क्या है वो लाइफ सपोर्ट सिस्टम जिस पर लता मंगेशकर को रखा गया था, जानिए कैसे होता है इसे हटाने का फ़ैसला?

The News Air- महान गायिका लता मंगेशकर का रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंड अस्पताल में 92 साल की उम्र में निधन हो गया। ‘स्वर कोकिला’ के नाम से विख्यात लता जी को जनवरी में कोविड-19 और न्यूमोनिया की शिकायत के बाद हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था और 8 जनवरी को उन्हें ICU में शिफ़्ट किया गया था। कोविड से उबरने के बाद शनिवार को उनकी स्थिति फिर से बिगड़ने के बाद उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। 28 सितंबर 1929 को इंदौर में जन्मीं लता दीदी ने एक हज़ार से अधिक फ़िल्मों में अपनी मधुर आवाज़ दी थी।

चलिए जानते हैं कि आख़िर क्या होता है वो लाइफ सपोर्ट सिस्टम जिस पर लता जी को रखा गया था? वेंटिलेटर सपोर्ट की ज़रूरत इंसान को कब पड़ती है? कब इसे हटा दिया जाता है?

Life Support System

क्या होता है लाइफ सपोर्ट सिस्टम?

हमारा शरीर एक जटिल मशीन की तरह होता है। शरीर के कई अंग और सिस्टम लगातार काम करते हुए इसे स्वस्थ रखते हैं। इनमें से कुछ अंगों के फंक्शन इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि अगर वे काम करना बंद कर दें तो इंसान जिन्दा नहीं रह सकता है। जब शरीर के ये महत्वपूर्ण सिस्टम फेल हो जाते हैं तो एक विशेष मेडिकल प्रक्रिया से उन अंगों को जिन्दा रखने की कोशिश की ज़ाती है, जिसे आमतौर पर लाइफ सपोर्ट सिस्टम कहते हैं।

लाइफ सपोर्ट के ज़रिए कोशिश की ज़ाती है कि शरीर फिर से ठीक से काम करने लगे, कई बार ऐसा हो भी जाता है, लेकिन कई बार शरीर का सिस्टम दोबारा काम नहीं कर पाता और इंसान की मौत हो ज़ाती है।

कब पड़ती है लाइफ सपोर्ट की ज़रूरत?

शरीर में चार अंगों-दिल, दिमाग़, फेफड़े और किडनी में से कोई भी काम करना बंद कर दे, तो लाइफ सपोर्ट की ज़रूरत पड़ती है। इन चार अंगों के काम करना बंद कर देने पर इंसान को लाइफ सपोर्ट पर रखा जाता है।

फेफड़े का फेल होना: पानी में डूबने, निमोनिया, ड्रग के ओवरडोज, ब्लड क्लॉट, फेफड़ों की गंभीर चोट या बीमारी, जैसे सीओपीडी और सिस्टिक फाइब्रोसिस और मांसपेशियों या नर्व रोगों जैसे SLS और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मामलों में।

दिल के फेल होने पर: अचानक कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक होने पर।
दिमाग़: स्ट्रोक या सिर पर गंभीर चोट लगने पर।
किडनी: किडनी के काम करना बंद करने पर।

किसी व्यक्ति का दिल रुक जाने पर डॉक्टर उसे फिर से शुरू करने की कोशिश करते हैं। CPR जैसे लाइफ सपोर्ट उपायों से पूरे शरीर में ख़ून और ऑक्सीजन का प्रवाह सुनिश्चित किया जाता है। दिल को फिर से धड़कने के लिए इलेक्ट्रिक शॉक (डीफिब्रिलेशन) दिया जाता है, और दिल को फिर से काम करना शुरू करने में मदद के लिए दवाएं भी दी ज़ाती हैं।

कितने तरह के होते हैं लाइफ सपोर्ट?

अधिकतर लोग जब किसी व्यक्ति के लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर होने की बात करते हैं, तो वे आमतौर पर वेंटिलेटर के बारे में बात करते हैं। दरअसल, लाइफ सपोर्ट सिस्टम एक व्यापक सिस्टम होता है और वेंटिलेटर उसका एक हिस्सा है। लाइफ सपोर्ट सिस्टम में कई चीज़ें शामिल होती हैं-जैसे-

मैकेनिकल वेंटिलेटर या वेंटिलेटर: इसे ब्रीदिंग मशीन के नाम से भी जाना जाता है। ये लाइफ सपोर्ट सिस्टम में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली मशीन है। एक ऐसी मशीन है जो किसी को सांस लेने में मदद करती है।

वेंटिलेटर फेफड़ों में हवा को पुश करके पूरे शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बनाए रखता है। इसका उपयोग अस्थायी रूप से निमोनिया जैसी स्थितियों के लिए किया जाता है, लेकिन फेफड़ों के फेल होने की स्थिति में मरीज़ों को इसकी ज़रूरत ज़्यादा समय तक पड़ती है।

कोरोना महामारी शुरू होने के बाद सांस की ज़्यादा दिक्क़त वाले मरीज़ों में वेंटिलेटर का इस्तेमाल काफ़ी बढ़ा है।

कार्डियोपल्मोनरी रिससिटैशन (CPR): CPR का यूज़ उन मरीज़ों के इलाज में किया जाता है, जिनका हार्ट या सांस रुक ज़ाती है। CPR का यूज़ दिल या सांस को दोबारा शुरू करने की कोशिश के तहत किया जाता है। हार्ट को फिर से एक्टिव करने के लिए आमतौर पर इलेक्ट्रिक शॉक या दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

हार्ट अटैक या डूबने जैसी अचानक हुई घटना में तुरंत इलाज के लिए CPR का यूज़ जीवन बचाने वाला साबित हो सकता है, लेकिन किसी लाइलाज बीमारी के लास्ट स्टेज से गुज़र रहे या गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों में CPR के प्रयोग के बावज़ूद उनके बचने की संभावना बहुत कम होती है।

अगर मरीज़ या उसके परिजन नहीं चाहते कि CPR दिया जाए तो इसके लिए उन्हें डॉक्टर को लिखित में निर्देश देना होता है, जिसे डॉक्टर मरीज़ के मेडिकल रिकॉर्ड में डू-नॉट-रिससिटैट (DNR) ऑर्डर के तौर पर दर्ज़ करता है।

आर्टिफिशियल न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन: इसका यूज़ उन मरीज़ों के लिए किया जाता है, जो खाना-पानी नहीं ले सकते हैं। इसमें ट्यूब फीडिंग को सीधे पेट, ऊपरी आंत, या नस में डाला जाता है और उस ट्यूब के ज़रिए ही पोषक तत्वों और लिक्विड या तरल पदार्थ का बैलेंस्ड मिश्रण दिया जाता है।

आर्टिफिशियल न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन कई बार जीवन बचा लेते हैं। आर्टिफिशियल न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन लंबे समय तक उन मरीज़ों को दिया जाता है, जो आंतों की गंभीर बीमारी की वजह से खाने को पचा नहीं पाते हैं।ट्यूब फीडिंग या नली के ज़रिए खाना अक्सर बहुत गंभीर मरीज़ों को दिया जाता है। ट्यूब फीडिंग कब हटाया जाए, इसका फ़ैसला मरीज़ के परिजन और डॉक्टर मरीज़ की स्थिति के अनुसार मिलकर कर सकते हैं।

किडनी डायलिसिस: यह लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सबसे कम इमरजेंसी वाले उपायों में शामिल हैं। डायलिसिस का यूज़ टॉक्सिन या ज़हरीले पदार्थों को फिल्टर करके शरीर से बाहर निकालने के लिए किया जाता है।

कब और कैसे शुरू होता है लाइफ सपोर्ट?

डॉक्टर, नर्स और अन्य हेल्थ केयर प्रोफेशनल, प्रमुख अंगों के काम करना बंद करने पर तुरंत लाइफ सपोर्ट देना शुरू कर देते हैं। इसमें दो प्रमुख मुद्दे हैं- लाइफ सपोर्ट शुरू करना और लाइफ सपोर्ट बंद करना। इन दोनों ही स्थितियों के लिए डॉक्टर को मरीज़ या उसके परिजन की अनुमति की ज़रूरत होती है।

मरीज़ या उसके परिजन लाइफ सपोर्ट सिस्टम लेने से इनकार कर सकते हैं, यानी इसे लेना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। हालांकि, एक बार इलाज शुरू होने के बाद इसे बीच में बंद नहीं किया जा सकता।

कुछ ऐसे भी कारण हैं, जब डॉक्टर अपनी मर्ज़ी से मरीज़ को लाइफ सपोर्ट नहीं दे सकते हैं, जैसे-

  • मरीज़ के परिजन इसे सिरे से नकार दें।
  • मरीज़ के परिजन इस बात का लिखित निर्देश दें कि उन्हें यह नहीं चाहिए।
  • मरीज़ के परिवार का निकटतम सदस्य उसके मेडिकल पावर ऑफ़ अटॉर्नी का प्रयोग करके लाइफ सपोर्ट लेने से मना कर दे।

लाइफ सपोर्ट कब रोक दिया जाता है?

आमतौर पर जब मरीज़ की रिकवरी की संभावना बिल्कुल नहीं बचती और डॉक्टर को लगता है कि अंग अब ख़ुद से काम करने में सक्षम नहीं हैं तो वे लाइफ सपोर्ट को बंद किए जाने की सलाह देते हैं।

  • रिकवरी की संभावना पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद भी लाइफ सपोर्ट को जारी रखने से मौत की प्रक्रिया लंबी खिंच ज़ाती है और ये प्रक्रिया बहुत खर्चीली भी है।
  • लाइफ सपोर्ट हटाने का मतलब होता है कि मरीज़ की कुछ ही घंटों या दिनों में मौत हो जाएगी। लाइफ सपोर्ट हटाने के कितनी देर बाद व्यक्ति की मौत होगी, ये इस पर निर्भर करता है कि किस तरह के इलाज को रोका गया है।
  • अधिकतर मामलों में वेंटिलेटर को बंद करते ही इंसान की सांस बंद हो ज़ाती है और उसकी मौत हो ज़ाती है, हालांकि, ऐसा करने पर कुछ लोगों की सांसें ख़ुद से चलने लगती है।
  • अगर मरीज़ कोई तरल पदार्थ या लिक्विड भी नहीं ले रहे हैं, तो वे आमतौर पर एक फीडिंग ट्यूब को हटाने के कुछ दिनों के भीतर ही उनकी मौत हो ज़ाती है, हालांकि, वे फीडिंग ट्यूब सपोर्ट हटाने के बाद एक या दो सप्ताह तक जीवित रह सकते हैं।
  • यदि मरीज़ बेहोशी की हालत में होता है और उसका दिमाग़ काम नहीं कर रहा होता है, तो डॉक्टर और परिवार के सदस्य तय करते हैं कि लाइफ सपोर्ट को कब बंद किया जाना चाहिए।
  • यह एक मुश्किल फ़ैसला होता है, ख़ासकर यदि बीमार व्यक्ति ने पहले अपने परिवार के साथ अपने जीवन के अंत की इच्छाओं पर चर्चा न की हो।
  • डॉक्टर परिवार के सदस्यों को ये समझने के लिए कहते हैं कि वे सोचें कि उनका मरीज़ ऐसी परिस्थिति में क्या चाहता है।
  • डॉक्टर मरीज़ को बचाने का हरसंभव प्रयास करते हैं, लेकिन जब उसके अंगों के दोबारा काम करने की कोई संभावना नहीं बचती है, तभी डॉक्टर लाइफ सपोर्ट हटाने की सलाह देते हैं।

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