद छोड़कर आम सहमति बनानी चाहिए।

2. कमर्शियल LPG का टैक्स रैशनलाइजेशन: छोटे फूड वेंडर्स और ढाबों के लिए कमर्शियल गैस पर टैक्स घटाया जाना चाहिए।

3. पारदर्शी मूल्य निर्धारण: डेली प्राइस रिवीजन का फॉर्मूला ईमानदारी से लागू किया जाए। जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल सस्ता हो तो उसका फायदा तुरंत जनता को ट्रांसफर होना चाहिए।

पूरे मामले की पृष्ठभूमि

भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। वैश्विक संकट और भू-राजनीतिक हालात को भी समझा जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जब संकट आता है तो सारा त्याग, सारा बलिदान सिर्फ देश के मिडिल क्लास के हिस्से में क्यों आता है?

पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं – यह सच है। लेकिन यह भी सच है कि कंपनियों ने 11 हफ्ते तक इस घाटे को देखा और फिर एक झटके में जनता पर ट्रांसफर कर दिया।

जब कंपनियों की बैलेंस शीट में हजारों करोड़ का मुनाफा दिखाया जा रहा है और आपके घर के बजट में छेद हो रहे हैं, तो कहीं न कहीं सिस्टम में गड़बड़ी है।


मुख्य बातें (Key Points)

• तीन बड़ी तेल कंपनियों (IOC, BPCL, HPCL) ने FY26 में ₹77,280 करोड़ का मुनाफा कमाया, जबकि Q4 में 41% YoY वृद्धि दर्ज की गई

• 49 महीनों की स्थिरता के बाद चुनाव के 16 दिन बाद पेट्रोल ₹7.5/लीटर महंगा हुआ, दिल्ली में अब ₹102+ पर

• कमर्शियल LPG सिलेंडर 5 महीने में 84% बढ़कर ₹3,113.50 हो गया, जिससे 30% छोटे रेस्टोरेंट बंद होने की चेतावनी

• पेट्रोल की कीमत का 50% हिस्सा टैक्स है – बेस प्राइस ₹45-50, लेकिन कुल ₹85-90 देना पड़ता है

• मिडिल क्लास पर सालाना ₹12,000-22,000 का अतिरिक्त बोझ, जबकि सैलरी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रही


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: पेट्रोल-डीजल की कीमतें 4 साल तक स्थिर क्यों रहीं?

चुनावी राजनीति के कारण मई 2022 से अप्रैल 2026 तक 49 महीनों तक कीमतें फ्रीज रखी गईं। विधानसभा चुनाव खत्म होने के 16 दिन बाद ही दाम बढ़ाए गए। RBI के सदस्य राम सिंह ने पहले ही कहा था कि यह प्राइस फ्रीज राजनीतिक है।

प्रश्न 2: तेल कंपनियां मुनाफे में हैं फिर भी कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

FY26 में तीन बड़ी कंपनियों ने ₹77,280 करोड़ का मुनाफा कमाया। वे रिफाइनिंग में तगड़ा मार्जिन कमाती हैं, लेकिन मार्केटिंग सेगमेंट में घाटा दिखाकर कीमतें बढ़ाती हैं। जब कच्चा तेल सस्ता होता है तब दाम नहीं घटाते, लेकिन महंगा होने पर तुरंत बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 3: पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता?

अगर पेट्रोल-डीजल को 28% GST स्लैब में लाया जाए तो कीमतें ₹20-25 प्रति लीटर कम हो सकती हैं। लेकिन केंद्र और राज्य दोनों को VAT और एक्साइज ड्यूटी से भारी रेवेन्यू मिलता है। कोई भी सरकार (चाहे केंद्र हो या राज्य) यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी छोड़ना नहीं चाहती।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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