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The News Air - Breaking News - बड़ा झटका: Petrol-Diesel ₹3 महंगा, क्या महंगाई से निपटने को तैयार है देश

बड़ा झटका: Petrol-Diesel ₹3 महंगा, क्या महंगाई से निपटने को तैयार है देश

चुनाव के बाद ईंधन दामों में बढ़ोतरी, 2022 जैसी स्थिति की आशंका, विशेषज्ञ बता रहे ₹10 तक की और वृद्धि संभव

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
शुक्रवार, 15 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस, राष्ट्रीय
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Petrol-Diesel
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Petrol Diesel Price Hike 2026 की खबर ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। 15 मई 2026 की सुबह से पेट्रोल-डीजल के दाम ₹3 और सीएनजी के दाम ₹2 बढ़ गए हैं। देखा जाए तो यह बढ़ोतरी कोई अचानक नहीं है – 2022 में भी चुनाव खत्म होते ही ऐसा ही हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि 15 मई से पहले दिल्ली में नॉर्मल पेट्रोल करीब ₹95 प्रति लीटर था, जो अब और महंगा हो गया है।

कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि इस बढ़ोतरी के कारण इस साल महंगाई 6% तक जा सकती है। अगर गौर करें तो यह स्थिति अरबपतियों को छोड़कर सभी के लिए खतरे की घंटी है। समझने वाली बात यह है कि जब ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी में पेट्रोल के दाम घटाए गए, तब भारत में दाम बढ़ाए जा रहे हैं।

शेयर बाजार में गिरावट: निवेशकों को क्यों नहीं भाया फैसला

15 मई को दाम बढ़ाने के बाद BPCL, HPCL और IOC (Indian Oil Corporation) सबके शेयर पौने 2% से लेकर पौने 5% तक गिर गए। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर यह कदम सही होता तो शेयर बाजार इसे सकारात्मक रूप से लेता।

क्या निवेशकों को उम्मीद थी कि दाम और ज्यादा बढ़ाए जाएंगे? या फिर यह संकेत है कि यह बढ़ोतरी तेल कंपनियों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है?

2022 की याद: 137 दिन रुके दाम, फिर 9 दिनों में 8 बार बढ़ोतरी

2022 में बिल्कुल ऐसा ही हुआ था। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में चुनाव अभियान चल रहे थे और 137 दिनों तक कोई दाम नहीं बढ़ा। जबकि उस समय भी यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल का भाव बढ़ने लगा था।

चुनाव खत्म होते ही कई दिनों तक पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जाने लगे। एक झटके में नहीं बल्कि दो हफ्ते तक रुक-रुक कर दाम बढ़ाए गए। 9 दिनों में लगातार आठ बार दाम बढ़ गए। एक हफ्ते में दाम ₹5.50 से ज्यादा बढ़े और दो हफ्ते के भीतर पेट्रोल-डीजल करीब ₹9 से लेकर ₹12 प्रति लीटर महंगा हो गया।

2022 में शुरुआत 80 पैसे से हुई और पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हुए ₹10 से ज्यादा की वृद्धि हो गई। इस बार शुरुआत ₹3 से हुई है।

₹3 की बढ़ोतरी काफी नहीं: आगे और महंगाई की आशंका

मीडिया में विश्लेषण छप रहे हैं कि पेट्रोल के दामों में की गई यह बढ़ोतरी इकलौती नहीं होगी। आगे भी दाम बढ़ सकते हैं क्योंकि तेल कंपनियों को 1 लीटर पेट्रोल के उत्पादन पर ₹25 से ₹30 का घाटा हो रहा है।

हिंदू बिजनेस लाइन के शिशिर सिन्हा से सरकारी सूत्रों ने कहा है कि अगर युद्ध के कारण हो रहे घाटे का सारा भार ग्राहकों पर शिफ्ट किया गया तो रिटेल के दामों में ₹20 से ₹30 की वृद्धि हो जाएगी।

पहलूविवरण
15 मई को वृद्धिपेट्रोल-डीजल ₹3, सीएनजी ₹2
वर्तमान घाटा₹25-₹30 प्रति लीटर
संभावित वृद्धि₹20-₹30 और बढ़ सकता है
श्रीगंगानगर में पेट्रोल₹109 प्रति लीटर से अधिक
सबसे प्रभावित वर्गआबादी का निचला 20% हिस्सा

अखबार लिखता है कि इससे आबादी का निचला 20% हिस्सा बुरी तरह प्रभावित होगा। किसान, ट्रक या ऑटो रिक्शा चलाने वाले इस बढ़ोतरी को झेल नहीं पाएंगे। इसलिए अपील की जा रही है कि आप खुद ही खपत कम कर दीजिए।

दूध के दाम क्यों बढ़े: क्या यह भी होर्मुज से आता है

पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ दूध के दाम भी बढ़ गए हैं। सवाल उठता है कि क्या दूध भी खाड़ी के देशों से आ रहा है? क्या भारत में दूध का टैंकर होर्मुज से होकर आता है?

यह कहा जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन महंगा हुआ, इसलिए दूध के दाम बढ़े। सीएनजी ₹2 महंगा हुआ, जाहिर है ऑटो का किराया महंगा होगा। ऑटो में चलने वाले की कमाई क्या रोज-रोज बढ़ रही है जो खुश हो रहा होगा?

पेट्रोल पंपों पर अजीब नजारा: प्रीमियम खरीदने का दबाव

कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) के मार्केटिंग डायरेक्टर को अपने पत्र में साफ-साफ लिखा है कि उन पर प्रीमियम पेट्रोल खरीदने और बेचने के दबाव दिए जा रहे हैं।

डीलर संगठन ने आरोप लगाया है कि HPCL के कुछ रीजनल ऑफिस दबाव बना रहे हैं कि जब तक सामान्य पेट्रोल के आर्डर को प्रीमियम पेट्रोल के आर्डर में नहीं बदलेंगे, तब तक सप्लाई नहीं की जाएगी। इससे आर्टिफिशियल किल्लत पैदा हो रही है।

प्रीमियम पेट्रोल नॉर्मल पेट्रोल से ₹9 महंगा है। ग्राहकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे प्रीमियम पेट्रोल खरीदें।

जबकि इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम बिना किसी शर्त के सप्लाई कर रहे हैं। Indian Oil Corporation के निदेशक अरविंद कुमार ने समाचार एजेंसी ANI से कहा कि सप्लाई में दिक्कत ना हो इसलिए उनकी रिफाइनरी 100% की क्षमता पर उत्पादन कर रही है और किसी आउटलेट पर तेल की कमी नहीं।

रांची और झारखंड में लंबी कतारें: तेल मिलने में दिक्कत

रांची के एक पेट्रोल पंप का हाल बता रहा है कि जमीनी स्थिति कुछ और है। शहर के कुछ पेट्रोल पंपों पर कतार लंबी होती चली जा रही है। लोग शिकायत करते मिले कि कई घंटे से पेट्रोल खरीदने का इंतजार कर रहे हैं, मगर मिल नहीं रहा इसलिए लाइन लंबी हो गई।

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में लोगों को देखकर पंप के स्टाफ निकलने से घबरा रहे हैं कि कहीं स्थिति बिगड़ ना जाए। झारखंड के अलग-अलग इलाकों से भी इसी तरह की खबर है कि पेट्रोल पंप पर तेल मिलने में दिक्कत आ रही है। ग्रामीण इलाकों में भी संकट दिखने लगा है।

यह भीड़ बता रही है कि लोगों को दो बातों की चिंता है – कभी भी तेल का मिलना कम हो सकता है, बंद भी हो सकता है और दाम इससे भी अधिक बढ़ सकते हैं।

केरल में भी सप्लाई में देरी: थोक बिक्री पर रोक

द हिंदू की खबर है कि उत्तर केरल के जिलों में ईंधन की सप्लाई में देरी हो रही है और रुक-रुक कर की जा रही है। केरल के अखबार मातृभूमि की रिपोर्ट है कि पेट्रोल पंपों से कहा जा रहा है कि थोक में बेचना कम कीजिए। ग्राहक को 200 लीटर से ज्यादा पेट्रोल-डीजल मत दीजिए।

भारत के पास कितना तेल स्टॉक है: 18 दिन की डिमांड

भारत में रोज 50 लाख बैरल तेल इस्तेमाल होता है। सरकार का कहना है 60 दिनों की डिमांड के लिए पर्याप्त तेल है। लेकिन खबरें छप रही हैं कि भारत में कच्चे तेल के भंडार में 15% की कमी आ गई है।

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार इस समय भारत के पास जितना तेल है उससे 18 दिनों की डिमांड पूरी की जा सकती है। फरवरी में भारत के पास 107 मिलियन बैरल का स्टॉक था। मई के मध्य में घटते-घटते 91 मिलियन बैरल पर आ गया है।

इकोनॉमिक टाइम्स का कहना है कि पेट्रोल बचाने की प्रधानमंत्री की अपील के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है।

12 साल में तेल उत्पादन नहीं बढ़ा: चीन से तुलना

मीडिया में दो तरह के विश्लेषण छप रहे हैं। एक कि भारत में पिछले 12 साल में तेल का उत्पादन नहीं बढ़ा। सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। कच्चे तेल के भंडारण की क्षमता भी भारत ने नहीं बढ़ाई जिसके कारण यह संकट विकराल हुआ।

भारत की तुलना चीन से की जा रही है जिसके पास दुनिया में सबसे अधिक तेल का भंडार करने की क्षमता है। 28 अप्रैल को सलमान सोज ने द वायर में लिखा कि सन 2000 के आसपास भारत और चीन की भंडारण क्षमता एक जैसी थी। दोनों ने तेल को स्टोर करने का एक जैसा फैसला लिया। मगर भारत इस दौड़ में पीछे रह गया।

देशतेल भंडारण क्षमतास्थिति
भारत2 करोड़ 10 लाख बैरलसंकट में
चीन140 करोड़ बैरलसुरक्षित

2004 में मनमोहन सिंह सरकार ने स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व प्रोग्राम को मंजूरी दी मगर देरी हुई। 2010 में विशाखापट्टनम, बैंगलोर और कर्नाटक के पादुर में रिजर्व बनना शुरू हुआ। 2018 में पूरा हुआ। इन तीनों रिजर्व में 39 मिलियन बैरल जमा हो सकता था।

इसी दौरान चीन ने अपना पहला रिजर्व 2006 में ही बना लिया। 2 साल के भीतर तीन और रिजर्व बन गए और 102 मिलियन बैरल स्टोर करने लगा। चीन उसके आगे भी 2 बिलियन बैरल कच्चा तेल स्टोर करने के लक्ष्य पर काम शुरू कर चुका है। भारत तीन स्टोरेज से आगे नहीं बढ़ सका।

28 फरवरी को जब ईरान पर हमला हुआ, उसके एक हफ्ते बाद ही CNBC ने रिपोर्ट कर दिया कि अगर तेल के दाम $100 के पार हुए तो बाकी दुनिया के मुकाबले चीन बेहतर तरीके से झटका झेल पाएगा।

ब्लूमबर्ग ने चार्ट बनाकर दिखाया कि चीन ने समय पर तैयारी की तो उसका संकट वैसा नहीं जैसा भारत का। भारत ने तैयारी नहीं की तो हाहाकार है।

हवाई कंपनियों का संकट: उड़ानें बंद होने का खतरा

26 अप्रैल को SpiceJet, IndiGo और Air India के प्रतिनिधि संगठन ने सरकार को चिट्ठी लिख दी कि अब अगर उनके ईंधन का दाम बढ़ेगा तो उड़ानों को जारी रखना मुश्किल हो जाएगा। अगर सरकार ने सपोर्ट नहीं किया तो उन्हें अपना ऑपरेशन बंद करना पड़ सकता है।

भारत के आसमान से कितनी तेजी से हवाई कंपनियां गायब होती चली गईं – Jet Airways, Go Air और अब SpiceJet की भी हालत खराब बताई जा रही है। इसमें Air India का भी नाम जुड़ गया है।

Air India का घाटा बढ़ते-बढ़ते ₹26,798 करोड़ तक आ पहुंचा है। इस वित्त वर्ष में उसका घाटा डबल हो गया। Air India को हर हफ्ते 140 उड़ानें रद्द करनी पड़ रही हैं। उसकी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में 27% की कटौती हो चुकी है।

IndiGo ने भी घोषणा की है कि मेट्रो शहरों में कम विमान उड़ाएगी। मांग भी कम हो गई है और घरेलू उड़ानों को जारी रखना फायदेमंद नहीं रहा।

दिलचस्प बात यह है कि भारत में दनादन एयरपोर्ट बनते जा रहे हैं। एयरपोर्ट बनाने की इतनी जल्दी क्यों है? और विमान कंपनियां उसी तेजी से गायब क्यों होती जा रही हैं या घाटे में जा रही हैं?

उड़ान योजना के तहत कितने एयरपोर्ट को बंद करना पड़ा और जहां उड़ानें चल रही हैं, वहां घटकर इक्का-दुक्का रह गई हैं। यह सब युद्ध के पहले से होने लगा था। बस फर्क यह आया है कि इसमें तेजी आ गई है।

बेरोजगारी 16 महीने के शीर्ष पर: नौकरियां जा रही हैं

हाल ही में सांख्यिकी मंत्रालय ने आंकड़े जारी किए कि भारत के युवाओं में बेरोजगारी 16 महीने के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है। एक बड़ी टेक कंपनी ने IIT, NIT, BIT के छात्रों को नौकरी के ऑफर दिए। ऑफर वापस ले लिए। छात्रों के हाथ आई नौकरी चली गई।

जिन कॉलेजों से छात्रों को नियुक्त किया गया उन्हें कहा जा रहा है अब आपकी जरूरत नहीं। नौकरी जाने की खबर अक्सर छोटे में छपती है। मगर पेट्रोल महंगा होने पर ऐसी जनता का बयान खूब बड़ा कर दिखाया जाता है जो सरकार की मजबूरी समझने का दावा करती है।

मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ: 10 साल में हिस्सा 38% से 53% पर

खुदरा महंगाई 14 महीनों के शीर्ष पर। थोक महंगाई 42 महीनों के शीर्ष पर। प्रधानमंत्री मोदी की सारी अपील किससे? मिडिल क्लास से। लोअर मिडिल क्लास और गरीब तो पहले ही सोना-चांदी नहीं लेता, विदेश यात्राएं नहीं करता, राशन का तेल खाता है।

2014 में कुल टैक्स कलेक्शन में मिडिल क्लास का हिस्सा 38.1% था। 10 साल बाद 2024 में बढ़कर 53.4% पर आ गया। कॉर्पोरेट का हिस्सा 10 साल में 61.9% से घटकर 46.6% हो गया।

उदय कोटक ने तो खतरे की चेतावनी दे दी। लेकिन उसके बाद दूसरे बड़े कॉरपोरेट प्रमुख चुप्पी साध गए। लिस्टेड कंपनियों के सीईओ की सैलरी एक दशक में डबल हो गई।

प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद अभी तक एक भी उद्योगपति भावुक क्यों नहीं हुआ कि हम अपने कर्मचारियों को एक महीने की ज्यादा सैलरी देंगे?

खाद्य तेल का संकट: 65-70 हजार करोड़ का आयात

2021 की बात है तब नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि कृषि प्रधान देश होने के बाद भी भारत ₹65,000 से लेकर ₹70,000 करोड़ का खाद्य तेल बाहर से लाता है। इसे बंद किया जाए ताकि किसानों के खाते में और पैसे दिए जा सकें।

2021 के बाद 2024 में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार एक फैसला लेती है – 3 साल बाद। और लक्ष्य बनाया जाता है अगले 7 साल का – 2031 तक का।

2021 में खाद्य तेल, ताड़ के तेल पर राष्ट्रीय मिशन बनाया गया। 3 अक्टूबर 2024 को मोदी सरकार की कैबिनेट ने तिलहन पर राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन की मंजूरी दी। 7 साल में तेल के उत्पादन के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाना था। इसके लिए 7 साल के लिए ₹10,000 करोड़ का बजट बताया गया।

तो 2021 से 2026 आ गया। मिशन ही बनता रहा और खाने के तेल का आयात घटा नहीं। भारत आज भी अपनी जरूरत का 60% तेल दूसरे देशों से मंगाता है।

इकोनॉमिक टाइम्स ने अपने एक चार्ट में दिखाया है कि पिछले 20 वर्षों में खाद्य तेल के आयात में 2.2 गुना की बढ़ोतरी हुई है और इसे आयात करने की लागत 15 गुना बढ़ गई है।

तेल का हिसाब करने के लिए नवंबर से अक्टूबर के बीच आकलन किया जाता है। इसे तेल वर्ष कहा जाता है। 2024-25 के शुरुआती छह महीनों में ₹73,000 करोड़ खाद्य तेल का आयात हुआ और मौजूदा तेल वर्ष के शुरुआती छह महीनों में ₹87,000 करोड़ का आयात हो चुका है।

सोना-चांदी कारीगरों का संकट: लाखों परिवारों की आजीविका खतरे में

प्रधानमंत्री की अपील से गहने बनाने वाले लाखों कारीगरों का परिवार संकट में आ गया है। उनकी कमाई खत्म हो जाएगी। होने लगी है। सोना-चांदी के छोटे कारोबारी बर्बाद होने लग जाएंगे। गहना कारीगरों के लिए सरकार क्या कर रही है? उनका घर कैसे चलेगा?

सबसे बड़ी बात यह है कि 85% ज्वेलरी एक्सपोर्टर MSME सेक्टर में है। यानी जॉब क्रिएटर्स हैं। सोने के आभूषण कारोबार में गांव से शहर तक, कस्बों से महानगरों तक छोटे ज्वेलर, व्यापारी, सुनार, गलाई, पकाई, चिलाई, गड़ाई, पॉलिश – ये सब काम में लाखों-करोड़ों कारीगर लगे हैं और करोड़ों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ती है।

जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर भारत की शायद सबसे बड़ी रोजगार देने वाली इंडस्ट्रीज में से एक है। 50 लाख लोग सीधे कारीगर इत्यादि यह काम करते हैं और देश में 3 करोड़ लोग इस उद्योग से जुड़े हैं।

एक साल की अगर रोजगार बंदी हो गई तो पूरा ज्वेलरी सेक्टर हिंदुस्तान का डिस्ट्रॉय हो जाएगा। उसका विनाश हो जाएगा।

FMCG कंपनियों का संकट: पैकेट छोटे, दाम बढ़े

हिंदू बिजनेस लाइन में बलारी शांस गिरी की एक रिपोर्ट है। FMCG की बड़ी कंपनियां विज्ञापन के बजट में कटौती कर रही हैं क्योंकि बाजार में खरीदार ही नहीं है और लागत भी बढ़ गई है।

FMCG कंपनियां वो सामान बनाती हैं जो आप रोजमर्रा के लिए घरों में इस्तेमाल करते हैं – ब्रश, टूथपेस्ट, साबुन, तेल वगैरह। अब कंपनियां साबुन, सॉफ्ट ड्रिंक, फेस वॉश के पैकेट का आकार छोटा कर रही हैं ताकि कमाई का मार्जिन संभाला जा सके।

मनी कंट्रोल की ऐश्वर्या नायर की रिपोर्ट है:

  • Hindustan Unilever ने अपने सामान में 2% से 5% की बढ़ोतरी कर दी है। कुछ सामान की पैकेजिंग घटा दी है तो बड़े पैकेट का दाम बढ़ा दिया है
  • खाड़ी में युद्ध ने पाम ऑयल के दाम बढ़ा दिए इसलिए साबुन के कारोबार को झटका लगा
  • Godrej ने साबुन के दाम 5% बढ़ा दिए हैं। कपड़े धोने के साबुन में 6% से 7% की बढ़ोतरी हुई है
  • Dabur के सामानों में 10% तक की महंगाई देखी जा सकती है। ₹10 से ₹20 की पैकिंग वाले सामान का साइज छोटा किया जा सकता है
  • Britannia का भी यही हाल है। दाम बढ़ रहे हैं और सामान छोटा हो रहा है
अंडरवियर की बिक्री गिरी: अर्थव्यवस्था का अजीब इंडिकेटर

आर्थिक दबाव नापने के कई पैमाने होते हैं। पारंपरिक तरीकों के अलावा ग्राहकों की खरीदारी के पैटर्न को भी देखा जाता है। अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है? इनमें से एक आइटम है पुरुषों के अंडरवियर।

जब इनकी बिक्री कम हो जाती है तो समझा जाता है कि पुरुष अपनी जरूरत के बुनियादी सामान पर पैसा खर्च नहीं कर पा रहा।

दिसंबर 2025 में भारत में Lux Industries और Jockey के डिस्ट्रीब्यूटर Page Industries दोनों की सेल्स में वृद्धि घट गई। इनका कहना है कि कम आय वाले वर्ग में बढ़ते आर्थिक बोझ के चलते अंडरवियर की बिक्री कम रही और रेवेन्यू भी कम रहा।

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यह भी मनी कंट्रोल में ऐश्वर्या नायर की रिपोर्ट है।

80% लोग इतने गरीब कि सरकार मुफ्त अनाज दे रही है

भारत में दामों का बढ़ना दूसरे देशों से अलग घटना है। यहां 80% लोग इतने गरीब हैं कि उनका पेट भरने के लिए सरकार मुफ्त में अनाज दे रही है। कई साल से जरा सी महंगाई ऐसे लोगों के जीवन को और संकट में डाल सकती है।

लोग चीजें खरीदना बंद कर देते हैं और कंपनियां संकट में आने लग जाती हैं।

2018-21 में एक्साइज ड्यूटी से ₹8 लाख करोड़ की कमाई

कई सारे चार्ट मीडिया में घुमाए जा रहे हैं कि दुनिया के देशों में 50% से 60% दाम बढ़े। भारत में तो बहुत कम बढ़ा। लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लंबे समय तक भारत ने एक्साइज ड्यूटी से भारी-भरकम कमाई की है।

2018 से 2021 के बीच ₹8 लाख करोड़ की कमाई हुई।

एक और पीआर चल रहा है – 4 साल से दाम नहीं बढ़ा। लेकिन इस दौरान क्या पेट्रोल सस्ता था? ₹95 प्रति लीटर की आदत डाल देने के बाद कहा जा रहा है कि 4 साल से दाम नहीं बढ़ा।

जब कच्चा तेल सस्ता हुआ – आज की तरह महंगा नहीं था – तब क्या उसका फायदा ग्राहकों को दिया गया? यूक्रेन युद्ध के कारण भारत की तेल कंपनियों ने रूस से सस्ती दरों पर तेल खरीदना शुरू किया। उस दौरान निजी तेल कंपनियों के साथ-साथ सरकार की तेल मार्केटिंग कंपनियों को भी बहुत फायदा हुआ। मगर दाम तो कम नहीं हुए।

जब सरकार से पूछा गया कि रूस से प्रति बैरल $30 से $35 की छूट मिली है, दाम क्यों नहीं घटे तो जवाब दिया गया – अगर रूस का सस्ता तेल नहीं आता तो भारत में पेट्रोल का दाम ₹150 प्रति लीटर तक चला गया होता।

संसद में सरकार ने कहा कि रूस से सस्ता तेल खरीदकर तेल कंपनियां पिछले साल के घाटे की भरपाई कर रही हैं। इसलिए जनता को लाभ नहीं मिल रहा और रूस के सस्ते तेल से जो बचत हो रही है उससे सरकार अपना राजकोशीय घाटा कम कर रही है।

विदेशी मुद्रा बचाने की अपील: अमेरिका से रूसी तेल पर प्रतिबंध हटाने की गुहार

भारत ने जिस तरह से अपनी जनता से अपील की है उसी तरह से अमेरिका से भी अपील की है कि रूस से तेल खरीदने पर प्रतिबंध हटा दीजिए। भारत इस संकट में भी अमेरिका की हरी झंडी का इंतजार कर रहा है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • 15 मई 2026 को पेट्रोल-डीजल ₹3 और सीएनजी ₹2 महंगा हुआ
  • तेल कंपनियों को ₹25-₹30 प्रति लीटर का घाटा, आगे ₹20-₹30 और बढ़ोतरी संभव
  • भारत के पास केवल 18 दिनों की डिमांड के लिए तेल स्टॉक
  • चीन के पास 140 करोड़ बैरल स्टॉक, भारत के पास केवल 2 करोड़ 10 लाख बैरल
  • 2022 में चुनाव के बाद 9 दिनों में 8 बार दाम बढ़े थे, ₹9-₹12 की वृद्धि हुई थी
  • रांची, झारखंड और केरल में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें
  • Air India का घाटा ₹26,798 करोड़, हर हफ्ते 140 उड़ानें रद्द
  • युवाओं में बेरोजगारी 16 महीने के शीर्ष स्तर पर
  • मिडिल क्लास का टैक्स हिस्सा 10 साल में 38.1% से 53.4% पर पहुंचा
  • खाद्य तेल आयात ₹87,000 करोड़, 60% निर्भरता बरकरार
  • 3 करोड़ लोग ज्वेलरी सेक्टर से जुड़े, आजीविका संकट में

 

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Hinduism Definition 2026: Religion या Way of Life? Supreme Court के 9 Judges ने दी अहम राय, जानें पूरा सच

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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