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The News Air - NEWS-TICKER - बाल गंगाधर तिलक के गणेश उत्सव से क्यों डरने लगे थे अंग्रेज… पढ़ें दिलचस्प किस्से

बाल गंगाधर तिलक के गणेश उत्सव से क्यों डरने लगे थे अंग्रेज… पढ़ें दिलचस्प किस्से

The News Air Team by The News Air Team
सोमवार, 15 अप्रैल 2024
in NEWS-TICKER, सियासत, स्पेशल स्टोरी
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बाल गंगाधर तिलक के गणेश उत्सव से क्यों डरने लगे थे अंग्रेज?
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नई दिल्ली, 15 अप्रैल (The News Air) अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए स्वाधीनता सेनानियों ने अपनी ओर से हरसंभव कोशिश की. इन्हीं सेनानियों में एक बड़ा नाम है बाल गंगाधर तिलक का, जिन्हें हम लोकमान्य तिलक के रूप में भी जानते हैं. लोकमान्य यानी सब जिन्हें मानते हों या जिसे लोक यानी आम जनता की मान्यता मिली हो. ऐसा हो भी क्यों नहीं, देश की आजादी की लड़ाई को आम जन से जोड़ने के लिए लोकमान्य तिलक काम ही ऐसे करते थे.

कभी उन्होंने गणपति महोत्सव की शुरुआत कर आम लोगों को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ा तो कभी शिवाजी उत्सव के जरिए जोड़ा. वह मुहर्रम के जुलूस में भी शामिल होते थे, जिससे लोगों को आजादी का महत्व समझा कर अंग्रेजों के खिलाफ खड़े कर सकें. साल 1895 में 15 अप्रैल को शुरू हुए शिवाजी उत्सव की वर्षगांठ पर आइए जान लेते हैं लोकमान्य तिलक से जुड़े किस्से.

रायगढ़ किले में की थी शिवाजी उत्सव की शुरुआत

बाल गंगाधर तिलक देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो कांग्रेस के सदस्य तो थे पर कई काम अपने मन से करते थे. इसमें उन्हें जनता का भरपूर समर्थन भी मिलता था. इसी तरह से एक शुरुआत थी शिवाजी उत्सव की. 15 अप्रैल 1895 को लोकमान्य तिलक ने रायगढ़ किले में शिवाजी उत्सव की शुरुआत की थी. रायगढ़ किले में ही कभी शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था और उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की थी. रायगढ़ की शिवाजी के समय में मराठा साम्राज्य की राजधानी था. ऐसे में महाराष्ट्र के लोगों का शिवाजी और रायगढ़ से अलग ही लगाव था और आज भी है.

शिवाजी के जरिए लोगों को किया एकजुट

भारतीय राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक लोकमान्य तिलक ने महसूस किया कि शिवाजी की विरासत को अगर उत्सव के रूप में मनाया जाए तो भारत के लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट करने में सफलता मिलेगी. वैसे भी लोकमान्य तिलक शिवाजी को साहस, नेतृत्व औऱ देशभक्ति की मिसाल के रूप में देखते थे और इन गुणों की अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई में बहुत जरूरत थी. इसके अलावा तिलक का मानना था कि शिवाजी के नाम पर उत्सव के जरिए भारत के लोगों में गर्व और एकता की भावना भरी जा सकती है, जो जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बंटे हुए थे. इसलिए उन्होंने शिवाजी उत्सव की शुरुआत कर इसका इस्तेमाल लोगों तक भारतीय राष्ट्रवाद का संदेश पहुंचाने और अंग्रेजों के खिलाफ उन्हें खड़ा करने के लिए किया.

देश की सीमा से निकलकर विदेश तक पहुंचा उत्सव

धीरे-धीरे शिवाजी उत्सव काफी प्रसिद्ध होता गया और एक सालाना आयोजन बन गया. देखते ही देखते यह पूरे महाराष्ट्र के साथ भारत के कई और हिस्सों में भी मनाया जाने लगा. एक वक्त ऐसा भी आया, जब यह उत्सव देश की सीमा तोड़कर विदेश तक पहुंच गया और साल 1905 तक यह उत्सव जापान में भी मनाया जाने लगा. इसके जरिए लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत होने लगी, जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ानी शुरू कर दी.

गणेश उत्सव से भरी देशभक्ति की भावना

शिवाजी उत्सव से पहले लोगों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत करने के लिए बाल गंगाधर तिलक गणेश उत्सव की शुरुआत कर चुके थे. हर साल गणेश चतुर्थी पर देश-दुनिया में मनाए जाने वाले गणेशोत्सव को घरों की दहलीज से निकालकर सार्वजनिक मंच पर स्थापित करने का श्रेय तिलक को ही जाता है. इस उत्सव की शुरुआत की भी रोचक कहानी है.

इस तरह से हुई थी गणेशोत्सव की शुरुआत

बताया जाता है कि साल 1892 में लोकमान्य तिलक बॉम्बे से पूना (अब पुणे) लौट रहे थे. ट्रेन में उनसे एक संन्यासी मिला. उसने तिलक से कहा कि हमारे राष्ट्र की रीढ़ धर्म है. इसके बाद तिलक के मन में कौंधने लगा कि लोगों की इस धर्मपरायणता का इस्तेमाल राष्ट्रभक्ति पैदा करने के लिए किया जा सकता है. तब महाराष्ट्र के घरों में गणेश चतुर्थी व्यक्तिगत रूप से धूमधाम से मनाई जाती थी.

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तिलक ने सोचा कि क्यों न जाति-पात में बंटे लोगों को एक करने के लिए गणपति का सहारा लिया जाए और उन्होंने 1893 में केशवजी नाइक चॉल सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की नींव रख दी. इस मंडल के जरिए पहली बार सार्वजनिक रूप से गजानन की बड़ी प्रतिमा स्थापित कर महोत्सव शुरू हुआ. महोत्सव के मंच पर तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते तो देशप्रेम के भाषण भी दिए जाते थे. धीरे-धीरे ख्याति बढ़ी तो झुंड के झुंड लोग गणेशोत्सव मैदान में पहुंचने लगे. अब अपनी बात पहुंचाने के लिए लोगों को इकट्ठा करने की दिक्कत दूर हो चुकी थी. हालत यह थी कि अंग्रेज इस तरह लोगों के एकजुट होने से डरने लगे थे.

महोत्सव के मंच पर पहुंचे थे नेताजी और नायडू

देखते ही देखते गणेशोत्सव महाराष्ट्र के कोने-कोने तक पहुंच गया और राज्य के लोगों में देशभक्ति की भावना का संचार होने लगा. वैसे तो तिलक चाहते थे कि गणेशोत्सव राष्ट्रीय उत्सव में बदले. लाला लाजपत राय और बिपिनचंद्र पाल जैसे गरम दल के नेता इसके लिए तैयार भी थे पर कांग्रेस के दूसरे नेता जैसे सुरेंद्रनाथ बनर्जी, दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू को इसका समर्थन नहीं मिला. फिर भी गणेश उत्सव लगातार बड़ा होता गया. विदेशों में भी इसे मनाया जाने लगा.

एक समय ऐसा आया, जब इस उत्सव के मंच से नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरोजिनी नायडू ने भी देशवासियों को संबोधित किया था. गणेशोत्सव की पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे ब्रिटिश प्रशासन डर गया था. रॉलेट कमेटी की रिपोर्ट में भी स्पष्ट रूप से इसका जिक्र किया गया है.

मुहर्रम के जुलूस को भी बनाया था जरिया

गणेश उत्सव से भी पहले लोकमान्य तिलक मुहर्रम के जुलूस के जरिए लोगों में देशभक्ति की भावना जागृत करते रहे थे. उस वक्त बॉम्बे प्रेसिडेंसी में मुहर्रम का जुलूस सबसे प्रसिद्ध था. जाति-धर्म से ऊपर उठकर सभी लोग इस जुलूस में शामिल होते थे. कई कुलीन परिवारों की हवेली में भी ताजिया रखा जाता था. यहां तक कि बाजीराव द्वितीय के बनवाए शुक्रवार वाड़ा में ताजिया रखा जाता था. इसलिए मुहर्रम के जुलूस में शामिल होकर तिलक लोगों को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए उत्साहित करते थे.

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