शांतिपूर्ण किसान आंदोलन पर लागू किया इंटरनेट शटडाउन का नियम

किसान आंदोलन और उसके समर्थकों पर इंटरनेट प्रतिबंध वास्तव में राजनीतिक रूप से प्रेरित : एसकेएम

चंडीगढ़, 15 जून (The News Air)

Samyukta Kisan Morcha: यह सूचित किया गया है कि ‘ओपन सोसाइटीज’ (‘G7 एण्ड गेस्ट कंट्रीज: 2021 ओपन सोसाइटीज स्टेटमेंट’) पर G7 देशों के बयान ने भारत सरकार के इस विचार को समाहित किया कि इंटरनेट की स्वतंत्रता राष्ट्रीय सुरक्षा / कानून और व्यवस्था के अधीन है। इसलिए, अंतिम वक्तव्य मे  ‘राजनीति से प्रेरित इंटरनेट शटडाउन’ का संदर्भ है, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किया है। भारत ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए जो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे उन मूल्यों को प्रोत्साहित करता है, जो लोकतंत्र की रक्षा करता है और लोगों को भय और उत्पीड़न से मुक्त रहने में सहायता करता है। भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए साइबरस्पेस के महत्व को एक अवसर के रूप में रेखांकित किया, न कि मूल्यों को नष्ट करने के लिए।

यह बड़ी विडंबना है कि भारत सरकार उन मुद्दों पर बयान दे रही है, जो व्यवहारिकता में पूरी तरह विफल है। जब से यह किसान आंदोलन शुरू हुआ है, सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ उनके समर्थकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है।

न केवल भारत के किसान संघों और उनके समर्थक समूहों ने अपने सोशल मीडिया स्पेस को बार-बार प्रतिबंधित पाया है, बल्कि दूसरी जगहों के उनके समर्थकों के साथ भी ऐसा हुआ है। शांतिपूर्ण किसान आंदोलन पर लागू किए गए इंटरनेट शटडाउन का कोई औचित्य नहीं था। एक बड़े किसान संघ का ट्विटर अकाउंट अभी तक निलंबित है। भारत सरकार जो कर रही है, वह असल में राजनीति से प्रेरित है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी नागरिकों का एक बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है, और सरकार अपनी राजनीतिक प्रेरणाओं के आधार पर इस पर अंकुश नहीं लगा सकती जैसा कि अभी हो रहा है। निश्चित रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपेक्षा अधिक अधिकार शामिल है ।असहमति का अधिकार और विरोध का अधिकार लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं।

मोदी सरकार ने इस मौजूदा आंदोलन को देशद्रोही, अलगाववादियों और आतंकवादियों में से एक के रूप में बदनाम करने की कोशिश की है। आज, एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि विरोध करने का अधिकार गैरकानूनी नहीं है और कई छात्र कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों से जुड़े मामले में यूएपीए के अर्थ के भीतर इसे ‘आतंकवादी अधिनियम’ नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ‘असहमति को दबाने की उसकी चिंता में, राज्य के दिमाग में, संवैधानिक रूप से सुनिश्चित विरोध के अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच की रेखा कुछ धुंधली होती जा रही है’। 300 दिनों से अधिक समय से जेल में बंद देवांगना कलिता, आसिफ इकबाल तन्हा और नताशा नरवाल को आज जमानत पर रिहा कर दिया गया है। लाइनों का यह धुंधलापन कुछ ऐसा है जिसे सरकार और सत्ताधारी दल ने जानबूझकर किसान आंदोलन के खिलाफ भी इस्तेमाल किया है।

ऐसी सूचना है कि कल झज्जर में भाजपा कार्यालय के लिए रखी गई आधारशिला को उखाड़ने के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई है, जिसमें हरियाणा के गृह मंत्री ने कड़ी कार्रवाई की धमकी दी हैएसकेएम इस कार्रवाई की निंदा करता है और एफआईआर को तुरंत वापस लेने की मांग करता है। हरियाणा में कुछ अन्य घटनाओं में, किसानों ने स्वयं एक नए भवन और पार्क का उद्घाटन किया (हिसार जिले के बरवाला में जहां विधायक जोगीराम सिहाग को एक कार्यक्रम मे जाना था तथा हांसी में जहाँ विधायक विनोद भयाना को एक पार्क का उद्घाटन करना था, किसानों के क्रोध के डर से कार्यक्रम में नहीं आए)। किसानों ने भाजपा और जजपा के निर्वाचित नेताओं के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा है।

बीकेयू डकौंडा से जुड़े किसानों के कुछ और दल आज सिंघू और टिकरी सीमा धरना स्थलों पर पहुंचे हैं| विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाली महिला किसानों की संख्या गौरतलब है। उन्होंने कृषि पर कॉरपोरेट-समर्थक कानूनों के प्रभावों को समझकर और पुरुषों के साथ समान स्तर पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होकर जारी संघर्ष को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है।

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