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The News Air - Breaking News - RBI Rupee Crisis: ₹94 तक गिरा रुपया, जानिए पूरा एक्शन प्लान

RBI Rupee Crisis: ₹94 तक गिरा रुपया, जानिए पूरा एक्शन प्लान

मिडिल ईस्ट युद्ध से तेल 60% महंगा हुआ, RBI ने रुपये को बचाने के लिए $100 बिलियन फॉरेक्स रिज़र्व झोंके

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
बुधवार, 25 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, बिज़नेस
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RBI Rupee Crisis
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RBI Rupee Crisis भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में महज एक महीने के भीतर 60% की बेतहाशा बढ़ोतरी हो चुकी है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ा है, जो डॉलर के मुकाबले ₹93-94 के ऑल टाइम लो तक पहुंच गया है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने इस संकट से निपटने के लिए अपने फॉरेक्स रिज़र्व से करीब $100 बिलियन का इस्तेमाल करके रुपये को सहारा देने की कोशिश तेज कर दी है। 2025 में रुपये को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा का दर्जा मिल चुका था और अब 2026 में स्थिति और गंभीर होती दिख रही है।

मिडिल ईस्ट युद्ध ने कैसे बिगाड़ा भारत का आर्थिक समीकरण

मिडिल ईस्ट रीजन में चल रहे युद्ध ने ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया है। कई एनर्जी प्रोजेक्ट्स और संपत्तियों पर हमले हुए हैं, जिससे उत्पादन और वितरण दोनों ठप हो गए हैं। सीधे शब्दों में कहें तो शॉर्ट टर्म में सप्लाई चेन पूरी तरह से बाधित हो चुकी है।

इस पूरे संकट में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) की भूमिका सबसे अहम है। इस जलमार्ग से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल का कारोबार होता था, जो ग्लोबल एनर्जी ट्रेड का 33% हिस्सा था। इसमें से करीब 84% शिपमेंट एशियाई बाजारों की ओर जाती थी और भारत का बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयात इसी रीजन से आता है।

ईरान ने कहा है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले किसी भी जहाज को उसे पेमेंट करनी होगी। हालांकि सीजफायर की बातचीत शुरू हो चुकी है और ईरान को अपना तेल बेचने के लिए प्रतिबंधों (Sanctions) में 30 दिन की छूट भी दी जा रही है, लेकिन अनिश्चितता अभी भी बरकरार है।

85% से ज्यादा ऊर्जा आयात पर निर्भर है भारत

RBI Rupee Crisis की जड़ यही है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) के मामले में यह निर्भरता 85% से भी पार जा चुकी है, जबकि प्राकृतिक गैस (Natural Gas) में यह 50% से ज्यादा है।

जब इन दोनों चीजों की सप्लाई चेन बाधित होती है तो इसका असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगा तेल, महंगी गैस: इसका बोझ अंततः आम आदमी की जेब पर ही आता है। पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस तक, खाद से लेकर बिजली तक, सब कुछ महंगा होने की आशंका बन जाती है।

चेन रिएक्शन: तेल महंगा हुआ तो रुपया कैसे गिरा

इस पूरे संकट का भारत पर कैसे असर पड़ रहा है, इसे एक सरल चेन रिएक्शन से समझा जा सकता है। तेल की कीमतों में तेज उछाल आने से भारत का आयात बिल बढ़ता है। आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) और बढ़ जाता है, क्योंकि हम ज्यादा आयात कर रहे हैं और उसके लिए ज्यादा डॉलर चुका रहे हैं।

ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि कच्चे तेल में हर $10 की बढ़ोतरी से भारत के चालू खाता घाटे पर GDP का 0.3% से 0.4% तक का असर पड़ता है। जब आयात के लिए ज्यादा डॉलर की मांग बनती है और ग्लोबल स्तर पर भी सभी देश अपने आयात बिल के लिए ज्यादा डॉलर खरीद रहे होते हैं तो डॉलर मजबूत होता जाता है।

डॉलर एक सेफ हेवन (Safe Haven) के रूप में भी मजबूत हो रहा है, क्योंकि दुनियाभर के निवेशक अनिश्चितता के दौर में डॉलर में पैसा लगा रहे हैं। नतीजा: पहले $1 खरीदने के लिए ₹90 लगते थे, अब उसी एक डॉलर के लिए ₹93-94 तक चुकाने पड़ रहे हैं। अगर RBI इंटरवीन न करे तो यह गिरावट और तेज हो सकती है।

तीन बड़े खतरे: FPI आउटफ्लो, बॉन्ड यील्ड और महंगाई का दबाव

RBI Rupee Crisis के तीन बड़े खतरनाक संकेत सामने आ रहे हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय हैं।

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पहला खतरा: विदेशी निवेशकों का पलायन। FPI (Foreign Portfolio Investors) तेजी से भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। सिर्फ मार्च महीने में ₹88,000 करोड़ का कैपिटल फ्लाइट हो चुका है। विदेशी निवेशक अपने गवर्नमेंट बॉन्ड और इक्विटी मार्केट के इंस्ट्रूमेंट्स बेचकर पैसा भारत से बाहर ले जा रहे हैं और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स (US Treasury Bonds) जैसी सुरक्षित जगहों पर लगा रहे हैं, क्योंकि वहां यील्ड भी बढ़ रही है और डॉलर भी मजबूत हो रहा है।

दूसरा खतरा: बॉन्ड यील्ड में उछाल। भारत की 10 साल की गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड 6.8% तक पहुंच चुकी है। जब विदेशी निवेशक बॉन्ड बेच रहे हैं तो उनकी मांग कम हो रही है, कीमत गिर रही है और यील्ड बढ़ रही है। यही यील्ड उधारी की लागत (Cost of Borrowing) का इंडिकेटर बनती है, जो सरकार और कॉर्पोरेट दोनों के लिए चिंता का सबब है।

तीसरा खतरा: महंगाई का बढ़ता दबाव। चाहे तेल हो, खाद (Fertilizers) हो या इलेक्ट्रॉनिक्स: सभी चीजों का आयात बिल बढ़ रहा है। अगर महंगाई (Inflation) और बढ़ी तो RBI को अपना वह 125 बेसिस पॉइंट्स का रेपो रेट कट वापस लेना पड़ सकता है, जो पिछले एक साल में ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। रेपो रेट बढ़ने का मतलब होगा कि आम आदमी के होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन सब की EMI बढ़ जाएगी।

RBI का वॉर रूम: तीन बड़े हथियार और उनका इस्तेमाल

RBI Rupee Crisis से लड़ने के लिए RBI के पास तीन प्रमुख हथियार हैं: रुपये की वैल्यू को मैनेज करना, बैंकिंग लिक्विडिटी बनाए रखना और ब्याज दरों को नियंत्रित करना।

RBI ने अपने फॉरेक्स रिज़र्व से करीब $100 बिलियन का इस्तेमाल कर डॉलर-रुपी स्वॉप ऑक्शन (Dollar-Rupee Swap Auction) के जरिए बाजार में डॉलर बेचे हैं ताकि डॉलर की सप्लाई बनी रहे और रुपये पर दबाव कम हो। RBI का साफ कहना है कि वह इंटरवेंशन करता है, मैनिपुलेशन नहीं। यानी अगर आज डॉलर बेच रहा है तो बाद में वापस भी खरीद लेगा ताकि रुपये की वैल्यू में बदलाव अचानक न हो और एक स्मूथ तरीके से हो, जिससे आयातक और निर्यातक दोनों इस बदलाव के साथ तालमेल बिठा सकें।

खास बात यह है कि RBI की हालिया इंटरवेंशन लॉन्ग टर्म फॉरेक्स डेरिवेटिव्स में ज्यादा हुई है, जिनकी मैच्योरिटी एक साल या उससे ज्यादा की है। इसका सीधा मतलब है कि RBI मान रहा है कि रुपये की वैल्यू में ये बदलाव शॉर्ट टर्म नहीं बल्कि लंबे समय तक बने रहने वाले हैं।

इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि भारत का फॉरेक्स रिज़र्व गिरकर $709.76 बिलियन पर आ गया है।

2026 में पहली बार बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डेफिसिट

RBI Rupee Crisis का एक और गंभीर असर बैंकिंग सिस्टम पर दिखा है। जब RBI डॉलर बेचकर बाजार से रुपया वापस खरीदता है तो अर्थव्यवस्था में रुपये की सप्लाई कम हो जाती है। इसी वजह से 2026 में पहली बार भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डेफिसिट की स्थिति बनी है। यह एक बेहद चिंताजनक संकेत है।

इस समस्या से निपटने के लिए RBI ने ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) शुरू किए हैं, जिसमें वह गवर्नमेंट सिक्योरिटीज खरीदकर बाजार में पैसा वापस डाल रहा है ताकि लिक्विडिटी बनी रहे, क्रेडिट ग्रोथ प्रभावित न हो और अर्थव्यवस्था की ग्रोथ जारी रहे।

यही OMOs बॉन्ड यील्ड को भी कंट्रोल करने में मदद करते हैं। जब RBI बॉन्ड खरीदता है तो उनकी मांग बढ़ती है, कीमत ऊपर जाती है और यील्ड नीचे आती है। आने वाले समय में RBI और ऐसे OMOs कंडक्ट कर सकता है ताकि उधारी की बढ़ती लागत को काबू में रखा जा सके।

$700 बिलियन का फॉरेक्स रिज़र्व: कब तक टिकेगा यह सुरक्षा कवच

एक अहम सवाल यह है कि अगर मिडिल ईस्ट का युद्ध लंबे समय तक चला और ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित रही तो RBI कब तक अपने फॉरेक्स रिज़र्व का इस्तेमाल कर पाएगा? $700 बिलियन का रिज़र्व भले ही बड़ी रकम लगती है, लेकिन कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह $1 ट्रिलियन होता तो कहीं बेहतर कुशन मिलता।

RBI का यह शॉर्ट टर्म मॉनिटरी शील्ड फिलहाल काम कर रहा है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। आयात के लिए भी डॉलर चाहिए और रुपये की रक्षा के लिए भी: दोनों मोर्चों पर एक साथ लड़ना सीमित समय तक ही संभव है।

सरकार का बड़ा कदम: ₹1 लाख करोड़ का Economic Stabilization Fund

RBI की मॉनिटरी शील्ड के साथ-साथ सरकार ने भी फिस्कल शील्ड (Fiscal Shield) का बड़ा कदम उठाया है। हाल ही में संसद में Economic Stabilization Fund का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत ₹1 लाख करोड़ का फंड बनाया जा रहा है।

इस फंड का मकसद अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए काउंटर-साइक्लिकल निवेश करना है। साथ ही महंगाई के बढ़ते दबाव को इस फंड के जरिए ऑफसेट करना है ताकि आम उपभोक्ता पर कम से कम बोझ पड़े। यह एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इसकी असली परीक्षा तब होगी जब इसे जमीन पर लागू किया जाएगा।

असली इलाज: फायर फाइटिंग नहीं, फायर प्रूफिंग चाहिए

यह पहली बार नहीं है जब ऊर्जा संकट ने भारतीय अर्थव्यवस्था को हिलाया हो। ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस से लेकर टेपर टेंट्रम तक, हर बार जब भी ऐसा संकट आया है तो RBI को अपने फॉरेक्स रिज़र्व का सहारा लेना पड़ा है। यह प्रक्रिया न तो टिकाऊ है और न ही लंबे समय में कारगर।

असली समाधान ऊर्जा ट्रांजिशन (Energy Transition) में छिपा है। भारत को जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता तेजी से कम करके नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) की ओर बढ़ना होगा। हालांकि भारत की नॉन-फॉसिल फ्यूल आधारित स्थापित क्षमता करीब 50% तक पहुंच चुकी है, लेकिन असली तस्वीर यह है कि बिजली उत्पादन का 70-75% हिस्सा अभी भी कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधन से आता है।

परमाणु ऊर्जा के लिए शांति विधेयक लाया गया है और 2047 के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए गए हैं। भारत के पास थोरियम (Thorium) के विशाल भंडार हैं और अंडमान रीजन में कच्चे तेल की मौजूदगी भी है। अब समय आ गया है कि इन प्राकृतिक संसाधनों का गहन दोहन शुरू किया जाए और जरूरत पड़ने पर विदेशी तकनीक के लिए साझेदारी की जाए।

RBI की भूमिका: ग्रीन फाइनेंस और रिन्यूएबल एनर्जी में पूंजी प्रवाह

RBI Rupee Crisis के इस दौर में RBI सिर्फ अल्पकालिक संकट प्रबंधन तक सीमित नहीं रह सकता। लंबे समय में RBI को ऊर्जा ट्रांजिशन में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स को प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग में पहले ही शामिल किया गया है, लेकिन अब इनके लिए रियायती ऋण (Concessional Lending) का विस्तार जरूरी है।

जिस तरह कभी ग्रामीण क्षेत्रों में क्रेडिट पहुंचाने के लिए कम ब्याज दर पर ऋण दिए गए थे, ठीक उसी तरह अब रिन्यूएबल एनर्जी और एनर्जी ट्रांजिशन प्रोजेक्ट्स के लिए भी कम लागत पर पूंजी उपलब्ध करानी होगी। ग्रीन डिपॉजिट्स को बढ़ावा देना, सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स को और पुश करना और ट्रांसपैरेंट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाना: ये सब कदम अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं।

आम आदमी को क्यों करनी चाहिए चिंता

RBI Rupee Crisis का सबसे सीधा असर आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। रुपया कमजोर होने से पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस सब महंगे होंगे। आयातित सामान: चाहे मोबाइल हो, लैपटॉप हो या दवाइयां, सबके दाम बढ़ सकते हैं। अगर RBI को महंगाई रोकने के लिए रेपो रेट बढ़ाना पड़ा तो हर तरह के लोन की EMI भी बढ़ जाएगी, जिसका बोझ मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ेगा।


मुख्य बातें (Key Points)
  • रुपया ₹93-94 के ऑल टाइम लो पर: मिडिल ईस्ट युद्ध से तेल की कीमतों में एक महीने में 60% की बढ़ोतरी हुई; भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता 85% से ज्यादा होने से चालू खाता घाटा बढ़ा।
  • RBI ने करीब $100 बिलियन फॉरेक्स रिज़र्व इस्तेमाल किया: डॉलर-रुपी स्वॉप ऑक्शन और OMOs के जरिए रुपये को सहारा दिया; फॉरेक्स रिज़र्व गिरकर $709.76 बिलियन पर आया।
  • मार्च में ₹88,000 करोड़ का FPI आउटफ्लो: 10 साल की बॉन्ड यील्ड 6.8% पहुंची; 2026 में पहली बार बैंकिंग लिक्विडिटी डेफिसिट बना।
  • सरकार ने ₹1 लाख करोड़ का Economic Stabilization Fund प्रस्तावित किया: लॉन्ग टर्म में ऊर्जा ट्रांजिशन, रिन्यूएबल एनर्जी और न्यूक्लियर एनर्जी पर फोकस जरूरी।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: रुपया ₹94 तक क्यों गिर गया?

मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ा है। ज्यादा डॉलर की मांग बनने, FPI आउटफ्लो और ग्लोबल अनिश्चितता के कारण डॉलर मजबूत हुआ और रुपया ₹93-94 के ऑल टाइम लो तक गिर गया।

Q2: RBI रुपये को बचाने के लिए क्या कर रहा है?

RBI डॉलर-रुपी स्वॉप ऑक्शन के जरिए बाजार में डॉलर बेच रहा है, ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) से बैंकिंग लिक्विडिटी बनाए रख रहा है और बॉन्ड खरीदकर यील्ड को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है। अब तक करीब $100 बिलियन फॉरेक्स रिज़र्व का इस्तेमाल किया जा चुका है।

Q3: भारत का फॉरेक्स रिज़र्व कितना है और क्या यह पर्याप्त है?

भारत का फॉरेक्स रिज़र्व वर्तमान में $709.76 बिलियन है। शॉर्ट टर्म के लिए यह पर्याप्त है, लेकिन अगर मिडिल ईस्ट का युद्ध लंबा खिंचा तो चुनौतियां बढ़ सकती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि $1 ट्रिलियन का रिज़र्व बेहतर सुरक्षा देता।

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अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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