मडगाँव का मैदान, जहाँ लोहिया ने लिया लोहा, तब आजाद हुआ गोवा


Sandeep-Pandit
पंडित संदीप

पुर्तगालियों के 451 साल के शासन को जिस मडगाँव के मैदान से ललकार लोहिया ने गोवा की आजादी की सुनहरी सौगात की गौरव गाथा लिख़ी, गोवावासियों पर पुर्तगालियों की जुल्मों जलालत से निजात की बिसात जिस मैदान पर बिछाई गई, जिस मैदान में गरजते बादलों से ज्यादा गरजे लोहिया, जिस मडगाँव मैदान में बरसते बादलों से ज्यादा बरसे लोहिया, जिस मैदान से उठी हुंकार ने पिघला दी पुर्तगालियों के जुल्म की जंजीरें। गोवा के जिस ऐतिहासिक मैदान से कैद हो गोवा की रिहाई का अध्याय लिख आए लोहिया, गोवा की उस शान का अपमान करने पर क्यों उतारू है गोवा सरकार। सवाल विपक्ष का था जवाब सरकार का मैदान के इतिहास के बारे में अधिकारी जानते ही नहीं।
अपने आजादी की विरासत की हिफाजत न कर पाने के लिए सरकारी मजबूरी, लाचारी बन पूरे देश के सामने है आज गोवा के सरकार की प्रस्तुति के रूप में प्रस्तुत गोवा का मडगाँव मैदान अनाथ अवस्था में दयनीय दशा में खड़ा लोहिया के ललकार का स्मारक जिसकी राष्ट्रीय धरोहर से गोवा सरकार का आर्कियॉलोजी विभाग अपनी ही जंगे आजादी के मैदान को अनाथ छोड़ इस बात से महरूम भी है कि आजादी का बिगुल फूंकने वाला मैदान संरक्षित भी है और राष्ट्रीय धरोहर भी है। विधानसभा के पटल पर लिखित जवाब देने से पहले काश मंत्री के हाथ कांप जाते, गोवा सरकार की कलम टूट जाती तो भी लोहिया अमर बोल को आघात देने वाले अक्षर न लिखे जाते।

आर्काइव और आर्कियॉलोजी विभाग के मंत्री का यह अभिज्ञता वाला जवाब लोहिया के लोगों को ही नहीं महात्मा गाँधी की आत्मा को भी गमगीन करने के लिए काफी साबित होगा।
जिन लोहिया की पुर्तगाल सरकार के द्वारा गिरफ्तारी के बाद महात्मा गाँधी ने अपने अखबार हरिजन में लेख लिख पुर्तगाली सरकार की चूले हिला दी थी, हरिजन में लोहिया के गोवा आजादी संघर्ष के लिए लिखे इस लेख का केंद्र बिंदु यहीं मडगाँव का मैदान है, जहाँ से गोवा की आजादी के लिए 18 जून 1946 को बरसती बूंदों में गरजते लोहिया को गोवा की धरती से पूरी दुनिया ने सुना। लोहिया ने इसी मैदान से पहली बार चार सौ पचास साल पुरानी पुर्तगाली हुकूमत को खुलेआम, खुलेमन और खुले मंच से दो सौ लोगों की जनसभा को संबोधित कर भीगते मैदान और बरसते मैदान के बीच संबोधित कर गोवा की आजादी की नींव का पत्थर पुर्तगाली दमनकारी शासन के खिलाफ रखा, लोहिया की उस सिंह गर्जना का इतिहास गवाह है जिसे न बादलों की बूंदे रोक पाई न ही कड़कती बिजलियों का शोर, लोहिया का जोर हर शोर पर भारी था। लाजिम था जालिम गिरफ्तार करे हुआ भी वही लोहिया को लोहे की सलाखों के पीछे मडगाँव जेल में कैद कर मानो पुर्तगाली सरकार ने अपने ताबूत में आखिरी कील ठोक ली हो।

लोहिया सलाखों के पीछे यह खबर पुर्तगाली गोवा से भारत देश तक जा पहुंची। बापू की पुकार ने पुर्तगाली लोहे को पिघला लोहिया को आजाद करने को मजबूर कर दिया। गोवा में 5 साल न आने का प्रतिबंध डॉक्टर राम मनोहर लोहिया पर पुर्तगालियों ने लगा गोवा के सरहद के पार कर भारत भेज दिया।
लोहिया फिर गोवा लौटने का वादा करके भारत लौटे जाते-जाते गोवा वासियों से कह गए “गोवा के लोग अपना संघर्ष जारी रखें।” फिर एक बार गोवा लौटे लोहिया इस बार गोवा की आजादी को और करीब लाने के लिए आते ही प्लेटफॉर्म से ही गिरफ्तार कर 10 दिन के कारावास और फिर गोवा की सरहद से पार कर भारत भेज दिया पुर्तगालियों ने लोहिया को, पर जिसका नाम लोहिया हो उस फौलाद को जुल्म की जंजीर कहाँ जकड़ पाती।

गोवा की आजादी के नायक लोहिया के भाषण का मैदान, लावारिस, बेहाल, आज बर्बाद खड़ा है और सदन के पटल पर मंत्री लिख कर जवाब देने की हिमाकत करते हैं कि उनके विभाग के बड़े अधिकारी मडगाँव मैदान के संरक्षित होने से अनभिज्ञ हैं। अपमान का यह चाटा अधिकारियों के गाल पर नहीं गोवा सरकार के गाल को लाल कर रहा है जो अपने गौरव, अपने मान, अपनी विरासत, अपनी धरोहर को संभाल नहीं सकती। राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाली सरकार की कथनी और करनी का अंतर बताने के लिए मडगाँव का यह मैदान एक बार फिर देश और दुनिया के सामने खड़ा आईना दिखा रहा है। गोवा सरकार बेरुखी कर सकती है पर गोवावासी अपने सम्मान, अपनी आजादी के प्रतीक, अपनी सुरक्षा, अपने स्वाभिमान के मैदान को पीढ़ी दर पीढ़ी गर्व के सतह संभालते रहेंगे, इसकी हिफाजत करेंगे इसमें कोई संदेह नहीं। यह एक नाकाम सरकार की नाकामी है जो विरासत को वीरान छोड़ अनभिज्ञता की चादर में मुँह छुपा बेशर्मी से जवाब दे। ऐसा कारनामा गोवा सरकार ही कर सकती है… फिर सोचो अगर ऐसी सरकार है तो फिर सरकार किस काम की।


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