Bhagwant Mann video probe में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। गुरुग्राम पुलिस की जांच में सामने आया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़ी कथित वायरल वीडियो पर फोरेंसिक रिपोर्ट देने वाली दोनों लैब असल में अस्तित्व में ही नहीं हैं। गिरफ्तार दो आरोपियों अंकित भारद्वाज और अरुण महेंद्रू ने जिन लैब के नाम पर रिपोर्ट जारी की, उनमें से किसी को भी सरकारी रिकॉर्ड में कोई मान्यता हासिल नहीं है।
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कागज़ों में लैब, ज़मीन पर कुछ नहीं
अंकित ने ‘साइफर सेंटिनल’ नाम की लैब के नाम पर नौ पन्नों की रिपोर्ट जारी की, जो जींद के खरक गागर के पते पर दर्ज थी। वहीं अरुण ने ‘साइबरयान ट्रेनिंग एंड कंसल्टेंसी’ के नाम पर 13 पन्नों की रिपोर्ट दिल्ली के तिलक नगर के पते पर साइन की।
हैरान करने वाली बात यह रही कि जांच में दोनों ही लैब फर्जी निकलीं।
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‘जमीन पर लैब का कोई वजूद नहीं’
गुरुग्राम के एसीपी (क्राइम) नवीन शर्मा ने साफ कहा, “अंकित ने साइफर सेंटिनल लैब के नाम पर वीडियो एनालिसिस की रिपोर्ट दी। ज़मीन पर साइफर सेंटिनल लैब मौजूद ही नहीं है। यह लैब किसी सरकारी विभाग में रजिस्टर्ड नहीं है और वह किसी लैब में कर्मचारी तक नहीं है।”
उन्होंने जोड़ा, “इसी तरह अरुण महेंद्रू ने साइबर यान लैब के नाम पर रिपोर्ट दी, जो भी मौजूद नहीं है। अरुण भी किसी फोरेंसिक लैब का कर्मचारी नहीं है, फिर भी उसने साइबर यान के नाम पर रिपोर्ट साइन की।”
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10 लाख रुपये में ‘मनचाही’ रिपोर्ट
गुरुग्राम पुलिस ने एक फोरेंसिक विशेषज्ञ की शिकायत पर दोनों को गिरफ्तार किया। शिकायत में आरोप था कि दो वरिष्ठ पंजाब पुलिस अधिकारियों ने मान से जुड़ी वीडियो पर मनचाही फोरेंसिक राय हासिल करने के लिए उसे 10 लाख रुपये दिए।
समझने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता जसप्रीत सिंह ने दावा किया कि उसे “मजबूर” किया गया कि वह अंकित और अरुण से ये “गढ़ी हुई” रिपोर्टें हासिल करे, जिसके लिए उसने भी 10 लाख रुपये दिए।
‘डिग्रियां और विशेषज्ञता’ का दावा
दिलचस्प बात यह है कि अरुण ने अपनी रिपोर्ट में अपनी “विशेषज्ञता के क्षेत्र” के तौर पर डिजिटल फोरेंसिक जांच, साइबरक्राइम जांच सहयोग, सूचना सुरक्षा आकलन जैसी कई चीज़ें गिनाईं। उसने BCA, इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा होने और MBA (IT) करने का दावा किया। साथ ही EC-Council की ECSA, ECIH और CHFI जैसी सर्टिफिकेशन्स का भी जिक्र किया।
वहीं अंकित ने खुद को “साइफर सेंटिनल का फोरेंसिक एनालिस्ट” और इंडस्ट्री एक्सपर्ट बताते हुए दावा किया कि उसने रक्षा मंत्रालय (MoD) समेत कई सरकारी एजेंसियों की जांच में सहयोग किया है।
रिपोर्ट में क्या लिखा था
दोनों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि वीडियो में दिखने वाला व्यक्ति मान नहीं है। अरुण ने लिखा कि उपलब्ध वीडियो सामग्री की तुलना के आधार पर “विश्वसनीय पहचान का पर्याप्त आधार है कि वीडियो में दिखाया गया व्यक्ति श्री भगवंत मान नहीं हैं।”
दो वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में
गुरुग्राम पुलिस अब दो वरिष्ठ पंजाब पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “उसने दो वरिष्ठ पंजाब पुलिस अधिकारियों के नाम लिए हैं। हम उसके दावों की जांच कर रहे हैं।” आरोपियों को बुधवार को कोर्ट में पेश किया जाना था, ताकि मामले में शामिल अन्य लोगों की पहचान की जा सके।
‘आप’ का पलटवार
वहीं, ‘आप’ के पंजाब प्रधान अमन अरोड़ा ने हरियाणा पुलिस से विवादित वीडियो की उत्पत्ति की गहराई से जांच की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया, “अगर भाजपा सच में सच्चाई जानना चाहती है, तो वह यह जांच क्यों नहीं कर रही कि यह वीडियो किसने बनाई, इसमें किसने अभिनय किया, किसने इसे फाइनेंस किया और इसे फैलाने का जिम्मेदार कौन था?”
अरोड़ा ने जोड़ा कि अगर मनचाही फोरेंसिक रिपोर्ट लेनी होती, तो यह पंजाब की किसी भी लैब से करवाई जा सकती थी, जहां कानून-व्यवस्था ‘आप’ सरकार के हाथ में है। ऐसा न करना यही दर्शाता है कि मकसद वीडियो का निष्पक्ष आकलन हासिल करना था।
आम लोगों पर असर
यह मामला फोरेंसिक रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब फर्जी लैब और गढ़ी हुई रिपोर्टें सामने आती हैं, तो आम आदमी का न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों पर भरोसा डगमगाता है। यही इस खुलासे का सबसे चिंताजनक पहलू है।
जानें पूरा मामला
यह पूरा विवाद मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़ी एक कथित बेअदबी वायरल वीडियो को लेकर शुरू हुआ। अकाल तख़्त की फोरेंसिक रिपोर्ट में वीडियो को प्रमाणिक बताया गया था, जबकि एक और पक्ष ने इसे फर्जी साबित करने की कोशिश की। इसी कोशिश में फर्जी लैब और गढ़ी हुई रिपोर्टों का पूरा खेल सामने आ गया, जिसके बाद गुरुग्राम पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया।
मुख्य बातें (Key Points)
- गुरुग्राम पुलिस की जांच में दोनों फोरेंसिक लैब फर्जी निकलीं।
- गिरफ्तार आरोपी अंकित और अरुण किसी मान्यता प्राप्त लैब के कर्मचारी नहीं।
- मनचाही रिपोर्ट के लिए कथित तौर पर 10 लाख रुपये के लेन-देन का आरोप।
- दो वरिष्ठ पंजाब पुलिस अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में।











