Vande Mataram Vs Tamil Anthem – यह सिर्फ गीतों के क्रम का विवाद नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीतिक पहचान की दिशा तय करने वाला टकराव है।
समय-समय पर आप देखते होंगे कि Tamil Nadu के अंदर जो क्षेत्रीयतावाद है, जो नेशनल वर्सेस रीजनलिज़्म का मुद्दा है, वो सामने आ जाता है। अभी हुआ क्या कि जो एक्टर Joseph Vijay हैं, उन्होंने मुख्यमंत्री के पद पर शपथ ली।
लेकिन शपथ समारोह के दौरान यहां पर जिस सीक्वेंस में सॉन्ग्स प्ले किए गए – चाहे वो नेशनल एंथम हो, जन गण मन हो या फिर जो तमिलनाडु का स्टेट सॉन्ग है – तो उसको लेकर काफी बड़ी बहस छिड़ गई है।
शपथ समारोह में क्या हुआ? गीतों का विवादित क्रम
आप देख सकते हो यहां पर – “Play Tamil song before Vande Mataram. Row over national song at TV chief Vijay’s swearing-in escalates.”
इसको थोड़ा सा हमें डिटेल में समझने की जरूरत है कि जो DMK पार्टी है, वह क्यों यहां पर नाखुश है? वो यहां पर क्यों एक्टर विजय को क्रिटिसाइज कर रही है?
क्या यहां पर जो सीक्वेंस में प्ले किया गया है सॉन्ग्स, क्या वो गलत है? यहां पर प्रोटोकॉल क्या कहता है? और एक्टर विजय ने ऐसा क्यों किया?
क्योंकि तमिलनाडु के अगर आप थोड़ा सा इतिहास में जाओगे, तो यह बहुत बड़ा मुद्दा है। यह इनफैक्ट आजादी से पहले से चलता आ रहा है और आजादी के बाद और ज्यादा आक्रामक हो गया था।
सबसे पहले वंदे मातरम, फिर जन गण मन, आखिर में तमिल थाई वाज़्थु
चलिए शुरुआत करते हैं। सबसे पहले देखते हैं कि सेरेमनी में हुआ क्या है। जैसा कि आप सब जानते हैं, यहां पर TVK के जो चीफ हैं एक्टर विजय। और देखिए, बहुत बड़ा बदलाव हुआ है।
क्योंकि इतने दशकों से अगर आप देखेंगे, या तो DMK पावर में होती थी या फिर AIADMK पावर में होती थी। खैर, जो भी है, यहां पर Chennai में शपथ ग्रहण समारोह हुआ।
और इस सेरेमनी के दौरान यहां पर जो सॉन्ग्स प्ले किए गए – जिस सीक्वेंस में, इसमें ध्यान दीजिएगा:
- सबसे पहले प्ले किया गया वंदे मातरम
- फिर उसके बाद इंडियन नेशनल एंथम जन गण मन
- और उसके बाद जो है तमिलनाडु का स्टेट सॉन्ग – तमिल थाई वाज़्थु
DMK और द्रविड़ समर्थक क्यों नाराज़ हुए?
यह यहां पर प्ले किया जाता है और इसके जस्ट बाद यहां पर आउटरेज ट्रिगर होता है। DMK के लीडर्स हों, द्रविड़ियन इंटेलेक्चुअल्स हों, तमिल कल्चरल एक्टिविस्ट्स हैं – वो यहां पर नाखुश थे।
क्यों? क्योंकि ट्रेडिशनली अगर आप देखेंगे – तमिलनाडु के जब भी तमिलनाडु गवर्नमेंट के जब भी कोई फंक्शन्स होते हैं, उसमें सबसे पहले तमिल थाई वाज़्थु यहां पर प्ले होता था।
लेकिन पहली बार शायद ऐसा देखने को मिल रहा है हाल के इतिहास में कि यहां पर पहले वंदे मातरम, फिर जन गण मन और उसके बाद तमिल थाई वाज़्थु।
मतलब द्रविड़ियन पॉलिटिक्स की अगर हम बात करें – मतलब तमिल आइडेंटिटी को नॉर्मली क्या है, नेशनल सिंबल से भी ऊपर रखा जाता है। तो यहां पर इसी की वजह से कुछ ही घंटे के अंदर जो पूरा मुद्दा है, वो एक्सप्लोड हो गया।
यह सिर्फ प्रोटोकॉल का मामला नहीं, बड़ा वैचारिक टकराव है
अच्छा, यहां पर एक चीज समझिएगा कि यह सिर्फ यहां पर प्रोटोकॉल या फिर सेरेमनी में क्या हुआ – यह सिर्फ उसकी बात नहीं है। मतलब it is not just about dispute over ceremonial protocol.
यह एक बड़ा क्लैश आपको देखने को मिलता है – इंडियन नेशनलिज़्म और तमिल रीजनल आइडेंटिटी के बीच में। और हो सकता है कि यहां से TVK और DMK के बीच में एक लॉन्ग स्ट्रगल की शुरुआत होने जा रही होगी।
तमिल थाई वाज़्थु: मदर तमिल का गौरवगान
खैर, यहां पर मैं समझाने की कोशिश करता हूं कि यह तमिल थाई वाज़्थु – इसका मतलब क्या है? बेसिकली इसमें जो मदर तमिल है, उनको इनवोक किया जाता है। यह स्टेट ऑफिशियल सॉन्ग है।
ऑफिशियल स्टेट सॉन्ग है तमिलनाडु का। और इसको लिखा गया था Manonmaniam Sundaranar के द्वारा। और यह जो सॉन्ग है, वो बेसिकली ग्लोरिफाई करता है – तमिल कल्चर को, तमिल लैंग्वेज को, तमिल सिविलाइजेशन को, तमिल हेरिटेज को और तमिल प्राइड को।
मतलब नॉर्मल जो सेरेमोनियल सॉन्ग है, उसके अलावा अगर आप देखेंगे – जो तमिल थाई वाज़्थु है, उसमें तमिलनाडु की जो पॉलिटिक्स है, उसमें डीप इमोशन्स आपको देखने को मिलेगा।
तमिल भाषा: सिर्फ संस्कृति नहीं, राजनीतिक मुद्दा
अच्छा, यहां पर तमिल लैंग्वेज – अगेन तमिलनाडु के अंदर अगर आप देखेंगे, लैंग्वेज का भी हमेशा से एक बड़ा मुद्दा आता है। तो इसको समझने के लिए – यह जो पूरा मुद्दा है उसको समझने के लिए – आपको थोड़ा सा पीछे जाना होगा।
मतलब ज्यादातर भारतीय राज्यों में अगर आप देखेंगे, तो लैंग्वेज एक कल्चरल की तरह देखा जाता है। लेकिन तमिलनाडु के अंदर क्या है कि लैंग्वेज एक पॉलिटिकल मुद्दा बन जाता है। सिविलाइजेशन इशू बन जाता है। एंटी-सेंट्रलाइजेशन को रिप्रेजेंट करता है।
तो जो तमिल नेशनलिज़्म है, यह बेसिकली इसलिए इमर्ज हुआ – बिकॉज़ तमिलों को विश्वास होता था कि जो नॉर्थ इंडियन हैं, वो पूरे देश के अंदर डोमिनेट करते हैं। पॉलिटिकल जो एलीट है, वो डोमिनेट किया जाता है नॉर्थ इंडिया के द्वारा।
हिंदी को कहीं न कहीं जानबूझकर इम्पोज़ किया जा रहा है। तमिल कल्चर खतरे में आ जाएगी। तो यह जो विचारधारा थी न, वो काफी तेजी से पनपती गई।
1965 का महत्वपूर्ण मोड़: हिंदी विरोधी आंदोलन
और यह अगर आप देखेंगे तो इसीलिए आप 1930 की बात करें, 1940 की बात करें – और 1965 में भी और ज्यादा आक्रामक हो गया था।
अच्छा, यहां पर इनफैक्ट मैं आपको 1965 का बताता हूं, क्योंकि एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। यूनियन गवर्नमेंट उस समय 1965 में प्लान कर रही थी कि हिंदी को एक प्राइमरी ऑफिशियल लैंग्वेज ऑफ इंडिया बनाया जाए।
तो तमिलनाडु में मैसिव प्रोटेस्ट होता है। जो स्टूडेंट्स हैं, यूथ्स हैं, द्रविड़ियन एक्टिविस्ट्स हैं – उनको डर यह था कि जो हिंदी स्पीकिंग नॉर्थ इंडियन्स हैं, वो गवर्नमेंट जॉब्स में डोमिनेट करेंगे।
तमिल आइडेंटिटी काफी कमजोर हो जाएगी। और जो भारत है, वो कल्चरली सेंट्रलाइज़्ड हो जाएगा। इसका काफी ज्यादा डर था।
द्रविड़ आंदोलन का उदय और DMK-AIADMK का वर्चस्व
1965 में जब यह हो रहा था, और इसी की वजह से काफी सारे प्रोटेस्ट होते हैं। कई-कई स्टूडेंट्स की यहां पर मृत्यु भी होती है। और इसी की वजह से परमानेंटली जो पूरी तमिल पॉलिटिक्स है, वो ट्रांसफॉर्म हो जाती है।
और यहीं पर आपको द्रविड़ आंदोलन का उदय देखने को मिलेगा। मतलब यह जो मूवमेंट स्टार्ट हुआ था, उसमें दो मेजर जो पार्टीज हैं, वो और ज्यादा उभरकर आती हैं।
DMK तो पहले से थी ही। उसके बाद AIADMK जो M.G. Ramachandran ने अपनी पार्टी बनाई थी। और उसके बाद Jayalalithaa – तो यह दो मेजर पार्टीज जो हैं, वो काफी ज्यादा डोमिनेट करने लगती हैं तमिलनाडु के अंदर।
और जो द्रविड़ आंदोलन है, वो बेसिकली तमिल आइडेंटिटी, सोशल जस्टिस, एंटी-कास्ट रिफॉर्म – इन सबको रिप्रेजेंट करता है। और 1967 के बाद से ही यहां पर यह जो पार्टीज हैं, वो पूरी तरह से डोमिनेट हो जाती हैं।
मतलब पिछले छह दशक में अगर हम बात करें – जो तमिल पॉलिटिकल सिंबल्स हैं, वो सेक्रेड हो जाते हैं। मतलब लोगों के इमोशनली बहुत ज्यादा अटैच हो जाते हैं।
वंदे मातरम: पेट्रियटिज़्म या नॉर्थ इंडियन नेशनलिज़्म?
जहां तक Vande Mataram का सवाल है दोस्तों – अभी देखा ही होगा आपने, पिछले साल इसको लेकर काफी चर्चा भी हुई थी, क्योंकि 150वीं वर्षगांठ जो एनिवर्सरी है, वो यहां पर मनाया जा रहा था सेंट्रल गवर्नमेंट के द्वारा।
Bankim Chandra Chattopadhyay ने इसको 1875 में यहां पर लिखा था। और यह बेसिकली ओरिजिनेट जो हुआ था न, वो एंटी-ब्रिटिश फ्रीडम मूवमेंट को लेकर हुआ था।
और कई इंडियन्स के लिए यह पेट्रियटिज़्म, एंटी-कॉलोनियल रेज़िस्टेंस, नेशनल यूनिटी – इन सबको रिप्रेजेंट करता है।
लेकिन तमिलनाडु में अगर हम बात करें – जो कुछ सेक्शन ऑफ द द्रविड़ियन पॉलिटिक्स हैं, वो वंदे मातरम को नॉर्थ इंडियन नेशनलिज़्म की तरह देखते हैं। हिंदू मेजॉरिटेरियनिज़्म की तरह देखते हैं। सेंट्रलाइज़्ड नेशनलिज़्म की तरह देखते हैं।
मतलब आप देखिए – रेस्ट ऑफ इंडिया की अगर हम बात करें, तो वंदे मातरम सिंपली एक पेट्रियोटिक है। लेकिन अगर हम तमिलनाडु की पॉलिटिकल हिस्ट्री में जाएं, तो यह इसमें एक एडिशनल आइडियोलॉजिकल लेयर दे देता है। जो तमिल के जो प्राइड हैं, वो यहां पर आपको देखने को मिलता है।
गीतों का क्रम क्यों मायने रखता है?
अच्छा, जो ऑर्डर है, वो इतना मैटर क्यों करता है? यह जो हम शपथ सेरेमनी की बात कर रहे हैं – यहां पर एक अलग-अलग ऑर्डर में यहां पर सॉन्ग्स को प्ले किया गया था।
अब पॉलिटिक्स के अंदर देखो, हर एक चीज मैटर करता है। जब हम पॉलिटिक्स की बात करते हैं, उसमें झंडा भी मैटर करेगा। जो सीटिंग अरेंजमेंट है – जो डिग्निटरीज़ आए हैं वहां पर, वो कहां पर बैठे हैं, कौन फ्रंट में बैठा है – तो वो भी काफी मैटर करता है।
लैंग्वेज मैटर करता है। सॉन्ग्स मैटर करते हैं। हर एक चीज मैटर करता है। तो यहां पर ऑब्वियस सी बात है – जो सेरेमोनियल सॉन्ग्स हैं, वो दिखाता है कि किसकी आइडेंटिटी पहले आती है।
तो इसी की वजह से जो DMK सपोर्टर्स हैं, उनका यह मानना था कि वंदे मातरम पहले हुआ, फिर नेशनल एंथम, फिर तमिल एंथम थर्ड। तो इसका मतलब यह हुआ कि आप इंडियन नेशनलिज़्म को ऊपर रख रहे हो। कॉन्स्टिट्यूशनल नेशनलिज़्म को दूसरे पर रख रहे हो। और तीसरे पर आप तमिल आइडेंटिटी को रख रहे हो।
और इसी की वजह से उनके द्वारा बैकलैश किया गया।
केंद्र सरकार का 2026 का नया नियम
वैसे मैं आपको एक चीज बता दूं – अभी 2026 के स्टार्टिंग में Home Ministry के द्वारा एक फ्रेश रूल्स स्टेट किया गया था। उसमें यह बताया गया था कि जब भी दोनों – मतलब नेशनल सॉन्ग और हमारा नेशनल एंथम जब एक साथ प्ले होंगे – तो पहले आपका वंदे मातरम प्ले होना चाहिए।
और जो छह स्टैंज़ाज़ हैं, पूरा वो आपका प्ले होना चाहिए। और उसके बाद नेशनल एंथम आना चाहिए। और मोदी जी की जो सरकार है, उन्होंने जैसा मैंने आपको बताया कि 150th एनिवर्सरी भी सेलिब्रेट किया था पिछले साल, उसमें भी काफी इशूज़ आ रहे थे।
तो बेसिकली जो विजय के सपोर्टर्स हैं, उनका यह मानना है कि एक्टर विजय यूनियन प्रोटोकॉल को बस फॉलो कर रहे थे। उनका कोई ऐसा इंटेंशन नहीं था।
विजय का यह एक्शन इतना सरप्राइजिंग क्यों था?
अच्छा, यहां पर एक और चीज समझने वाली बात है कि एक्टर विजय का यह जो एक्शन था, वो इतना सरप्राइज़िंग क्यों था? क्योंकि देखो, पॉलिटिक्स में एंटर करने से पहले अगर आप देखेंगे न – जो एक्टर विजय, इस तरह से देखा जाता था उनको कि वो तमिल कॉज़ के लिए काफी सिम्पैथेटिक हैं।
वो सेंट्रलाइज़ेशन के खिलाफ हैं। यूथ-ओरिएंटेड हैं। तो और इनफैक्ट उनकी फिल्मों में भी अगर आप देखेंगे, वो एंटी-एस्टैब्लिशमेंट मैसेजिंग देते थे। सोशल जस्टिस के थीम्स पर फिल्म बनाते थे।
तो कई लोगों का यह एक्सपेक्टेशन था कि जब वो पावर में आएंगे, CM बनेंगे, तो वो ट्रेडिशनल द्रविड़ियन सिंबॉलिज़्म को और ज्यादा आगे बढ़ाएंगे। इंस्टेड यहां पर जो सेरेमनी है, उसमें यह पता चलता है कि नहीं, यह तो कुछ उल्टा ही हो गया।
तो इसी की वजह से जो तमिल पॉलिटिकल सोसाइटी है, वो उसमें से कई लोग काफी शॉक में आ गए कि ऐसा कैसे हो गया?
क्या यह जानबूझकर किया गया? विजय का मिडिल ग्राउंड
और देखो, क्वेश्चन यह आता है कि क्या यह जानबूझकर किया गया? अब कई लोगों का मानना है – यस। क्योंकि देखो क्या है न कि तमिलनाडु की पॉलिटिक्स इतने दशकों से सिर्फ DMK स्टाइल द्रविड़ियनिज़्म की तरह चल रही थी और AIADMK के हिसाब से चल रही थी।
लेकिन एक्टर विजय कुछ नया अटेम्प्ट करना चाहते हैं, ऐसा लगता है। मतलब जो तमिल आइडेंटिटी है, उसको इंडियन नेशनलिज़्म के साथ मिलाकर चलना चाहते हैं।
और यह स्ट्रेटेजिकली इंपॉर्टेंट हो जाता है, क्योंकि DMK ऑलरेडी यहां पर डोमिनेट करती है द्रविड़ियन आइडेंटिटी पॉलिटिक्स को। BJP स्ट्रॉन्ग नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स को डोमिनेट करती है।
तो मे बी शायद हो सकता है कि जो एक्टर विजय हैं, वो मिडिल ग्राउंड लेकर जा रहे हों। मतलब वो प्राउड तमिल भी हैं, लेकिन वो एंटी-नेशनलिस्ट का ऐसा कोई भी काम नहीं करते। कोई मॉडर्न भी हैं, रिफॉर्मिस्ट भी हैं।
मतलब एक मिडिल ग्राउंड जो होता है न – और यू नेवर नो, मतलब क्या मंशा होती है आगे चलकर? हो सकता है कि एक इंटेंशन है। हो सकता है आगे चलकर तमिलनाडु के – अब यह तो CM बने हैं, काम करेंगे। हो सकता है अगर इस तरह से चीजों को आगे बढ़ाएंगे, नेशनल आइडेंटिटी को आगे ले जाएंगे।
यू नेवर नो – कोई तमिलनाडु से आगे चलकर प्राइम मिनिस्टर बन जाए। तो इस तरह की भी चीजें होती हैं।
DMK इतना आक्रामक क्यों हो रहा था?
अच्छा, DMK इतना आक्रामक क्यों हो रहा था? DMK बेसिकली – उनके लिए तो एक अपॉर्चुनिटी की तरह है कि देखो, यहां पर जो तमिल आइडेंटिटी है, उसको इनवोक करने लग गए वो लोग कि देखो, एक्टर विजय ने हमारे सिंबॉलिज़्म को कमजोर किया है।
वो सेंट्रल नेशनलिज़्म की तरफ सॉफ्ट होते जा रहे हैं। वो इस तरह से चीजों को यहां पर दिखा रहे थे। और इसीलिए आप देखेंगे, जो TVK है जो पार्टी है, उन्होंने तुरंत बैक-ट्रैक भी कर लिया।
उन्होंने कहा कि नहीं, ऐसा कोई बात नहीं था। यह बस पहली बार हुआ है। और आगे चलकर यहां पर जो तमिल आइडेंटिटी वोटर्स हैं, उनको हम एलिनेट नहीं करेंगे।
TVK का बैक-ट्रैक: अब पहले तमिल गीत बजेगा
और इसीलिए उन्होंने यहां पर यह कह दिया कि आगे चलकर जब भी गवर्नमेंट फंक्शन होगा, उसमें पहले तमिलनाडु का जो स्टेट सॉन्ग है, वो पहले प्ले किया जाएगा।
तो कहीं न कहीं यह दिखाता है कि जो एक्टर विजय हैं, वो तमिल आइडेंटिटी के वोटर्स को एलिनेट नहीं करना चाहते। और वो भी स्टार्टिंग में। क्योंकि स्टार्टिंग में अगर आप इसी इन्हीं तरह के कंट्रोवर्सीज़ में घिर जाओगे, तो फिर काम के लिए समय कहां बचेगा? आप काम कैसे कर पाओगे?
असली सवाल: तमिलनाडु की राजनीतिक पहचान किस दिशा में?
काफी कुछ है यहां पर। देखो, रियल मीनिंग यहां पर यह निकलता है कंट्रोवर्सी का। It is not about song कि कौन सा सॉन्ग बेटर है, खराब? ऐसा नहीं है।
बेसिकली यह डिसाइड करेगा आगे चलकर कि तमिलनाडु की जो पॉलिटिकल आइडेंटिटी है, वो किस दिशा में जाएगी? वो TVK के विचारधारा पर जाएगी या फिर जो द्रविड़ियन आइडियोलॉजी है जो चलते आ रही है लंबे समय से, उस विचारधारा पर जाएगी।
समझने वाली बात यह है कि तमिलनाडु में राजनीति केवल नीतियों और विकास के मुद्दों पर नहीं, बल्कि पहचान और प्रतीकों पर भी लड़ी जाती है। और विजय ने अनजाने में या जानबूझकर एक ऐसी बहस छेड़ दी है जो आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।
मुख्य बातें (Key Points)
• एक्टर विजय की शपथ समारोह में पहले वंदे मातरम, फिर जन गण मन और आखिर में तमिल थाई वाज़्थु बजाया गया, जो परंपरा के विपरीत था
• परंपरागत रूप से तमिलनाडु में सरकारी समारोहों में तमिल थाई वाज़्थु पहले बजाया जाता था, जो तमिल पहचान को सर्वोपरि मानता है
• 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया और द्रविड़ आंदोलन को मजबूत किया
• DMK और AIADMK ने पिछले छह दशकों से तमिलनाडु की राजनीति पर एकाधिकार बनाए रखा है
• विजय का यह कदम इंडियन नेशनलिज़्म और तमिल आइडेंटिटी के बीच मध्यम मार्ग खोजने का प्रयास हो सकता है
• TVK ने DMK के दबाव में आकर घोषणा की कि आगे से पहले तमिल गीत बजाया जाएगा













