Punjab De-Silting Policy: पंजाब सरकार इन दिनों एक बड़ी कानूनी उलझन में फंस गई है। National Green Tribunal (NGT) और Punjab-Haryana High Court ने दरियाओं से गाद निकालने की नीति को माइनिंग गतिविधि करार दिया है। और बस यहीं से शुरू हुई असली मुश्किल।
अगर गौर करें तो मामला यह है कि पंजाब सरकार ने अप्रैल-मई 2026 में सतलुज, रावी, ब्यास और घग्गर नदियों से 79 साइटों पर डी-सिल्टिंग (गाद निकालने) के लिए टेंडर जारी किए थे। सरकार का तर्क था कि यह बाढ़ से बचाव के लिए जरूरी है। लेकिन NGT और High Court ने इसे “वाणिज्यिक रेत माइनिंग” मान लिया। और अब सरकार को पर्यावरण मंजूरी (environmental clearance) लेने के लिए कहा गया है।
दिलचस्प बात यह है कि मानसून शुरू होने वाला है और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है, लेकिन सरकार के हाथ बंधे हैं। यह पंजाब के लिए एक बेहद नाजुक स्थिति है।
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High Court ने क्या कहा?
Punjab और Haryana High Court ने रोपड़ जिले की सतलुज और स्वां नदी के कुछ स्थानों पर गैर-कानूनी माइनिंग के मुद्दे को लेकर माइनिंग गतिविधि पर तुरंत रोक लगाने के लिए कहा है।
High Court में पंजाब सरकार ने पक्ष रखा कि साइट पर कोई खनन नहीं की जा रही है, बल्कि मौजूदा पुलों की मजबूती के लिए काम चल रहा है। लेकिन Justice Sandeep Modgil की अगुवाई वाले बेंच ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को हिदायत दी कि पुल की मजबूती के लिए लगाए गए टेंडरों आदि से संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाए जाएं। बेंच ने अगले आदेशों तक माइनिंग से संबंधित गतिविधियों पर रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 16 जून को होगी।
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NGT का फैसला—79 साइट्स पर रोक
इसी बीच, National Green Tribunal ने पंजाब सरकार द्वारा जारी किए गए 79 साइटों के टेंडरों पर रोक लगा दी है। NGT का साफ कहना है कि पंजाब सरकार तब तक रेत नहीं निकाल सकती जब तक वह पर्यावरण क्लीयरेंस (environmental clearance) नहीं ले लेती।
ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिए कि पंजाब सरकार जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (District Survey Report) तैयार करे। समझने वाली बात यह है कि NGT ने बाढ़ के मद्देनजर दरियाओं की सफाई पर कोई रोक नहीं लगाई है। लेकिन यह भी शर्त लगाई है कि दरियाओं की सफाई सरकार अपने खर्चे पर या फिर सरकारी एजेंसियों के जरिए करवाए।
देखा जाए तो NGT की चिंता यह है कि ठेकेदारों को रेत चुकने की इजाजत देना व्यावसायिक माइनिंग को बढ़ावा देगा, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है।
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सरकार का तर्क vs विरोधी पक्ष
पंजाब सरकार का तर्क है कि हर साल बारिश के दौरान नदियों में गाद जमा हो जाती है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है। इसलिए डी-सिल्टिंग जरूरी है। सरकार का कहना है कि यह माइनिंग गतिविधि नहीं है, जिसके लिए पर्यावरण से संबंधित मंजूरी ली जाए।
लेकिन दूसरी ओर, पर्यावरणविद और NGT का कहना है कि डी-सिल्टिंग की आड़ में यह वाणिज्यिक रेत माइनिंग है, जिसे बेचकर ठेकेदार मुनाफा कमाएंगे। और यहीं विरोधाभास है।
चिंता का विषय यह है कि मानसून शुरू होने वाला है और अगर नदियों की सफाई नहीं हुई, तो बाढ़ का खतरा गंभीर हो सकता है। लेकिन कानूनी पेचीदगियों ने सरकार को बांध दिया है।
क्या है डी-सिल्टिंग पॉलिसी?
पंजाब सरकार ने इस साल अप्रैल-मई में सतलुज, रावी, ब्यास और घग्गर नदियों से 79 साइटों पर डी-सिल्टिंग के लिए टेंडर जारी किए थे। इस योजना के तहत ठेकेदारों को नदियों से गाद और रेत निकालने की इजाजत दी जानी थी।
सरकार का कहना था कि यह काम बाढ़ रोकने के लिए जरूरी है। लेकिन NGT ने इसे माइनिंग गतिविधि मानते हुए पर्यावरण क्लीयरेंस को कानूनी तौर पर अनिवार्य करार किया।
हैरान करने वाली बात यह है कि NGT ने केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया है। यानी अभी और देरी होगी।
पंजाब के लिए मुश्किल का दौर
पंजाब सरकार के लिए यह कठिन घड़ी है क्योंकि मानसून शुरू होने वाला है और बाढ़ के खतरे के मद्देनजर नदियों की सफाई अहम है। लेकिन कानूनी रोक और NGT के निर्देशों ने स्थिति को जटिल बना दिया है।
राहत की बात यह है कि NGT ने सफाई पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई—सरकार अपने खर्चे या सरकारी एजेंसियों के जरिए सफाई करवा सकती है। लेकिन यह प्रक्रिया धीमी और खर्चीली होगी।
सवाल उठता है कि क्या सरकार समय पर जरूरी कदम उठा पाएगी? या फिर बाढ़ का खतरा बढ़ेगा?
मुख्य बातें (Key Points):
- NGT ने पंजाब सरकार की 79 साइट्स पर डी-सिल्टिंग के टेंडर पर रोक लगाई
- Punjab-Haryana High Court ने रोपड़ की सतलुज और स्वां नदी पर माइनिंग रोकी
- Justice Sandeep Modgil की अगुवाई वाले बेंच ने दस्तावेज मांगे, 16 जून को अगली सुनवाई
- NGT का कहना—पर्यावरण क्लीयरेंस के बिना डी-सिल्टिंग नहीं हो सकती
- सरकार का तर्क—यह बाढ़ रोकने के लिए जरूरी सफाई है, माइनिंग नहीं
- मानसून से पहले नदियों की सफाई जरूरी, लेकिन सरकार कानूनी उलझन में













