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The News Air - Breaking News - El Niño 2026 Alert: अलनीनो का खतरा मंडराया भारत पर, मानसून कमजोर रहने की आशंका

El Niño 2026 Alert: अलनीनो का खतरा मंडराया भारत पर, मानसून कमजोर रहने की आशंका

WMO की चेतावनी से बढ़ी चिंता – जून से अगस्त के बीच 80% संभावना, खेती-पानी पर पड़ेगा सीधा असर

Ajay Kumar by Ajay Kumar
बुधवार, 3 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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El Niño 2026 Alert
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El Niño 2026 Alert: क्या फिर से तप रही है दुनिया? इस साल की गर्मी ने तो सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, लेकिन असली मुसीबत अभी शुरू होने वाली है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने एक ऐसी चेतावनी जारी की है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी। प्रशांत महासागर में पानी उबल रहा है और इसका सीधा असर हमारे आपके घर तक पहुंचने वाला है।

जी हां, बात हो रही है अलनीनो (El Niño) की। डब्ल्यूएमओ के मुताबिक जून से अगस्त के बीच इसके आने की संभावना 80% है और नवंबर तक यह अपना विकराल रूप दिखा सकता है। देखा जाए तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं। हमारी खेती आज भी मानसून पर निर्भर है और अलनीनो का मतलब है – कमजोर मानसून, सूखा, और खाद्य सुरक्षा पर खतरा।

🔍 यह भी पढ़ें- Super El Niño 2026: भारत में आने वाली सदी की सबसे भयंकर गर्मी!

WMO की चेतावनी – प्रशांत महासागर में खतरनाक बदलाव

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थितियां तेजी से विकसित हो रही हैं। आने वाले महीनों में यह मौसमी बदलाव, वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न को पूरी तरह से बदलने के लिए तैयार है।

वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान मॉडल बताते हैं कि साल 2026 में आने वाला यह अलनीनो सामान्य नहीं होगा, बल्कि इसके मध्यम से बहुत मजबूत होने की पूरी संभावना है। अगर गौर करें तो जब भी मजबूत अलनीनो आता है, तो पूरी दुनिया के मौसम में अराजकता फैल जाती है।

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संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने तो यहां तक कह दिया कि यह “पहले से गर्म हो रही दुनिया की आग में घी डालने का काम करेगा।” उनकी चेतावनी साफ है – अलनीनो के प्रभाव बेहद गंभीर होंगे जो बहुत तेजी से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर वैश्विक अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था को तहस-नहस कर सकते हैं।

अलनीनो है क्या – समझें आसान भाषा में

आसान भाषा में समझें तो अलनीनो प्रशांत महासागर की एक प्राकृतिक घटना है। जब मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म हो जाता है, तो उसे अलनीनो कहते हैं।

यह चक्र दो से सात साल में एक बार आता है और इसका असर बड़ा खतरनाक होता है। समझने वाली बात यह है कि यह सिर्फ पानी गर्म नहीं करता, बल्कि पूरी दुनिया के वेदर पैटर्न को बदल देता है। कहीं भयानक सूखा पड़ता है तो कहीं इतनी बारिश कि शहर के शहर डूब जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस नाम के पीछे एक रोचक कहानी है। अलनीनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ होता है “छोटा बच्चा” या “लिटिल बॉय”। इसे यह नाम दक्षिण अमेरिका के मछुआरों ने दिया था क्योंकि यह घटना अक्सर क्रिसमस के आसपास शुरू होती थी, इसलिए उन्होंने इसे “क्राइस्ट चाइल्ड” या अलनीनो का नाम दे दिया।

लेकिन आज यह “छोटा बच्चा” पूरी दुनिया के मौसम को कंट्रोल करने वाला एक बड़ा विलेन बन गया है।

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भारत पर सबसे बड़ा खतरा – कमजोर मानसून

भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण एशिया के लिए यह रिपोर्ट किसी बड़े झटके से कम नहीं है। साउथ एशियन क्लाइमेट आउटलुक फोरम के पूर्वानुमानों का हवाला देते हुए WMO ने स्पष्ट कर दिया है कि अलनीनो के प्रभाव के कारण दक्षिण एशिया में इस साल मानसून की बारिश सामान्य से कम होने की आशंका है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मानसून लाइफलाइन की तरह है। अगर मानसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा असर निम्नलिखित पर पड़ेगा:

फसलों का उत्पादन: धान, मक्का, दालें जैसी खरीफ फसलें सीधे प्रभावित होंगी
पानी की उपलब्धता: तालाब, नदियां और भूजल स्तर गिरेगा
खाद्य सुरक्षा: अनाज की कमी और महंगाई बढ़ेगी
ग्रामीण अर्थव्यवस्था: किसानों की आय घटेगी, गरीबी बढ़ेगी

कम बारिश की वजह से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत की 60% से अधिक आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है।

सरकार ने कमर कसी – शिवराज सिंह चौहान की तैयारी

सरकार और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस स्थिति को देखते हुए पहले ही कमर कस ली है। मानसून सामान्य से कम रहने का अनुमान है, जिसका मतलब है धान, मक्का और दालों जैसी खरीफ फसलों पर दबाव बढ़ना।

लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। सतर्कता ही इसका समाधान है। सरकार अब निम्नलिखित कदम उठा रही है:

उपायविवरण
जिला स्तर पर इमरजेंसी प्लानहर जिले में सूखे से निपटने की तैयारी
कम पानी वाली फसलेंबाजरा जैसी फसलों पर जोर
जल संरक्षणतालाबों और जलाशयों के पानी को बचाने की रणनीति
बीज बैंकसूखा-प्रतिरोधी बीजों का भंडारण

राहत की बात बस यह है कि हमारे जलाशयों में पिछले साल के मुकाबले 27% पानी अभी भी ज्यादा है। यह एक सकारात्मक संकेत है जो आने वाली चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकता है।

अलनीनो बनाम क्लाइमेट चेंज – क्या अंतर है?

बहुत से लोग यहां कंफ्यूज हो जाते हैं। अलनीनो और क्लाइमेट चेंज एक ही चीज नहीं हैं। देखिए, अलनीनो एक प्राकृतिक साइकिल है जो सदियों से चल रही है। यह प्रकृति का अपना तरीका है।

लेकिन हम इंसानों ने जो प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग फैलाई है, उसने इस प्राकृतिक आपदा को और अधिक हिंसक बना दिया है। गर्म वातावरण में ऊर्जा सोखने की क्षमता ज्यादा होती है। इसलिए अब अलनीनो के दौरान आने वाली लू (हीट वेव) और बाढ़ पहले से कई गुना अधिक विनाशकारी हो गई है।

समझने वाली बात यह है:

  • अलनीनो = प्राकृतिक घटना (हजारों सालों से हो रही है)
  • क्लाइमेट चेंज = मानव निर्मित समस्या (पिछली सदी से तेज हुई)
  • दोनों का संयोजन = खतरनाक कॉम्बो (विनाशकारी प्रभाव)

वैज्ञानिकों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि इस बात का कोई सीधा सबूत नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अलनीनो आने की फ्रीक्वेंसी या इसकी ताकत बढ़ गई है। लेकिन जब यह प्राकृतिक अलनीनो इंसानी गतिविधियों से गर्म हुई धरती से टकराता है, तो इसका असर कई गुना बढ़ जाता है।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों पर अलग असर

अलनीनो का प्रभाव हर जगह एक जैसा नहीं होता। कहीं बहुत ज्यादा बारिश होती है तो कहीं भयानक सूखा पड़ता है। आइए देखें कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों पर क्या असर होने की आशंका है:

अधिक बारिश और बाढ़ की आशंका:

  • दक्षिणी अमेरिका (पेरू, इक्वाडोर)
  • अमेरिका के दक्षिणी हिस्से (टेक्सास, फ्लोरिडा)
  • हॉर्न ऑफ अफ्रीका (केन्या, सोमालिया)
  • मध्य एशिया के कुछ भाग

इन क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़, भूस्खलन और जान-माल का नुकसान हो सकता है।

सूखा और गर्मी की आशंका:

  • भारत और दक्षिण एशिया
  • ऑस्ट्रेलिया
  • इंडोनेशिया
  • मध्य अमेरिका
  • कैरीबियाई देश

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत दूसरी श्रेणी में आता है – यानी यहां सूखा और गर्मी का खतरा है।

कृषि मौसम विज्ञानी प्रवीण चौधरी की चेतावनी

कृषि मौसम विज्ञानी प्रवीण चौधरी ने इस स्थिति पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि वर्तमान में राजस्थान के जैसलमेर और आसपास के सभी जिलों में गर्मी लगभग 45 से 48 डिग्री तक पहुंच रही है।

उन्होंने “नौ तपा” का जिक्र किया – जो पुराने किसानों और ज्योतिषियों की परंपरागत मान्यता है। नौ तपा को अच्छा इसलिए माना जाता था कि इसमें अधिक गर्मी पड़ने से सभी रोग, मच्छर और कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

लेकिन प्रवीण चौधरी ने एक बड़ी बात कही – “सबसे बड़ा कारण समुद्र के अंदर जो वैक्यूम बन रहा है, जिसको अपन वैज्ञानिक भाषा में सुपर अलनीनो बोल रहे हैं। इसके कारण टेम्परेचर बहुत हाई है और हवा में नमी बिल्कुल नहीं है, शुष्क है।”

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने मौसम विभाग से फोन पर बात करके पुष्टि की कि इस बार “सुपर अलनीनो” की स्थिति बन रही है, इसलिए तापमान 48-50 डिग्री तक छू रहा है।

उनका अनुमान है कि यह नौ तपा या अलनीनो का इफेक्ट मई के अंत तक और जून के प्रथम सप्ताह में धीरे-धीरे कम होने की उम्मीद है। लेकिन अगर यह प्रभाव बना रहा, तो चीजों का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा।

आम लोगों पर क्या असर होगा?

अब सवाल यह है कि हम आम लोगों पर इसका क्या असर होगा? देखा जाए तो अलनीनो का प्रभाव सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता। यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को कई तरह से प्रभावित करता है:

खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी: फसल उत्पादन कम होने से सब्जी, अनाज, दालों के दाम बढ़ेंगे

बिजली की किल्लत: पानी की कमी से हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स प्रभावित होंगे

पानी का संकट: शहरों में भी पानी की किल्लत हो सकती है

स्वास्थ्य समस्याएं: गर्मी से लू (हीट स्ट्रोक), डिहाइड्रेशन और अन्य बीमारियां बढ़ेंगी

पशुधन पर असर: चारे और पानी की कमी से पशुपालन मुश्किल होगा

राहत की बात यह है कि अगर हम समय रहते तैयारी करें तो इन प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

क्या करें – व्यक्तिगत स्तर पर तैयारी

सरकार अपने स्तर पर तैयारी कर रही है, लेकिन हमें भी व्यक्तिगत स्तर पर सतर्क रहना होगा:

जल संरक्षण: पानी की हर बूंद बचाएं, बर्बादी न करें

वर्षा जल संचयन: अगर संभव हो तो रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाएं

खाद्य भंडारण: आवश्यक अनाज और दालों का थोड़ा स्टॉक रखें

लू से बचाव: दोपहर में बाहर निकलने से बचें, पानी पीते रहें

मौसम की जानकारी: नियमित रूप से मौसम विभाग के अपडेट देखें

ऊर्जा की बचत: बिजली की खपत कम करें

समझने वाली बात यह है कि छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़ा फर्क ला सकते हैं।

दुनिया को क्या करना चाहिए – संयुक्त राष्ट्र की सलाह

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इस संकट से निपटने का एकमात्र प्रभावी तरीका यही है कि दुनिया जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर अपनी निर्भरता को तुरंत खत्म कर दे।

रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ बढ़ें: सोलर, विंड, हाइड्रो पावर को बढ़ावा

अर्ली वार्निंग सिस्टम: दुनिया के हर नागरिक तक शीघ्र चेतावनी प्रणाली की पहुंच सुनिश्चित करें

जलवायु अनुकूलन: कृषि, जल प्रबंधन और स्वास्थ्य क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल रणनीतियां बनाएं

अंतरराष्ट्रीय सहयोग: देशों को मिलकर काम करना होगा

डब्ल्यूएमओ की ओर से जारी इन चेतावनियों का मुख्य उद्देश्य दुनियाभर की सरकारों और मानवीय सहायता एजेंसियों को समय रहते कदम उठाने का मौका देना है। अग्रिम मौसमी पूर्वानुमानों की मदद से कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक योजनाएं बनाई जा सकती हैं।

पिछले अलनीनो के उदाहरण – इतिहास से सबक

अलनीनो कोई नई घटना नहीं है। इतिहास में कई बार मजबूत अलनीनो आ चुके हैं और हर बार भारी तबाही हुई है:

1997-98 का सुपर अलनीनो: इसे अब तक के सबसे मजबूत अलनीनो में से एक माना जाता है। इंडोनेशिया में भयानक सूखा और जंगल की आग, पेरू में विनाशकारी बाढ़, पूर्वी अफ्रीका में भारी बारिश। इससे लगभग 23,000 लोगों की मौत हुई और $35-45 बिलियन का नुकसान हुआ।

2015-16 का अलनीनो: भारत में लगातार दो साल सूखे की स्थिति, फसल उत्पादन में भारी गिरावट, किसानों की आत्महत्याओं में वृद्धि।

1982-83 का अलनीनो: ऑस्ट्रेलिया में भयानक सूखा, दक्षिण अमेरिका में भारी बाढ़।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हर बार अलनीनो के बाद हम यही कहते हैं कि “अगली बार बेहतर तैयारी करेंगे,” लेकिन फिर वही गलतियां दोहराई जाती हैं। इस बार हमें वास्तव में सबक लेना होगा।

भारत सरकार की तैयारी – विभिन्न स्तरों पर

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर निम्नलिखित स्तरों पर तैयारी कर रही हैं:

राष्ट्रीय स्तर पर:

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सूखा प्रबंधन योजना सक्रिय की
  • कृषि मंत्रालय ने राज्यों को सूखा-प्रतिरोधी बीजों की आपूर्ति बढ़ाने के निर्देश दिए
  • जल संसाधन मंत्रालय ने जलाशयों के प्रबंधन पर फोकस किया

राज्य स्तर पर:

  • राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे सूखा-प्रवण राज्यों ने आपातकालीन योजनाएं बनाईं
  • जल टैंकरों की व्यवस्था
  • चारे के भंडार की तैयारी

जिला स्तर पर:

  • स्थानीय जल संचयन की योजनाएं
  • किसानों को वैकल्पिक फसलों के बारे में प्रशिक्षण
  • स्वास्थ्य विभाग को लू से निपटने की तैयारी
तकनीक की मदद – सैटेलाइट और AI का उपयोग

आधुनिक तकनीक अब अलनीनो के प्रभावों को कम करने में मदद कर रही है:

सैटेलाइट मॉनिटरिंग: ISRO और NASA की सैटेलाइट्स समुद्र के तापमान को रियल-टाइम में ट्रैक कर रही हैं

AI पूर्वानुमान: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल्स अधिक सटीक पूर्वानुमान दे रहे हैं

मोबाइल अलर्ट सिस्टम: किसानों को उनकी भाषा में मौसम की जानकारी SMS और ऐप के जरिए मिल रही है

ड्रोन तकनीक: फसलों की स्थिति की निगरानी के लिए

उम्मीद की किरण यह है कि तकनीक के सहारे हम पहले से बेहतर तैयारी कर सकते हैं और नुकसान को कम कर सकते हैं।

आगे के महीनों का पूर्वानुमान

मौसम विज्ञानियों के अनुसार आने वाले महीनों में यह पैटर्न देखने को मिल सकता है:

महीनाअलनीनो की स्थितिभारत पर असर
जून 2026विकसित हो रहा (80% संभावना)मानसून की शुरुआत में देरी या कमजोरी
जुलाई-अगस्तपूर्ण रूप से सक्रियअसमान बारिश, कुछ क्षेत्रों में सूखा
सितंबर-अक्टूबरमजबूत चरणखरीफ फसलों पर प्रभाव
नवंबर-दिसंबरचरम पर (संभावित)रबी की बुवाई प्रभावित

चिंता का विषय यह है कि यह पूरे कृषि सीजन को प्रभावित कर सकता है।

लंबी अवधि का समाधान – क्लाइमेट रेजिलिएंस

अलनीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं से निपटने के लिए हमें दीर्घकालिक समाधान चाहिए:

जलवायु-स्मार्ट कृषि: ऐसी फसलें और तकनीकें जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार दें

जल प्रबंधन: माइक्रो इरिगेशन, ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिस्टम

मिट्टी का स्वास्थ्य: ऑर्गेनिक फार्मिंग, मल्चिंग, कवर क्रॉप्स

वन संरक्षण: पेड़ लगाना और जंगलों को बचाना

शिक्षा और जागरूकता: किसानों और आम लोगों को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना

इससे साफ होता है कि यह सिर्फ एक मौसम की समस्या नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक चुनौती है जिसके लिए व्यापक बदलाव जरूरी हैं।


मुख्य बातें (Key Points)

• विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि जून-अगस्त 2026 के बीच अलनीनो आने की 80% संभावना है, जो मध्यम से बहुत मजबूत हो सकता है और नवंबर तक चरम पर पहुंच सकता है

• भारत और दक्षिण एशिया में इस साल मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका, जिससे धान, मक्का, दालों जैसी खरीफ फसलें प्रभावित होंगी और सूखे की स्थिति बन सकती है

• कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिला स्तर पर इमरजेंसी प्लान, कम पानी वाली फसलों (बाजरा) पर जोर और जल संरक्षण की रणनीति शुरू की; राहत की बात – जलाशयों में पिछले साल से 27% अधिक पानी

• अलनीनो एक प्राकृतिक घटना है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग ने इसे अधिक विनाशकारी बना दिया है; संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी कि यह “पहले से गर्म हो रही दुनिया की आग में घी” डालेगा


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: अलनीनो क्या है और यह भारत को कैसे प्रभावित करता है?

अलनीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है जिसमें समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को बदल देता है। भारत में अलनीनो का सीधा असर मानसून पर पड़ता है – बारिश सामान्य से कम होती है, जिससे सूखा, फसल उत्पादन में कमी और पानी की किल्लत हो सकती है।

प्रश्न 2: 2026 में अलनीनो कितना मजबूत होगा और कब आएगा?

WMO के अनुसार जून से अगस्त 2026 के बीच अलनीनो आने की 80% संभावना है। यह मध्यम से बहुत मजबूत हो सकता है और नवंबर तक अपने चरम पर पहुंच सकता है। कृषि मौसम विज्ञानियों ने इसे “सुपर अलनीनो” की संज्ञा दी है, जो विशेष रूप से चिंताजनक है।

प्रश्न 3: आम लोग अलनीनो के प्रभाव से कैसे बच सकते हैं?

व्यक्तिगत स्तर पर जल संरक्षण करें, पानी की बर्बादी से बचें, वर्षा जल संचयन करें यदि संभव हो। खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं इसलिए आवश्यक अनाज का थोड़ा स्टॉक रखें। गर्मी से बचने के लिए दोपहर में बाहर न निकलें, पानी पीते रहें। मौसम विभाग के अपडेट नियमित रूप से देखें और बिजली-पानी की बचत करें।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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