महंगाई का जाल, लेकर आया नया साल

The News Air- (पंडित संदीप) रोटी कपड़ा जूता महंगाई की मार से कराह रहे हैं तो वही कैश की ऐश पर भी चौकीदार का पहरा लगा सरकार ने जनता को जो नए साल की सौगात दी है वह ‘दर्द-ए-जनवरी’ बन जन जन को महंगाई के जाल में फंसाने को तैयार है। वायदे जब जुमला बन जाते हैं तो सच, जुल्म करना आसान हो जाता है। आसमान छूती महंगाई पर महंगाई की एक और इमारत यह साबित करती है कि मनमानी जारी है।


लोकतंत्र में बातों का बतासा बांट वादों का पहाड़ खड़ा कर जनता को फंसाकर बनती सरकारें वायदों को भुला जन विरोधी क्यों हो जाती हैं? यह एक अनबुझ पहेली है, यह रहस्य समझ से परे की बात है। विपक्ष में रहते नेता कितने जनप्रिय, कितने जन नायक, कितने जन हितैषी, बनने का ढोंग करते हैं और कुर्सी मिलते ही फिर बदल जाते हैं, जनता हाथ मलती ठगी सी बेबस, बेआस एक उम्मीद के सहारे कतार में फिर खड़ी होती है कि सरकार बदल बदला लेंगे। भोली जनता ये भूल जाती है आखिर वो सरकार कहाँ बदल पाती है? जनता तो बस कुर्सी पर बैठने वाले नुमाइंदो की सूरत ही बदल पाती है, सरकार उसी शक्ल उसी अंदाज से चलती रहती है। जिन मुद्दों का विरोध कर कुर्सी पर कब्जा जमाती है, कुर्सी पर बैठते हैं वहीं मुद्दे उसकी पहली पसंद पहली प्राथमिकता बन जनता से दगा करते ही रहे हैं। ज्यादा दूर जाने की जरूरत भी नहीं 2014 में देश भर में गली-गली में एक नारा गूंजा था ‘बहुत हुई महंगाई की मार’……इस नारे के शोर ने उम्मीद की भोर दिखाई थी जो स्याह अंधेरा बन आज लोगों में खौफ़ बरपा रहा है। महंगाई को डायन से डार्लिंग बना सरकार उसके रूप को प्रतिदिन विकराल बना जो दमन कर रही है वह नाकाबिले बर्दाश्त है। पेट्रोल-डीजल ने आग लगी है तो सरसों का तेल हाथ से फिसल रहा है, गैस हवा की तरह बढ़ गई है जिसे सिलेंडर में कैद करना गरीब के लिए कहाँ आसान है? दाल चीनी चावल चाय बिना उबाले ही अब उबल रहे हैं। पहले ही महंगाई का मुंह सुरसा के मुँह को चिढा रही थी ऊपर से नए साल की सौगात में जो स्वागत सरकार ने जनवरी का किया है उससे सरकार नामक संस्था पर एतबार करने के लिए दिल पत्त्थर का और आँखें अंधी करनी होगी।
खाने की रोटी पर पहले ही डाका था चौकीदार का, अब रोटी मंगाकर खाने वालों को भी चौकीदार ने लपेट लिया है। थके हारे शहरों में देर रात काम कर भोजन मंगा अपना गुजारा करने वाले अब बाहर से मंगा कर खाएगा तो उसे महंगाई खून के आँसू रुलाएगी। यह जनवरी का नया गिफ्ट दिया है दिल्ली दरबार ने। तन को ढकने वाले कपड़े पर मन की मार करने वाले की मनमानी भारी पड़ी है, कपड़ा पकड़ से दूर करने की कवायद है जनवरी में जीएसटी का फेरबदल, ऐसे ही नेताओं के जुल्म से पीड़ित जनता जनसभा में नंगे पैर ही आए इसका इंतजाम भी सरकार ने सोच समझकर ही किया होगा जूतों का भाव बढ़ा देना इस चाल का हिस्सा ही मालूम होता है कि कहि नेता जी की सभा में जूता ना चल जाए तो बचा कैसे जाए? इसलिए जूते के भाव बढ़ा आम जन को जूता विहीन करने की कवायद कामयाब नज़र आती है। आपका बैंक आपका पैसा बता जन जन का खाता खुलवाने वाली सरकार ने नया फरमान जारी किया है कि पैसा डालोगे तो जुर्माना पैसा निकाल लोगे तो भी जुर्माना। जुर्माने का डबल इंजन,ऐसी मनमानी की रफ्तार, ऐसा जजिया कर कभी जनमानस पर थोपा नहीं गया जो आज के राज में हो रहा है। बैंक कतारों में खड़ा हो धन सुरक्षित करने वालों पर जुर्माना लगा सरकार बैंकों से उन्हें दूर क्यों करना चाहती है? जनता को ही नहीं, यह गणित जनवरी के भी समझ नहीं आई।


इस वायदा खिलाफ सरकार ने जनता के लिए क्या किया यह सोचने बैठो तो उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी और काम याद ही नहीं आएंगे। एक ऊंची मूर्ति बना उससे भी ज्यादा ऊंचा कद महंगाई का बढ़ाने के कीर्तिमान के अलावा सरकार के झोले में है ही क्या? नोटबंदी का ऐलान कर जनता को निचोड़ दिया, लॉकडाउन की घोषणा ने सड़कों पर मौत को सजा दिया, ऑक्सीजन की किल्लत ने गंगा तट को कब्रिस्तान बना दिया, अब किस किस बात पर रोए, ऐ सरकार बता तूने आँसुओं की सौगात के सिवा दिया ही क्या है? चूल्हे बुझाने, कपड़े छीनने, जूते उतरवाने वाली सरकार के होश ठिकाने कोई अगर कर सकता है तो वह धरती को चीर अनाज का अंबार लगाने वाला किसान है। किसानों को फंसाने का जाल जो सरकार ने बुना था जो उन्हीं के गले का जंजाल बन गया। माफी के साथ मोदी ने काले कानून मजबूरन वापस लिए तो सवाल उठता है सात सौ से ज्यादा किसानों की बलि लेना ही इस कानून का मकसद था क्या? ये सच न भी माना जाए तो फिर इसके अलावा काले कानूनों ने वतन को दिया ही क्या? अराजक सरकार जब तानाशाह हो जाए, जब जुल्म की मीनार बना दे तो जनता के पास सड़कों पर उतर इंकलाब बुलंद करने के अलावा रास्ता भी क्या शेष है। जनवरी की सर्द रातें सड़कों को खूब संजीदा रखेंगी सजा के रखेंगी यकीन रखिये महंगाई के खिलाफ जनाक्रोश टूटेगा ही टूटेगा आज नहीं तो कल। सोचना बस इतना ही है कि हमें उस सरकार से लड़ना है,जिसके लिए वायदा जुमला है, किसान आतंकवादी है, रोजगार पकौड़ा है, महंगाई डार्लिंग और कुर्सी उसकी माई बाप है। यह जिस दिन हमें समझ आ जाएगा सरकार खुद भी खुद को बचा नहीं पाएगी हमें बस भरोसा रखना है और इंकलाब करना है।

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