8th Pay Commission Latest News की चर्चा चल रही है, लेकिन रेलवे कर्मचारियों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बता रही है। हाल ही में रेलवे बोर्ड और कर्मचारी संगठनों के बीच एक बेहद अहम बैठक हुई। इस बैठक के अंदर जो कुछ हुआ, उसने रेलवे प्रशासन के दावों की पोल खोल कर रख दी।
क्या भारतीय रेलवे में ड्राइवर्स से नियमों को ताक पर रखकर 14 से 17 घंटे तक लगातार काम कराया जा रहा है? जब रेलवे के नियमों में साफ लिखा है कि ड्यूटी 9 घंटे से ज्यादा नहीं होगी, तो फिर कर्मचारियों पर इतनी लंबी शिफ्ट का दबाव क्यों? और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी।
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’17 घंटे की ड्यूटी: सुरक्षा के साथ खिलवाड़’
AIRF के जनरल सेक्रेटरी शिव गोपाल मिश्रा ने इस बैठक में कर्मचारियों के काम के घंटों का मुद्दा बेहद कड़े तेवरों में उठाया। उन्होंने सीधी बात रखी कि इमरजेंसी के नाम पर लोको पायलट से 17 घंटे तक गाड़ी चलवाना किसी भी तरह से सही नहीं है।
दिलचस्प बास यह है कि मौजूदा नियमों के मुताबिक बेहद जरूरी हालात में भी ड्यूटी को 12 घंटे से ज्यादा नहीं खींचा जा सकता। लेकिन आज लोको पायलट्स से 17 घंटे तक ट्रेन चलवाई जा रही है। यह सिर्फ कर्मचारियों के अधिकारों का हनन नहीं है, बल्कि करोड़ों यात्रियों की जिंदगी के साथ सीधा खिलवाड़ है। जब इंसान शारीरिक रूप से टूट जाएगा, तो वह सिग्नल और रफ्तार पर ध्यान कैसे दे पाएगा?
‘95% बजट खत्म, फिर भी TA-OT के पैसे अटके’
बैठक में कर्मचारियों के ट्रैवलिंग अलाउंस (TA) और ओवरटाइम (OT) के रुके हुए पैसों पर भी जोरदार बहस छिड़ गई।
समझने वाली बास यह है कि रेलवे बोर्ड ने खुद बताया कि रेलवे को जो करीब 900 करोड़ रुपये का भारी बजट मिला था, उसका लगभग 95% हिस्सा खर्च किया जा चुका है। इसी आंकड़े को पकड़ते हुए कर्मचारी नेताओं ने तीखा सवाल दागा कि जब रेलवे अपना लगभग पूरा बजट खर्च कर चुका है और कर्मचारी दिनरा पटरी पर डटे हुए हैं, तो फिर उनके पसीने की कमाई का भुगतान महीनों से क्यों रोका गया है?
‘ट्रैकमैन की पैदल तकलीफ: 20 किमी से घटाकर 12 किमी की मांग’
यहां ध्यान देने वाली बास यह है कि ट्रैक मैनों की तकलीफ भी बैठक के केंद्र में रही। कड़कड़ाती धूप और हड़ कपाती ठंड में मीलों पैदल चलकर पटरियों की हिफाजत करना कोई आसान काम नहीं।
मौजूदा पीवी मैनुअल के हिसाब से ट्रैकमैन के लिए 20 कि.मी. तक की पेट्रोलिंग का प्रावधान है। कर्मचारी संगठन ने मांग रCखी है कि इस भारीभरकम दूरी को घटाकर तुरंत 12 कि.मी. तय किया जाए। 20 कि.मी. चलना और साथ में भारी औजार लेकर काम करना इंसानी शरीर की क्षमता से बाहर है।
‘8वें वेतन आयोग की सुगबुगाहट और जमीनी हकीकत’
यह खबर इस समय इसलिए भी इतनी अहम बन गई है क्योंकि एक तरफ सरकार 8वें वेतन आयोग की सुगबुगाहट के बीच कर्मचारियों की सैलरी में बड़े बदलावों की तैयारी कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि किसी भी रेलवे कर्मचारी की वास्तविक आमदनी सिर्फ बेसिक पे से तय नहीं होती।
उनके घर का बजट समय पर मिलने वाले भत्तों और ओवरटाइम के पैसों से चलता है। अगर महीनों तक उनकी मेहनत की कमाई ही अटक जाएगी, तो वेतन आयोग की सिफारिशों का जमीन पर क्या असर बचेगा?
बीते कुछ समय में कई रेल हादसे हुए हैं, जिनकी जांच में अक्सर मानवीय भूल या अत्यधिक थकान की बातें सामने आई हैं। रेलवे बोर्ड को यह समझना होगा कि जबरन ओवरस्ट्रेच ड्यूटी करवाकर न तो रेलवे सुरक्षित रह सकता है और न ही कर्मचारी महसूस कर सकते हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
- रेलवे बोर्ड बैठक में AIRF ने 14-17 घंटे की ड्यूटी का मुद्दा बेहद कड़े अंदाज में उठाया।
- रेलवे नियमों में 9 घंटे ड्यूटी का प्रावधान है, लेकिन लोको पायलट्स से 17 घंटे काम करवाया जा रहा है।
- 95% बजट खर्च होने के बाद भी TA और OT के भुगतान में महीनों से देरी हो रही है।
- ट्रैकमैन की पेट्रोलिंग लिमिट 20 किमी से घटाकर 12 किमी करने की मांग उठी।











