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The News Air - Breaking News - Sarcopenia: बुढ़ापे में कमजोर मसल्स से बचाएगी डॉक्टर की ये सलाह, जानें पूरी जानकारी

Sarcopenia: बुढ़ापे में कमजोर मसल्स से बचाएगी डॉक्टर की ये सलाह, जानें पूरी जानकारी

30 की उम्र के बाद शुरू होता है मसल लॉस जिसे Sarcopenia कहते हैं, डॉक्टर ने बताए बचाव के आसान तरीके; साथ ही जानें हेयर ऑयल vs हेयर सीरम में कौन बेहतर और सब्जियों में मिले खतरनाक लेड का पूरा सच।

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 12 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, हेल्थ
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Sarcopenia
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Sarcopenia एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में ज्यादातर लोग जानते ही नहीं, लेकिन यह चुपचाप उनके शरीर को कमजोर बना रही होती है। बुढ़ापे में हड्डियां कमजोर होती हैं, यह तो सबको पता है। लेकिन सिर्फ हड्डियां ही नहीं, मांसपेशियां भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। जैसे ही 30 से 35 साल की उम्र पार होती है, मसल लॉस शुरू हो जाता है। इसे ही मेडिकल भाषा में Sarcopenia कहते हैं, यानी उम्र बढ़ने के साथ-साथ मांसपेशियों का कमजोर और कम हो जाना।

जब मसल्स की ताकत घटती है तो उठने-बैठने, चलने, सीढ़ियां चढ़ने और यहां तक कि कुर्सी से खड़े होने तक में दिक्कत होने लगती है। सर गंगाराम हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के चेयरपर्सन डॉ. अतुल कक्कड़ ने इस बीमारी के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

Sarcopenia क्या है: अब हड्डी और मसल दोनों को एक साथ देखा जाता है

डॉ. अतुल कक्कड़ बताते हैं कि Sarcopenia एक ऐसी बीमारी है जिसमें मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है। आजकल मेडिकल साइंस में मसल और बोन यानी मांसपेशी और हड्डी दोनों को एक सिंगल यूनिट के रूप में देखा जाता है। जब दोनों एक साथ कमजोर होते हैं तो इसके लिए एक नया मेडिकल टर्म इस्तेमाल किया जाता है: ऑस्टियोसार्कोपीनिया (Osteosarcopenia)। इसका मतलब है कि बोन और मसल दोनों एक साथ कमजोर हो रहे हैं।

यह बात आम लोगों के लिए इसलिए अहम है क्योंकि ज्यादातर लोग सिर्फ हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस) पर ध्यान देते हैं, लेकिन मांसपेशियों की कमजोरी को नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि हकीकत यह है कि Sarcopenia रोजमर्रा की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित करता है।

Sarcopenia के कारण: डायबिटीज से लेकर एक्सरसाइज न करने तक

डॉ. अतुल कक्कड़ के अनुसार Sarcopenia के कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहला और सबसे आम कारण है एजिंग प्रोसेस यानी बढ़ती उम्र। 30 साल की उम्र के बाद शरीर में मसल लॉस शुरू हो जाता है और यह प्रक्रिया उम्र बढ़ने के साथ तेज होती जाती है।

इसके अलावा डायबिटीज (शुगर) के मरीजों में Sarcopenia बहुत ज्यादा देखा जाता है। क्रॉनिक इंफेक्शन यानी लंबे समय से चले आ रहे संक्रमण भी इसकी एक बड़ी वजह हैं। अगर किसी को कैंसर है या पेट की कोई गंभीर बीमारी है जिसमें पोषण ठीक से नहीं मिल पाता, तो भी मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं।

मालन्यूट्रिशन यानी कुपोषण और लैक ऑफ एक्सरसाइज यानी व्यायाम न करना Sarcopenia के दो और बड़े कारण हैं। जो लोग शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं रहते, उनकी मांसपेशियां तेजी से कमजोर होती हैं।

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Sarcopenia के लक्षण: कुर्सी से उठना भी हो जाता है मुश्किल

Sarcopenia के लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी है ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके। डॉ. अतुल कक्कड़ बताते हैं कि इसका सबसे पहला लक्षण यह है कि मसल का मास यानी मांसपेशियों का आकार विजिबली कम हो जाता है। शरीर पतला और कमजोर दिखने लगता है।

उठने-बैठने में दिक्कत होने लगती है। एक बहुत सिंपल टेस्ट है जिससे आप खुद जांच सकते हैं: कुर्सी से बिना किसी सहारे के खड़ा होना। अगर आपको कुर्सी से बिना हाथ का सहारा लिए खड़ा होने में दिक्कत हो रही है, तो यह Sarcopenia का संकेत हो सकता है।

सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा डॉक्टर ने एक और दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इंडियन स्टाइल टॉयलेट का इस्तेमाल करने में भी दिक्कत आती है। नीचे स्क्वाट करके बैठने की पोजीशन से बिना सहारे के उठना Sarcopenia के मरीजों के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें मसल्स और बोन दोनों पर असर पड़ता है।

अगर शरीर के किसी हिस्से में, किसी मांसपेशी में खूब दर्द हो रहा है, यह दर्द जाने का नाम नहीं ले रहा और इसका असर रोजमर्रा के काम पर पड़ रहा है, तो एक बार डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए।

Sarcopenia की जांच कैसे होती है: DEXA स्कैन से लेकर नर्व टेस्टिंग तक

डॉ. अतुल कक्कड़ के अनुसार Sarcopenia का डायग्नोसिस करना बहुत मुश्किल नहीं है। सबसे पहले डॉक्टर मरीज को वॉक करवाते हैं या कुर्सी से उठवाते हैं। इन सिंपल टेस्ट्स से ही काफी कुछ पता चल जाता है।

लैब में भी इसकी जांच हो सकती है। होल बॉडी DEXA स्कैन एक अहम टेस्ट है जिसमें बोन और मसल दोनों की कंपोजिशन पता चल जाती है। इससे यह साफ हो जाता है कि मसल लॉस हो रहा है या नहीं। इसके अलावा हॉस्पिटल में मसल और नर्व की प्रॉपर टेस्टिंग भी की जाती है जिससे Sarcopenia की गंभीरता का सही-सही अंदाजा लग जाता है।

Sarcopenia से बचाव: डॉक्टर की 5 सबसे जरूरी सलाह

डॉ. अतुल कक्कड़ ने Sarcopenia से बचने के लिए बहुत स्पष्ट और आसान सलाह दी है। उनके अनुसार अगर इन बातों का ध्यान रखा जाए तो बुढ़ापे में मांसपेशियों को कमजोर होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है।

पहला: रेगुलर एक्सरसाइज करें। यह सबसे जरूरी है। शरीर को सक्रिय रखना Sarcopenia से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है।

दूसरा: मसल टोनिंग और मसल स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज करें। डॉक्टर ने स्पष्ट किया कि ये दोनों अलग-अलग एक्सरसाइज होती हैं। स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज और कोर एक्सरसाइज से मसल गेन होता है।

तीसरा: प्रोटीन का इंटेक प्रॉपर रखें। साथ ही कैल्शियम, विटामिन डी और मैग्नीशियम जैसे जरूरी न्यूट्रिएंट्स भी डाइट में पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए। ये छोटी-छोटी चीजें हैं, लेकिन अगर डाइट में ये प्रॉपर हों तो मसल वीकनेस से बचा जा सकता है।

चौथा: अल्कोहल बेयर मिनिमम या बिल्कुल नहीं होना चाहिए। अल्कोहल से भी Sarcopenia की समस्या बढ़ सकती है।

पांचवां: समय पर जांच करवाएं। 30 की उम्र पार करने के बाद नियमित रूप से अपनी मसल और बोन हेल्थ की जांच करवाना बुद्धिमानी है।

हेयर ऑयल vs हेयर सीरम: कौन ज्यादा फायदेमंद?

Sarcopenia के बाद अब बात करते हैं एक और बड़े सवाल की जो लाखों लोगों के मन में रहता है: बालों के लिए तेल ज्यादा फायदेमंद है या सीरम? तमीरा लाइफ में कंसल्टेंट प्लास्टिक सर्जन डॉ. स्मृति नाथानी ने इस सवाल का बहुत साफ जवाब दिया है।

डॉ. स्मृति कहती हैं कि हेयर ऑयल और हेयर सीरम दोनों अलग-अलग काम करते हैं। इन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। यह बात समझना बहुत जरूरी है क्योंकि ज्यादातर लोग दोनों को एक ही समझ बैठते हैं।

कब लगाएं हेयर ऑयल: हेल्दी बालों के लिए हफ्ते में एक बार काफी

डॉ. स्मृति के अनुसार अगर आपके बाल हेल्दी हैं, कम टूटते हैं, उनकी जड़ें मजबूत हैं और बालों या स्कैल्प से जुड़ी कोई दिक्कत नहीं है, तो आपको हफ्ते में एक बार हेयर ऑयल लगाना चाहिए। इससे बालों और स्कैल्प को पोषण मिलता है।

सबसे अच्छे तेल हैं: नारियल का तेल, ऑलिव ऑयल और आलमंड ऑयल। इनमें फैटी एसिड, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो स्कैल्प और बालों के लिए बहुत फायदेमंद हैं। तेल लगाते वक्त चंपी करना भी अच्छा रहता है क्योंकि इससे स्कैल्प में खून का बहाव सुधरता है।

लेकिन डॉक्टर ने दो बहुत जरूरी सावधानियां भी बताईं। पहली: हेयर ऑयल बाल धोने के सिर्फ दो घंटे पहले लगाएं। रात भर बालों में तेल लगाकर छोड़ना सही नहीं है। दूसरी: प्योर हेयर ऑयल इस्तेमाल करें, यानी ऐसा तेल जिसमें कोई केमिकल, कलर या खुशबू न डाली गई हो। एक्स्ट्रा वर्जन हेयर ऑयल सबसे अच्छा विकल्प है।

कब लगाएं हेयर सीरम: सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर, कॉस्मेटिक सीरम नहीं

डॉ. स्मृति के अनुसार अगर बालों की जड़ें कमजोर हैं, बाल बहुत ज्यादा टूट रहे हैं, डैंड्रफ है, ड्राई स्कैल्प है, कोई फंगल इंफेक्शन है, एलोपेशिया एरियाटा है (जिसमें सिर के बाल कुछ एरिया से झड़ जाते हैं) या स्कैल्प में लाल या सफेद रंग के पैचेस हैं, तब आपको सीरम लगाना चाहिए।

लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात है: कॉस्मेटिक सीरम नहीं, मेडिकेटेड सीरम लगाएं। यानी वो सीरम जो डॉक्टर लिखकर दें। ऐसे सीरम में एक्टिव इंग्रेडिएंट्स होते हैं जो सिर की उस खास समस्या को दूर करने में मदद करते हैं।

उदाहरण के लिए, अगर हेयर लॉस की दिक्कत है तो डॉक्टर 5% या 10% मिनोक्सिडिल वाला सीरम लगाने को कहते हैं। यह बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है, स्कैल्प में खून का बहाव सुधारता है और बालों की ग्रोथ फेज को लंबा करता है।

सीरम लगाते वक्त ध्यान रखें कि स्कैल्प सूखा और साफ हो। सीरम को उंगलियों या ड्रॉपर की मदद से लगाएं और हल्की चंपी करें ताकि सीरम बालों की जड़ों तक पहुंच जाए। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी हेयर सीरम न लगाएं।

बेंगलुरु की सब्जियों में मिला खतरनाक लेड: बैंगन में सेफ लिमिट से 20 गुना ज्यादा

अब बात करते हैं एक ऐसी खबर की जो हर किसी को चौंका देगी। आप जिन हरी सब्जियों को हेल्दी समझकर खरीदते हैं, वही सब्जियां आपके शरीर में खतरनाक हैवी मेटल लेड (सीसा) जमा कर रही हैं।

बेंगलुरु और उसके आसपास के बाजारों में एक इन्वेस्टिगेशन हुई। इसमें यहां बिकने वाली सब्जियों के 72 सैंपल्स लिए गए। इन सैंपल्स में 11 हैवी मेटल्स, 3 मिनरल्स और करीब 230 तरह के पेस्टिसाइड्स (कीटनाशकों) की जांच की गई।

नतीजे चौंकाने वाले थे। 72 में से 19 सैंपल ऐसे निकले जिनमें लेड पाया गया। सबसे ज्यादा लेड बैंगन में मिला, वो भी सेफ लिमिट से करीब 20 गुना ज्यादा। इसके अलावा लौकी, बींस, चुकंदर, पत्ता गोभी, शिमला मिर्च, मिर्च, खीरा, जूट के पत्ते, गांठ गोभी और कद्दू में भी लेड पाया गया।

इंडिया टुडे के मुताबिक सभी सैंपल्स की जांच FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) द्वारा मान्यता प्राप्त लैब में की गई थी। यह जांच रिपोर्ट 12 फरवरी 2026 को सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की एक कमेटी ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को सौंपी थी।

सब्जियों में लेड कैसे पहुंचता है: इंडस्ट्रियल एरिया की खेती सबसे खतरनाक

शारदा केयर हेल्थ सिटी में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी डिपार्टमेंट के सीनियर डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. विनीत कुमार गुप्ता बताते हैं कि सब्जियों में लेड पहुंचना पर्यावरण प्रदूषण से जुड़ा है।

जब ऐसे इलाकों में खेती की जाती है जहां की मिट्टी, पानी और हवा में हैवी मेटल्स मौजूद हैं, तब पौधे अपनी जड़ों के जरिए इन्हें सोख लेते हैं। अगर खेती इंडस्ट्रियल एरिया के आसपास की जा रही है तो खतरा और बढ़ जाता है। इंडस्ट्रीज से निकलने वाला धुआं और कचरा मिट्टी व पानी को प्रदूषित करता है।

इसके अलावा पुराने कीटनाशक छिड़कने, गंदे पानी से सिंचाई करने और सड़क किनारे उगाई गई सब्जियों में लेड की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

लेड का शरीर पर खतरनाक असर: किडनी, लिवर और दिमाग सब पर मार

डॉ. विनीत गुप्ता बताते हैं कि लेड एक हैवी मेटल है और शरीर को इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं होती। लेकिन खाने-पीने के जरिए यह शरीर में पहुंच सकता है। इसकी थोड़ी मात्रा भी बहुत नुकसानदेह है।

जब लेड शरीर में पहुंचता है तो यह धीरे-धीरे खून, हड्डियों और अंगों में जमा हो सकता है। प्रेग्नेंट महिलाओं और बच्चों पर इसका सबसे गंभीर असर होता है क्योंकि यह दिमाग और नर्वस सिस्टम पर सीधा हमला करता है।

लंबे समय तक लेड के संपर्क में रहने पर किडनी और लिवर से जुड़ी गंभीर दिक्कतें हो सकती हैं। एनीमिया हो सकता है। बच्चों के दिमागी विकास, याददाश्त और सीखने की क्षमता पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है।

अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक ऐसी सब्जियां खाता है जिनमें लेड की मात्रा बहुत ज्यादा है, तो धीरे-धीरे कुछ लक्षण दिखाई देते हैं: थकान, सिरदर्द, पेट दर्द और भूख कम लगना।

सब्जियों से लेड का खतरा कम करने का तरीका: नमक या सिरके वाले पानी में भिगोएं

डॉ. विनीत गुप्ता ने सब्जियों से लेड के एक्सपोजर को कम करने के लिए कुछ आसान लेकिन बेहद जरूरी तरीके बताए हैं।

पहला: सब्जियों को बहते पानी में अच्छी तरह धोएं। सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि दो-तीन बार धोएं।

दूसरा: कोशिश करें कि सब्जियों को 10 से 15 मिनट तक नमक या सिरके वाले पानी में भिगोएं। इससे सब्जियों की सतह पर मौजूद पेस्टिसाइड्स और हैवी मेटल्स काफी हद तक साफ हो सकते हैं।

तीसरा: सब्जियों को ठीक से पकाएं। कच्ची या अधपकी सब्जियां खाने से बचें। ठीक से पकाने से सब्जियों पर मौजूद पेस्टिसाइड्स और धूल को काफी हद तक साफ किया जा सकता है।

यह जानकारी हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है जो बाजार से सब्जियां खरीदकर खाता है। खासकर बड़े शहरों में जहां इंडस्ट्रियल एरिया के पास खेती होती है, वहां सब्जियों को अच्छी तरह धोना और पकाना बेहद जरूरी है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • Sarcopenia 30 की उम्र के बाद शुरू होता है, इसमें मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं; डायबिटीज, कुपोषण और एक्सरसाइज न करना इसके प्रमुख कारण हैं। बचाव के लिए रेगुलर एक्सरसाइज, प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन डी और मैग्नीशियम जरूरी है।
  • हेयर ऑयल हेल्दी बालों के लिए हफ्ते में एक बार काफी है (नारियल/ऑलिव/आलमंड ऑयल), जबकि मेडिकेटेड हेयर सीरम सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर लगाएं; कॉस्मेटिक सीरम से बचें।
  • बेंगलुरु के बाजारों में 72 सब्जी सैंपल्स की जांच में 19 में लेड मिला; बैंगन में सेफ लिमिट से 20 गुना ज्यादा लेड पाया गया।
  • सब्जियों से लेड के खतरे को कम करने के लिए उन्हें बहते पानी में धोएं, 10-15 मिनट नमक या सिरके वाले पानी में भिगोएं और ठीक से पकाकर खाएं।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. Sarcopenia क्या है और यह किस उम्र में शुरू होता है?

Sarcopenia एक ऐसी बीमारी है जिसमें उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां कमजोर और कम होने लगती हैं। यह 30 से 35 साल की उम्र के बाद शुरू हो सकता है। डायबिटीज, कुपोषण, एक्सरसाइज न करना और अल्कोहल इसके प्रमुख कारण हैं। रेगुलर एक्सरसाइज, प्रोटीन इंटेक और विटामिन डी-कैल्शियम से इससे बचा जा सकता है।

2. हेयर ऑयल और हेयर सीरम में क्या फर्क है?

हेयर ऑयल और हेयर सीरम दोनों अलग-अलग काम करते हैं। हेल्दी बालों के लिए हफ्ते में एक बार प्योर हेयर ऑयल (नारियल/ऑलिव/आलमंड) काफी है, जो बाल धोने से 2 घंटे पहले लगाएं। मेडिकेटेड सीरम सिर्फ तब लगाएं जब बाल ज्यादा झड़ रहे हों, डैंड्रफ हो या कोई स्कैल्प समस्या हो, और वो भी डॉक्टर की सलाह पर।

3. सब्जियों में लेड कैसे पहुंचता है और इससे कैसे बचें?

इंडस्ट्रियल एरिया के पास खेती, प्रदूषित पानी से सिंचाई, पुराने कीटनाशक और सड़क किनारे उगाई गई सब्जियों में लेड ज्यादा हो सकता है। बचाव के लिए सब्जियों को बहते पानी में अच्छी तरह धोएं, 10-15 मिनट नमक या सिरके वाले पानी में भिगोएं और ठीक से पकाकर खाएं।

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