Testosterone Naturally कैसे बढ़ाएं, यह सवाल आज के समय में कई पुरुषों के लिए अहम हो गया है। Testosterone एक मेल सेक्स हॉर्मोन है जो पुरुषों की आवाज बदलना, दाढ़ी-मूंछ आना, मांसपेशियों की ताकत बढ़ना जैसे कामों में मदद करता है। यह हॉर्मोन उनकी सेक्शुअल ड्राइव को भी कंट्रोल करता है।
पर कई बार पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा घटने लगती है। खासकर 30 से 40 की उम्र के बाद। जाहिर है इसका सीधा असर उनके शरीर, दिमाग और सेक्स करने की इच्छा पर पड़ता है।
लेकिन अच्छी बात यह है कि टेस्टोस्टेरोन को नेचुरली बढ़ाया जा सकता है। यह जानकारी दी Narayana Hospital, Gurugram में यूरोलॉजी एंड यूरो-ऑन्कोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट एंड डायरेक्टर Dr. Rajiv Goel ने।
कौन से फूड्स हैं फायदेमंद
देखा जाए तो टेस्टोस्टेरोन कुछ खास चीजों के सेवन से बढ़ सकता है। जैसे कि Fish (मछली), गुड क्वालिटी फैट्स जैसे कि Avocado (एवोकाडो), Nuts (मेवे), Berries (बेरीज) और Oysters (सीप), Pomegranate (अनार)। इन सबके सेवन से टेस्टोस्टेरोन बढ़ सकता है।
डॉ. राजीव गोयल कहते हैं कि टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने के लिए सप्लीमेंट्स का भी इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन उनसे बहुत ज्यादा कोई फायदा नहीं होता है।
अगर गौर करें तो यह एक महत्वपूर्ण बात है। बाजार में कई सप्लीमेंट्स उपलब्ध हैं जो बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन वास्तव में उनका प्रभाव सीमित होता है।
6-7 घंटे की नींद है जरूरी
अगर आप रियली टेस्टोस्टेरोन बढ़ाना चाहते हैं तो आपको एक्चुअली जो चाहिए वो है 6 से 7 घंटे की अच्छी स्लीप। हर रोज एक्सरसाइज, खासकर Muscle Building Exercise करनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि अगर आपके मसल्स डेवलप होते हैं तो टेस्टोस्टेरोन लेवल्स बढ़ते हैं। यह एक नेचुरल साइकिल है जो शरीर में चलती रहती है।
और फाइनली गुड क्वालिटी फैट एंड प्रोटीन इन डाइट लेना बेहद जरूरी है। अगर आप सिर्फ कार्बोहाइड्रेट्स खा रहे हैं तो टेस्टोस्टेरोन लेवल लो हो जाएगा।
समझने वाली बात यह है कि बैलेंस्ड डाइट ही असली चाबी है। केवल एक ही तरह का पोषण लेने से काम नहीं चलेगा।
इन चीजों से करें परहेज
टेस्टोस्टेरोन लो होता है जब हम एक्स्ट्रा शुगर खाते हैं, जब हम Processed Food खाते हैं, जब हम Fried Food खाते हैं। इसलिए इन चीजों का सेवन अवॉइड करिए।
स्टडीज यह भी शो करती हैं कि Soya Products (सोया उत्पाद) और Mint (पुदीना) का ज्यादा सेवन से भी टेस्टोस्टेरोन लेवल कम हो जाता है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह चीजें पूरी तरह से खराब नहीं हैं, लेकिन इनकी अधिक मात्रा नुकसानदेह हो सकती है।
5 नेचुरल तरीके (संक्षेप में)
अगर आपको टेस्टोस्टेरोन लेवल बढ़ाना है तो:
1. डाइट में गुड क्वालिटी फैट जरूर शामिल करें – एवोकाडो, नट्स, फिश जैसे फूड्स
2. अच्छी नींद लेना – 6-7 घंटे की नींद अनिवार्य है
3. रोज एक्सरसाइज करना – खासकर मसल बिल्डिंग एक्सरसाइज
4. बैलेंस्ड डाइट – प्रोटीन, फैट और कार्ब्स का सही संतुलन
5. प्रोसेस्ड और फ्राइड फूड से बचें – शुगर का सेवन कम करें
राहत की बात यह है कि यह सभी तरीके पूरी तरह से नेचुरल और साइड-इफेक्ट फ्री हैं।
Pancreatic Cancer Vaccine में बड़ी सफलता
90% मरीज 4-6 साल बाद भी जिंदा
Pancreatic Cancer से जुड़ी एक अच्छी खबर है। वैज्ञानिक इस मुश्किल कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीन तैयार कर रहे हैं। इस वैक्सीन का फेज वन क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है और नतीजे उम्मीद जगाने वाले हैं।
पैन्क्रियाज में कैंसर वाले जिन मरीजों के शरीर में इस वैक्सीन पर अच्छा रिस्पांस दिया, उनमें से करीब 90% लोग इलाज के 4 से 6 साल बाद भी जिंदा थे।
देखा जाए तो यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर इस कैंसर में मरीजों के बचने की उम्मीद कम होती है। American Cancer Society की कैंसर स्टैटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट के मुताबिक पैन्क्रियाटिक कैंसर का फाइव ईयर सर्वाइवल रेट सिर्फ 13% है।
यानी यह कैंसर डायग्नोस होने के बाद 100 में से सिर्फ 13 लोग ही अगले 5 साल तक जिंदा रह पाते हैं।
Autogene Cevumeran: एक खास वैक्सीन
इस एक्सपेरिमेंटल वैक्सीन का नाम Autogene Cevumeran है। इसके खास होने की कुछ वजहें हैं।
पहली वजह यह कि यह एक Therapeutic Vaccine है। यानी यह कैंसर से बचाने में नहीं बल्कि उसके इलाज में मदद करती है। मतलब जिन लोगों को पैन्क्रियाज का कैंसर हो गया है, उनमें यह कैंसर के बढ़ने या दोबारा लौटने को रोकने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।
दूसरी वजह यह Personalized Vaccine है। यानी इसे मरीज के ट्यूमर के हिसाब से तैयार किया जाता है। यह कोई जनरल वैक्सीन नहीं है।
तीसरी वजह यह mRNA Technology पर बेस्ड है। इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कोविड-19 वैक्सीन में भी हुआ था।
कैसे काम करती है यह वैक्सीन
mRNA यानी Messenger Ribonucleic Acid। यह शरीर के सेल्स को बताता है कि कौन सा प्रोटीन बनाना है। इस वैक्सीन में सेल्स को ऐसा मैसेज दिया जाता है कि वो ट्यूमर से जुड़े कुछ खास प्रोटीन बनाएं।
इससे शरीर का इम्यून सिस्टम, खासकर T-cells, उन प्रोटीन को पहचानकर कैंसर सेल्स पर हमला करना सीखते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह तकनीक शरीर की अपनी रक्षा प्रणाली को ही मजबूत बनाती है, बाहर से कुछ नया नहीं डालती।
क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे
Autogene Cevumeran वैक्सीन पर अभी रिसर्च और क्लीनिकल ट्रायल्स चल रहे हैं। यह वैक्सीन BioNTech और Genentech मिलकर डेवलप कर रहे हैं। Genentech स्विट्जरलैंड की बड़ी फार्मा कंपनी Roche Group का हिस्सा है।
रिसर्च में New York के Memorial Sloan Kettering Cancer Center के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। रिसर्च को Dr. Vinod Balachandran लीड कर रहे हैं।
उन्होंने इसके फॉलो-अप नतीजे American Association for Cancer Research की एनुअल मीटिंग में पेश किए।
16 मरीजों पर हुआ परीक्षण
वैक्सीन के फेज वन स्टडी में 16 मरीजों को पैन्क्रियाटिक कैंसर की सर्जरी के बाद Autogene Cevumeran वैक्सीन दी गई। साथ में उन्हें कीमोथेरेपी और चेकपॉइंट इनहिबिटर नाम की एक इम्यूनोथेरेपी दवा भी दी गई।
यह वैक्सीन हर मरीज के ट्यूमर के DNA के हिसाब से अलग-अलग बनाई गई थी। 16 में से 8 मरीजों में इस वैक्सीन ने अच्छा असर दिखाया।
इन मरीजों के इम्यून सिस्टम ने ट्यूमर को पहचानना शुरू किया और T-cells बनाए। यह T-cells कैंसर के सेल्स पर हमला करते हैं।
समझने वाली बात यह है कि इन 8 मरीजों में से 7 लोग सर्जरी के 4 से 6 साल बाद भी जिंदा रहे। वहीं जिन 8 मरीजों में वैक्सीन असर नहीं कर पाई, उनमें से सिर्फ 2 लोग ही जिंदा बचे।
पैन्क्रियाटिक कैंसर इतना खतरनाक क्यों
इस बारे में हमने पूछा H.O.P.E. Oncology Clinic, New Delhi में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर Dr. Amish Vora से।
डॉ. अमीश बोरा कहते हैं कि Pancreas शरीर के अंदर गहराई में होता है। इसलिए यहां बनने वाला ट्यूमर जल्दी पकड़ में नहीं आता। इससे जांच में अक्सर देरी हो जाती है।
इस कैंसर के शुरुआती लक्षण लगभग न के बराबर होते हैं। जिससे बीमारी का पता देर से चलता है। तब तक कैंसर फैल चुका होता है।
पैन्क्रियाटिक कैंसर के हर मरीज में सर्जरी मुमकिन नहीं होती। कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी का असर भी सीमित रहता है। इस वजह से इसका इलाज काफी जटिल और चुनौती भरा बन जाता है।
भविष्य की उम्मीदें
फेज वन के अच्छे नतीजों के बाद अब एक ग्लोबल फेज टू क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया गया है। इसमें Autogene Cevumeran वैक्सीन को ज्यादा मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है।
यह स्टडी न्यूयॉर्क के MSK यानी Memorial Sloan Kettering समेत कई दूसरी जगहों पर चल रही है।
डॉ. अमीश कहते हैं कि नई mRNA बेस्ड वैक्सीन Autogene Cevumeran शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स पहचानने और उनसे लड़ने में मदद करती है। अगर आगे बड़े ट्रायल्स में भी इसके अच्छे नतीजे मिलते हैं तो इससे मरीजों की उम्र बढ़ सकेगी।
साथ ही इलाज ज्यादा असरदार और मरीज के हिसाब से बनाया जा सकेगा।
हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी यह स्टडी एक बहुत ही छोटे समूह पर हुई है। इसलिए इसके नतीजों को बड़े और रैंडमाइज्ड ट्रायल्स में कंफर्म करना जरूरी है।
किडनी पेशेंट्स कौन से फल खाएं
गर्मियों के कुछ फल हो सकते हैं नुकसानदेह
हर मौसम में अलग-अलग फल आते हैं जो खास उस मौसम की जरूरतों को पूरा करते हैं। यह फल ज्यादा पौष्टिक, सस्ते और ताजे होते हैं। जैसे गर्मियों में मौसमी फल हैं – Watermelon (तरबूज), Muskmelon (खरबूजा), Mango (आम), Litchi (लीची), Jamun (जामुन) और Bael (बेल) वगैरह।
आमतौर पर मौसमी फल खाने के लिए बेस्ट माने जाते हैं। पर अगर आपको किडनी से जुड़ी कोई दिक्कत है तो हो सकता है कि गर्मियों में मिलने वाले कुछ फल आपके लिए सेफ ना हों।
इस बारे में हमें जानकारी दी Aakash Healthcare Multi-Speciality Hospital, Dwarka में नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट के एडिशनल डायरेक्टर Dr. Anupam Roy ने।
क्यों सावधानी जरूरी है
डॉ. अनुपम रॉय कहते हैं कि फल वैसे तो हेल्दी होते हैं, लेकिन हर फल हर किसी के लिए सही नहीं होता। कुछ फलों में Potassium, नेचुरल शुगर और पानी ज्यादा होता है।
जब किडनी ठीक से काम नहीं करती तब ऐसे फलों को ज्यादा खाना नुकसान कर सकता है। खासकर उन लोगों में जिन्हें Chronic Kidney Disease है, जो Dialysis पर हैं या जिनके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस बिगड़ा हुआ है।
अगर गौर करें तो यह समझना बहुत जरूरी है कि कौन सा फल कितनी मात्रा में लेना है।
आम: सीमित मात्रा में खाएं
कुछ फलों को लिमिट में ही खाना चाहिए। जैसे Mango (आम)। इसमें पोटैशियम और शुगर दोनों ज्यादा होते हैं। जब किडनी सही से काम नहीं करती तो शरीर में पोटैशियम बढ़ सकता है।
जिससे दिल की धड़कन पर असर पड़ सकता है। इसलिए Chronic Kidney Disease और Diabetic Kidney Patients को आम ज्यादा नहीं खाने चाहिए।
तरबूज और खरबूजा: डायलिसिस मरीजों के लिए नहीं
Watermelon (तरबूज) में पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। यह उन लोगों के लिए ठीक नहीं है जिन्हें फ्लूइड लिमिट में रखना होता है, जैसे डायलिसिस पेशेंट्स।
इसी तरह Muskmelon (खरबूजा) और Banana (केला) में भी पोटैशियम बहुत ज्यादा होता है। लिहाजा एडवांस्ड क्रॉनिक किडनी डिजीज और डायलिसिस वाले मरीजों को इन्हें अवॉइड करना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि जो फल आमतौर पर बेहद फायदेमंद माने जाते हैं, वे किडनी मरीजों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।
संतरा, मौसंबी और चीकू
Orange (संतरा) और Sweet Lime (मौसंबी) में भी पोटैशियम होता है। इसलिए अगर शरीर में पोटैशियम पहले ही हाई है तो इन्हें कंट्रोल में लेना चाहिए।
वहीं Sapota (चीकू) में शुगर ज्यादा होती है। इसलिए डायबिटिक किडनी मरीजों को इसे कम ही खाना चाहिए।
किडनी-फ्रेंडली फल कौन से हैं
वैसे कुछ ऐसे भी फल हैं जो किडनी पेशेंट्स के लिए सेफ माने जाते हैं। जैसे Apple (सेब)। इसमें पोटैशियम कम और फाइबर ज्यादा होता है।
Pineapple (अनानास) भी किडनी फ्रेंडली फल है। इसके अलावा Strawberry, Blueberry, Grapes (अंगूर), Papaya (पपीता) और Guava (अमरूद) भी सीमित मात्रा में लिए जा सकते हैं।
क्योंकि यह किडनी पर ज्यादा बोझ नहीं डालते।
पोर्शन कंट्रोल है जरूरी
हालांकि कोई फल कितना ही सेफ क्यों ना हो, ज्यादा मात्रा में लेने पर नुकसान कर सकता है। इसलिए पोर्शन कंट्रोल बहुत जरूरी है।
एक और बात – हर मरीज की हालत अलग होती है। इसलिए डाइट में कोई भी चेंज करने से पहले डॉक्टर से जरूर पूछ लें।
समझने वाली बात यह है कि सामान्य सलाह सभी पर लागू नहीं होती। आपकी किडनी की स्थिति, डायलिसिस की जरूरत, और दूसरी बीमारियों के आधार पर डाइट प्लान अलग होगा।
मुख्य बातें (Key Points):
टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने के तरीके:
- गुड क्वालिटी फैट, प्रोटीन और फिश, नट्स, बेरीज खाएं
- 6-7 घंटे की नींद और रोजाना मसल बिल्डिंग एक्सरसाइज जरूरी
- प्रोसेस्ड फूड, एक्स्ट्रा शुगर और फ्राइड फूड से बचें
पैन्क्रियाटिक कैंसर वैक्सीन:
- Autogene Cevumeran वैक्सीन से 90% मरीज 4-6 साल बाद भी जिंदा
- mRNA टेक्नोलॉजी पर आधारित पर्सनलाइज्ड वैक्सीन
- फेज टू क्लीनिकल ट्रायल जारी
किडनी पेशेंट्स के लिए फल:
- आम, तरबूज, खरबूजा, केला सीमित मात्रा में या अवॉइड करें
- सेब, अनानास, बेरीज किडनी-फ्रेंडली हैं
- डाइट में बदलाव से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूरी













