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The News Air - Breaking News - Rule of Law Bureaucracy पर हाई कोर्ट का बड़ा सवाल: संविधान या सत्ता?

Rule of Law Bureaucracy पर हाई कोर्ट का बड़ा सवाल: संविधान या सत्ता?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नौकरशाही पर उठाया गंभीर सवाल, अधिकारियों की वफादारी संविधान की बजाय राजनीतिक आकाओं के प्रति, विधि के शासन को मान रहे प्रशासनिक असुविधा

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
मंगलवार, 9 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Rule of Law Bureaucracy
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Rule of Law Bureaucracy पर आजादी के 75 साल बाद भी अगर देश की सबसे बड़ी अदालतों में से एक इलाहाबाद हाई कोर्ट को यह कहना पड़े कि देश के प्रशासनिक अधिकारियों की निष्ठा संविधान से ज्यादा सत्ता में बैठे शासकों की तरफ दिखाई दे रही है, तो समझ लीजिए कि पानी सर से ऊपर जा चुका है। यह सवाल केवल उत्तर प्रदेश का नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे भारत के लोकतंत्र की आत्मा पर किया गया एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रहार है।

देखा जाए तो यह विश्लेषण उस मुद्दे पर है जो इस देश की रीढ़ की हड्डी का एक्स-रे है – जिसे हम ब्यूरोक्रेसी कहते हैं। क्या वाकई में भारत के स्टील फ्रेम में जंग लग चुका है? क्या हमारा Rule of Law यानी विधि का शासन धीरे-धीरे Rule of Rulers यानी शासकों का शासन बन गया है? आइए, इस पूरे मामले को गहराई से समझते हैं।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: जब अदालत ने हंटर चलाया

अमूमन अदालतें मामलों की सुनवाई के दौरान विवेकपूर्ण टिप्पणियां करती हैं। लेकिन इस बार इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर जो हंटर चलाया है, उसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के गलियारों में खलबली मचा दी है।

कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद तीखी और गंभीर टिप्पणी की। अगर गौर करें तो कोर्ट के शब्द बेहद चुभने वाले थे: “कई अधिकारियों की वफादारी संविधान की तरफ नहीं बल्कि रूलिंग डिस्पेंसेशन यानी मौजूदा राजनीतिक आकाओं के प्रति दिखाई देती है।”

इतना ही नहीं, माननीय जज साहब ने आगे जो कहा वह और भी डराने वाला है। उन्होंने कहा कि आज की तारीख में विधि का शासन को ये जो अधिकारी हैं, वे अपना संवैधानिक दायित्व मानते ही नहीं बल्कि वे इसे एक “ऑपरेशनल इनकन्वीनियंस” की तरह देखते हैं – यानी विधि के शासन को एक प्रशासनिक असुविधा की तरह देखते हैं।

कहने का मतलब साफ है – कानून का पालन करना इन अधिकारियों के लिए एक सरदर्दी बन गया है और सत्ताधारियों को खुश रखना उनकी प्राथमिकता।

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यह किसी क्लर्क की आलोचना नहीं, देश के प्रीमियम तंत्र पर सवाल है

ध्यान दीजिए, यह किसी छोटे-मोटे क्लर्क या कांस्टेबल की आलोचना नहीं हो रही है। यह देश के प्रीमियम तंत्र पर उठाया गया सवाल है – वह तंत्र जो UPSC की सबसे कठिन परीक्षा पास करके नीति निर्माण की कुर्सियों तक पहुंचा है।

यहां पर एक बहुत ही बुनियादी और मौलिक प्रश्न खड़ा होता है: जब एक IAS या IPS अधिकारी सेलेक्ट होकर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (LBSNAA) यानी मसूरी से निकलता है, तो वह अपनी सर्विस जॉइन करते समय क्या शपथ लेता है?

क्या वह किसी मुख्यमंत्री के प्रति वफादारी की शपथ लेता है? क्या वह कैबिनेट मंत्री या राजनीतिक दल के घोषणापत्र के प्रति निष्ठा की कसम खाता है? बिल्कुल नहीं।

वह शपथ लेता है भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखने की। और यही वह संवैधानिक मूल्य है जो आज खतरे में दिख रहा है।

🔍 यह भी पढ़ें- Anti Defection Law के तहत AAP का बड़ा दांव, गद्दार सांसदों की छुट्टी!

संविधान निर्माताओं का खूबसूरत बैलेंस: Political vs Permanent Executive

हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने यहां पर बहुत खूबसूरत, बहुत ही फाइन बैलेंस बनाया था। पहला यह था कि जो पॉलिटिकल एग्जीक्यूटिव होगा – जो सत्ता के शीर्ष पर होगा – वह अस्थाई होगा। राजनीतिक कार्यपालिका हर 5 साल में बदल जाएगी। यह निर्वाचित प्रतिनिधि होंगे और जन-मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होंगे।

लेकिन एक स्थाई कार्यपालिका होगी जो सरकारों के बदलने पर नहीं बदलेगी और इसकी जवाबदेही संविधान के प्रति होगी। राज्य को चलाने की जिम्मेदारी भी इसी ब्यूरोक्रेसी के पास होगी, क्योंकि दल बदलते हैं लेकिन राज्य स्टेट हमेशा कायम रहता है।

लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि स्थाई कार्यपालिका यानी ब्यूरोक्रेसी खुद को अस्थाई राजनीतिक आकाओं के रंग में इस तरह ढाल चुकी है कि दोनों के बीच में अंतर ही समाप्त हो गया है।

ऐतिहासिक संदर्भ: ICS से IAS तक का सफर

यह बीमारी आई कहां से? क्या यह रातोंरात पैदा हुई? बिल्कुल नहीं। इसका इलाज ढूंढने के लिए हमें उस इतिहास को समझना पड़ेगा जहां से यह शुरू हुई।

आजादी से पहले इस सर्विस को कहा जाता था ICS (Indian Civil Services)। ब्रिटिश काल में इन साहब बहादुरों का मुख्य काम जनता का कल्याण करना या उन्हें राइट्स देना नहीं हुआ करता था। बल्कि उनके दो प्रमुख एजेंडा हुआ करते थे:

  1. राजस्व संग्रह करना (Revenue Collection)
  2. मेंटेनेंस ऑफ लॉ एंड ऑर्डर – यानी साम्राज्य के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचल देना

यानी कि उनकी जवाबदेही जो होती थी, वो जनता या संविधान के प्रति नहीं बल्कि सीधे ब्रिटिश क्राउन या फिर उन आकाओं के प्रति थी। और वे माई-बाप संस्कृति के प्रतीक हुआ करते थे।

सरदार पटेल का स्टील फ्रेम: एक सपना जो अधूरा रह गया

1947 में जब भारत आजाद हुआ, तो सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सर्विसेज को भारत का स्टील फ्रेम कहा। उन्होंने कहा था कि अगर देश को एकजुट रखना है तो हमें एक निष्पक्ष, मजबूत और निडर प्रशासनिक सेवा की आवश्यकता होगी।

संविधान निर्माताओं ने कानून बदले, संस्थाएं बदलीं, व्यवस्थाएं बदलीं। लेकिन अफसोस, हम उस औपनिवेशिक संस्कृति को पूरी तरह से दफन नहीं कर पाए। आज भी साहबों के ठाट-बाट वही हैं। बस उनके ब्रिटिश आकाओं की जगह राजनीतिक आकाओं ने ले ली है।

Max Weber का Concept: Neutrality और Anonymity

समझने वाली बात यह है कि नौकरशाही का जो कॉन्सेप्ट है, वह बेस्ड ही है न्यूट्रलिटी (तटस्थता) और एनॉनिमिटी (अनामता) पर। यही कोर कॉन्सेप्ट Max Weber ने दिया था नौकरशाही के लिए।

इसका मतलब:

  • वे तटस्थ भी होंगे – किसी राजनीतिक विचारधारा या थॉट प्रोसेस के प्रति डेडिकेटेड नहीं होंगे
  • उनमें अनामता भी होगी – यानी वे सामने से आकर क्रेडिट नहीं लेंगे

यही Westminster Model भी है जहां पर अधिकारी राजनीति से पूरी तरह से तटस्थ होते हैं। सत्ता कोई भी हो, वे कानून को सर्वोच्च मानते हैं।

1970s का दौर: Neutral से Committed Bureaucracy की ओर

भारत के प्रशासनिक इतिहास में सरदार पटेल के बाद बड़ा परिवर्तन तब आया जब 1970 का दशक शुरू हुआ। जब इंदिरा गांधी जी का युग शुरू होता है तो वो कहती हैं कि हमें तटस्थ ब्यूरोक्रेसी नहीं चाहिए। हमें चाहिए “Committed Bureaucracy” – यानी सरकार के एजेंडे के प्रति ब्यूरोक्रेसी को कमिटेड होना चाहिए।

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दिलचस्प बात यह है कि ऐसा ही सिस्टम अमेरिका में भी बहुत साल पहले चला करता था जिसको Spoil System कहा जाता था। यहां पर क्या होता है? सरकार के एजेंडे के प्रति ब्यूरोक्रेसी को डेडिकेटेड होना होता है।

इसके पीछे आइडिया यह है कि सरकार यह मानती है कि अगर नौकरशाही हमारे आइडिया के प्रति, हमारे कमिटमेंट के प्रति, हमारी मैनिफेस्टो के प्रति डेडिकेटेड रहेगी तो हम उसे ज्यादा बेहतर ढंग से लागू करवा पाएंगे।

लेकिन संविधान ने हमारे संविधान ने ब्यूरोक्रेसी को कमिटेड नहीं बनाया था क्योंकि कुर्सी और सत्ता के प्रति उसे कमिटेड नहीं होना था।

प्रशासनिक सुधारों पर बनी हुई PC Hota Committee से लेकर Second Administrative Reforms Commission (द्वितीय ARC) ने भी बार-बार चीख-चीख कर यह कहा कि सिविल सर्विस का राजनीतिकरण देश के लिए घातक है। सिविल सर्विस को हर हाल में न्यूट्रल ही होना चाहिए।

जमीनी हकीकत: तीन बड़े हथियार जो अधिकारियों को झुकाते हैं

अब आते हैं जमीनी हकीकत पर। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जो उंगली उठाई है, उसके पीछे के मैकेनिज्म को भी जानना जरूरी है। आखिर एक IAS या IPS अधिकारी इतना शक्तिशाली होने के बावजूद भी घुटने क्यों टेक देता है?

इसके पीछे तीन बड़े हथियार हैं जो राजनीतिक सत्ता इस्तेमाल करती है:

1. लूपलाइन और ट्रांसफर-पोस्टिंग का डर

अगर कोई ईमानदार अधिकारी सत्ताधारी दल के किसी गैरकानूनी आदेश को मानने से इंकार करता है तो रात 12:00 बजे ही उसका ट्रांसफर एक ऐसी जगह पर कर दिया जाता है जिसे प्रशासनिक शब्दकोश में “लूपलाइन” या फिर “डंपिंग ग्राउंड” कहा जाता है। और इससे बचना चाहता है एक ब्यूरोक्रेट।

2. रिटायरमेंट के बाद का लालच

किसी आयोग का अध्यक्ष बना देना, राज्यपाल बना देना, राज्यसभा सीट दे देना – यह जो लाभ के लालच दिए जाते हैं, इससे वे अपने सेवाकाल के आखिरी सालों में रीढ़ की हड्डी छोड़कर काम करते हैं राजनीतिक आकाओं के प्रति।

3. चहेते अधिकारियों का सिंडिकेट

मलाईदार राज्यों में कुछ मलाईदार पोस्ट होते हैं और उस पर एक अघोषित खेल चलता है। जो अधिकारी सरकार के हर ऑपरेशनल इनकन्वीनियंस को बाईपास करके काम करवा सकता है, वह जिले का कप्तान या फिर मुख्य सचिव बना दिया जाता है। उसे मिलती है मलाईदार पोस्टिंग।

यह बीमारी केवल उत्तर प्रदेश की नहीं

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह बीमारी केवल उत्तर प्रदेश की नहीं है। आप पश्चिम बंगाल में देखिए, आप कर्नाटक में देखिए, आप तमिलनाडु में देखिए, पूरे देश में देखिए, आप केंद्र के स्तर पर देखिए। समय-समय पर हर जगह विपक्षी दलों द्वारा जांच एजेंसियों और स्थानीय पुलिस के दुरुपयोग के बड़े आरोप लगते रहे हैं।

और यह पूरे देश के प्रशासनिक ढांचे को खोखला करता जा रहा है।

सिक्के का दूसरा पहलू: ईमानदार अधिकारी भी हैं

लेकिन रुकिए, इसका मतलब क्या यह है कि पूरा सिस्टम ही सड़ चुका है? क्या सारे अधिकारी बिक चुके हैं? बिल्कुल नहीं। ऐसा कहना बिल्कुल गलत होगा।

सिक्के का दूसरा पहलू देखना भी बहुत जरूरी है। आज भी देश में ऐसे सैकड़ों IAS, IPS और राज्य सेवा के अधिकारी मौजूद हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के विपरीत परिस्थितियों में भी संविधान का परचम बुलंद रखे हुए हैं।

इतिहास गवाह है कि जब-जब नेताओं ने सरहद पार करने की कोशिश की है तो T.N. Seshan जैसे अधिकारियों ने अपने अकेले दम पर पूरे सिस्टम को उसकी औकात याद दिला दी है।

आज भी ऐसे कई अधिकारी हैं जो दर्जनों ट्रांसफर झेलते हैं, सस्पेंड होते हैं, लेकिन वे किसी नेता की जी-हजूरी करने से साफ मना कर देते हैं। और यही अधिकारी हमारे सिस्टम को आज भी बनाए हुए हैं – स्टील फ्रेम बनाए हुए हैं।

इसीलिए हमारा यह विश्लेषण उन जांबाज और ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ नहीं है बल्कि यह उस सिस्टम और प्रवृत्ति के खिलाफ है – एक गंभीर चेतावनी है – जो ईमानदार अफसरों को हाशिए पर धकेलती है और चाटुकारों को सिर-आंखों पर बिठाती है।

लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर संकट के बादल

अगर हम आज की डेट में देखें तो लोकतंत्र के तीन स्तंभ जो हैं, उन तीनों पर संकट के बादल दिखाई देते हैं:

  • न्यायपालिका का इकबाल कमजोर हुआ तो न्याय खतरे में पड़ जाएगा
  • मीडिया अगर चाटुकार बन गई तो वह सत्य को दफन कर देगी
  • नौकरशाही यदि संविधान को छोड़कर राजनीतिक विंग बन गई तो लोकतंत्र का जो ढांचा है वह खोखला बनकर रह जाएगा

बात बहुत सीधी है और बिल्कुल साफ है कि भारत का लोकतंत्र सिर्फ इस बात से महान नहीं बनता कि यहां पर हर 5 साल में चुनाव होते हैं और सरकारें बदल सकती हैं।

लोकतंत्र तब जिंदा रहता है जब उसकी संस्थाएं मजबूत और निष्पक्ष होती हैं। अगर न्यायपालिका का इकबाल खत्म हो जाए, और अगर मीडिया चाटुकार बन जाए, और अगर नौकरशाही संविधान को छोड़कर किसी राजनीतिक दल की विंग की तरह काम करने लगे, तो लोकतंत्र का जो ढांचा है वह खोखला बनकर रह जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रखा आईना: अब आंखें नहीं चुरा सकते

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बहाने पूरे देश के सामने एक ऐसा आईना रख दिया है जिससे हम आंखें नहीं चुरा सकते।

वास्तव में सवाल घूम-फिर कर फिर वहीं खड़ा होता है: अगर कल सरकार बदल जाए तो क्या ब्यूरोक्रेसी की वफादारी भी बदल जानी चाहिए, या फिर उसकी निष्पक्षता का पैमाना सिर्फ और सिर्फ भारत के संविधान होना चाहिए?

चिंता का विषय यह है कि अगर हर सरकार के साथ ब्यूरोक्रेसी का रंग भी बदलता रहा, तो स्थायी कार्यपालिका का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। और तब देश में शासन नहीं, अराजकता होगी।

समाधान की दिशा में: स्वतंत्र सिविल सर्विसेज बोर्ड

हैरान करने वाली बात यह है कि इतने बड़े मुद्दे पर कोई ठोस सुधार क्यों नहीं हो रहे? क्या अधिकारियों की जो ट्रांसफर-पोस्टिंग होती है, उसके लिए हमें एक स्वतंत्र सिविल सर्विसेज बोर्ड का गठन नहीं कर देना चाहिए जो राजनीतिक दबाव से पूरी तरह से मुक्त हो?

यह सवाल सिर्फ UPSC के एस्पिरेंट्स के लिए नहीं है, बल्कि देश के हर जागरूक नागरिक के लिए है। क्योंकि आखिरकार, Rule of Law Bureaucracy का सवाल हमारे लोकतंत्र की नींव का सवाल है।


मुख्य बातें (Key Points)

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने नौकरशाही की वफादारी पर गंभीर टिप्पणी की
  • अधिकारियों की निष्ठा संविधान से ज्यादा राजनीतिक आकाओं के प्रति दिखाई दे रही है
  • Rule of Law को “ऑपरेशनल इनकन्वीनियंस” (प्रशासनिक असुविधा) माना जा रहा है
  • सरदार पटेल ने सिविल सर्विस को भारत का “स्टील फ्रेम” कहा था
  • 1970s में Neutral Bureaucracy से Committed Bureaucracy की ओर बदलाव
  • तीन हथियार: ट्रांसफर का डर, पोस्ट-रिटायरमेंट लालच, मलाईदार पोस्टिंग
  • T.N. Seshan जैसे ईमानदार अधिकारी आज भी मौजूद हैं
  • लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर संकट: न्यायपालिका, मीडिया, नौकरशाही

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Committed Bureaucracy क्या है और यह कब शुरू हुई?

Committed Bureaucracy का कॉन्सेप्ट 1970s में इंदिरा गांधी के दौर में शुरू हुआ। इसका मतलब है कि नौकरशाही सरकार के राजनीतिक एजेंडे के प्रति प्रतिबद्ध होनी चाहिए, न कि तटस्थ रहे। यह Westminster Model के Neutral Bureaucracy के विपरीत है।

प्रश्न 2: IAS/IPS अधिकारी किसके प्रति वफादार होते हैं?

संवैधानिक रूप से, IAS/IPS अधिकारी अपनी सेवा शुरू करते समय भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की शपथ लेते हैं, न कि किसी राजनीतिक दल या मुख्यमंत्री के प्रति। लेकिन व्यावहारिक रूप में कई बार यह वफादारी राजनीतिक सत्ता की ओर झुक जाती है।

प्रश्न 3: क्या सभी नौकरशाह राजनीतिक दबाव में काम करते हैं?

नहीं। देश में आज भी सैकड़ों ईमानदार IAS, IPS अधिकारी हैं जो T.N. Seshan की तरह संविधान के प्रति निष्ठावान हैं और राजनीतिक दबाव के बावजूद अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। लेकिन सिस्टम में मौजूद ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल और पोस्ट-रिटायरमेंट लाभ के कारण कई अधिकारी दबाव में आ जाते हैं।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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