हॉकी छोड़ रेहड़ी थामी: फास्ट फूड बेच परिवार का कर रही है पालन पोषण


The News Air (हमीरपुर)- जिन हाथों ने कभी देश के लिए हॉकी स्टिक थामी थी, वहीं हाथ अब परिवार के पालन पोषण के लिए फास्ट फूड की रेहड़ी (ठेला) धकेलने को विवश हैं। नेहा सिंह अब हॉकी उठाती भी है तो मात्र 1500 रुपए कमाने के लिए। बीमार पिता के इलाज के साथ भाई-बहन की पढ़ाई और घर का अन्य ख़र्च जुटाने के लिए वह हमीरपुर के बाज़ार में फास्ट फूड की रेहड़ी लगा रही है। उसकी पढ़ाई भी छूट गई है।

पिता की बीमारी ने तोड़ी कमर

राष्ट्रीय खेल हॉकी की नेशनल खिलाड़ी नेहा सिंह के पिता चंद्र सिंह मछली कॉर्नर चलाते थे। कुछ महीने पहले वे बीमार पड़ गए तो परिवार के भरण पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी नेहा सिंह और उनकी छोटी बहन पर आ गई। परिवार के हालात इतने बद्तर हो गए कि कॉलेज की पढ़ाई और खेल के करियर को बीच में ही छोड़कर नेहा हमीरपुर के बाज़ार में फास्ट फूड की रेहड़ी (ठेला) लगाने को मजबूर हो गई।

झुग्गी में रहने को मजबूर परिवार

मूलतः मंडी के कोटली की रहने वाली नेहा के परिवार के पास ज़मीन नहीं है। वे हमीरपुर बाज़ार के बीचों बीच एक झुग्गी में परिवार के चार अन्य सदस्यों के साथ रहती है। न तो नहाने की व्यवस्था है और न ही शौचालय का प्रबंध। झुग्गी में नेहा के बीमार पिता भी हैं, जिन्हें डॉक्टर ने स्वच्छ वातावरण में रहने की सलाह दी है। पिछली तरफ़ बने बाड़े में एक बकरी और मुर्गी रखी है।

भाई बहन की ज़िम्मेदारी संभाली

नेहा सिंह स्कूली पढ़ाई के दौरान ही साईं हॉस्टल धर्मशाला के लिए चुनी हुई। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (साईं) के हॉस्टल में रहते हुए स्कूल के दौरान ही नेहा ने साल 2015 में पंजाब में सब जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता था। हिमाचल की टीम की तरफ़ से दो नेशनल हॉकी मैच खेले हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी से 2018 में वह वेटलिफ्टिंग में भी एक नेशनल छलांग लगा चुकी है। पिता अचानक बीमार हुए तो नेहा को छोटी बहन निकिता की बीए और छोटे भाई अंकुश की स्कूल पढ़ाई का ख़र्च उठाना पड़ रहा है।

नहीं मिली नौकरी

नेहा नेशनल खिलाड़ी हैं। ऐसे में परिवार को उम्मीद थी कि उसे सरकारी नौकरी मिल ही जाएगी। लेकिन परिवार के सारे सपने टूट चुके हैं। नेहा बताती है कि अब कभी किसी टीम से खेलने के लिए पैसे मिल जाते हैं तो वह मैच में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो जाती है। एक मैच खेलने के उन्हें 1500 रुपए और खाने पीने का और रहने का ख़र्च मिल जाता है।

ज़मीन मिली, पर घर बनाने के पैसे नहीं

भूमिहीन होने पर नेहा के परिवार को सरकार ने हमीरपुर नगर परिषद के ही वार्ड-10 के समीप 4 मरले ज़मीन आवंटित की थी। उसकी मां निर्मला देवी बताती है कि बेटी को नौकरी न मिलने से उन पर संकट गहरा गया है। घर बनाने के पैसे तक नहीं हैं। कमेटी की तरफ़ से घर बनाने के लिए सरकार से पैसे दिलाने की बात कही थी, लेकिन पैसा मिला नहीं। कुछ रुपए उधार लिए तो पति बीमार हो गए।


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