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The News Air - Breaking News - Voluntary Sex Work अब अपराध नहीं: Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला

Voluntary Sex Work अब अपराध नहीं: Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने PITA Act को लेकर दिया बड़ा फैसला, स्वैच्छिक यौन कार्य को अपराध नहीं माना, जबरन पुनर्वास पर लगाई रोक

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
बुधवार, 3 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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Voluntary Sex Work
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Voluntary Sex Work को लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से यौन कार्य कर रहा है तो यह अपराध नहीं है। साथ ही, पुलिस या सरकार किसी को जबरदस्ती पुनर्वास केंद्र नहीं भेज सकती। यह फैसला 1956 के Prevention of Immoral Traffic Act (PITA) की व्याख्या को पूरी तरह से बदल देता है।

देखा जाए तो यह फैसला उन 8 से 10 लाख यौन कर्मियों के लिए एक बड़ी राहत है जो भारत में काम कर रहे हैं। वर्षों से पुलिस की पितृसत्तात्मक सोच और जबरन पुनर्वास की नीति से परेशान इन कर्मियों को अब संवैधानिक संरक्षण मिल गया है। कोर्ट ने अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 का हवाला देते हुए कहा कि “It’s Her Choice” – और यह चुनाव सर्वोपरि है।

समझने वाली बात यह है कि अब तक पुलिस छापेमारी के दौरान सभी यौन कर्मियों को एक ही नजरिए से देखती थी – चाहे वे तस्करी की शिकार हों या स्वेच्छा से काम कर रही हों। लेकिन Supreme Court ने इस “one-size-fits-all” दृष्टिकोण को खारिज करते हुए साफ अंतर स्थापित किया है।

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PITA Act 1956: क्या है यह कानून और क्यों था विवाद में?

Prevention of Immoral Traffic Act (PITA), जिसे पहले SITA (Suppression of Immoral Traffic Act) के नाम से जाना जाता था, 1956 में बनाया गया था। इस कानून का उद्देश्य मानव तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति को रोकना था।

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लेकिन समस्या यहीं शुरू हुई। इस कानून के तहत पुलिस को यह अधिकार था कि वह छापेमारी कर सकती है, यौन कर्मियों को उनके कार्यस्थल से बेदखल कर सकती है और उन्हें जबरन “सुरक्षा गृहों” में भेज सकती है – चाहे वे स्वेच्छा से काम कर रहे हों या नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना था कि पुलिस इस कानून का दुरुपयोग करती थी। स्वैच्छिक यौन कर्मियों को भी तस्करी की शिकार मानकर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस अस्पष्टता को दूर कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का यह रवैया पितृसत्तात्मक (paternalistic) है, जहां सरकार यह तय करती है कि महिला की सहमति वास्तविक है या नहीं – बिना उससे पूछे।


Supreme Court के 5 महत्वपूर्ण निर्देश: अब क्या बदल गया?

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में पांच बहुत स्पष्ट बातें कही हैं जो इस मामले को पूरी तरह बदल देती हैं:

1. यौन कार्य स्वयं अपराध नहीं है
अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से Voluntary Sex Work कर रहा है तो यह अपराध नहीं। हां, किसी सार्वजनिक स्थान पर वेश्यालय चलाना या अवैध तरीके से इसे संचालित करना अपराध है – लेकिन व्यक्तिगत स्वैच्छिक कार्य नहीं।

2. जबरन पुनर्वास पर रोक
किसी भी यौन कर्मी को उसकी इच्छा के विरुद्ध सुरक्षा गृह या पुनर्वास केंद्र में नहीं भेजा जा सकता। अगर वह नहीं चाहती, तो सरकार उसे मजबूर नहीं कर सकती।

3. छापेमारी में गिरफ्तारी नहीं
छापे के दौरान मिले स्वैच्छिक यौन कर्मियों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार या उत्पीड़ित नहीं किया जाएगा। उन्हें सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।

4. बचाव कार्रवाई की शर्त
बचाव (rescue) कार्रवाई केवल तभी वैध है जब व्यक्ति स्पष्ट रूप से तस्करी का या जबरदस्ती का शिकार हो। अगर महिला खुद कहती है कि वह स्वेच्छा से काम कर रही है, तो उसे शिकार नहीं माना जाएगा।

5. सहमति की जांच अनिवार्य
पुलिस को पहले महिला से बात करनी होगी और उसकी सहमति की जांच करनी होगी। केवल सरकार या पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि क्या वास्तविक है और क्या नहीं।


संवैधानिक आधार: Article 14, 19 और 21 का संदर्भ

Supreme Court of India ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के तीन अनुच्छेदों का विशेष रूप से उल्लेख किया है – जिन्हें “गोल्डन ट्रायंगल” कहा जाता है:

अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान माना जाएगा। यौन कर्मी भी नागरिक हैं और उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं।

अनुच्छेद 19(1)(g) – पेशे की स्वतंत्रता
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से कोई पेशा चुनता है (जब तक वह कानून के दायरे में हो), तो राज्य उसे रोक नहीं सकता।

अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
यहां Francis Coralie Mullin केस का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल जिंदा रहने का अधिकार नहीं, बल्कि “गरिमापूर्ण जीवन” का अधिकार देता है।

अगर गौर करें तो कोर्ट ने कहा – “यह पीड़िता का जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य है। यह मानना बेतुका होगा कि यह सब पीड़िता की इच्छा के बिना तय किया जा सकता है।”


धारा 17 और Threshold Inquiry: अब कैसे होगी जांच?

PITA Act की धारा 17 में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जिसे “Threshold Inquiry” कहा जाता है। जब पुलिस छापेमारी में किसी को पकड़ती है, तो उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है।

अब मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी है कि वह यह पता करे:

प्रश्न 1: क्या यह व्यक्ति स्वैच्छिक यौन कर्मी है?
प्रश्न 2: या यह तस्करी का शिकार है?

स्थितिकार्रवाई
अगर व्यक्ति तस्करी का शिकार है (या दबाव में है)तत्काल बचाव → विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान → पुनर्वास केंद्र भेजा जाएगा
अगर व्यक्ति स्वैच्छिक रूप से काम कर रहा हैस्वतंत्र रूप से जाने की अनुमति → कोई जबरन पुनर्वास नहीं

ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर महिला कहती है कि वह स्वेच्छा से काम कर रही है, तो उसकी बात को प्राथमिकता दी जाएगी। हां, अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि पीछे से दबाव बनाया जा रहा है या महिला डर के कारण सच नहीं बोल पा रही, तो आगे की जांच की जाएगी।


तस्करी vs स्वैच्छिक कार्य: क्या है मुख्य अंतर?

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल है कि तस्करी (trafficking) और Voluntary Sex Work में फर्क क्या है? आइए इसे एक टेबल से समझते हैं:

पहलूतस्करी (Trafficking)स्वैच्छिक यौन कार्य
सहमतिकोई सहमति नहीं, जबरदस्ती या धोखे से लाया गयापूर्ण स्वतंत्र सहमति
कानूनी स्थितिपीड़ित (Victim)मानवाधिकार धारक (Rights Holder)
राज्य की भूमिकातत्काल बचाव और कार्रवाई अनिवार्यपुनर्वास के साधन देगी, लेकिन थोपेगी नहीं
अपराधधारा 5 (PITA) के तहत गंभीर अपराधअपराध नहीं
स्वतंत्रताव्यक्ति बंधक है, नहीं छोड़ सकताकभी भी छोड़ सकता है

समझने वाली बात यह है कि अगर किसी को बेच दिया गया है, धोखे से लाया गया है, या वह नाबालिग है – तो यह तस्करी है और गंभीर अपराध। लेकिन अगर कोई वयस्क व्यक्ति अपनी मर्जी से यह काम चुनता है, तो राज्य उसकी पसंद में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।


Buddhadeb Karmakar केस: यौन कर्मियों के अधिकारों की पहली मांग

Buddhadeb Karmakar बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2011) केस में भी Supreme Court ने यौन कर्मियों के अधिकारों को मान्यता दी थी। उस समय कोर्ट ने कहा था:

  • यौन कर्मियों को कानूनी सुरक्षा का अधिकार है
  • पुलिस छापों में उनके साथ सम्मान से व्यवहार किया जाए
  • उन्हें FIR दर्ज करने का अधिकार है

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अक्सर फिल्मों, सीरियल्स या न्यूज चैनलों पर जब इस तरह की छापेमारी दिखाई जाती है, तो यौन कर्मियों के साथ बहुत अमानवीय तरीके से पेश आया जाता है। उन्हें बंदी बनाकर, उनकी वीडियो लीक करके, और उन्हें अपराधी की तरह ट्रीट किया जाता है।

लेकिन कानूनी रूप से देखें तो यह पूरी तरह से गलत है। स्वैच्छिक यौन कर्मी अपराधी नहीं हैं – और उनके साथ भी नागरिकों जैसा व्यवहार होना चाहिए।


वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में Voluntary Sex Work की स्थिति

अब जरा दुनिया के अन्य देशों में Voluntary Sex Work की कानूनी स्थिति पर नजर डालते हैं:

देश/मॉडलकानूनी स्थिति
अमेरिका (USA)नेवादा को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में अवैध
नीदरलैंड (Netherlands)पूर्णतः वैध, श्रमिक अधिकारों के साथ मान्यता
स्वीडन (Nordic Model)खरीदार अपराधी है, लेकिन विक्रेता नहीं
भारत (India)आंशिक रूप से वैध – स्वैच्छिक कार्य OK, ब्रोथल चलाना अपराध
न्यूजीलैंडपूर्णतः वैध, सरकारी समर्थन और कानूनी सुरक्षा

दिलचस्प बात यह है कि नॉर्डिक मॉडल (जो स्वीडन में है) एक अलग दृष्टिकोण अपनाता है। वहां यौन सेवाएं खरीदने वाला ग्राहक अपराधी माना जाता है, लेकिन सेवा देने वाली महिला नहीं। इसके पीछे तर्क यह है कि महिला को पीड़ित माना जाता है, अपराधी नहीं।

भारत का मॉडल अब कुछ हद तक बीच का रास्ता है – स्वैच्छिक कार्य को मान्यता, लेकिन संगठित वेश्यालयों पर प्रतिबंध।


उन्मूलनवादी vs अधिकारवादी: दो विरोधी विचारधाराएं

Voluntary Sex Work के मुद्दे पर दो मुख्य विचारधाराएं हैं जो आमने-सामने हैं:

उन्मूलनवादी दृष्टिकोण (Abolitionist Approach):

  • यौन कार्य अपने आप में शोषण है
  • कोई भी महिला इसे स्वेच्छा से नहीं चुनती
  • गरीबी और पितृसत्ता इसके मूल कारण हैं
  • राज्य को पितृसत्तात्मक (paternalistic) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और “बचाव” करना चाहिए

अधिकारवादी दृष्टिकोण (Rights-Based Approach):

  • वयस्क महिला की स्वतंत्रता और सहमति सर्वोपरि है
  • शरीर और जीवन पर उसका पूर्ण अधिकार है
  • कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य अधिकार आवश्यक हैं
  • राज्य को उसकी पसंद में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए

अगर गौर करें तो Supreme Court ने अधिकारवादी दृष्टिकोण को मान्यता दी है। कोर्ट ने कहा – “मदद करने में और मजबूर करने में अंतर है।” राज्य पुनर्वास के साधन दे सकती है, लेकिन किसी को जबरन नहीं भेज सकती।

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कोर्ट ने माना कि “इन अ वे” उन्मूलनवादी सोच सही है – बहुत सी महिलाएं मजबूरी में इस काम में आती हैं। लेकिन “होलिस्टिकली” यह पूरी तस्वीर नहीं है। बहुत सी महिलाएं सुरक्षित तरीके से यह काम करना चाहती हैं, और उनकी इच्छा का सम्मान होना चाहिए।


आगे की राह: क्या सुधार जरूरी हैं?

Supreme Court के इस फैसले के बाद अब कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की जरूरत है:

1. कानूनी सुधार (Legislative Reforms):
PITA में स्पष्ट संशोधन हो जिसमें तस्करी और स्वैच्छिक कार्य का क्लियर कट अंतर लिखा जाए। विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान को वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए, लेकिन जबरन नहीं।

2. प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms):

  • ट्रॉमा-इनफॉर्म्ड पुलिसिंग प्रशिक्षण: पुलिस को पता होना चाहिए कि कौन महिला ट्रॉमा में है और किसे समर्थन की जरूरत है
  • थ्रेशोल्ड इंक्वायरी के लिए SOP: मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure) को लागू किया जाए
  • संवेदनशीलता और एम्पैथी: पुलिस और मजिस्ट्रेट दोनों को संवेदनशील प्रशिक्षण दिया जाए

3. सामाजिक सुधार (Social Reforms):

  • सामाजिक कलंक को कम करने के लिए जन जागरूकता अभियान
  • यह समझाना कि Supreme Court ने इसे अपराध नहीं माना है
  • समाज की सोच में बदलाव लाना

4. कल्याणकारी योजनाएं (Welfare Schemes):
स्वैच्छिक यौन कर्मियों के लिए:

  • हेल्थ आईडी (Health ID)
  • बैंक खाता
  • जन कल्याण योजनाओं में शामिल करना
  • स्वास्थ्य सुविधाएं और सुरक्षा उपाय

समझने वाली बात यह है कि अगर सरकार और Supreme Court ने यह स्वीकार कर लिया कि Voluntary Sex Work अपराध नहीं है, तो फिर यौन कर्मियों को भी वही सुविधाएं और अधिकार मिलने चाहिए जो अन्य नागरिकों को मिलते हैं।


जानें पूरा मामला: क्या था विवाद?

दरअसल, यह मामला तब शुरू हुआ जब PITA Act के तहत पुलिस ने कई छापेमारी की और सभी यौन कर्मियों को एक ही नजरिए से देखा गया। चाहे वे तस्करी की शिकार हों या स्वेच्छा से काम कर रही हों – सभी को जबरन पुनर्वास केंद्रों में भेज दिया गया।

यौन कर्मी संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे को कोर्ट में उठाया। उनका कहना था कि यह राज्य का पितृसत्तात्मक रवैया है जहां सरकार यह तय करती है कि महिला की सहमति वास्तविक है या नहीं – बिना उससे पूछे।

नेहा धूपिया के “It’s Her Choice” मीम का भी इस बहस में जिक्र हुआ। हालांकि उस मीम को लेकर तब बहुत विवाद हुआ था और गलत व्याख्या की गई थी, लेकिन सही दिशा में देखें तो वह संदेश सही था – एक वयस्क महिला की पसंद का सम्मान होना चाहिए।

Supreme Court ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया और भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों के आधार पर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।


मुख्य बातें (Key Points)

✅ Voluntary Sex Work अब अपराध नहीं – अगर कोई स्वेच्छा से यौन कार्य कर रहा है तो यह कानूनी है

✅ जबरन पुनर्वास पर रोक – किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध पुनर्वास केंद्र नहीं भेजा जा सकता

✅ पुलिस उत्पीड़न नहीं कर सकती – छापेमारी में मिले स्वैच्छिक कर्मियों को गिरफ्तार या परेशान नहीं किया जाएगा

✅ सहमति सर्वोपरि – महिला की सहमति और उसकी बात को प्राथमिकता दी जाएगी

✅ संवैधानिक संरक्षण – अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत यौन कर्मियों को भी समान अधिकार

✅ तस्करी गंभीर अपराध – मानव तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति अभी भी गंभीर अपराध है


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या भारत में sex work अब पूरी तरह कानूनी है?

नहीं, पूरी तरह नहीं। Supreme Court ने कहा है कि स्वैच्छिक यौन कार्य अपराध नहीं है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर वेश्यालय चलाना, ब्रोथल संचालित करना और मानव तस्करी अभी भी गंभीर अपराध हैं। यानी व्यक्तिगत स्तर पर स्वैच्छिक कार्य को मान्यता मिली है, लेकिन संगठित वेश्यावृत्ति पर प्रतिबंध जारी है।

प्रश्न 2: PITA Act और ITPA में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं है। यह एक ही कानून के दो नाम हैं। पहले इसे SITA (Suppression of Immoral Traffic Act) कहा जाता था, फिर इसे बदलकर PITA (Prevention of Immoral Traffic Act) कर दिया गया। अब इसे अक्सर ITPA (Immoral Traffic Prevention Act) भी कहते हैं। मूल कानून 1956 का है।

प्रश्न 3: अगर कोई sex worker पुलिस उत्पीड़न की शिकायत करना चाहे तो क्या कर सकती है?

Supreme Court के फैसले के अनुसार, यौन कर्मियों को भी FIR दर्ज करने और कानूनी सुरक्षा का पूर्ण अधिकार है। अगर पुलिस छापे के दौरान या बाद में उत्पीड़न करती है, तो वे नजदीकी पुलिस स्टेशन, मजिस्ट्रेट या मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करा सकती हैं। Buddhadeb Karmakar केस में भी यह अधिकार स्थापित किया गया था।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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