Transgender Law: बुधवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सरकार ने मांग की है कि ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के खिलाफ देशभर की विभिन्न हाई कोर्ट्स में चल रही सभी चुनौतियों को एकत्र करके सर्वोच्च अदालत में स्थानांतरित किया जाए। देखा जाए तो यह कदम कानूनी अनिश्चितता और परस्पर विरोधी फैसलों से बचने के लिए उठाया गया है।
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस ज्योमालिया बागची की बेंच के समक्ष इस मामले का जिक्र किया। उन्होंने शुक्रवार को इन ट्रांसफर पेटिशन्स पर जल्द सुनवाई करने की गुहार लगाई। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार चाहती है कि सभी हाई कोर्ट्स अपनी कार्रवाई रोक दें और एक ही मंच पर यह मामला सुना जाए।
सरकार की दलील: विरोधाभासी फैसलों का खतरा
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया, “हमने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम के खिलाफ मिली चुनौतियों को इस अदालत में लाने के लिए ट्रांसफर पेटिशन दायर की हैं। अगर ये पेटिशन शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होती हैं और नोटिस जारी किया जाता है, तो हम हाई कोर्ट्स को अपनी कार्रवाई आगे बढ़ाने से रोकने की बेनती कर सकते हैं।”
दिलचस्प बात यह है कि सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि चूंकि इस वक्त कई हाई कोर्ट्स इस मामले की सुनवाई कर रही हैं, इसलिए केंद्रीय कानून की वैधता पर अलग-अलग विचार और आपस में विरोधी न्यायिक फैसले आने का बड़ा खतरा है। यह स्थिति कानूनी अराजकता पैदा कर सकती है।
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CJI की टिप्पणी और असहमति
समझने वाली बात यह है कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) इस मांग पर पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत को अक्सर प्रांतीय अदालतों (हाई कोर्ट्स) द्वारा दिए गए कानूनी तर्कों और विश्लेषण का फायदा मिलता है।
CJI ने टिप्पणी की, “कई बार हमें हाई कोर्ट के विचारों का फायदा भी मिल सकता है।” जब कानून अधिकारी ने अपनी बातों को दोहराया, तो CJI ने संक्षेप में कहा कि वह “देखेंगे।” यह संकेत देता है कि सुप्रीम कोर्ट जल्दबाजी में सभी मामलों को अपने पास लेने को तैयार नहीं है।
विवाद का मूल कारण: सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन हटाना
‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) (संशोधन) अधिनियम, 2026’ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और LGBTQ+ समुदाय के सदस्यों द्वारा सख्त कानूनी जांच के घेरे में है। अगर गौर करें तो विवाद की मुख्य वजह लिंग (Gender) की “स्व-पहचान” (self-identification) की अवधारणा को हटाना है।
यह वही अधिकार है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पहले अपने ऐतिहासिक ‘नालसा’ (NALSA) फैसले में बहाल रखा था। उस फैसले में अदालत ने माना था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने का मौलिक अधिकार है।
क्या है याचिकाकर्ताओं का तर्क?
2026 के इस संशोधन में लिंग की पहचान के लिए चिकित्सीय या प्रशासनिक हस्तक्षेप (सर्टिफिकेट आदि) को अनिवार्य बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि यह शर्त व्यक्ति के सम्मान, निजता (Privacy) और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
ट्रांसजेंडर समुदाय का कहना है कि किसी को अपनी लैंगिक पहचान साबित करने के लिए मेडिकल जांच या सरकारी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यह उनकी गरिमा और स्वतंत्रता के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी जारी किए थे नोटिस
दर्शनीय है कि इसी महीने की शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली सीधे तौर पर दायर की गई अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस भी जारी किया था। इसका मतलब है कि शीर्ष अदालत पहले से ही इस मामले पर विचार कर रही है।
अब सरकार चाहती है कि हाई कोर्ट्स में चल रहे सभी मामले भी सुप्रीम कोर्ट में आ जाएं ताकि एक समान फैसला हो सके। यह कदम कानूनी स्पष्टता के लिए जरूरी माना जा रहा है।
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मुख्य बातें (Key Points)
• केंद्र ने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 के खिलाफ सभी हाई कोर्ट मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की
• सॉलिसिटर जनरल ने विरोधाभासी फैसलों के खतरे का हवाला दिया
• CJI ने हाई कोर्ट्स के विचारों के महत्व पर जोर दिया
• विवाद का मुख्य बिंदु: सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन अधिकार को हटाना
• LGBTQ+ समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस कानून का विरोध कर रहे हैं













