Pitru Paksha 2026 का सबसे अहम दिन सर्वपितृ अमावस्या कब है? यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में है जो अपने पूर्वजों को भावुक और आदरपूर्ण मन से विदा करना चाहता है। अगर किसी वजह से आप साल भर अपने पितरों की तिथि पर श्राद्ध करना भूल गए हैं, तो यह अमावस्या का दिन आपके लिए सब कुछ ठीक करने का एक बड़ा अवसर है।
पांचांग के अनुसार, इस बार सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर यानी शनिवार के दिन मनाई जाएगी और इसी के साथ पितृ पक्ष का समापन भी हो जाएगा। अमावस्या तिथि की शुरुआत 9 अक्टूबर की रात 9:35 से होगी और यह 10 अक्टूबर की रात 9:19 में समाप्त होगी।
🔍 यह भी पढ़ें- अक्टूबर 2026 में आएंगे देश के सबसे बड़े त्योहार! पितृ पक्ष से Navratri तक पूरी लिस्ट
‘उदया तिथि के नियम और तर्पण के शुभ मुहूर्त’
अगर गौर करें तो, उदया तिथि के नियमों के अनुसार 10 अक्टूबर को ही सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाएगा। इसी दिन हमारे पूर्वज वापस अपने लोक के लिए प्रस्थान करेंगे।
दिलचस्प बास यह है कि इस दिन तर्पण के लिए तीन समय सबसे उत्तम माने गए हैं:
| मुहूर्त का नाम | समय |
|---|---|
| कुतुब मुहूर्त | सुबह 11:34 से दोपहर 12:21 तक |
| रोहिण मुहूर्त | दोपहर 12:21 से 1:07 तक |
| अपराह काल | दोपहर 1:07 से शाम 3:28 तक |
इन तीनों ही मुहूर्तों को श्राद्ध और तर्पण कर्म के लिए सबसे अधिक फलदाई माना गया है।
‘स्नान, संकल्प और तर्पण की विधि’
समझने वाली बास यह है कि इस पावन दिन की शुरुआत आपको सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निर्वत होकर करनी चाहिए। साफ और स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूरी श्रद्धा के साथ अपने पितरों का स्मरण करें।
किसी पवित्र स्थान या नदी के तट पर स्नान करें या घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। इसके बाद नदी के किनारे या घर के आंगन में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं और संकल्प लें। तर्पण के लिए स्वच्छ जल में थोड़े से काले तिल मिला लें और पितरों के नाम से जल अर्पित करें।
‘पिंड दान और पंचबली भोजन’
और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। जौ, चावल, काले तिल और दूध को मिलाकर पिंड तैयार करें और अपने पूर्वजों का नाम लेते हुए उन्हें अर्पित करें।
यहां ध्यान देने वाली बास यह है कि इस विधि के बाद पंचबली भोजन निकालना बेहद जरूरी है। पंचबली का मतलब है कि सबसे पहला भोजन गाय के लिए, दूसरा कौवे के लिए, तीसरा कुत्ते के लिए, चौथा चीटियों के लिए और पांचवा देवताओं के लिए। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
‘परंपरा का महत्व: संस्कारों को जीवित रखना’
सवाल उठता है कि आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में इस परंपरा का क्या महत्व है?
देखा जाए तो, जब हम अपने बुजुर्गों और पूर्वजों को याद करते हैं, तो यह हमारी संस्कृति और कृतज्ञता की भावना को जीवित रखता है। यह दिन सिर्फ पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि अपने परिवार की जड़ों से जुड़ने का एक सुंदर अवसर है। इससे मानसिक सुकून और पारिवारिक एकता मजबूत होती है।
अंत में अपने पूर्वजों से किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें और उन्हें विदा करते हुए परिवार में सुख और शांति की कामना करें।
मुख्य बातें (Key Points)
- सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर (शनिवार) को मनाई जाएगी, तिथि 9 अक्टूबर रात 9:35 से शुरू होगी।
- तर्पण के सबसे शुभ मुहूर्त: कुतुब (11:34-12:21), रोहिण (12:21-1:07), अपराह (1:07-3:28)।
- विधि: स्नान, दक्षिण दिशा मुख बैठकर संकल्प, काले तिल मिले जल से तर्पण।
- पिंड दान के बाद पंचबली भोजन (गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी, देवता) निकालना जरूरी।










