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The News Air - Breaking News - 94,000 Government Schools Closed: क्या सरकारी शिक्षा वेंटिलेटर पर? UDISE+ रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा

94,000 Government Schools Closed: क्या सरकारी शिक्षा वेंटिलेटर पर? UDISE+ रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा

शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल गायब हो गए, हर दिन 25 स्कूल बंद हुए।

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
सोमवार, 13 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, स्पेशल स्टोरी
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94000 Schools Closed:
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Government Schools Crisis India: साथियों, अगर मैं आज आपसे एक बिल्कुल सीधा सवाल पूछूं कि पिछले 10 सालों में भारत में सबसे तेजी से क्या गायब हुआ है? आप में से बहुत सारे लोग कहेंगे सर, सरकारी नौकरियां नहीं हैं। बहुत सारे लोग कहेंगे सर, मेरी जेब में पैसा नहीं है। देखा जाए तो बहुत लोग ऐसा भी कहेंगे कि सर, सरकारी कंपनियां बेच दी गई हैं।

लेकिन साथियों, आज जो आंकड़ा मैं आपके सामने रख रहा हूं ना, उसे सुनकर आपके पैरों तले से जमीन खिसक जाएगी। शायद ही कोई सोच पाए, लेकिन पिछले एक दशक में भारत में सरकारी स्कूल गायब हो गए।

और यह मैं नहीं कह रहा हूं। समझने वाली बात है कि भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ यानी यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस की रिपोर्ट और नीति आयोग का डाटा चीख-चीख कर कह रहा है।

🔍 यह भी पढ़ें- Punjab Government Schools Enrollment: 9% की गिरावट से केंद्र चिंतित, 352 करोड़ Mid-Day Meal बजट मंजूर

94,000 स्कूल गायब

अब जरा इस आंकड़े को कॉपी में नोट कीजिएगा दोस्तों। पिछले 10 सालों में भारत के अंदर लगभग 94,000 सरकारी स्कूल गायब हो गए हैं, कम हो गए हैं। गणित लगाइए साथियों, इसका मतलब क्या हुआ? औसतन हर दिन करीब 25 सरकारी स्कूल नक्शे से ओझल हो गए हैं।

एक तरफ सरकारी स्कूल सिकुड़ रहे हैं, दूसरी तरफ आपके मोहल्ले, आपके कस्बे में प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गई है। दिलचस्प बात यह है कि तो आज की क्लास में हम किसी राजनीतिक नूरा-कुश्ती में नहीं पड़ेंगे।

आज हम डाटा के साथ समझने का प्रयास करेंगे कि क्या भारत में धीरे-धीरे सरकारी शिक्षा मॉडल को टाटा-बाय-बाय किया जा रहा है? यह जो स्कूलों का मर्जर यानी कि विलय हो रहा है, यह संसाधनों की बचत है या हमारी मजबूरी है या बच्चों के साथ छल है?

🔍 यह भी पढ़ें- Government Media Control: विज्ञापन के जरिए मीडिया पर सरकारी नियंत्रण की पूरी कहानी

स्कूल मर्जर पॉलिसी

जब सोशल मीडिया पर यह खबर तैरती है कि 94,000 स्कूल बंद हो गए, तो लोग सोचते हैं कि बुलडोजर चला होगा, अब इमारतें गिरा दी गई होंगी, रातोंरात ताला जड़ दिया गया होगा। नहीं साहब, कहानी इतनी सिंपल नहीं है। इसकी क्रोनोलॉजी को समझिए।

भारत की UDISE+ डाटा के अनुसार साल 2014-15 में देश में लगभग 11.7 लाख स्कूल थे जो कि वर्ष 2024-25 तक आते-आते 10.13 लाख स्कूल बचे। यानी कि 94,000 स्कूल गायब।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि अब यह समझिए कि सरकार इसके पीछे जो तर्क देती है ना, उस तर्क को प्रशासनिक भाषा में कहा जाता है स्कूल मर्जर पॉलिसी। इसको भी पहले समझ लेते हैं।

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सरकार का तर्क

जब सरकार कहती है – देखिए, सरकार के पक्ष को समझना बहुत जरूरी है। सरकार कहती है कि भाई, एक ही गांव में 1 किमी के दायरे में तीन छोटे-छोटे स्कूल चल रहे हैं। एक में 10 बच्चे हैं, दूसरे में आठ बच्चे हैं, तीसरे में 12 बच्चे हैं।

तीनों जगह अलग-अलग प्रिंसिपल साहब हैं, अलग-अलग खिचड़ी यानी मिड डे मील बट रही है, अलग-अलग बिल्डिंग मेंटेन हो रही है। तो क्यों ना इन तीनों को मिलाकर एक बड़ा शानदार सा अच्छा सा स्कूल बना दिया जाए, विद स्मार्ट क्लासेस।

अगर गौर करें तो सुनने में यह तर्क लाजवाब लगता है। कॉर्पोरेट की भाषा में इसको कहा जाता है ऑप्टिमाइजेशन ऑफ रिसोर्सेज यानी कि संसाधनों का सर्वोत्तम प्रयोग करना।

जमीनी हकीकत

क्योंकि भारत एक अलग देश है। यहां पर समझिए, यहां पर एक पेच फंसता है दोस्तों। हमारा भारत कोई अमेरिका या यूरोप नहीं है। दिल्ली, मुंबई या लखनऊ के किसी VIP इलाके में दो स्कूलों के बीच की दूरी 500 मीटर हो सकती है।

लेकिन हमारे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में या राजस्थान के मरुस्थल और उत्तराखंड के पहाड़ों में जाकर देखिए साहब। वहां पर दो गांवों और दो स्कूलों के बीच 5 से 7 किमी की दूरी आम बात है।

जब आप मुझे बताइए कि जो प्राथमिक कक्षा का छह साल का बच्चा पहले आधा किमी पैदल चलकर स्कूल पहुंच जाता था, मर्जर के बाद अगर उसे रोज 6 किमी दूर जाना पड़ेगा, पैदल वो भी गांव से, तो क्या गरीब परिवार का बच्चा जाएगा?

प्राइवेट स्कूलों का उदय

साथियों, बच्चे जा रहे हैं प्राइवेट स्कूल की शरण में। UDISE+ की रिपोर्ट गवाही दे रही है इसकी। इसी के साथ पिछले एक दशक में रिपोर्ट के अनुसार सरकारी स्कूल घटे हैं, वहीं प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.3 लाख हो गई है। यानी कि जितने स्कूल सरकारी कम हुए, उससे कहीं ज्यादा प्राइवेट स्कूल बढ़े।

साथियों, एक बात समझिएगा, जरा सोचिएगा। हमारे हिंदी बेल्ट में एक कहावत होती है – पेट काटकर बच्चों को पढ़ाना। आज एक आम मजदूर, एक छोटा किसान भी सरकारी स्कूल में मुफ्त वजीफे और मुफ्त मिड डे मील के चक्कर को छोड़कर अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा प्राइवेट स्कूल की फीस में झोंक रहा है।

भरोसे की लड़ाई

क्यों झोंक रहा है? क्योंकि लड़ाई सिर्फ बड़ी बिल्डिंग की नहीं है साथियों, लड़ाई भरोसे की भी है। अभिभावक को लगता है कि भले ही प्राइवेट स्कूल की मान्यता आधी-अधूरी कमरे में हो, लेकिन वहां मास्टर साहब रोज आएंगे, बच्चे दो अक्षर अंग्रेजी बोलना सीख जाएंगे और थोड़ा डिसिप्लिन भी सीख जाएंगे।

यानी कि भारत की शिक्षा अब केवल एक पब्लिक सर्विस नहीं रह गई। यह भारतीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा और सबसे महंगा निवेश बन चुकी है।

शिक्षकों की कमी

भारत के सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी त्रासदी क्या है? जो सरकारी स्कूल हैं, उनकी सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि वहां बच्चे नहीं जाना चाहते। त्रासदी यह है कि वहां पर पढ़ाने के लिए शिक्षक ही नहीं हैं।

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हमारे देश के नीति निर्माताओं का एक बड़ा ही अजीब रवैया है दोस्तों। वो कहते हैं स्कूलों में छात्र कम हैं इसलिए स्कूल बंद करो। अरे साहब, छात्र इसलिए कम हैं क्योंकि स्कूल में मास्टर ही नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि कई स्कूल तो ऐसे हैं जहां एक ही मास्टर ऑल इन वन है। वह गणित भी पढ़ा रहे हैं, विज्ञान भी पढ़ा रहे हैं, वो हाजिरी भी लगा रहे हैं, वो दोपहर में खिचड़ी का हिसाब भी कर रहे हैं। ऊपर से सरकारी जो फालतू के काम हैं – जनगणना के, इलेक्शन के – ये सारे काम, भूसा लाने तक के काम दिए गए टीचर्स को।

शिक्षक भर्ती का संकट

भर्तियां भी एक बड़ा मुद्दा है। भर्तियां ही नहीं होती हैं। भर्तियों की भर्तियां कितनी अटकी हुई हैं, उसको भी समझिएगा। एक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया हमारे देश में किसी तपस्या से कम नहीं है दोस्तों।

पहले राज्य सरकार सोकर उठती है, खाली पदों की गणना करना शुरू करती है। जब वो गणना कर लेती है, उसके बाद फाइल पहुंचती है वित्त विभाग (Finance Department) में बजट पास कराने के लिए। फिर फाइल वहां महीनों धूल फांकती है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि उसके बाद भर्ती बोर्ड विज्ञापन निकालता है, छात्र सालों-साल तैयारी करते हैं, फॉर्म भरते हैं, एग्जाम होता है, पता चलता है पेपर लीक हो गया। यह एक परंपरा जैसी बन गई है दोस्तों हमारे देश में।

डेमोग्राफिक डिजास्टर

आज हम डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी कि युवा आबादी की बात बहुत जोर-शोर से, शोर-शराबे के साथ करते हैं, ढोल-नगाड़ों के साथ करते हैं। हम कहते हैं कि हम दुनिया की सबसे युवा आबादी है।

लेकिन अगर युवा आबादी अशिक्षित हो, कुपोषित हो, शिक्षा के साथ बड़ी ना हुई हो, तो यह डेमोग्राफिक डिविडेंड डेमोग्राफिक डिजास्टर बन जाता है।

21वीं सदी का सबसे बड़ा रिसोर्स जो है ना दोस्तों, वह कच्चा तेल या सोना नहीं है। वह है ह्यूमन रिसोर्सेज यानी मानव पूंजी। मानव पूंजी फैक्ट्रियों में नहीं बनता है दोस्तों, यह बनता है स्कूल के क्लासरूम में।

समाधान के रास्ते

अगर भारत को विश्वगुरु बनना है तो चार काम करने पड़ेंगे:

पहला काम: टाइम बाउंड कैलेंडर होना चाहिए। UPSC की तरह शिक्षक भर्ती का भी एक फिक्स कैलेंडर होना चाहिए।

दूसरा: पारदर्शी और सुरक्षित परीक्षा करानी चाहिए। पेपर लीक के खिलाफ इतने सख्त कानून हों कि कोई हिम्मत ना कर सके।

तीसरा: ग्रामीण भत्ते अलग से दिए जाने चाहिए। जो टीचर दूरदराज के गांवों या आदिवासी इलाकों में पढ़ा रहे हैं, उन्हें विशेष इंसेंटिव, विशेष प्रमोशन और सुरक्षा भी दी जानी चाहिए।

चौथा: लर्निंग आउटकम पर फोकस करना पड़ेगा। दोस्तों, बच्चा सिर्फ मिड डे मील के लिए अगर स्कूल आ रहा है तो वो गलत है।


मुख्य बातें (Key Points)

  • पिछले 10 सालों में 94,000 सरकारी स्कूल गायब
  • हर दिन औसतन 25 स्कूल बंद हुए
  • प्राइवेट स्कूल 2.88 लाख से 3.3 लाख हुए
  • शिक्षक भर्ती में 2-5 साल लगते हैं
  • ग्रामीण इलाकों में 5-7 किमी दूरी की समस्या
  • UDISE+ और नीति आयोग का डाटा

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या सरकारी स्कूल वाकई बंद हो रहे हैं?

हां, UDISE+ डाटा के अनुसार 2014-15 में 11.7 लाख स्कूल थे जो 2024-25 में 10.13 लाख रह गए। यानी 94,000 स्कूल कम हुए, ज्यादातर स्कूल मर्जर पॉलिसी के तहत।

प्रश्न 2: स्कूल मर्जर से बच्चों को क्या नुकसान?

ग्रामीण इलाकों में स्कूल की दूरी 5-7 किमी तक बढ़ जाती है, जिससे ड्रॉपआउट रेट बढ़ता है और गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

प्रश्न 3: शिक्षकों की भर्ती में इतनी देरी क्यों?

भर्ती प्रक्रिया में 2-5 साल लगते हैं – बजट अप्रूवल, विज्ञापन, पेपर लीक, कोर्ट केस – ये सब मिलकर प्रक्रिया को लंबा खींचते हैं।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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