“भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस की असली चुनौती शुरू होगी”

‘भारत जोड़ो यात्रा’ कितनी सफल होगी यह 2024 लोक सभा चुनाव परिणाम से ही तय हो सकेगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस के वोटरों और कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद जगी है। इसलिए यह यात्रा असफल नहीं होगी बशर्ते यह जोश और उत्साह आगे भी बना रहे।

30 जनवरी को भारत जोड़ो यात्रा श्रीनगर में ध्वजारोहण के साथ खत्म हो जाएगी। अब कश्मीर से वापस दिल्ली आने के बाद राहुल गांधी क्या करेंगे और कांग्रेस की रणनीति क्या रहेगी, सारा खेल इसी पर निर्भर करेगा।

2024 लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस के लिए परिस्थितियां काफी चुनौती भरा रहने वाली है। इन चुनौतियों को पार करने के बाद ही 2024 का रास्ता कुछ आसान बनेगा। पहली चुनौती है – राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बड़ा फेरबदल कर संगठन को मजबूत बनाने की क्योंकि सिर्फ मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने से 2024 की राह आसान नहीं होने वाली। कांग्रेस को भाजपा की तरह बूथ स्तर पर अपने संगठन को मजबूत करना होगा।

फिर यह तय करना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी कि 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले किसे आगे किया जाए। मेरे हिसाब से कांग्रेस को कोई व्यक्ति के बदले भाजपा बनाम कांग्रेस पार्टी के बीच मुकाबला कराने वाली रणनीति पर काम करना चाहिए। वास्तविकता भी है कि भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी की छवि काफी बेहतर हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से राहुल का सीधा मुकाबला कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

दरअसल भाजपा अभी भी यही चाहती है कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को ही आगे करे ताकि वह परिवारवाद और पप्पू के अपने पुराने नैरेटिव को केंद्र में रखकर चुनाव के दौरान कांग्रेस के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सके।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का हालिया बयान मुझे अच्छा लगा। उन्होंने कहा कि ‘भारत जोड़ो यात्रा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए नहीं है। अब गांधी परिवार के कुछ चाटुकार नेताओं को यह बात समझाना होगा, जो चाटुकारिता के चक्कर में बार-बार राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बताते रहते हैं।

कांग्रेस के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण काम है – प्रादेशिक नेताओं के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई को खत्म कर इकट्ठे होकर चुनाव लड़ना। यह 2023 में नौ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इनमें से छह राज्य छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है।

मिजोरम में पिछले चुनाव में कांग्रेस को करीब 30 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं मेघालय में 28.5 प्रतिशत वोट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन सरकार नहीं बना सकी थी। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो कांग्रेस की सरकार है, लेकिन दोनों ही राज्यों में आपसी गुटबाजी चरम पर है।

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंहदेव के बीच 2018 में सरकार बनने के बाद से ही विवाद चल रहा है। चुनाव के बाद तय हुआ कि दोनों ढ़ाई-ढ़ाई साल बाद सीएम रहेंगे, लेकिन ढाई साल बाद भी आलाकमान ने भूपेश बघेल को ही मौका दे दिया। अब चुनाव के समय अगर वह इधर-उधर होते हैं तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा।

राजस्थान में तो पिछले दो साल से लगातार राजनितिक ड्रामा चल रहा है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की तनातनी रोज चर्चा में रहती है। चुनाव तक अगर ऐसा ही चलता रहा तो कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल सकती है।

कर्नाटक में भारत जोड़ों यात्रा के दौरान तो प्रदेश के नेता एक साथ दिखे लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच आपसी खींचतान काफी लंबे समय से चल रहा है। चुनावी विश्लेषकों के अनुसार अगर कर्नाटक में कांग्रेस सही ढंग से चुनाव लड़े तो जीत सकती है क्योंकि यहां बीजेपी में भी आपसी लड़ाई काफी ज्यादा है। बीएस येदुरप्पा मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से काफी नाराज चल रहे हैं। उनकी नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी कर्नाटक से ही आते हैं। इसलिए कर्नाटक कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है।

मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार से लोग काफी नाराज हैं, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा उठाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों वाली करीब 25 सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी, जो 2020 में कांग्रेस छोड़कर सिंधिया के साथ भाजपा में चले गए थे।

निष्कर्ष – छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में लोकसभा की कुल 93 सीटें हैं। कर्नाटक में तीन-चार सीट जेडीएस वाली छोड़कर करीब 90 सीटों पर कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है। 2019 में भाजपा इनमें से 87 सीटों पर जीत हासिल की थी। अगर यहां पर कांग्रेस भाजपा को आधे पर भी रोक देती है तो भाजपा सांसदों की संख्या 302 से घटकर 258 हो जाएगी, जो पूर्ण बहुमत से 14 कम है। इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी भाजपा की सीट कम हो सकती है।

अमरजीत झा, रिसर्च स्कॉलर, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला

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ईमेल – amarjeetjha04in@gmail.com

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