PSEB Question Bank Controversy: शिक्षा के क्षेत्र में समानता का अधिकार एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया है। पंजाब में दो गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर करके नेत्रहीण (Visually Impaired) विद्यार्थियों के साथ हो रहे शैक्षणिक भेदभाव को चुनौती दी है। ‘सक्षम पंजाब’ और ‘उड़ान एम्पावरमेंट ट्रस्ट (रेडियो उड़ान)’ ने पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) द्वारा लागू किए गए ‘प्रश्न बैंक आधारित सिलेबस’ सिस्टम को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए इसे तुरंत बंद करने की मांग की है।
देखा जाए तो यह केवल एक शैक्षणिक नीति का मामला नहीं है, बल्कि दिव्यांग छात्रों के मौलिक अधिकारों और गरिमा का सवाल है। याचिका में कहा गया है कि नेत्रहीण छात्रों को केवल उनकी शारीरिक अक्षमता के आधार पर कम सिलेबस पढ़ाना और परीक्षा देना उनके साथ खुला भेदभाव है।
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कौन हैं याचिकाकर्ता और क्या है मांग
सक्षम पंजाब की जनरल सेक्रेटरी दीपिका सूद और उड़ान एम्पावरमेंट ट्रस्ट की ट्रस्टी ज्योति मलिक ने एडवोकेट अभिजीत सिंह रावेले के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि वे पंजाब राज्य में नेत्रहीण विद्यार्थियों को आम विद्यार्थियों के बराबर समावेशी (Inclusive) और बराबरी की शिक्षा प्रदान करने के गंभीर संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का मुद्दा उठा रहे हैं।
अगर गौर करें तो यह NGOs केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे पंजाब में नेत्रहीण छात्रों की आवाज बनकर सामने आई हैं। उनका कहना है कि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) द्वारा नौवीं से बारहवीं कक्षा के नेत्रहीण विद्यार्थियों पर थोपी गई यह प्रश्न बैंक आधारित परीक्षा प्रणाली पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण है।
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क्या है Question Bank System और क्यों है विवादित
इस प्रणाली के तहत नेत्रहीण विद्यार्थियों को दूसरे विद्यार्थियों की तरह पूरा सिलेबस नहीं पढ़ाया जाता और न ही उस पर परीक्षा ली जाती है। बल्कि उन्हें सिर्फ चुनिंदा हिस्सों वाले एक सीमित “प्रश्न बैंक” सिलेबस तक ही सीमित (रोक) कर दिया जाता है।
समझने वाली बात यह है कि यह सिस्टम मानता है कि नेत्रहीण छात्र पूरा सिलेबस नहीं पढ़ सकते। लेकिन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह धारणा ही गलत है। दृष्टिहीनता का बच्चे की बौद्धिक या मानसिक योग्यता से कोई लेना-देना नहीं होता।
दिलचस्प बात यह है कि पूरे भारत में CBSE, ICSE और कई राज्यों के शिक्षा बोर्डों के तहत नेत्रहीण विद्यार्थी पूरा सिलेबस पढ़ते हैं और UPSC, SSC, बैंकिंग और राज्य सिविल सेवाओं जैसी उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलतापूर्वक मुकाबला करते हैं। फिर PSEB क्यों नेत्रहीण छात्रों को कम सिलेबस पर सीमित करना चाहता है?
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नेत्रहीण छात्रों को अकादमिक रूप से कमजोर बनाने की साजिश
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस प्रणाली का प्रभाव यह हो रहा है कि सिर्फ दिव्यांगता के आधार पर नेत्रहीण विद्यार्थियों को अकादमिक तौर पर अलग और कमजोर किया जा रहा है। जबकि देखने की असमर्थता का बच्चे की बौद्धिक या मानसिक योग्यता से कोई संबंध नहीं होता।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह प्रणाली नेत्रहीन छात्रों के भविष्य पर सीधा प्रहार करती है। अगर उन्हें पूरा सिलेबस नहीं पढ़ाया जाएगा तो आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं में वे कैसे टिक पाएंगे? उनका ज्ञान और कौशल कैसे विकसित होगा?
सुविधाएं दें, सिलेबस कम नहीं करें
याचिका में सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया है कि अगर नेत्रहीण विद्यार्थियों को डिजिटल किताबें, स्क्रीन-रीडर सॉफ्टवेयर, लिखने के लिए सहायक (Scribes), अतिरिक्त समय और सुविधाजनक परीक्षा फॉर्मेट जैसी जायज सुविधाएं दी जाएं, तो वे मुख्यधारा का पूरा सिलेबस पढ़ने के पूरी तरह सक्षम हैं।
अगर गौर करें तो यह तर्क बिल्कुल वैज्ञानिक और न्यायसंगत है। नेत्रहीन छात्रों को समस्या सिलेबस से नहीं, बल्कि पहुंच (accessibility) से है। अगर उन्हें सही तकनीक और सहायता मिले तो वे किसी से कम नहीं।
आज के डिजिटल युग में स्क्रीन-रीडर, ब्रेल डिस्प्ले, ऑडियो बुक्स और अन्य सहायक तकनीकें आसानी से उपलब्ध हैं। CBSE और अन्य बोर्ड ये सुविधाएं प्रदान करते हैं। फिर PSEB क्यों पीछे है?
2017 से लागू है यह विवादित प्रणाली
याचिका में बताया गया है कि यह विवादित प्रणाली PSEB द्वारा 30 अक्टूबर 2017 और 13 दिसंबर 2017 को जारी किए गए नोटिफिकेशन से शुरू हुई थी। इस नोटिफिकेशन के तहत पहले सुनने से असमर्थ (Hearing Impaired) बच्चों के लिए लागू “प्रश्न बैंक” की सुविधा को नेत्रहीन और मानसिक तौर पर कमजोर बच्चों पर भी लागू कर दिया गया था।
समझने वाली बात यह है कि बोर्ड ने बिना सोचे-समझे विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं को एक ही ‘दिव्यांग (DA)’ श्रेणी में इकट्ठा कर दिया और सभी पर एक जैसा घटाया हुआ सिलेबस लागू कर दिया। यह संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां नेत्रहीन विद्यार्थियों को पूरा सिलेबस पढ़ने के लिए सिर्फ तकनीकी सुविधाओं (Accessibility Accommodations) की जरूरत होती है, वहीं मानसिक तौर पर कमजोर बच्चों के लिए सिलेबस में बदलाव की जरूरत बिल्कुल अलग प्रकार की होती है। दोनों को एक ही श्रेणी में रखना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है।
RPWD Act 2016 का उल्लंघन
याचिका में कहा गया है कि इस तरह बोर्ड ‘दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016’ (RPWD Act 2016) के तहत दिव्यांगता के अनुकूल आवश्यक सुविधाएं देने में विफल रहा है। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि दिव्यांग छात्रों को समावेशी शिक्षा का अधिकार है और उन्हें उनकी विशेष जरूरतों के अनुसार सुविधाएं (Reasonable Accommodations) प्रदान की जानी चाहिए।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि RPWD Act 2016 एक केंद्रीय कानून है और सभी राज्यों को इसका पालन करना अनिवार्य है। लेकिन PSEB की यह नीति सीधे तौर पर इस कानून का उल्लंघन करती है।
संवैधानिक अधिकारों का हनन
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि यह प्रणाली भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
संविधान हर नागरिक को समान अवसर की गारंटी देता है। लेकिन PSEB की यह नीति नेत्रहीन छात्रों को केवल उनकी शारीरिक अक्षमता के आधार पर शिक्षा के समान अवसर से वंचित कर रही है।
अगर गौर करें तो यह एक गंभीर संवैधानिक मुद्दा है। अदालत को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।
पूरे देश में नेत्रहीन छात्र पूरा सिलेबस पढ़ते हैं
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पूरे भारत में CBSE, ICSE और कई राज्यों के शिक्षा बोर्डों के तहत नेत्रहीन विद्यार्थी पूरा सिलेबस पढ़ते हैं। वे UPSC, SSC, बैंकिंग और राज्य सिविल सेवाओं जैसी उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलतापूर्वक मुकाबला करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि देश में कई IAS, IPS और अन्य उच्च पदों पर नेत्रहीन अधिकारी सेवारत हैं। उन्होंने पूरा सिलेबस पढ़कर और कठिन परीक्षाएं पास करके यह मुकाम हासिल किया है।
तो फिर PSEB क्यों मानता है कि नेत्रहीन छात्र पूरा सिलेबस नहीं पढ़ सकते? यह सोच ही भेदभावपूर्ण है।
छात्रों के भविष्य पर सीधा प्रहार
समझने वाली बात यह है कि सीमित सिलेबस पढ़ने वाले छात्र जब आगे उच्च शिक्षा या प्रतियोगी परीक्षाओं में जाएंगे तो उन्हें गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। उनके ज्ञान में बड़े गैप होंगे, जो उनके करियर को प्रभावित करेंगे।
यह सिस्टम वास्तव में नेत्रहीन छात्रों को पहले ही हीनता और असमर्थता का अहसास करा देता है। यह उनके आत्मविश्वास को तोड़ता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग कर देता है।
याचिकाकर्ताओं की मांगें
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि:
- PSEB के 30 अक्टूबर 2017 और 13 दिसंबर 2017 के नोटिफिकेशन को रद्द किया जाए
- पूरे पंजाब में बोर्ड से संबंधित स्कूलों में पढ़ने वाले नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए तुरंत प्रभाव से पूरा सिलेबस लागू किया जाए
- नेत्रहीन छात्रों को उनकी जरूरत के अनुसार तकनीकी और अन्य सहायता (डिजिटल किताबें, स्क्रीन-रीडर, स्क्राइब, अतिरिक्त समय आदि) प्रदान की जाए
- समावेशी शिक्षा की संवैधानिक गारंटी को सुनिश्चित किया जाए
शिक्षा विभाग को आईना दिखाती याचिका
देखा जाए तो यह याचिका केवल PSEB को नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र को आईना दिखाती है। यह सवाल उठाती है कि क्या हम दिव्यांग छात्रों को वास्तव में समान अवसर दे रहे हैं या केवल कागजों पर?
21वीं सदी में जब तकनीक ने दिव्यांग लोगों के लिए इतनी संभावनाएं खोल दी हैं, तब भी अगर हम उन्हें पुरानी सोच के आधार पर सीमित करते रहेंगे तो यह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि दिव्यांग छात्र हमारी दया के पात्र नहीं, बल्कि बराबरी के अधिकार के हकदार हैं। उन्हें रियायत की नहीं, बल्कि सुविधाओं की जरूरत है।
समावेशी शिक्षा की दिशा में एक अहम कदम
यह याचिका समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर अदालत इस मामले में सकारात्मक निर्णय देती है तो यह न केवल पंजाब बल्कि पूरे देश में दिव्यांग छात्रों के शैक्षिक अधिकारों को मजबूत करेगा।
अगर गौर करें तो यह मामला एक मिसाल बन सकता है। अन्य राज्यों में भी अगर ऐसी भेदभावपूर्ण नीतियां हैं तो उन्हें चुनौती दी जा सकेगी।
हाईकोर्ट अब इस याचिका पर सुनवाई करेगा और PSEB से जवाब मांगेगा। देखना होगा कि बोर्ड इस गंभीर आरोपों का क्या जवाब देता है।
मुख्य बातें (Key Points)
• ‘सक्षम पंजाब’ और ‘उड़ान एम्पावरमेंट ट्रस्ट’ ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में PIL दायर की
• PSEB के Question Bank System को नेत्रहीन छात्रों के साथ भेदभाव करार देते हुए चुनौती दी
• नौवीं से बारहवीं कक्षा के नेत्रहीन छात्रों को पूरा सिलेबस नहीं, बल्कि सीमित प्रश्न बैंक सिलेबस पढ़ाया जाता है
• याचिका में कहा गया कि दृष्टिहीनता का बौद्धिक क्षमता से कोई संबंध नहीं, सिर्फ तकनीकी सुविधाओं की जरूरत है
• RPWD Act 2016 और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए नोटिफिकेशन रद्द करने की मांग
• CBSE, ICSE और अन्य बोर्डों में नेत्रहीन छात्र पूरा सिलेबस पढ़ते हैं और उच्च स्तरीय परीक्षाओं में सफल होते हैं
• बोर्ड ने 2017 में विभिन्न दिव्यांगताओं को एक श्रेणी में डालकर सभी पर घटाया सिलेबस लागू किया











