पंजाब कांग्रेस की पिक्चर अभी बाकी है, टिकट बंटवारे को लेकर मचेगा घमासान


चंडीगढ़, 24 जुलाई (The News Air)

पंजाब में कई माह चली जोर आजमाइश के बाद आखिरकार कांग्रेस मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू एक मंच पर लाने में सफल रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व की चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। क्योंकि,अभी चुनाव से संबंधित कई अहम समितियों के साथ प्रदेश के नए प्रभारी की नियुक्ति होनी है।

नवजोत सिंह सिद्धू के अध्यक्ष के तौर पर जिम्मेदारी संभालने के कार्यक्रम में कैप्टन अमरिंदर सिंह शामिल हुए। दोनों नेताओं ने एक साथ तस्वीर भी खिंचवाई। पर, दोनों नेताओं की बीच तल्खी बरकार रही। इससे साफ है कि पार्टी नेतृत्व का इम्तिहान अभी बाकी है। क्योंकि, कई समितियों के साथ नए प्रभारी की नियुक्ति होनी है।

पंजाब के प्रभारी हरीश रावत को पार्टी ने उत्तराखंड चुनाव में अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है। रावत उत्तराखंड चुनाव में पार्टी का चेहरा होंगे। पंजाब और उत्तराखंड दोनों राज्यों में एक साथ चुनाव है। ऐसे में रावत को पंजाब के प्रभारी की जिम्मेदारी छोड़नी होगी। यहीं से पार्टी नेतृत्व की मुश्किल शुरू होगी, क्योंकि नए प्रभारी की नियुक्ति में कैप्टन और सिद्धू दोनों की राय अहम होगी। दोनों को एक नाम पर सहमत करना आसान नहीं है।

इसके साथ विधानसभा चुनाव के लिए कई समितियों का भी गठन किया जाना है। इसमें सबसे अहम अभियान और घोषणा पत्र समिति है। पार्टी कैप्टन के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। इसलिए वही अभियान समिति के अध्यक्ष होंगे। कैप्टन और सिद्धू के बीच विवाद में एक बड़ा मुद्दा चुनावी वादों को पूरा नहीं करना है। इसको लेकर सिद्धू सार्वजनिक तौर पर कैप्टन पर निशाना साधते रहे हैं।

ऐसे में घोषणा पत्र समिति की भूमिका अहम हो जाती है। पार्टी नेतृत्व को दोनों पक्षों के बीच तालमेल बनाते हुए नई समितियों का गठन करना होगा। पंजाब कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि चुनाव नजदीक है, ऐसे में पार्टी को बहुत सोच समझकर निर्णय करने होंगे। पार्टी को लगातार यह संदेश देना होगा कि कांग्रेस एकजुट है।

टिकट वितरण को लेकर होगा घमासान- दिल्ली में राहुल गांधी कह रहे हैं कि पंजाब कांग्रेस में अब सब अच्छा है, लेकिन इस दावे की परीक्षा जल्द ही टिकट वितरण के समय होगी. क्योंकि अगर कांग्रेस जीत दर्ज़ करती है, तो अगला सीएम कौन होगा, यह सवाल अभी तक अटका हुआ है. कैप्टन की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सिद्धू को राज्य का पार्टी प्रमुख बनाना और सार्वजनिक माफ़ी के बाद मुलाक़ात के दावे के बावज़ूद सीएम को सिद्धू से मिलने पर मजबूर करना, यह दिखाता है कि सीएम पद के लिए 79 साल के कैप्टन से सिद्धू कई पायदान आगे खड़े हैं. सिद्धू के पहले भाषण से यह अनुमान भी लगाए जा रहे हैं कि उनका चुनाव प्रचार उन वादों के इर्द-गिर्द रहेगा, जिन्हें कैप्टन पूरा नहीं कर सके.

हालांकि, कई सियासी ज़ंगों के गवाह रहे कैप्टन भी इतने जल्दी हथियार डालने वाले नहीं हैं. उनका खेमा जानता है कि अगला सीएम कौन होगा, यह केवल हाईकमान ही नहीं बल्कि चुनाव के बाद विधायकों का बहुमत हासिल करने पर भी निर्भर होगा. इस बात को सिद्धू भी जानते हैं और उन्हें शायद हाईकमान का समर्थन भी हासिल है. ऐसे में वे सीएम पद पर दावेदारी पेश करने के लिए अपने समर्थकों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा टिकट हासिल करना चाहेंगे. पार्टी प्रमुख के तौर पर टिकट वितरण में सिद्धू की बात सुनी जाएगी, लेकिन कैप्टन की भूमिका भी इस प्रक्रिया में अहम होगी.


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