आंदोलन से आंकड़ें तक सिमटी राजनीति, राजनीति डाटा डाटा हो गई

लेखक- पंडित संदीप– मोबाइलीकरण के युग में राजनीति का डाटाकरण हो जाना आश्चर्य नहीं कौतुहल पैदा करता है। कैसे होंगे वो लोग जो शब्दों से राजनीति का समीकरण सजाते, सँवारते, बनाते, बिगाड़ते होंगे। वो नेता भी इसी देश की माटी में जन्मे जो मुद्दों को उछाल जनता का मन टटोल दिल जीत लेते थे। वो नेता जो समय की नियति को पहचान नीति का सृजन कर समाज को जोड़ आंदोलन खड़ा कर राजनीति की धुरी बन समाज का वरदान बनते होंगे।
कितना साहस, शौर्य, सम्मान समाया होगा उनके शब्दों के तरकश में कि जनता उन्हें नेता से नायक मान साथ चल पड़ती होगी। नमक आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, सत्याग्रह आंदोलन तो याद ही होगा। मंगल पांडे का ‘प्राण आहुति आंदोलन’ लक्ष्मीबाई का ‘सर्वस्व समर्पण आंदोलन’ चंद्रशेखर आजाद का आखिरी साँस तक ‘आजाद आंदोलन’ शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव का ‘फाँसी आंदोलन’ ये नेता किस माटी के बने होंगे जिन्होंने आंदोलन को वरदान बना असंभव को संभव करने की राह पर मतवालों की टोली चला दी जो न गोली से डरे, न बम से हटे, न फाँसी के फंदे से घबराए और जो न काला पानी में जीवन काला कर पछताए ही। क्या संवाद रहा होगा पंडित नेहरू का, क्या बोलती थी इंदिरा, क्या बोलते थे सरल अटल, क्या गरजते रहे आडवाणी, क्या बोलकर बहुजन को सत्ता का शीर्ष दे गए मान्यवर कांशीराम। याद है इस पीढ़ी के आखिरी शानदार वक्ता की शैली जो मजाक-मजाक में सिंहासन उखाड़ आंदोलन का वृक्ष बना देता है। लालू प्रसाद यादव का संवाद स्वाद ही नहीं साहब साहस, समायोजन, संगठन, सृजन की मिसाल भी माना जाता है।
अब आधुनिक नेता मंच नहीं मोबाइल की तलाश में भटकते, अटकते, घूमते, झूलते नजर आ रहे हैं। इस राजनीतिक परिवर्तन का कारण नेताओं की नीति है, समय का अभाव, संवादहीनता या फिर समाज में नेताओं के प्रति नफरत का अंकुर है समझना होगा, जिसके कारण जनता के दिलों में नेता अब मोबाइल की खिड़की से उतरने को मजबूर हैं। मोबाइल का झरोखा आज की राजनीति का द्वार बन गया है। कौन दल, कौन नेता कितनों के मोबाइल में झांक अपनी बंद कमरे की रिकॉर्डिंग खोल सकता है आज की राजनीति बस मोबाइल के कुछ बटन तक ही सीमित हो सेव, सिरक्यूलेट, डिलीट से पहले वायरल होती घुटती, मरती, बिखरती मालूम होती है। कर लो दुनिया मुट्ठी में का नारा दे मोबाइल मानव को तन्हा कर गया इसी लुत्फे तन्हाई में नेतागिरी की अंगड़ाई आंकड़ों की तलाश में फड़फड़ाती लाचार खड़ी है। रणवीर, भाषणवीर, संवादवीर, रणनीतिकार की जगह राजनीति में ‘डाटावीर’ का उदय हुआ है। अब जिसके पास जितना ज्यादा डाटा वह उतना बड़ा नेता, डाटा-डाटा खेलते और दल बल सहित आंकड़ों की पकड़ को मजबूत बनाते कार्यकर्ताओं की टोली को जाने-अनजाने मजबूर बना रहे हैं।
डाटा वीरों की फौज से तरह-तरह के डाटा संकलित करा सृजित करना राजनीति का जैविक युद्ध बन गया है। इन आंकड़ों की बाजीगरी के युग में हुनरमंद रणनीतिकारों को कुचल नेता के बगल में बैठे डाटा किंग हुक्मरान की तरह ‘देख तमाशा डाटा का’ खेल खिला मन मोह रहे हैं। नेताओ को डाटानगरी की सैर करा सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाने में जुटे नए डाटा जनक से राजनीति का कोना कोना अटा पड़ा है। जिसके कारण चौराहे की चर्चा, चाय की चुस्की की रौनक, मंच की महिमा, संवाद की गरिमा, बातों के तीर, मुद्दों की मुनादी मोबाइल शरणम गच्छामि हो चित्कार कर रही है। इस महाडाटेश्वर युग में सत्ता जाति धर्म के आंकड़ें तक ही नहीं वरन स्वाद, पहनावा, पसंद ,परिवार की निजता और उस निजता की निजता को भी नोचने बेचने को बेचैन है। इस संवादहीन राजनीति की नीति ठंडा मतलब कोका कोला जैसे एक बोतल में समा गई है। जहाँ डाटा ही मंत्र, डाटा ही यंत्र, डाटा ही तंत्र बन सब डाटामय हो गया है। सामाजीकरण, सामाजिक संवाद, सामाजिक न्याय को पीठ दिखा आंकड़ों के अकड़ में अकड़ी राजनीति की गति आंदोलन की गति से निकल एक डाटा बक्सा बन सिमट गई है।
इंतजार उस दिन का है जब फिर राजनीति पुरोधाओं की परिधि में आएगी, जनता सड़कों पर उतरेगी, नेता संवाद करेंगे, संसद, विधानसभा डाटा वीरों से नहीं जनवीरों से आबाद होगी। ये इंतजार लंबा हो सकता है पर पूरा जरूर होगा, जब डाटा के माया जाल से निकल जनता के बीच खड़े होंगे नेता, जन-जन तक पहुँच जनन्याय की भूमिका से जननायक की भूमिका में आएंगे फिलहाल दौर-ए-डाटा है और सब को डाटा भाता है।

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