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The News Air - Breaking News - Anti Defection Law India Cases: राघव चड्ढा से पहले ये 5 बड़े दल-बदल, सरकारें तक बदल गईं

Anti Defection Law India Cases: राघव चड्ढा से पहले ये 5 बड़े दल-बदल, सरकारें तक बदल गईं

एकनाथ शिंदे के शिवसेना तोड़ने से लेकर अरुणाचल में 43 विधायकों की बगावत तक, जानें भारत के सबसे बड़े दल-बदल मामले जिनमें दो-तिहाई नियम का इस्तेमाल हुआ

The News Air Team by The News Air Team
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Anti Defection Law India Cases
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Anti Defection Law India Cases की बात जब भी होती है तो राजनीति में भूचाल आ जाता है। एक तरफ किसी पार्टी की खुशी होती है तो दूसरी तरफ किसी का गम। क्योंकि एक पार्टी के सदस्य दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और पूरा राजनीतिक समीकरण बदल जाता है।

देखा जाए तो एंटी डिफेक्शन लॉ की कहानी तब आती है जब वो सदस्य किसी पद पर हों। जैसे सांसद हो, राज्यसभा सांसद हो, लोकसभा सांसद हो या फिर विधायक ही क्यों न हो। इस वक्त पर यह सवाल उठता है कि एक पार्टी छोड़कर दूसरे का दामन थामने पर क्या उसकी सदस्यता सिर्फ पार्टी से नहीं बल्कि सदन से भी जाएगी?

और बस यहीं से शुरू होती है दो-तिहाई नियम की दिलचस्प कहानी। आइए जानते हैं भारतीय राजनीतिक इतिहास के उन 5 बड़े मामलों के बारे में जहां Anti Defection Law को दो-तिहाई प्रावधान के जरिए पार कर लिया गया।

राघव चड्ढा का ताजा मामला: 7 में से 7 सांसद

राघव चड्ढा ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और घोषणा की कि आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल होने वाले हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि AAP के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का जाना दो-तिहाई से भी ज्यादा है।

उन्होंने दावा किया कि हम एंटी डिफेक्शन लॉ के इस प्रावधान का पालन कर रहे हैं। संवैधानिक रूप से हम कुछ गलत नहीं कर रहे हैं। उनके साथ इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में संदीप पाठक और अशोक मित्तल मौजूद थे।

दिलचस्प बात यह है कि अशोक मित्तल वही शख्स हैं जिन्हें AAP ने राघव चड्ढा को डेपुटी लीडर के पद से हटाने के बाद उस पद पर बैठाया था। और अब दोनों ही साथ में BJP में शामिल हो रहे हैं।

हालांकि, जब तक यह रिपोर्ट तैयार की जा रही है, तब तक केवल तीन सांसदों – राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल – ने औपचारिक रूप से BJP में शामिल हुए हैं। बाकी चार में स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह के नाम शामिल हैं।

केस 1: TDP के 4 राज्यसभा सांसद – 2019 का झटका

अगर गौर करें तो राज्यसभा में इस तरह का बड़ा दल-बदल 2019 में भी हुआ था। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के राज्यसभा के 6 सांसदों में से 4 ने भाजपा का दामन थाम लिया था।

यह 2019 लोकसभा चुनाव के बाद का मामला है। आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ ही होता है। उस चुनाव में TDP और कांग्रेस दोनों की बुरी हार हुई। YSR कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी की सरकार बनी।

समझने वाली बात यह है कि जब आप विधानसभा में कमजोर होते हैं तो इसका असर राज्यसभा में दिखता है। TDP के 6 राज्यसभा सांसदों में से 4 ने तय किया कि अब चंद्रबाबू नायडू की पार्टी छोड़कर BJP में जाने का समय आ गया है।

इनके नाम थे – वाई एस चौधरी, सीएम रमेश, टीजी वेंकटेश और जी मोहन राव। यह एक्जैक्ट दो-तिहाई था – 6 में से 4। और बस यहीं से शुरू हुई TDP के लिए मुश्किल घड़ी की कहानी।

लेकिन राजनीति की सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज वही TDP, BJP के साथ गठबंधन में है। नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार के लिए चंद्रबाबू नायडू सबसे अहम स्तंभों में से एक हैं।

केस 2: अरुणाचल का महाविलय – 43 में से 43!

अरुणाचल प्रदेश का दिसंबर 2016 का मामला शायद सबसे हैरान करने वाला है। यहां तो पूरी की पूरी पार्टी ही एक साथ चली गई।

अरुणाचल प्रदेश की 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 46 विधायक थे। एक सुबह खबर आई कि 43 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर लिया है।

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यह कोई मजाक नहीं था। चिंता का विषय यह है कि 46 में से 43 का मतलब है लगभग पूरी पार्टी ही गायब हो गई। इन 43 विधायकों ने पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में विलय कर लिया जो BJP के साथ गठबंधन में थी।

इस बगावत का नेतृत्व पेमा खांडू ने किया। बाद में वे सीधे BJP में शामिल हो गए और मुख्यमंत्री बने। आज भी उनकी ही सरकार चल रही है।

और बस यहीं से शुरू होती है नॉर्थ ईस्ट की राजनीति की वह कहानी जहां ऐसे दल-बदल आम बात हैं। जो 3 विधायक बचे थे वे खुद सोच रहे थे कि कहीं हम पर ही Anti Defection Law न लग जाए!

केस 3: एकनाथ शिंदे का मास्टर स्ट्रोक – जून 2022

महाराष्ट्र का यह मामला आज भी हर किसी की जुबान पर है। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे। महा विकास आघाड़ी की सरकार चल रही थी – शिवसेना, कांग्रेस और शरद पवार की NCP के गठबंधन की।

जून 2022 का महीना था। शिवसेना के कुल 55 विधायक थे। दो-तिहाई के लिए 37 चाहिए थे। और एकनाथ शिंदे ठीक-ठीक 38 विधायकों के साथ मुंबई छोड़कर गुवाहाटी पहुंच गए।

दिलचस्प बात यह है कि वे गुवाहाटी में रहे, एक होटल में। फिर वहां से एकनाथ शिंदे नेता बनकर उभरे और Maharashtra लौटे। यह एक्जैक्ट दो-तिहाई विधायकों के साथ था।

सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब यह घोषणा हुई कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री होंगे और देवेंद्र फडणवीस, जो पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे, डिप्टी सीएम बनने को तैयार हैं। यह एक political masterstroke था।

शिवसेना का बंटवारा: असली कौन?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एकनाथ शिंदे ने पार्टी को तोड़कर BJP में विलय नहीं किया। उन्होंने अपनी अलग शिवसेना बनाई और दावा किया कि असली शिवसेना हम हैं।

मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा। बहस हुई – असली शिवसेना कौन है? इलेक्शन सिंबल किसको मिलेगा? फिर मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।

अंत में तय हुआ कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना असली शिवसेना मानी जाएगी। उद्धव ठाकरे को शिवसेना (UBT) – यानी उद्धव बालासाहेब ठाकरे – कहा जाने लगा।

राहत की बात यह है कि कम से कम दोनों गुटों को अपनी-अपनी पहचान मिल गई। लेकिन राजनीतिक नुकसान उद्धव ठाकरे को ही हुआ।

केस 4: तेलंगाना में कांग्रेस का पतन – 2019

2019 का एक और मामला तेलंगाना का है। यहां की 119 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 19 विधायक थे। एक विधायक लोकसभा चुनाव में सांसद हो गए थे, तो 18 बचे।

केसीआर यानी के चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) – जो अब भारत राष्ट्र समिति (BRS) है – की सरकार चल रही थी। उनके पास 88 के करीब विधायक थे।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई। और फिर मौका देखकर 18 में से 12 विधायक – यानी एक्जैक्ट दो-तिहाई – BRS में शामिल हो गए।

समझने वाली बात यह है कि जब एक पार्टी केंद्र में कमजोर होती है तो राज्यों में भी उसके विधायक डगमगाने लगते हैं। यही हुआ तेलंगाना में।

केस 5: गोवा में कांग्रेस का सफाया – 8 में से 8

गोवा छोटा राज्य है लेकिन यहां दल-बदल बार-बार होता है। एक मामले में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत के समय की बात है।

कांग्रेस के कुल 11 विधायक थे। उनमें से 8 विधायकों ने – यानी दो-तिहाई से भी ज्यादा – पार्टी तोड़ दी और सीधे भाजपा में जाकर शामिल हो गए।

गोवा में यह आम बात है। दो विधायकों वाली पार्टी में एक चला जाए। तीन में से दो चले जाएं। लेकिन 11 में से 8 का जाना एक बड़ा झटका था।

चिंता का विषय यह है कि छोटे राज्यों में दो-तिहाई संख्या जुटाना आसान होता है। इसलिए गोवा, मणिपुर, मेघालय जैसे राज्यों में यह बार-बार होता है।

मध्य प्रदेश: ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला

मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच की खींचतान खूब चर्चित रही। हालांकि यह एक्जैक्ट दो-तिहाई टूट का मामला नहीं था, लेकिन इसका असर बड़ा था।

करीब 20 विधायक सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर चले गए। उन्होंने इस्तीफा दिया। नंबर गेम बदल गया। कमलनाथ की सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बने।

यह दर्शाता है कि हमेशा दो-तिहाई नियम की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी छोटी संख्या में जाने पर भी सरकारें बदल जाती हैं।

Anti Defection Law: आलोचना के बिंदु

एंटी डिफेक्शन लॉ बनाया ही इसलिए गया था क्योंकि जनता जो मैंडेट देती है वो किसी एक पार्टी को उसकी विचारधारा देखकर देती है। अगर नेता पार्टी बदल लेते हैं तो जनता के मैंडेट पर सवाल खड़ा होता है।

लेकिन यही कानून दो-तिहाई का प्रावधान भी देता है। आलोचना का बिंदु यह है कि अगर एक-दो लोगों का जाना गलत है तो बड़ी संख्या में जाना कैसे सही हो सकता है?

अगर गौर करें तो इसके पीछे का मकसद यह था कि इतनी बड़ी संख्या जुटाना मुश्किल होगा इसलिए यह हतोत्साहित करेगा। लेकिन राजनीतिक कौशल ने इस प्रावधान को भी पार कर लिया।

पंजाब का दिलचस्प पहलू

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पंजाब में भाजपा के शायद केवल 2 विधायक हैं। लेकिन अब उनके 5-6 राज्यसभा सांसद हो जाएंगे।

यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि राज्यसभा राज्य का प्रतिनिधित्व करता है। राज्य में विधायक नहीं हैं फिर भी सांसद जुटा लेना – यह राजनीतिक कलाबाजी ही है।

इसीलिए भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि पंजाब के लोगों के साथ धोखा हुआ है। पंजाब की जनता ने जिन्हें वोट दिया वे अब दूसरी पार्टी में चले गए।

राघव चड्ढा बनाम एकनाथ शिंदे: क्या अंतर?

एक महत्वपूर्ण अंतर है। एकनाथ शिंदे ने जब शिवसेना तोड़ी तो उन्होंने BJP में विलय नहीं किया। उन्होंने अपनी अलग शिवसेना बनाई और दावा किया कि असली शिवसेना हम हैं।

उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि विधायकों का बड़ा समूह हमारे साथ है, संगठन में भी हमारे लोग हैं, लोकसभा सांसद भी हमारे साथ हैं।

लेकिन राघव चड्ढा ने स्पष्टता रखी है कि पार्टी पर उनका दावा नहीं है। वे सीधे BJP में शामिल हो रहे हैं। यह एक अलग रणनीति है।

Anti Defection Law India Cases का राजनीतिक संदेश

इन सभी मामलों से एक बात साफ होती है – Anti Defection Law में दो-तिहाई का प्रावधान एक दोधारी तलवार है। एक तरफ यह बड़े पैमाने पर जनमत को reflect करने का दावा करता है। दूसरी तरफ यह जनता के मैंडेट को भी नकारता है।

हैरान करने वाली बात यह है कि जो कानून दल-बदल रोकने के लिए बना था वही कानून बड़े पैमाने पर दल-बदल की सुविधा भी देता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दो-तिहाई प्रावधान को या तो हटा देना चाहिए या फिर और सख्त करना चाहिए। लेकिन फिलहाल तो यह प्रावधान कायम है और राजनीतिक दल इसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं।

मुख्य बातें (Key Points)
  • Anti Defection Law India Cases में राघव चड्ढा का मामला ताजा, AAP के 10 में से 7 सांसद BJP में शामिल
  • TDP के 6 में से 4 राज्यसभा सांसद 2019 में BJP में गए, आज TDP-BJP गठबंधन में
  • अरुणाचल में 2016 में सबसे बड़ा विलय – कांग्रेस के 46 में से 43 विधायक एक साथ गए
  • एकनाथ शिंदे ने जून 2022 में शिवसेना के 55 में से 38 विधायकों के साथ बगावत की
  • तेलंगाना में 2019 में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक BRS में, गोवा में 11 में से 8 BJP में
  • दो-तिहाई प्रावधान की आलोचना – जनता के मैंडेट पर सवाल लेकिन कानूनी रूप से वैध
  • पंजाब में BJP के 2 विधायक लेकिन 5-6 राज्यसभा सांसद – राजनीतिक कलाबाजी

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Anti Defection Law में दो-तिहाई नियम क्या है?

जवाब: संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य एक साथ पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाते हैं या विलय करते हैं, तो उन्हें दल-बदल का दोषी नहीं माना जाता और उनकी सदस्यता नहीं जाती।

प्रश्न 2: भारत का सबसे बड़ा दल-बदल मामला कौन सा है?

जवाब: अरुणाचल प्रदेश में दिसंबर 2016 में हुआ दल-बदल सबसे बड़ा माना जाता है जब कांग्रेस के 46 में से 43 विधायक एक साथ पार्टी छोड़कर पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गए थे।

प्रश्न 3: एकनाथ शिंदे और राघव चड्ढा के मामले में क्या अंतर है?

जवाब: एकनाथ शिंदे ने शिवसेना तोड़कर अपनी अलग शिवसेना बनाई और असली शिवसेना होने का दावा किया। जबकि राघव चड्ढा ने सीधे BJP में विलय की घोषणा की और AAP पार्टी पर कोई दावा नहीं किया।

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