BRICS Consensus Failure: दिल्ली में जो हुआ, वह भारत की कूटनीति के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हुआ। जब BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक शुरू हुई, तो उम्मीद थी कि भारत अपनी अध्यक्षता में सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनवा लेगा। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। Iran War को लेकर ईरान और UAE के बीच इतनी तीखी असहमति हो गई कि कोई Joint Statement ही जारी नहीं हो पाया। यह वही स्थिति थी जो 2 साल पहले G20 Summit में Russia-Ukraine War को लेकर देखने को मिली थी। लेकिन तब भारत ने किसी तरह सबको मना लिया था। इस बार कामयाबी नहीं मिली।
देखा जाए तो यह सिर्फ एक procedural disagreement नहीं है। यह BRICS के भीतर गहरे geopolitical contradictions को उजागर करता है। खबर आई है – “India fails to bridge divide over Iran War at BRICS summit” – और यह headline ही सब कुछ बयां कर देता है।
क्या हुआ दिल्ली में, जानें पूरा मामला
BRICS Foreign Ministers Meeting दिल्ली में आयोजित की गई थी। इस बार भारत के पास BRICS की अध्यक्षता है। PM Modi ने सभी विदेश मंत्रियों से मुलाकात की, हाथ मिलाया, स्वागत किया। सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन जैसे-जैसे बैठक आगे बढ़ी, तनाव बढ़ता गया।
असली समस्या तब शुरू हुई जब Joint Declaration के draft पर चर्चा होने लगी। Iran चाहता था कि BRICS स्पष्ट रूप से अमेरिका और इज़राइल की military actions की निंदा करे। ईरान पर हुए हमलों को international law का उल्लंघन बताया जाए। तेहरान को diplomatic support मिले।
लेकिन UAE इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। क्यों? क्योंकि UAE के अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते हैं। Western security system के साथ गहरे ties हैं। भारत के साथ भी बड़ी economic partnership है।
समझने वाली बात यह है कि BRICS में consensus-based decision making होती है। मतलब अगर एक भी देश किसी बात से नाखुश है, तो Joint Declaration जारी नहीं हो सकता। और यही हुआ।
ईरान की मांग, UAE की आपत्ति
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने विशेष रूप से दो paragraphs पर आपत्ति जताई:
Paragraph 26: इसमें Palestine issue का जिक्र था, लेकिन ईरान को लगा कि भाषा काफी कमजोर है।
Paragraph 29: इसमें Red Sea और Maritime Security का मुद्दा था, जिसे ईरान अपने खिलाफ मानता था।
ईरान चाहता था कि BRICS openly anti-Western हो जाए। Strategically coordinate करे। Politically assertive बने। लेकिन UAE की पूरी अलग सोच थी।
दिलचस्प बात यह है कि negotiations के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया। ईरान wording को और aggressive बनाना चाहता था। UAE ने साफ मना कर दिया। भारत ने बीच में mediate करने की पूरी कोशिश की। लेकिन दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह अड़े रहे।
भारत ने जारी किया Chair’s Statement
चूंकि Joint Statement संभव नहीं था, इसलिए भारत ने केवल “Chair’s Statement and Outcome Document” जारी किया। इसे आप यहां पढ़ सकते हैं।
इस statement में भारत ने बेहद सावधानी से neutral language का इस्तेमाल किया है। कहा गया है:
- “We note the different views expressed by members”
- “Support for dialogue and diplomacy”
- “Respect for international law”
- “Maritime security and protection of civilians”
अगर गौर करें तो भारत ने किसी को भी directly condemn नहीं किया – न ईरान को, न UAE को, न अमेरिका को, न इज़राइल को। न ही explicitly ईरान की position को support किया। न ही anti-Western language का इस्तेमाल किया।
यह वही strategic balancing diplomacy है जो भारत सालों से करता आ रहा है। लेकिन इस बार यह पर्याप्त नहीं रहा।
ईरान बनाम UAE: दो अलग दुनियाएं
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि Iran और UAE दोनों BRICS के सदस्य जरूर हैं, लेकिन strategically वे बिल्कुल अलग हैं।
| मुद्दा | ईरान की स्थिति | UAE की स्थिति |
|---|---|---|
| अमेरिका के साथ संबंध | US hegemony का विरोध | US के साथ मजबूत रक्षा संबंध |
| इज़राइल | पूर्ण विरोध | Diplomatic normalization |
| क्षेत्रीय भूमिका | Anti-Western resistance का नेतृत्व | Stability और trade को प्राथमिकता |
| BRICS की भूमिका | Anti-Western military bloc बनाना चाहता है | Economic forum के रूप में देखता है |
| भारत के साथ | Strategic partnership | $5 billion investment, oil supply deals |
ईरान ने UAE पर हमले भी किए हैं – Fujairah Port पर attacks हुए हैं। जब Iran War अपने peak पर था, तब Burj Khalifa के आसपास भी missiles गिरी थीं। कुछ hotels के पास drone attacks हुए जिनमें जानें भी गईं।
तो जाहिर है कि दोनों देशों के बीच सहमति बनना लगभग असंभव था।
BRICS का विस्तार ही बन गया संकट
BRICS की शुरुआत 2009 में हुई थी – तब सिर्फ Brazil, Russia, India और China थे। 2010 में South Africa जुड़ा। तब तक सब ठीक था।
Original purpose क्या था? Global economic governance में reforms लाना। Western countries के dominance को कम करना। Developing countries की आवाज बुलंद करना। Multipolarity को promote करना। IMF, World Bank, SWIFT, G7 का alternative बनाना।
लेकिन हाल के वर्षों में जब Egypt, Ethiopia, Indonesia, Iran और UAE शामिल हुए, तो चीजें जटिल हो गईं।
Expansion की वजह से overall population बढ़ा, oil reserves बढ़े, geopolitical weight बढ़ी – यह तो अच्छी बात है। लेकिन problem यह हुई कि इन देशों के बीच आपस में ही rivalry है। Conflicting alliances हैं। Wars में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
यही BRICS crisis का सबसे बड़ा कारण है।
चीन के विदेश मंत्री क्यों नहीं आए
एक और दिलचस्प तथ्य – China के Foreign Minister Wang Yi इस meeting में शामिल ही नहीं हुए। चीन ने अपने Ambassador को भेज दिया representation के तौर पर।
यह भी थोड़ा problematic हो जाता है। China का direct diplomatic involvement कम हो गया। और उसकी वजह से जो compromise हो सकता था, consensus बन सकता था, वो भी नहीं बन पाया।
क्या यह China की strategy थी कि वह भारत को अकेले struggle करने दे? या फिर Wang Yi की अन्य प्राथमिकताएं थीं? यह स्पष्ट नहीं है।
भारत की दुविधा: सबके साथ संबंध बनाए रखना
भारत के लिए यह बेहद sensitive position थी। क्योंकि हमारे सभी के साथ अच्छे relations हैं:
- USA: Strategic partnership, Quad member
- Israel: Defense cooperation, technology transfer
- UAE: $5 billion investment, oil supply, trade
- Iran: Chabahar Port, energy needs
- Russia: Defense equipment, historical ties
- Saudi Arabia: Energy security, diaspora
इन सबके competing interests को manage करना आसान नहीं था।
खासकर जब BRICS meeting चल रही थी, उसी समय PM Modi पांच European countries के दौरे पर गए थे। लेकिन सबसे पहले वे UAE गए। यह symbolic था – India-UAE ties की importance दिखाने के लिए।
Oil prices बढ़ रहे हैं। Gas और oil की supply सुनिश्चित करनी थी। $5 billion का investment promise हुआ। यह सब बीच में चल रहा था।
ऐसे में भारत किसी एक पक्ष को खुश करके दूसरे को नाराज नहीं कर सकता था।
क्या BRICS अब प्रासंगिक है
सवाल उठता है – BRICS का अब कोई relevance है या नहीं? क्योंकि जिस मकसद के लिए यह बनाया गया था, उसमें यह fail हो रहा है।
Critics का तर्क है:
- BRICS में strategic coherence नहीं है
- Economically united नहीं दिखता
- NATO, European Union या G7 की तरह function नहीं कर सकता
- बोलने के लिए meetings होती हैं, लेकिन concrete outcomes नहीं मिलते
- सबसे बड़े global crisis पर भी consensus नहीं बन पाता
BRICS खुद को “Global South की आवाज” बताता है। “Multipolarity का champion” कहता है। “Western-led global governance का alternative” दावा करता है।
लेकिन जब दुनिया के सबसे बड़े crisis – Iran War – पर सहमति नहीं बन पा रही, तो यह credibility पर सवाल खड़े करता है।
G20 Summit की याद
याद कीजिए 2 साल पहले जब India ने G20 Summit host किया था। तब भी Russia-Ukraine War को लेकर बड़ी समस्या थी। Joe Biden और Vladimir Putin के बीच सहमति नहीं बन रही थी। Joint Statement के मुद्दे पर बड़ा संकट था।
लेकिन भारत ने किसी तरह सभी पक्षों को मना लिया। Balanced language का इस्तेमाल किया। और अंत में Joint Declaration जारी हुआ। यह भारत की diplomatic victory थी।
इस बार वही कामयाबी नहीं मिली। क्यों? क्योंकि इस बार मामला और भी जटिल था। Iran War सिर्फ दो देशों के बीच नहीं है। इसमें Middle East, USA, Israel, Gulf countries सब शामिल हैं। Regional rivalries हैं। Sectarian tensions हैं।
आगे क्या होगा
अब देखना होगा कि जब BRICS का पूरा Summit होगा – जब heads of states की meeting होगी – तब क्या होता है। क्या तब Joint Declaration संभव हो पाएगा?
यह काफी हद तक depend करेगा कि Iran War का क्या हाल होता है। अगर युद्ध जारी रहा, tensions बढ़ते रहे, तो फिर से consensus बनाना मुश्किल होगा।
भारत की कोशिश होगी कि वह अपनी chairmanship को successful बनाए। लेकिन geopolitical realities इतनी जटिल हैं कि यह आसान नहीं होगा।
हो सकता है भारत फिर से वही formula अपनाए – बहुत generic, neutral language में statement जारी करे। Controversial issues को avoid करे। सबको खुश रखने की कोशिश करे।
लेकिन सवाल यह है कि इससे BRICS की credibility पर क्या असर होगा? क्या यह group सच में कुछ concrete achieve कर पाएगा?
BRICS: बातें ज्यादा, नतीजे कम
चिंता का विषय यह है कि BRICS धीरे-धीरे एक talk shop बनता जा रहा है। Meetings होती हैं, photos खिंचती हैं, statements आते हैं – लेकिन ground पर बदलाव नहीं दिखता।
New Development Bank बनाया गया – लेकिन उसका impact कितना है? BRICS currency की बात होती है – लेकिन कब होगा? Trade में local currencies का इस्तेमाल बढ़ाने की बात होती है – लेकिन progress धीमी है।
अगर BRICS को relevant बने रहना है, तो उसे अपने internal contradictions को resolve करना होगा। Clear objectives define करने होंगे। और सबसे जरूरी – consensus building mechanism को मजबूत बनाना होगा।
वरना यह सिर्फ एक symbolic platform बनकर रह जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
- BRICS Foreign Ministers Meeting दिल्ली में हुई लेकिन Joint Statement जारी नहीं हो पाया
- Iran चाहता था कि BRICS अमेरिका और इज़राइल की निंदा करे, लेकिन UAE ने इनकार कर दिया
- BRICS में consensus-based decision making होती है, इसलिए एक देश की असहमति से पूरा statement रुक गया
- भारत ने mediate करने की कोशिश की लेकिन Iran-UAE divide को पाट नहीं पाया
- चीन के Foreign Minister Wang Yi meeting में शामिल नहीं हुए, सिर्फ Ambassador भेजा
- भारत ने केवल Chair’s Statement जारी किया जिसमें neutral language का इस्तेमाल किया
- यह incident BRICS के भीतर गहरे geopolitical contradictions को उजागर करता है
- BRICS का expansion फायदेमंद तो है लेकिन सदस्यों के बीच conflicting interests भी बढ़े हैं
- अब देखना होगा कि BRICS Summit में heads of states कैसे consensus बनाते हैं













