SIR Supreme Court: बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों की SIR (Summary Revision) कार्रवाई करने की शक्ति को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यह “निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों की संवैधानिक जरूरत को आगे बढ़ाती है।” देखा जाए तो यह फैसला चुनावी पारदर्शिता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुआई वाले बेंच ने स्पष्ट टिप्पणी की कि यह नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग ने SIR का उपयोग करके कानूनी शक्तियों से बाहर जाकर काम किया है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फैसला बिहार में की गई SIR कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आया है।
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अदालत का स्पष्ट रुख
बेंच ने अपने फैसले में कहा, “हम यह निष्कर्ष निकालने में असमर्थ हैं कि विवादित कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक सुविधा के लिए की गई है। इसके उलट, हम मानते हैं कि चुनावों की SIR निष्पक्ष और आजाद चुनावों की संवैधानिक जरूरत को आगे बढ़ाती है।”
यह टिप्पणी साफ करती है कि शीर्ष अदालत चुनाव आयोग के इस कदम को वैध और जरूरी मानती है। समझने वाली बात यह है कि SIR प्रक्रिया से फर्जी मतदाताओं को हटाया जा सकता है और मतदाता सूची को अधिक प्रामाणिक बनाया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क क्या था?
SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के पास संविधान की धारा 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और इसके तहत बने नियमों के अधीन व्यापक रूप से SIR करने की शक्तियां नहीं हैं।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों की यह संशोधन “NRC (National Register of Citizens) जैसी प्रक्रिया” थी जहां चुनाव संस्था नागरिकता की पुष्टि कर रही थी, जो कि केंद्र सरकार की शक्ति है, चुनाव आयोग की नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रक्रिया वास्तविक मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर सकती है।
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29 जनवरी को सुरक्षित हुआ था फैसला
29 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा दायर याचिका समेत अन्य याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बिहार में SIR कार्रवाई के पहले चरण के रूप में की गई थी।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम बहस शुरू की थी। उस समय अदालत ने टिप्पणी की थी कि मतदाता सूचियों में नाम शामिल करना या बाहर निकालना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
65 लाख लोगों के नाम हटाए गए थे
चुनाव प्राधिकरण ने 65 लाख लोगों के नाम जारी किए थे जिन्हें SIR कार्रवाई के हिस्से के रूप में प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटा दिया गया था। यह एक बड़ी संख्या थी जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी।
SIR नोटिफिकेशन के अनुसार, जो मतदाता 2002 या 2003 की सूचियों में मौजूद नहीं थे, उन्हें उस समय की सूचियों में मौजूद किसी व्यक्ति के साथ पारिवारिक संबंध दिखाने पड़े थे। अगर गौर करें तो यह एक सख्त शर्त थी।
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चुनाव आयोग का बचाव
SIR कार्रवाई का बचाव करते हुए, चुनाव आयोग ने कहा था कि आधार और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता के निर्णायक सबूत के रूप में नहीं माना जा सकता है। आयोग का तर्क था कि कई बार फर्जी आधार कार्ड या वोटर कार्ड बना लिए जाते हैं, इसलिए गहन जांच जरूरी है।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि उनका उद्देश्य किसी को वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को प्रामाणिक और साफ बनाना है।
फैसले का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
यह फैसला चुनावी सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साफ मतदाता सूची से फर्जी वोटिंग पर रोक लगेगी और चुनाव अधिक निष्पक्ष होंगे।
हालांकि, कुछ नागरिक समाज संगठनों ने चिंता व्यक्त की है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक मतदाता भी प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी वैध मतदाता को उसके अधिकार से वंचित न किया जाए।
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मुख्य बातें (Key Points)
• सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR शक्ति को पूरी तरह बरकरार रखा
• अदालत ने कहा यह निष्पक्ष चुनावों के लिए संवैधानिक जरूरत
• बिहार में 65 लाख नाम SIR प्रक्रिया में हटाए गए थे
• याचिकाकर्ताओं ने इसे NRC जैसी प्रक्रिया बताया था
• चुनाव आयोग के पास यह शक्ति संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में: SC













