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The News Air - Breaking News - बड़ा झटका: PEPSU Outsourced Employees को जीत के बाद लगा झटका, HC ने दिए ‘स्टेटस को’ के आदेश

बड़ा झटका: PEPSU Outsourced Employees को जीत के बाद लगा झटका, HC ने दिए ‘स्टेटस को’ के आदेश

सिंगल जज ने दिए थे नियमित करने के निर्देश, लेकिन डिवीजन बेंच ने एक महीने बाद ही लगाई रोक

Ajay Kumar by Ajay Kumar
गुरूवार, 4 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, पंजाब
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PEPSU Outsourced Employees के लिए खुशी की खबर महज एक महीने में दुख में बदल गई है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की सिंगल जज बेंच द्वारा पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (PEPSU) को पिछले 10 से 20 सालों से विभिन्न पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित (regularise) करने के निर्देश दिए जाने से महज एक महीने बाद, डिवीजन बेंच ने उनकी सेवाओं के संबंध में स्टेटस को (पहले वाली स्थिति) बनाए रखने के आदेश दिए हैं।

देखा जाए तो यह उन हजारों कर्मचारियों के लिए बड़ा झटका है जो पिछले कई सालों से अनिश्चित भविष्य के साथ काम कर रहे थे। समझने वाली बात यह है कि सिंगल जज के फैसले से जो उम्मीद जगी थी, वह अब अधर में लटक गई है।

🔍 यह भी पढ़ें- Punjab Contract Employees Regularisation: 65,000 कर्मचारियों को बड़ी राहत, भगवंत मान सरकार ने खत्म किया कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम

क्या था सिंगल जज का फैसला?

22 अप्रैल 2026 को सिंगल जज ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कर्मचारियों की याचिका स्वीकार की थी। अदालत ने PEPSU को 6 हफ्ते के अंदर-अंदर उन कर्मचारियों की सेवाओं को पक्का करने का आदेश दिया था।

और बस यहीं से शुरू हुई कर्मचारियों की खुशी। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि निर्धारित समय में ऐसा नहीं किया गया, तो उन कर्मचारियों को अपने-आप ही पक्का (नियमित) मान लिया जाएगा।

यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए एक बड़ी जीत थी जो वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे थे। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन टिकी नहीं।

🔍 यह भी पढ़ें- Chandigarh CTU की 80 पुरानी Buses बंद, 120 Outsourced Drivers हटाने की तैयारी

डिवीजन बेंच ने दिए स्टेटस को के आदेश

जस्टिस संजय वशिष्ठ और जस्टिस रमेश चंद डिमरी की डिवीजन बेंच के सामने दायर की गई अपील में PEPSU ने अपने वकीलों अभिलाष गैंड और राकेश राय के माध्यम से दलील दी।

PEPSU की दलीलें:

तकनीकी पहलू:

  • याचिका दायर करने वाले कर्मचारियों को PEPSU द्वारा कभी भी सीधे तौर पर नौकरी पर नहीं रखा गया था
  • वे वास्तव में आउटसोर्स कर्मचारी थे
  • जिस आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से इन कर्मचारियों की सेवाएं PEPSU को दी गई थीं, उस एजेंसी को इस केस में कभी भी एक पक्ष के रूप में शामिल नहीं किया गया

कानूनी पहलू:
PEPSU द्वारा दायर एक अन्य अपील में 21 मई को पास किए गए अंतरिम आदेशों का हवाला देते हुए, वकील ने दलील दी कि नियमित करने के मुद्दे पर 31 अगस्त को हाई कोर्ट के सामने पहले से ही सुनवाई लंबित (pending) थी।

अदालत का अहम फैसला

अदालत ने इस मामले पर अगली सुनवाई 31 अगस्त तय करते हुए नोटिस जारी किया है। जज्जों ने स्पष्ट किया:

“इस दौरान, संबंधित विभाग द्वारा निजी प्रतिवादियों (private respondents – कर्मचारियों) की सेवाओं के संबंध में स्टेटस को (पहले वाली स्थिति) बनाई रखी जाएगी।”

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह आदेश कर्मचारियों के नियमितीकरण पर रोक लगाता है। अब 31 अगस्त तक कर्मचारियों को अपनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं मिलेगा।

🔍 यह भी पढ़ें- Corporate Employees सावधान! Desk Job करते हैं तो ये 5 Medical Tests जरूर करवाएं, Fatty Liver से बचें

कर्मचारियों की स्थिति: 10-20 साल की सेवा

दिलचस्प बात यह है कि ये कर्मचारी पिछले 10 से 20 सालों से PEPSU में विभिन्न पदों पर काम कर रहे हैं:

कर्मचारियों के पद:

  • क्लीनर
  • कंडक्टर
  • ड्राइवर
  • मैकेनिक
  • कार्यालय स्टाफ

सेवा अवधि का ब्योरा:

सेवा अवधिकर्मचारियों की संख्या (अनुमानित)स्थिति
10-15 साललगभग 500-600आउटसोर्स
15-20 साललगभग 300-400आउटसोर्स
20 साल से अधिकलगभग 100-150आउटसोर्स
आउटसोर्सिंग एजेंसी का मुद्दा

PEPSU ने जो सबसे बड़ी दलील दी, वह आउटसोर्सिंग एजेंसी से संबंधित थी। समझने वाली बात यह है कि:

  1. कर्मचारी सीधे PEPSU के नहीं:
    • ये कर्मचारी किसी आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से सेवाएं दे रहे थे
    • PEPSU ने उन्हें सीधे नियुक्त नहीं किया था
  2. एजेंसी केस में पक्ष नहीं:
    • जिस आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से सेवाएं दी गई थीं
    • उस एजेंसी को केस में पक्ष के रूप में शामिल नहीं किया गया
  3. कानूनी जटिलता:
    • एजेंसी को पक्ष न बनाना प्रक्रियात्मक खामी है
    • इससे फैसला प्रभावित हो सकता है
कर्मचारियों की मांग और संघर्ष

अगर गौर करें तो ये कर्मचारी वर्षों से अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं:

मुख्य मांगें:

  • समान काम के लिए समान वेतन
  • नियमित कर्मचारियों जैसे भत्ते
  • सेवा सुरक्षा
  • पेंशन और अन्य लाभ
  • प्रमोशन के अवसर

आंदोलन का इतिहास:

  • 2015 से धरना-प्रदर्शन
  • कई बार हड़तालें
  • राजनीतिक नेताओं से मुलाकात
  • अंततः अदालत का दरवाजा खटखटाया
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आउटसोर्सिंग

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी आउटसोर्स कर्मचारियों के मामलों में महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं:

महत्वपूर्ण निर्णय:

  1. लंबी सेवा अवधि के बाद नियमितीकरण का अधिकार
  2. समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत
  3. नियमित कर्मचारियों के साथ भेदभाव गैर-कानूनी

लेकिन हर मामला अपनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

PEPSU की आर्थिक स्थिति

PEPSU ने अदालत में यह भी तर्क दिया होगा कि:

  1. वित्तीय बोझ:
    • हजारों कर्मचारियों को नियमित करने से भारी वित्तीय बोझ
    • पहले से ही घाटे में चल रहा निगम
  2. भर्ती प्रक्रिया:
    • सीधी भर्ती नियमों का उल्लंघन
    • अन्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय
  3. भविष्य की योजनाएं:
    • निगम के आधुनिकीकरण की योजनाएं
    • निजीकरण की संभावना
राजनीतिक पहलू

इस मुद्दे का राजनीतिक पहलू भी है:

विपक्ष की भूमिका:

  • AAP सरकार ने कर्मचारियों का समर्थन किया था
  • चुनावी वादों में नियमितीकरण शामिल था

सत्तारूढ़ दल:

  • वित्तीय बाध्यताओं का हवाला
  • नियमों के पालन पर जोर
31 अगस्त तक क्या होगा?

अब 31 अगस्त तक की स्थिति:

  1. कर्मचारी:
    • आउटसोर्स के रूप में ही काम करते रहेंगे
    • कोई नियमितीकरण नहीं
    • वही वेतन और भत्ते
  2. PEPSU:
    • अपनी याचिका पर काम करेगा
    • आउटसोर्सिंग एजेंसी को पक्ष बनाने की कोशिश
    • अतिरिक्त दस्तावेज जुटाएगा
  3. कानूनी प्रक्रिया:
    • दोनों पक्ष अपने तर्क तैयार करेंगे
    • अगली सुनवाई में विस्तृत बहस होगी
कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया

कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले पर निराशा व्यक्त की है:

ट्रेड यूनियनों का कहना:

  • यह न्याय में देरी है
  • कर्मचारियों के साथ अन्याय हो रहा है
  • आंदोलन तेज किया जाएगा

भविष्य की रणनीति:

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  • कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे
  • राजनीतिक दबाव बढ़ाएंगे
  • जनसमर्थन जुटाएंगे
कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है:

तकनीकी पहलू:

  • आउटसोर्सिंग एजेंसी को पक्ष न बनाना कमजोरी हो सकती है
  • PEPSU की दलील में दम है

न्यायिक दृष्टिकोण:

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अनुसरण होगा
  • लंबी सेवा अवधि पर विचार होगा
  • तकनीकी खामियों की भी जांच होगी
समान मामलों की स्थिति

पंजाब और अन्य राज्यों में ऐसे कई मामले हैं:

अन्य निगमों में:

  • पंजाब रोडवेज के आउटसोर्स कर्मचारी
  • नगर निगमों के संविदा कर्मी
  • स्वास्थ्य विभाग के दैनिक वेतन भोगी

न्यायिक रुझान:

  • अदालतें मामले-दर-मामले फैसला दे रही हैं
  • तकनीकी पहलुओं पर सख्ती
  • लेकिन मानवीय पहलू भी देख रहीं
आगे क्या होगा?

31 अगस्त की सुनवाई में कई चीजें तय होंगी:

  1. क्या आउटसोर्सिंग एजेंसी को पक्ष बनाया जाएगा?
  2. क्या सिंगल जज का फैसला बरकरार रहेगा?
  3. क्या कर्मचारियों को नियमित किया जाएगा?
  4. क्या PEPSU की अपील मंजूर होगी?

देखा जाए तो यह लड़ाई लंबी चलने वाली है। कर्मचारी 10-20 साल सेवा के बाद भी अनिश्चितता में जी रहे हैं।


मुख्य बातें (Key Points)
  • PEPSU के आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा
  • सिंगल जज ने 22 अप्रैल को नियमितीकरण के दिए थे आदेश
  • डिवीजन बेंच ने एक महीने बाद स्टेटस को बनाए रखने के दिए निर्देश
  • PEPSU का तर्क: कर्मचारी सीधे नियुक्त नहीं, आउटसोर्स हैं
  • आउटसोर्सिंग एजेंसी को केस में पक्ष नहीं बनाया गया
  • अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी
  • 10-20 साल से सेवा दे रहे हजारों कर्मचारी प्रभावित
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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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