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The News Air - Breaking News - जुर्म रोकने के लिए Gulf Style Punishment: अपराधियों के हाथ-पैर काट दो, क्या भारत में लागू हो सकती है सजा?

जुर्म रोकने के लिए Gulf Style Punishment: अपराधियों के हाथ-पैर काट दो, क्या भारत में लागू हो सकती है सजा?

यौन उत्पीड़न केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस आर नटराजन ने कहा - 'हाथ-पैर काटेंगे तभी लोग कानून का पालन सीखेंगे'

Ajay Kumar by Ajay Kumar
बुधवार, 3 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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Gulf Style Punishment
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Karnataka High Court Punishment Debate: कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज ने एक विवादास्पद बयान देकर पूरे देश में बहस छेड़ दी है। जस्टिस आर नटराजन ने यौन उत्पीड़न के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कानून का डर लोगों में बिठाना है तो “ईंट का जवाब पत्थर से देना पड़ेगा।” उन्होंने Gulf देशों की तर्ज पर सख्त सजा देने की बात कही और कहा कि “अगर आप किसी का हाथ या पैर काट दें तो शायद तभी लोग कानून का पालन करना सीखेंगे।”

देखा जाए तो यह बयान भावनात्मक रूप से समझ में आता है, खासकर तब जब महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हों। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या 21वीं सदी के लोकतांत्रिक भारत में ऐसी मध्यकालीन सजाएं संभव या उचित हैं?

दिलचस्प बात यह है कि जज साहब का बयान सिर्फ एक सुझाव या इशारा था, न कि कोई कानूनी आदेश। लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है – क्या हमारे मौजूदा कानून अपराधियों को रोकने में विफल हो रहे हैं? और क्या सख्त सजा ही एकमात्र समाधान है?

अगर गौर करें तो यह केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारी न्याय व्यवस्था, मानवाधिकार, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल है।

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क्या हुआ अदालत में? पूरा प्रसंग

जस्टिस आर नटराजन की पीठ Manipal Institute of Technology के एक 23 वर्षीय छात्र की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोपी पर अपनी सहपाठी के साथ यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप है।

बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी लगभग 2 महीने से न्यायिक हिरासत में है और उसने कोई अपराध नहीं किया है। इसी दौरान जज साहब भावनाओं में आ गए और उन्होंने कड़ी टिप्पणी की।

जज साहब ने क्या कहा:

“यदि आप किसी का हाथ या पैर काटते हैं, शायद तभी लोग कानून का पालन करना सीखेंगे। क्योंकि हमारे यहां लोकतंत्र है और हर कोई इसे हल्के में लेता है।”

“अपराधियों से मौजूदा कानूनों के तहत सख्ती से नहीं निपटा जा रहा है, जिससे कानून ने अपने दांत खो दिए हैं और सजा का डर कमजोर पड़ गया है।”

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जज साहब ने यह बयान किसी फैसले में नहीं दिया, बल्कि अपनी निराशा और चिंता व्यक्त करने के लिए कहा। लेकिन हाईकोर्ट के जज का ऐसा बयान स्वाभाविक रूप से बड़ी बहस का विषय बन गया।

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Gulf देशों में क्या सजाएं हैं?

Gulf देशों में कुछ विशेष अपराधों के लिए शरीयत कानून के तहत बेहद कड़ी सजाएं दी जाती हैं। आइए समझते हैं:

अपराधसजादेश
चोरीहाथ काटना (Amputation)सऊदी अरब, ईरान (कुछ मामलों में)
व्यभिचार/Adulteryसार्वजनिक रूप से कोड़े मारना या पत्थर मारकर मौतसऊदी अरब, ईरान
हत्यासार्वजनिक फांसी या सिर कलम करनासऊदी अरब
ड्रग ट्रैफिकिंगमौत की सजासऊदी अरब, UAE, ईरान
धर्म निंदा/Blasphemyमौत की सजासऊदी अरब, पाकिस्तान

विशेष नोट: ये सजाएं शरीयत कानून पर आधारित हैं और इन देशों की कानूनी व्यवस्था धार्मिक आधार पर काम करती है। यह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की संवैधानिक व्यवस्था से बिल्कुल अलग है।

समझने वाली बात यह है कि इन देशों में इन सजाओं का डर वाकई है और अपराध दर भी कम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही एकमात्र कारण है या वहां की समाज व्यवस्था, निगरानी तंत्र और कड़े कानून प्रवर्तन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं?

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क्या भारत में ऐसी सजा संभव है?

एक शब्द में जवाब है – नहीं। और यह कई कारणों से:

1. संवैधानिक बाधाएं:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है – “किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा वंचित नहीं किया जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है। हाथ-पैर काटना या शारीरिक अंग विच्छेदन इस मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

2. मानवाधिकार उल्लंघन:

ऐसी सजाएं यातना (Torture) की श्रेणी में आती हैं। भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं जो यातना को पूरी तरह प्रतिबंधित करती हैं।

3. न्यायिक गलतियों का खतरा:

अगर गलती से किसी निर्दोष को सजा हो गई और उसका हाथ काट दिया गया, तो बाद में कैसे उसे वापस लगाएंगे? जेल की सजा को तो बाद में माफ किया जा सकता है, लेकिन शारीरिक अंग कटने के बाद कोई मुआवजा काफी नहीं होगा।

4. लोकतांत्रिक मूल्य:

भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। हमारी कानून व्यवस्था पुनर्वास (Rehabilitation) और सुधार (Reformation) के सिद्धांत पर आधारित है, न कि केवल बदला (Retribution) पर।

पहलूGulf स्टाइल सजाभारतीय कानून व्यवस्था
आधारधार्मिक कानून (शरीयत)संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष कानून
उद्देश्यडर और बदलासुधार और पुनर्वास
मानवाधिकारसीमितसंरक्षित (संविधान द्वारा)
अंतरराष्ट्रीय मानकविवादितअनुपालन में
क्या जज साहब की बात में दम है?

जस्टिस नटराजन ने जो कहा, उसमें एक गहरी चिंता और निराशा झलकती है। उन्होंने इशारा किया कि:

1. कानून का डर खत्म हो गया है: सच है कि आज अपराधी कानून से नहीं डरते। वे जानते हैं कि केस वर्षों तक चलेगा, जमानत मिल जाएगी और सजा होने की संभावना कम है।

2. लोकतंत्र का दुरुपयोग: लोग लोकतांत्रिक अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। जो अधिकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए बने थे, उनका फायदा अपराधी उठा रहे हैं।

3. मौजूदा कानून अपर्याप्त: यौन अपराधों में सजा दर बहुत कम है। National Crime Records Bureau के आंकड़े बताते हैं कि रेप के मामलों में सिर्फ 27% मामलों में सजा होती है।

लेकिन समाधान क्या है?

जज साहब का निदान (Diagnosis) सही है, लेकिन उपचार (Treatment) गलत है। हाथ-पैर काटना समाधान नहीं है। असली समाधान हैं:

तत्काल कदम:

  1. फास्ट ट्रैक कोर्ट्स: यौन अपराधों के मामलों में 6 महीने में फैसला
  2. 100% सजा दर: हर दोषी को सजा मिले, यह सुनिश्चित करना
  3. कठोर लेकिन मानवीय सजा: उम्रकैद या मौत की सजा (गंभीर मामलों में)
  4. नॉन-बेलेबल ऑफेंस: कुछ गंभीर अपराधों को जमानत-रहित बनाना

दीर्घकालिक सुधार:

  1. पुलिस सुधार: जांच में तेजी और संवेदनशीलता
  2. न्यायिक सुधार: ज्यादा जज, ज्यादा कोर्ट, कम लंबित मामले
  3. सामाजिक जागरूकता: महिलाओं के प्रति सम्मान की शिक्षा
  4. CCTV और निगरानी: सार्वजनिक स्थानों पर बेहतर सुरक्षा
विशेष अपराधों के लिए विशेष सजा?

कुछ लोगों का तर्क है कि रेप जैसे जघन्य अपराधों के लिए कितनी भी कठोर सजा जायज है। यह भावना समझी जा सकती है। लेकिन कानूनी और नैतिक दृष्टि से यह उचित नहीं है।

क्यों?

1. रेप को परिभाषित करना मुश्किल: कभी-कभी सहमति का मुद्दा जटिल होता है। गलत मामले में भी सजा हो सकती है।

2. दूसरे अपराधों के साथ असमानता: अगर रेप के लिए हाथ काटा तो हत्या के लिए क्या करेंगे? क्रूरता की होड़ शुरू हो जाएगी।

3. अपराधी को और खतरनाक बनाना: अगर रेप के लिए हाथ काटने की सजा हो तो अपराधी सोचेगा – “वैसे भी इतनी सख्त सजा है तो पीड़िता को मार ही देता हूं ताकि गवाह न रहे।” इससे अपराध और भयानक हो जाएगा।

अन्य देशों का अनुभव

दुनिया के कई देशों ने कठोर सजाओं का प्रयोग किया है। नतीजे मिले-जुले रहे हैं:

सऊदी अरब: कड़ी सजाओं के बावजूद कुछ अपराध होते हैं, लेकिन वहां की पूरी समाज व्यवस्था अलग है – बेहद कड़ी निगरानी, सीमित व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और धार्मिक कानून।

सिंगापुर: बेंत से मारने (Caning) की सजा है। अपराध दर कम है, लेकिन यहां भी कठोर निगरानी और तेज न्याय प्रणाली है।

USA (कुछ राज्य): मौत की सजा के बावजूद अपराध दर कम नहीं हुई। अध्ययन बताते हैं कि सजा की निश्चितता (Certainty) सजा की कठोरता (Severity) से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सबक: सजा कितनी भी कठोर हो, अगर पकड़े जाने की संभावना कम है तो अपराधी नहीं डरेगा। तेज और निश्चित न्याय सबसे बड़ा निवारक है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी: “जज साहब की निराशा समझी जा सकती है, लेकिन ऐसी सजाएं संवैधानिक रूप से असंभव हैं। हमें न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लानी होगी, न कि मध्यकालीन तरीके अपनाने होंगे।”

प्रो. (डॉ.) फैजान मुस्तफा (संवैधानिक विशेषज्ञ): “भारत एक सभ्य समाज है और हमारा संविधान मानवीय गरिमा को सर्वोच्च स्थान देता है। हम अपराध से लड़ते हुए अपराधी को भी मानव मानते हैं। यही हमारी ताकत है।”

सामाजिक कार्यकर्ता और महिला अधिकार एक्टिविस्ट: “समस्या सजा की कमी नहीं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन की कमी है। 99% रेप केसों में अपराधी पकड़े ही नहीं जाते या सबूत नहीं मिलते। यहां सुधार चाहिए।”

सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया

जज साहब के बयान पर सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है:

समर्थन में:

  • “जज साहब बिल्कुल सही कह रहे हैं। अपराधियों को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए।”
  • “Gulf देशों में इतने कम अपराध क्यों होते हैं? क्योंकि वहां डर है।”
  • “रेप जैसे अपराध के लिए कोई भी सजा कम है।”

विरोध में:

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  • “यह मध्यकालीन सोच है। हम 21वीं सदी में हैं।”
  • “अगर गलती से किसी निर्दोष को सजा हो गई तो?”
  • “समस्या सजा की नहीं, बल्कि न्याय में देरी की है।”

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ज्यादातर लोग यौन अपराधों से नाराज हैं और कड़ी सजा चाहते हैं। लेकिन बहुत कम लोग Gulf स्टाइल सजा का समर्थन कर रहे हैं।

वास्तविक समाधान: सख्त लेकिन सभ्य

भारत को अपनी खुद की राह बनानी होगी – जो सख्त हो लेकिन सभ्य भी:

1. तेज न्याय:

  • रेप केसों में 6 महीने में फैसला (Fast Track Courts)
  • DNA टेस्टिंग और फोरेंसिक साइंस का तेज इस्तेमाल
  • गवाहों की सुरक्षा

2. निश्चित सजा:

  • हर दोषी को सजा हो, कोई बचे नहीं
  • जमानत पर कड़े नियम
  • अपील की प्रक्रिया को सीमित करना (फ्रिवोलस अपील को रोकना)

3. कठोर (लेकिन मानवीय) सजा:

  • गंभीर मामलों में उम्रकैद (बिना माफी के)
  • सबसे जघन्य मामलों में मौत की सजा (rarest of rare)
  • दोषी की संपत्ति से पीड़िता को मुआवजा

4. रोकथाम:

  • स्कूल-कॉलेज में यौन शिक्षा और सम्मान की शिक्षा
  • सार्वजनिक स्थानों पर CCTV और बेहतर रोशनी
  • पुलिस की बेहतर ट्रेनिंग और संवेदनशीलता

5. सामाजिक बदलाव:

  • महिलाओं के प्रति सोच बदलना
  • पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देना
  • मीडिया की जिम्मेदार भूमिका
अगली सुनवाई और मामले का भविष्य

कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में 23 वर्षीय आरोपी को फिलहाल जमानत नहीं दी है। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और 8 जून को अगली सुनवाई तय की है।

जज साहब का बयान अदालती फैसले का हिस्सा नहीं है, बल्कि उनकी व्यक्तिगत टिप्पणी है। इसलिए इसका कोई कानूनी असर नहीं होगा। लेकिन इसने एक जरूरी बहस शुरू कर दी है।

निष्कर्ष: संतुलन की जरूरत

जस्टिस नटराजन की चिंता जायज है। हमारी कानून व्यवस्था में सुधार की सख्त जरूरत है। लेकिन समाधान मध्यकालीन तरीकों में नहीं, बल्कि आधुनिक और प्रभावी न्याय प्रणाली में है।

याद रखें:

  • सभ्यता की पहचान यह नहीं है कि हम अपराधियों को कितनी क्रूरता से सजा देते हैं, बल्कि यह है कि हम अपराध को कितनी प्रभावी तरीके से रोकते हैं
  • डर सजा की कठोरता से नहीं, बल्कि सजा की निश्चितता से पैदा होता है
  • न्याय बदला नहीं, सुधार और सुरक्षा का माध्यम है

भारत को एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जो सख्त, तेज, निष्पक्ष और मानवीय हो। यही असली समाधान है।

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मुख्य बातें (Key Points)

• कर्नाटक HC के जस्टिस आर नटराजन ने यौन उत्पीड़न केस की सुनवाई में कहा कि “हाथ-पैर काटेंगे तो लोग कानून का पालन सीखेंगे”

• जज ने Gulf देशों की तर्ज पर कड़ी सजा की बात की और कहा कि मौजूदा कानूनों ने “अपने दांत खो दिए हैं”

• भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 और मानवाधिकार ऐसी सजाओं को असंभव बनाते हैं – यह यातना की श्रेणी में आता है

• विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या सजा की कठोरता नहीं बल्कि न्याय में देरी और सजा की अनिश्चितता है

• असली समाधान है – Fast Track Courts, 100% सजा दर, बेहतर जांच और सामाजिक बदलाव


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Gulf देशों में कौन-कौन सी कड़ी सजाएं दी जाती हैं?

Gulf देशों (सऊदी अरब, ईरान आदि) में शरीयत कानून के तहत कुछ अपराधों के लिए शारीरिक दंड दिए जाते हैं – चोरी के लिए हाथ काटना, व्यभिचार के लिए कोड़े मारना या पत्थर मारकर मौत, हत्या के लिए सार्वजनिक फांसी या सिर कलम करना। लेकिन ये सजाएं धार्मिक कानून पर आधारित हैं और लोकतांत्रिक देशों में लागू नहीं होतीं।

प्रश्न 2: क्या भारत में ऐसी सजाएं संभव हैं?

नहीं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है। हाथ-पैर काटना या शारीरिक अंग विच्छेदन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और यातना की श्रेणी में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसी सजाओं को खारिज किया है।

प्रश्न 3: तो फिर यौन अपराधों के लिए क्या समाधान है?

असली समाधान है – Fast Track Courts में 6 महीने में फैसला, 100% सजा दर सुनिश्चित करना, DNA और फोरेंसिक साइंस का तेज इस्तेमाल, गंभीर मामलों में उम्रकैद या मौत की सजा, पुलिस सुधार और बेहतर जांच, CCTV और सार्वजनिक सुरक्षा में सुधार। सजा की निश्चितता (Certainty) सजा की कठोरता (Severity) से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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