Right to Safe Travel को अब भारत में एक मौलिक अधिकार का दर्जा मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हाईवे सुरक्षा को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि सुरक्षित सड़कें और बेहतर रोड इंफ्रास्ट्रक्चर अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं। देश में हर साल करीब 1.7 से 1.8 लाख लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं, और इसी गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI), सड़क परिवहन मंत्रालय और राज्य सरकारों को 13 सख्त निर्देश जारी किए हैं।
दो भीषण हादसों के बाद जब नवंबर 2025 में कुल 34 लोगों की जान चली गई, तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए यह मामला उठाया। पहला हादसा 2 नवंबर को भारतमाला एक्सप्रेसवे पर हुआ जहां एक बस ने साइड में खड़े ट्रेलर को टक्कर मार दी और 15 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। अगले ही दिन तेलंगाना के रेड्डी जिले में पत्थर से भरी लॉरी ने राज्य परिवहन निगम की बस को टक्कर मारी, जिसमें 19 लोगों की जान चली गई—इनमें सिर्फ 40 दिन का एक बच्चा भी शामिल था।
देखा जाए तो हमारे देश की सड़कों की हालत किसी से छिपी नहीं है। खासकर नेशनल हाईवे पर जो अनियमितता और लापरवाही दिखती है, वह चिंताजनक है। हालांकि नेशनल हाईवे देश के कुल रोड नेटवर्क का सिर्फ 2% हिस्सा हैं, लेकिन इन पर होने वाली कुल मौतों का 30% हिस्सा यहीं दर्ज होता है। इसका सीधा मतलब है कि हम हाईवे पर नियमों का पालन नहीं कर रहे।
स्वत: संज्ञान और अनुच्छेद 142 की शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान (Suo Moto Jurisdiction) का इस्तेमाल किया। आप जानते होंगे कि अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए किसी भी आदेश को पारित करने की शक्ति है। यह आदेश कानून की तरह काम करता है और पूरे देश में लागू होता है, चाहे संसद से कोई कानून पास हुआ हो या नहीं।
अगर गौर करें तो इस फैसले की सबसे बड़ी बात यह है कि अब राइट टू सेफ मोबिलिटी और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर को अनुच्छेद 21 का हिस्सा बना दिया गया है। जिस तरह स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा जीवन के अधिकार में शामिल हैं, उसी तरह अब सुरक्षित सड़कें भी आपका मौलिक अधिकार बन गई हैं। इसका अर्थ है कि अगर आपको लगता है कि कहीं सड़क की हालत खराब है या सुरक्षा की कमी है, तो आप सीधे कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
हाईवे खतरे का रास्ता नहीं बन सकते
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि हाईवे खतरे का रास्ता नहीं हो सकते। हर एक बचाई जा सकने वाली मौत (Avoidable Death) राज्य की विफलता मानी जाएगी। आर्थिक तंगी का बहाना देकर खराब सड़कों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुरक्षा एक गैर-परक्राम्य दायित्व (Non-Negotiable Obligation) है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कोर्ट ने साझा जिम्मेदारी (Shared Responsibility) की बात की है। अब जिम्मेदारी सिर्फ एक विभाग की नहीं, बल्कि NHAI, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, राज्य सरकारें, पुलिस और जिला प्रशासन सभी को साथ मिलकर काम करना होगा। अक्सर हमारे देश में जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की परंपरा रही है—कोई कहता है ये विभाग की गलती है, कोई कहता है वो जिम्मेदार है। लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।
13 सख्त निर्देश: तत्काल खतरों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने कुल 13 दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पहले तीन निर्देश तत्काल खतरों से जुड़े हैं।
पहला है रोड साइड पार्किंग पर पूर्ण प्रतिबंध। अक्सर आपने देखा होगा कि हाईवे के किनारे बड़े-बड़े ट्रक खड़े रहते हैं। कई बार तो तीन लेन वाली सड़क पर आखिरी लेन में ही गाड़ी पार्क कर दी जाती है। मैंने खुद मुंबई एक्सप्रेसवे पर कई जगह यह देखा है। समझने वाली बात यह है कि रात को ये खड़ी ट्रकें जानलेवा साबित होती हैं। ज्यादातर पुरानी ट्रकों में पीछे की लाइट नहीं होती, कोई चमकीला निशान नहीं होता। अंधेरे में तेज रफ्तार से आती गाड़ी को दिखता ही नहीं और सीधे जाकर टकरा जाती है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है—हाईवे के किनारे (Carriageway) पर कोई भी ट्रक या गाड़ी पार्क नहीं की जा सकती। यह फेटल कोलीजन (घातक टक्कर) का सबसे बड़ा कारण है।
दूसरा निर्देश है अतिक्रमण हटाना। हाईवे के किनारे छोटे-छोटे ढाबे, गुमटी, दुकानें—ये सब इललीगल हैं। इनके लिए एक उचित जगह होनी चाहिए, हाईवे से थोड़ा अलग एक अलग रास्ता निकलकर। लेकिन अभी तो क्या है, सीधे हाईवे के बगल में ये सब लगा दिए जाते हैं। कोर्ट ने 60 दिन के भीतर इन्हें हटाने का आदेश दिया है।
तीसरा है लाइसेंस का नियमन। हाईवे पर कोई भी व्यावसायिक गतिविधि बिना लाइसेंस और सुरक्षा क्लीयरेंस के नहीं हो सकती। पेट्रोल पंप, भोजनालय, सभी सुविधाओं की समीक्षा की जाएगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशन: पार्किंग और रेस्ट एरिया जरूरी
अगले तीन निर्देश इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े हैं। दिलचस्प बात यह है कि कई बार लोग इसलिए भी गाड़ी साइड में खड़ी करते हैं क्योंकि उचित पार्किंग जोन, रेस्ट एरिया, शौचालय और भोजन की सुविधा नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि उचित पार्किंग जोन, समय-समय पर शौचालय और भोजन सुविधाएं होनी चाहिए। यह इंफ्रास्ट्रक्चर बने तो लोग गलत तरीके से गाड़ी नहीं खड़ी करेंगे।
इमरजेंसी रिस्पांस नेटवर्क भी बेहद जरूरी है। हादसे के बाद पहले कुछ घंटे बेहद क्रिटिकल होते हैं—गोल्डन ऑवर कहते हैं इसे। इस दौरान अगर जान बचाई जा सके तो बच सकती है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि हर 75 किलोमीटर पर एंबुलेंस और टो सर्विस उपलब्ध होनी चाहिए।
ब्लैक स्पॉट की पहचान अगले 45 दिन में करनी होगी। ये वो जगहें हैं जहां बार-बार हादसे होते हैं। मान लीजिए कोई सड़क चलते-चलते अचानक मुड़ जाती है और वहां कोई साइनबोर्ड नहीं, रोशनी नहीं—बस, हादसा हो गया। ऐसी जगहों पर उचित साइनेज, लाइटिंग, स्पीड ब्रेकर लगाने होंगे।
टेक्नोलॉजी और निगरानी: ड्रोन और एआई का इस्तेमाल
अगले दो निर्देश टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं। आज टेक्नोलॉजी का जमाना है तो उसका भरपूर इस्तेमाल होना चाहिए। एडवांस्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम—कैमरे, स्पीड सेंसर, जीपीएस—इन सबका इस्तेमाल करना है ताकि सख्ती से नियमों को लागू किया जा सके।
ड्रोन और फिजिकल इंस्पेक्शन से लगातार निगरानी करनी है। नागरिक शिकायत प्रणाली को टेक से जोड़ना है ताकि रियल टाइम में समस्याओं का समाधान हो सके।
एनफोर्समेंट और गवर्नेंस: पेट्रोलिंग और टास्क फोर्स
अगले तीन निर्देश नियमों को लागू करने से जुड़े हैं। डेडिकेटेड हाईवे पेट्रोल होनी चाहिए। इललीगल पार्किंग, तेज रफ्तार, उल्लंघन—इन सबकी निगरानी के लिए समय-समय पर पेट्रोलिंग जरूरी है।
डिस्ट्रिक्ट हाईवे सेफ्टी टास्क फोर्स बनाई जाएगी जिसमें जिला अधिकारी, पुलिस, हाईवे अथॉरिटी शामिल होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर समन्वय और रियल टाइम में समस्याओं का समाधान होगा।
अंतर-राज्यीय समन्वय भी जरूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में एक कानून है, मध्य प्रदेश में दूसरा और महाराष्ट्र में कुछ और। सभी राज्यों में एक समान नियम लागू होने चाहिए।
जवाबदेही और शिकायत प्रणाली
आखिरी दो निर्देश जवाबदेही के हैं। पब्लिक कंप्लेंट सिस्टम होना चाहिए। हेल्पलाइन ठीक से काम करे ताकि जनता अपनी समस्या बता सके।
टाइम बाउंड कंप्लायंस की बात की गई है—30 से 75 दिन की डेडलाइन दी गई है। अब देखना यह है कि सरकार इसे पूरा कर पाती है या नहीं।
चुनौतियां: कहना आसान, करना मुश्किल
कहने को तो बातें बड़ी-बड़ी हो गई हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या सरकार इन्हें लागू कर पाएगी? हमारे देश की हालत सबको पता है। चाहे कानून बन जाए, चाहे सुप्रीम कोर्ट कुछ कह दे—कई चुनौतियां हैं।
संघीय समन्वय सबसे बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार को सभी राज्यों के साथ मिलकर काम करना होगा। क्या इतनी आसानी से हो पाएगा?
फंडिंग की कमी दूसरी बड़ी समस्या है। सरकार कहेगी भाई पैसे ही नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो बड़ी-बड़ी बातें कर दीं, लेकिन इन्हें लागू कैसे करें? पैसे कहां से आएंगे?
एनफोर्समेंट की दिक्कत तीसरी समस्या है। कितना भी कानून बना लो, जब तक उचित मैनपावर नहीं होगी, जब तक करप्शन नहीं हटेगा, तब तक नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा सकता।
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का विरोध भी होगा। अतिक्रमण हटाने जाओ तो देखिए क्या बैकलैश होता है। कोई 5 साल से वहां काम कर रहा है, उसे हटाना इतना आसान नहीं। लेकिन अगर सिस्टम ठीक से काम करे तो क्या नहीं हो सकता।
पहले और अब: बदलाव का रुख
अगर तुलना करें तो पहले रोड सेफ्टी पर सिर्फ पॉलिसी बनाने तक सीमित था। अब इसे राइट-बेस्ड अप्रोच बना दिया गया है—अनुच्छेद 21 का हिस्सा।
पहले एनफोर्समेंट कमजोर और बिखरा हुआ था। अब इसे केंद्रीकृत और समन्वित किया गया है।
पहले फोकस हादसे के बाद की कार्रवाई पर ज्यादा था। अब हादसे से पहले की रोकथाम (Pre-Accident Prevention) पर जोर है।
पहले जवाबदेही लगभग नहीं थी। अब टाइम बाउंड और मॉनिटरिंग के साथ जवाबदेही तय की गई है।
भारत का सड़क सुरक्षा संकट
हैरान करने वाली बात यह है कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा सड़क सुरक्षा संकट है। हर साल 4.7 लाख हादसे होते हैं। हर साल 1.7 से 1.8 लाख मौतें होती हैं। मतलब हर दिन 485 मौतें और हर दिन 1,300 से ज्यादा दुर्घटनाएं। सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु दर के मामले में भारत विश्व में सबसे ऊपर है।
आगे क्या किया जा सकता है?
राहत की बात यह है कि अगर सरकार गंभीरता से काम करे तो बदलाव संभव है। सबसे पहले नेशनल रोड सेफ्टी अथॉरिटी को मजबूत करना होगा। तुरंत आधार पर एआई-बेस्ड ट्रैफिक सिस्टम को एकीकृत करना चाहिए ताकि लोगों की निगरानी हो सके।
मोटर व्हीकल एक्ट का सख्त अनुपालन बेहद जरूरी है। और सबसे महत्वपूर्ण—पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन चलाना होगा। लोगों को पता होना चाहिए कि ये कानून हैं, ये उनका हक है। तभी चीजें बदल सकती हैं।
देखते हैं कि यह ऐतिहासिक फैसला जमीन पर कितना असर दिखाता है। उम्मीद की किरण यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब सड़क सुरक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया है—अब इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मुख्य बातें (Key Points):
• सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित सड़कों को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा घोषित किया
• नवंबर 2025 के दो भीषण हादसों में 34 लोगों की मौत के बाद कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया
• हाईवे पर इललीगल पार्किंग, अतिक्रमण पर पूर्ण प्रतिबंध, 60 दिन में हटाना अनिवार्य
• हर 75 किमी पर एंबुलेंस, ब्लैक स्पॉट की पहचान 45 दिन में, डिस्ट्रिक्ट टास्क फोर्स बनेगी
• भारत में हर दिन 485 मौतें सड़क हादसों से, हर दिन 1,300 से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं













