Asaram Life Sentence: बुधवार को पूर्व स्व-घोषित धर्मगुरु आसाराम के लिए राजस्थान हाई कोर्ट से आंशिक राहत की खबर आई है। अदालत ने उन्हें IPC और POCSO Act के तहत सामूहिक बलात्कार के गंभीर आरोपों से तो बरी कर दिया, लेकिन नाबालिग से रेप के मुख्य मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। देखा जाए तो यह फैसला आसाराम के लिए अच्छी-बुरी खबरों का मिश्रित बैग साबित हुआ।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह अहम फैसला सुनाते हुए आसाराम को IPC की धारा 376(D) और POCSO Act की धाराओं 5(G)/6 के दोषों से मुक्त कर दिया है। साथ ही, आपराधिक साजिश से जुड़ी धारा 120(B) से भी उन्हें डिस्चार्ज किया गया है। यह वही आरोप थे जिनमें सामूहिक यौन शोषण का मामला बनता था।
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नाबालिग से रेप का दोष बरकरार, उम्रकैद जारी
हालांकि, यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि बेंच ने नाबालिग के साथ बलात्कार से संबंधित IPC की धारा 376(2)(F) के तहत आसाराम की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। इसका सीधा मतलब है कि निचली अदालत द्वारा 2018 में दी गई उम्रकैद की सजा अब भी लागू रहेगी और आसाराम को यह सजा पूरी करनी होगी।
अदालत ने आसाराम को सजा के मद्देनजर जल्द आत्मसमर्पण करने के सख्त निर्देश दिए हैं। फिलहाल वह अस्थायी जमानत पर बाहर हैं, जिसे सोमवार को महज सात दिनों के लिए बढ़ाया गया था। दिलचस्प बात यह है कि फैसला सुनाने से पहले अदालत ने कथित तौर पर टिप्पणी की थी कि उनके पास मुलजिम के लिए “अच्छी और बुरी खबरों का मिश्रित बैग” है।
कई गंभीर धाराओं में सजा यथावत
राजस्थान हाई कोर्ट ने IPC की कई अन्य गंभीर धाराओं के तहत भी सजाओं को बरकरार रखा है। इनमें धारा 342 (गैरकानूनी रूप से नजरबंद करना), 370(4) (तस्करी), 506 (आपराधिक धमकी), 509 (महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाना), और 354(A) (यौन शोषण) शामिल हैं।
इसके अलावा, POCSO Act की धाराओं 7/8 और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 23 के तहत भी सजा बरकरार रही है। बेंच ने IPC की धारा 376 और POCSO Act की धारा 34 के तहत भी आसाराम की सजा को यथावत रखा है। समझने वाली बात यह है कि आंशिक राहत के बावजूद, आसाराम अभी भी कई गंभीर आरोपों के तहत दोषी बने हुए हैं।
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सह-अभियुक्तों को मिली पूर्ण बरी
वहीं दूसरी ओर, अदालत ने सह-अभियुक्त संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को पूरी तरह से बरी कर दिया है। इन दोनों को पहले क्रमशः धारा 120(B) के साथ पढ़ी जाने वाली धाराओं 370(4) और 370(D) के तहत दोषी ठहराया गया था। ये दोनों आसाराम के करीबी सहयोगी माने जाते थे और कथित तौर पर पूरे मामले में अहम भूमिका निभा रहे थे।
जानें पूरा मामला और पृष्ठभूमि
आसाराम को 25 अप्रैल, 2018 को उनके आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के साथ यौन शोषण करने के गंभीर आरोप में दोषी ठहराया गया था। उन्हें IPC, POCSO Act और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की कई धाराओं के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यह मामला देशभर में सुर्खियों में रहा था क्योंकि आसाराम उस समय एक प्रभावशाली धर्मगुरु माने जाते थे और उनके लाखों अनुयायी थे।
अगर गौर करें तो बेंच ने आसाराम और सह-अभियुक्तों द्वारा दायर अपीलों पर लंबी सुनवाई पूरी करने के बाद 20 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले में कई मोड़ आए और लंबी कानूनी लड़ाई चली।
पीड़िता एक नाबालिग छात्रा थी जो आसाराम के आश्रम में रहती थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालतों ने शुरू से ही सख्त रुख अपनाया और त्वरित सुनवाई की।
अब क्या है कानूनी विकल्प?
अब आसाराम की कानूनी स्थिति यह है कि वह कुछ गंभीर आरोपों से मुक्त जरूर हो गए हैं, लेकिन मुख्य आरोप – नाबालिग से रेप – अभी भी कायम है। इसका मतलब साफ है कि उन्हें उम्रकैद की सजा काटनी होगी। हालांकि, उनके पास अब सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला है और वह इस फैसले के खिलाफ अपील दायर कर सकते हैं।
यह मामला धार्मिक गुरुओं द्वारा अपनी शक्ति और प्रभाव के दुरुपयोग का एक चर्चित उदाहरण रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संतुलित है क्योंकि अदालत ने सबूतों के आधार पर फैसला दिया है।
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मुख्य बातें (Key Points)
• राजस्थान हाई कोर्ट ने आसाराम को गैंगरेप और आपराधिक साजिश के आरोपों से बरी किया
• नाबालिग से रेप के मामले में IPC धारा 376(2)(F) के तहत उम्रकैद की सजा बरकरार
• कई अन्य गंभीर धाराओं जैसे 342, 370(4), 506, 509, 354(A) में सजा यथावत
• सह-अभियुक्त संचिता गुप्ता और शरत चंद्र को पूर्ण बरी
• आसाराम को आत्मसमर्पण के सख्त निर्देश, सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला













