Madhya Pradesh Development: भारत के ठीक बीचोंबीच बसा मध्य प्रदेश जिसे हम गर्व से “हार्ट ऑफ इनक्रेडिबल इंडिया” कहते हैं, आज गवर्नेंस और ह्यूमन डेवलपमेंट के मामले में देश की प्रगति की दौड़ में कहीं पीछे छूटता जा रहा है। जब हम ग्लोबली भारत को आर्थिक सुपरपावर बनाने के सपने देख रहे हैं, तो देश के सबसे सेंट्रल स्टेट का यह हाल क्यों है?
देखा जाए तो हाल ही की न्यूज हेडलाइंस मध्य प्रदेश की एक कड़वी तस्वीर पेश कर रही हैं। The Print की रिपोर्ट बताती है कि सीनियर सिटीजंस के खिलाफ क्राइम में MP वर्स्ट परफॉर्मर्स में से एक है। Times of India के मुताबिक राज्य की बिजली कंपनियां ₹71,000 करोड़ के घाटे में डूब रही हैं। और सबसे चौंकाने वाली बात – The Indian Express के डाटा के अनुसार देश में सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate) मध्य प्रदेश में है।
दिलचस्प बात यह है कि जब दुनिया भर के एनालिस्ट इन हेडलाइंस को देखते हैं तो एक सिंपल निष्कर्ष निकाल लेते हैं – “मध्य प्रदेश एक फेल हो चुका स्टेट है और नेशनल पॉलिटिक्स में इररेलेवेंट है।” लेकिन क्या वाकई यह सच है?
अगर गौर करें तो मध्य प्रदेश इररेलेवेंट नहीं है, बल्कि उसे जानबूझकर एक ऐसे पैटर्न में धकेल दिया गया है जहां उसकी तकलीफें हेडलाइंस तो बनती हैं पर पॉलिसी मेकर्स के लिए चैलेंज नहीं बन पातीं।
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शिशु मृत्यु दर: देश में सबसे खराब स्थिति
अगर कोई राज्य अपने पैदा होने वाले बच्चों और बुजुर्गों को जिंदा और महफूज नहीं रख सकता, तो वहां की हर इन्वेस्टमेंट समिट और इंडस्ट्रियल पार्क सिर्फ एक धोखा है।
रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के SRS डाटा के मुताबिक मध्य प्रदेश इनफेंट मोर्टैलिटी रेट के मामले में पूरे देश में सबसे खराब परफॉर्म कर रहा है। हर 1,000 जिंदा पैदा होने वाले बच्चों में से 40 बच्चे अपना पहला साल पूरा नहीं कर पाते। जबकि नेशनल एवरेज लगभग 26 से 32 के बीच आता है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस क्राइसिस में एक और खतरनाक सच छुपा है – जेंडर असमानता। मध्य प्रदेश में फीमेल इनफेंट मोर्टैलिटी रेट और भी ज्यादा चिंताजनक है। जिसका मतलब है कि एक तो वैसे ही नियोनेटल केयर सिस्टम खराब है, ऊपर से बेटियां पैदा होते ही इस सिस्टमिक कोलैप्स का सबसे पहला शिकार बनती हैं।
समझने वाली बात है कि ये मौतें किसी ऐसी बीमारी से नहीं हो रही जिसका कोई इलाज न हो। प्रीमेच्योर बर्थ्स, निमोनिया, सेप्सिस, कुपोषण और बर्थ एस्फिक्सिया – ये सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें एक बेसिक फंक्शनल प्राइमरी हेल्थ केयर सिस्टम आराम से रोक सकता है।
| राज्य/क्षेत्र | शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000) |
|---|---|
| मध्य प्रदेश | 40 |
| राष्ट्रीय औसत | 26-32 |
| सर्वश्रेष्ठ राज्य (केरल लगभग) | 6-8 |
सरकार करोड़ों रुपए स्कीम्स में लगा देती है – चाहे एनीमिया मुक्त भारत हो या न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन सेंटर्स। लेकिन ग्राउंड लेवल पर डिलीवरी मैकेनिज्म्स बिल्कुल गायब हैं। मनी इज एलोकेटेड बट आउटकम इज एक्चुअली जीरो।
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बुजुर्गों पर बढ़ते अपराध: एक और शर्मनाक रिकॉर्ड
National Crime Records Bureau (NCRB) की रिपोर्ट साफ दिखाती है कि साल 2024 के आते-आते सीनियर सिटीजंस के खिलाफ क्राइम्स में 17% का उछाल देखा गया। मध्य प्रदेश 2022 से ही लगभग सबसे वर्स्ट परफॉर्मर्स की लिस्ट में बना हुआ है।
जो राज्य अपने बच्चों को पोषण और इलाज नहीं दे पा रहा, अपने बुजुर्गों को सेफ एनवायरमेंट नहीं दे पा रहा – उसे एडमिनिस्ट्रेटिव फेलियर नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे?
और यह सब अचानक नहीं हुआ। यह कई दशकों की पॉलिसी नेग्लेक्ट और ब्यूरोक्रेटिक कॉम्प्लेसेंसी का नतीजा है, जहां सिविल सोसाइटी और गवर्नेंस के बीच का कॉन्ट्रैक्ट पूरी तरह टूट चुका है।
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पावर सेक्टर: ₹71,000 करोड़ का घाटा
अब जो लोग सामाजिक विकास के इंडिकेटर्स को फालतू मानते हैं और कहते हैं कि सिर्फ GDP और इंफ्रास्ट्रक्चर दिखाओ, तो चलिए हार्ड कोर मैक्रोइकोनॉमिक्स की बात कर लेते हैं।
किसी भी राज्य की इंडस्ट्रियल प्रोग्रेस, फार्मिंग और मॉडर्न इकॉनमी का सबसे बड़ा ड्राइवर होता है उसका पावर सेक्टर। अगर आपका पावर सेक्टर स्टेबल है तो इंडस्ट्री आएगी। अगर वह खुद कर्जे में डूबा है तो पूरी इकॉनमी को मजेदार में फंसा देगा।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश की पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां (Discoms) लगभग ₹71,000 करोड़ के घाटे से ब्लीड कर रही हैं। यह कोई छोटा-मोटा लॉस नहीं है – यह राज्य के पूरे बजट को पैरालाइज करने के लिए काफी है।
मध्य प्रदेश पूरे देश में फोर्थ वर्स्ट नेशनली रैंक कर रहा है इस मामले में। भारत के बाकी राज्यों ने पिछले वित्तीय वर्ष में अपने एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल लॉसेस (AT&C Losses) को लगभग 15% से कम कर दिया। लेकिन मध्य प्रदेश इस नेशनल एवरेज से बहुत पीछे छूट गया है।
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| कुल Discom घाटा | ₹71,000 करोड़ |
| राष्ट्रीय रैंकिंग | 4th Worst |
| AT&C Loss | राष्ट्रीय औसत से अधिक |
| अनमीटर्ड सप्लाई | लगभग 30,000 MW (कुल का 40%) |
घाटे का सबसे बड़ा कारण है स्ट्रक्चरल करप्शन और एडमिनिस्ट्रेटिव इनकम्पिटेंस। मध्य प्रदेश के एनुअल रेवेन्यू रिक्वायरमेंट पिटीशन में साफ स्वीकार किया गया है कि बिजली का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनमीटर्ड एग्रीकल्चरल सेल्स में जाता है।
अगर प्रोजेक्टेड सेल 80,000 मेगावाट की है तो उसमें से लगभग 30,000 मेगावाट सिर्फ अनमीटर्ड एग्रीकल्चर सप्लाई दिखाई जाती है। इसका मतलब यह कि आपको बेसिकली पता ही नहीं है कि ऑलमोस्ट 40% बिजली जो राज्य में बन रही है वो जा कहां रही है।
टेक्निकल सिस्टम ओवरलोड, डायरेक्ट थेफ्ट, पुअर बिलिंग, इनएफिशिएंसी और नो मीटरिंग – ये चार दुश्मन हैं जो मध्य प्रदेश के एनर्जी सेक्टर को अंदर से खाते जा रहे हैं। जब राज्य रेगुलेटरी कमीशंस बार-बार कहते हैं कि हर एग्रीकल्चरल कंज्यूमर को मीटर करो, तब भी सालों तक जमीन पर कोई प्रोग्रेस नहीं दिखता।
यह एडमिनिस्ट्रेटिव लीकेज है। यह टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली लूट है जो इनएफिशिएंट सिस्टम्स को फीड करने के लिए बर्बाद की जा रही है।
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BIMARU का कांसेप्ट: क्या है इसका इतिहास?
जो लोग इकोनॉमिक्स और डेमोग्राफी के स्टूडेंट हैं, वे जानते हैं कि यह टर्म “BIMARU” 1980 के मध्य में प्रसिद्ध डेमोग्राफर आशीष बोस ने कॉइन की थी।
BIMARU का मतलब:
- B = Bihar (बिहार)
- M = Madhya Pradesh (मध्य प्रदेश)
- R = Rajasthan (राजस्थान)
- U = Uttar Pradesh (उत्तर प्रदेश)
ये हमारे देश की वो राज्य हुआ करती थीं जो भारत की पॉपुलेशन और टेरिटरी का एक बहुत बड़ा हिस्सा होल्ड करते थे। पर इनकी इकोनॉमिक ग्रोथ, साक्षरता, हेल्थ केयर और इंफ्रास्ट्रक्चर इतनी खराब थी कि पूरे देश की ग्रोथ को नीचे धकेल देती थी।
लेकिन आज जब हम साल 2026 में खड़े हैं तो सवाल उठता है – क्या आज भी ये सभी राज्य उसी दलदल में हैं?
बाकी BIMARU राज्यों का ट्रांजिशन
उत्तर प्रदेश का बदलाव: Uttar Pradesh ने पिछले कुछ सालों में एक्सप्रेसवेज (गंगा एक्सप्रेसवे, विंध्य एक्सप्रेसवे), डिफेंस कॉरिडोर्स और स्टेट लेड कैपिटल एक्सपेंडिचर के जरिए खुद को इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन के रूप में रिब्रांड कर दिया है। हां, अभी भी काफी काम करना बाकी है, लेकिन उन्होंने अपना वो BIMARU वाला टैग काफी हद तक शिफ्ट कर दिया है।
राजस्थान की छलांग: Rajasthan ने सोलर एनर्जी और टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा रेवोल्यूशन किया है। उन्होंने प्राइमरी हेल्थ और सोशल सिक्योरिटी पर काफी एग्रेसिव टार्गेटिंग की है, जिससे इनके वेलफेयर इंडिकेटर्स काफी हद तक इंप्रूव हुए हैं।
बिहार की पॉलिटिकल विजिबिलिटी: Bihar अभी भी इकोनॉमिकली स्ट्रगल कर रहा है, इसमें कोई शक नहीं। पर इनकी पॉलिटिकल विजिबिलिटी और सोशल इंजीनियरिंग इतनी तीखी है कि पूरे देश का पॉलिसी फोकस हमेशा इन पर बना रहता है। बिहार दिल्ली में बैठे बाबुओं को अपनी स्टेट इग्नोर नहीं करने देता।
| राज्य | परिवर्तन की स्थिति | मुख्य उपलब्धि |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | महत्वपूर्ण सुधार | एक्सप्रेसवेज, डिफेंस कॉरिडोर, इन्वेस्टमेंट |
| राजस्थान | ठोस प्रगति | सोलर एनर्जी, टूरिज्म, हेल्थकेयर |
| बिहार | राजनीतिक दृश्यता | मजबूत पॉलिटिकल वॉयस, नेशनल फोकस |
| मध्य प्रदेश | स्थिर/पिछड़ा | BIMARU टैग अभी भी मौजूद |
जब बाकी राज्यों को इस स्टिग्मा से निकलते देखते हैं तो मध्य प्रदेश का ग्राफ देखकर दुख होता है। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स और इनफेंट मोर्टैलिटी के मामले में मध्य प्रदेश आज भी उसी पुरानी दलदली जमीन पर खड़ा है।
यह पूरे भारत का एक कड़वा सच है कि मध्य प्रदेश फास्ट बिकमिंग द लास्ट बेस्शन ऑफ क्लासिक BIMARU सिंड्रोम।
रिसोर्स रिच, लेकिन फिर भी गरीब
दिलचस्प बात यह है कि मध्य प्रदेश को “डायमंड स्टेट” कहा जाता है। पूरे देश की 15% मिनरल वेल्थ मध्य प्रदेश में है और डायमंड प्रोडक्शन में यहां मोनोपॉली है।
चाहे वो मिनरल वेल्थ हो, फॉरेस्ट कवर हो या एग्रीकल्चरल पोटेंशियल – यहां का कॉमन सिटीजन आज भी उन्हीं बेसिक फैसिलिटीज के लिए तरस रहा है जो बाकी राज्य अब सीमलेसली डिलीवर कर पा रहे हैं।
इनस्पाइट ऑफ ऑल द रिसोर्सेज दैट दे हैव। यह कंपेरिजन बताता है कि प्रॉब्लम न मध्य प्रदेश की ज्योग्राफी या रिसोर्सेज की है, बल्कि एडमिनिस्ट्रेटिव विल पावर की है।
पॉलिटिकली इररेलेवेंट क्यों कहा जाता है MP को?
पहले तो यह साफ कर दें कि डाटा के अनुसार यह बात पूरी तरह गलत है। मध्य प्रदेश से लोकसभा में 29 सीट्स आती हैं और यह कोई छोटा-मोटा नंबर नहीं है। सेंट्रल गवर्नमेंट बनाने में मध्य प्रदेश का बहुत बड़ा और डिसाइसिव रोल रहता है।
तो फिर पॉलिटिकल एनालिस्ट और नेशनल मीडिया इसे इररेलेवेंट क्यों कहती है? इसका सबसे बड़ा रीज़न है – साइलेंट सबसर्वियंस सिंड्रोम (शांत और आज्ञाकारी होने की बीमारी)।
साउथ इंडियन राज्यों का मॉडल: साउथ की स्टेट्स जब सेंटर से बात करती हैं तो वे अपनी हाई GDP और हाई टैक्स कंट्रीब्यूशन के दम पर बहुत एग्रेसिवली नेगोशिएट करते हैं। इसी अग्रेशन से वे नेशनल नैरेटिव को अपने फेवर में पुश करवाते हैं।
यूपी-बिहार का वोलैटाइल पॉलिटिक्स: उत्तर प्रदेश और बिहार की पॉलिटिक्स इतनी अनप्रेडिक्टेबल होती है कि वहां का एक छोटा सा पॉलिटिकल शिफ्ट दिल्ली की कुर्सी को हिला देता है। नेशनल मीडिया इन राज्यों में 24 घंटे कैमरा लेकर बैठी रहती है।
पंजाब और बॉर्डर स्टेट्स: पंजाब या दूसरे बॉर्डर राज्य अपनी जियोपॉलिटिक्स और आइडेंटिटी ड्रिवन सोशल मूवमेंट्स के दम पर हमेशा स्पॉटलाइट में रहते हैं।
लेकिन जब बात आती है मध्य प्रदेश की – इसे नेशनल पॉलिटिक्स में एक बहुत सेफ और प्रेडिक्टेबल सीट मान लिया गया है। यहां वोटर्स के बीच कोई एग्रेसिव रीजनल सबनेशनलिज्म नहीं दिखता। यहां लोग काफी शांत हैं और यहां की पॉलिटिक्स दो बड़ी पार्टियों के बीच एक साइलेंट और प्रेडिक्टेबल पैटर्न पर चल रही है।
इस सब का सबसे भयानक नुकसान यह होता है कि जब मध्य प्रदेश के वोटर्स एडमिनिस्ट्रेटिव फेलियर्स पर सरकार को रूथलेसली पनिश नहीं करते, तो पॉलिटिशियंस के लिए इस राज्य का डेवलपमेंट इररेलेवेंट होना शुरू हो जाता है।
जब इलेक्शन सिर्फ रूटीन मैनेजमेंट के जरिए जीता जा सकता है तो ₹71,000 करोड़ के Discom लॉसेस को क्यों फिक्स किया जाए? जब वोटर्स 40 बच्चों की मौत को किस्मत का खेल मान लेते हैं तो हेल्थकेयर रिफॉर्म्स सरकार की प्रायोरिटी लिस्ट में सबसे नीचे जाएंगे ही।
मध्य प्रदेश देश के लिए इररेलेवेंट नहीं है। अफसोस की बात यह है कि वो खुद के लिए साइलेंट हो गया है। उसका अपना नैरेटिव, उसकी अपनी तकलीफें नेशनल स्टेज पर बार्गेनिंग चिप बन ही नहीं पातीं।
समाधान: क्या किया जा सकता है?
मध्य प्रदेश एक सोया हुआ शेर है – बस सही जगह पर स्ट्राइक करने की जरूरत है। समाधान इतने कॉम्प्लिकेटेड नहीं हैं, लेकिन उन्हें इंप्लीमेंट करने के लिए आयरन विल चाहिए।
1. ग्रैन्युलर फिस्कल डिसिप्लिन: जब तक हर एग्रीकल्चरल डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर पर मीटर नहीं लगाएंगे, जब तक पावर थेफ्ट और एडमिनिस्ट्रेटिव करप्शन को जीरो नहीं करेंगे, तब तक ये ₹71,000 करोड़ का घाटा पूरे राज्य के बजट को खाता रहेगा। इनएफिशिएंसीज को फ्री बीज का नाम देना बंद करना पड़ेगा।
2. ग्रासरूट हेल्थकेयर मॉडल्स: धकोनी और गरौली ग्राम पंचायत जैसी आइसोलेटेड सक्सेस स्टोरीज से सीखना होगा। ये दो छोटी पंचायतें लगातार 2 साल तक जीरो इनफेंट मोर्टैलिटी रेट अचीव कर सकती हैं तो पूरा राज्य क्यों नहीं कर सकता? इसे केस स्टडी बनाया जाए। टॉप डाउन ब्यूरोक्रेसी की जगह बॉटम अप एग्जीक्यूशन पर ध्यान देना पड़ेगा।
3. वोकल अकाउंटेबिलिटी: मध्य प्रदेश के लोगों को यह एक्सेप्ट करना बंद करना होगा कि “यहां तो ऐसा ही होता है।” जब तक आप गवर्नेंस के कोर इश्यूज को इलेक्टोरल इश्यूज नहीं बनाएंगे, तब तक कोई भी पॉलिटिकल पार्टी आपको सीरियसली नहीं लेगी।
क्यों जरूरी है MP का विकास?
मध्य प्रदेश को “हार्ट ऑफ इंडिया” बोलना टूरिज्म पोस्टर्स पर काफी कूल लग सकता है। लेकिन प्रैक्टिकल बात करें तो अगर भारत एक ह्यूमन बॉडी सिस्टम है तो मध्य प्रदेश उसका कोर प्रोसेसर है।
अगर कोर प्रोसेसर ही लैग करना शुरू हो जाए तो पूरा सिस्टम हैंग हो जाता है। हम विकसित भारत का नया अपडेट तब तक इंस्टॉल नहीं कर पाएंगे जब तक हमारा सबसे सेंट्रल राज्य और इसके पुराने बग्स फिक्स नहीं होते।
वक्त आ गया है कि मध्य प्रदेश के लोग साइलेंट रहना छोड़ दें। स्टॉप बीइंग जस्ट द कॉम्प्लायंट हार्ट ऑफ इंडिया। इट्स टाइम टू राइज, परफॉर्म एंड बिकम द स्ट्रॉन्गेस्ट मसल ऑफ दिस नेशन।
मुख्य बातें (Key Points)
• मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 40 प्रति 1000 – देश में सबसे खराब, जबकि राष्ट्रीय औसत 26-32 है
• राज्य की बिजली वितरण कंपनियां ₹71,000 करोड़ के घाटे में, लगभग 40% बिजली अनमीटर्ड सप्लाई में गायब
• BIMARU राज्यों में से UP, राजस्थान और बिहार ने प्रगति की लेकिन MP अभी भी पुराने पैटर्न में फंसा है
• 29 लोकसभा सीटों के बावजूद “साइलेंट सबसर्वियंस सिंड्रोम” के कारण राष्ट्रीय चर्चा में कम दिखता है
• देश की 15% खनिज संपदा और डायमंड मोनोपॉली के बावजूद बेसिक गवर्नेंस में पिछड़ा हुआ










