Land Pooling Policy Punjab: संयुक्त किसान मोर्चा ने पंजाब सरकार की संशोधित लैंड पूलिंग नीति के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले नई संशोधनों के बाद आई लैंड पूलिंग नीति को लेकर किसान संगठन चौकस हो गए हैं।
संयुक्त किसान मोर्चा ने आम आदमी पार्टी सरकार को सख्त लहजे में कहा है कि पंजाब के किसान की मर्जी के बिना एक इंच भी जमीन जबरन नहीं लेने देंगे।
मोर्चे ने कहा कि लैंड पूलिंग नीति में संशोधनों के नाम पर किसानों को भ्रमजाल में फंसाने की कोशिश हो रही है। देखा जाए तो यह मुद्दा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका और अस्तित्व का है।
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“पुरखों की जमीनें कारपोरेट को नहीं देंगे”
संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से जोगिंदर सिंह उगराहां ने बयान जारी करके कहा कि वे किसानों की पुरखों की जमीनें किसी भी कीमत पर कारपोरेट घराने के हवाले नहीं करने देंगे।
उन्होंने कहा:
“यह जमीनें नहीं बल्कि किसानों का खून-पसीना है और पुरखों की निशानी है।”
मोर्चे ने कहा कि पंजाब सरकार अब किसानों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश में है। संशोधनों के नाम पर जमीन बदले मिलने वाले रिहायशी और व्यावसायिक प्लॉट के क्षेत्र में मामूली बदलाव किए गए हैं।
अगर गौर करें तो किसान नेताओं का आरोप है कि यह सिर्फ दिखावा है, असली मकसद जमीनें हड़पना है।
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पहले भी वापस लेनी पड़ी थी नीति
मोर्चे का कहना है कि पहले भी किसानों के विरोध के कारण पंजाब सरकार को लैंड पूलिंग नीति वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
अब सरकार फिर से कुछ वर्ग गजों का टुकड़ा फेंककर किसानों की कीमती जमीनों पर कब्जा करना चाहती है।
पुरानी बनाम नई नीति में फर्क:
| पहलू | पुरानी नीति | संशोधित नीति |
|---|---|---|
| रिहायशी प्लॉट साइज | कम | थोड़ा बढ़ा |
| व्यावसायिक प्लॉट | सीमित | थोड़ा बढ़ा |
| मुआवजा दर | निश्चित | थोड़ा संशोधित |
| किसान की सहमति | अस्पष्ट | अभी भी अस्पष्ट |
समझने वाली बात यह है कि मूल ढांचा वही है, सिर्फ ऊपरी पॉलिश की गई है।
“सरकारें कारपोरेट की कठपुतलियां हैं”
जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि सरकारें कारपोरेट घरानों की कठपुतलियां हैं। उन्होंने कहा कि कारपोरेट घरानों की नजर अब खेती सेक्टर पर है क्योंकि ये घराने खेती से किसान को बाहर करके समूचे खेती सिस्टम का कंट्रोल अपने हाथों में लेना चाहते हैं।
उन्होंने पंजाब सरकार को चेतावनी दी:
“कारपोरेट घरानों की मंशा को पंजाब का किसान कदापि पूरा नहीं होने देगा।”
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद किसान संगठन कारपोरेट के प्रवेश को लेकर बेहद संवेदनशील हो गए हैं।
बड़े आंदोलन की चेतावनी
उगराहां ने कहा कि जमीनों की लूट के खिलाफ किसान बड़ा आंदोलन छेड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हाल ही में भारतीय किसान यूनियन लखोवाल के हरिंदर सिंह लखोवाल भी इस नीति के खिलाफ कूद पड़े हैं।
दिलचस्प बात यह है कि चुनावों से पहले जमीनों को अधिग्रहित करने का कोई भी प्रयास पंजाब सरकार को राजनीतिक तौर पर महंगा पड़ सकता है।
विपक्ष ने भी उठाई आवाज
शिरोमणि अकाली दल भी इस नीति के खिलाफ मैदान में कूद पड़ी है। विपक्षी दल इसे सियासी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं।
अगर गौर करें तो यह मुद्दा AAP सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है, खासकर जब:
✅ कर्मचारी पहले से ही नाराज हैं
✅ किसान संगठित हो रहे हैं
✅ विपक्ष हमलावर है
✅ चुनाव नजदीक हैं
सरकार का पक्ष: किसानों की मांग पर संशोधन
दूसरी तरफ पंजाब सरकार का कहना है कि किसानों की मांग के अनुसार ही यह नई संशोधन किए गए हैं।
सरकार का दावा है कि:
✔️ जमीन मालिकों को बेहतर मुआवजा
✔️ रिहायशी और व्यावसायिक प्लॉट में हिस्सेदारी
✔️ विकास के लिए जरूरी
✔️ सभी प्रक्रियाएं पारदर्शी
लेकिन किसान संगठनों को यह तर्क स्वीकार्य नहीं है।
कारपोरेट खेती का डर
किसान नेताओं का मुख्य डर यह है कि एक बार जमीन हाथ से गई तो वापस नहीं आएगी। और फिर धीरे-धीरे पूरी खेती का कारपोरेटीकरण हो जाएगा।
समझने वाली बात यह है कि:
❌ किसान मजदूर बन जाएगा
❌ जमीन से लगाव खत्म होगा
❌ पारंपरिक खेती नष्ट होगी
❌ कारपोरेट मुनाफा कमाएंगे
यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दा भी है।
मुख्य बातें (Key Points)
✔️ संयुक्त किसान मोर्चा ने लैंड पूलिंग नीति के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया
✔️ एक इंच भी जमीन जबरन अधिग्रहित नहीं होने देंगे
✔️ पुरखों की जमीनें कारपोरेट को नहीं सौंपने का संकल्प
✔️ जोगिंदर सिंह उगराहां ने सरकार को चेतावनी दी
✔️ पहले भी विरोध के कारण नीति वापस लेनी पड़ी थी
✔️ चुनाव से पहले यह मुद्दा सरकार के लिए मुसीबत
✔️ शिरोमणि अकाली दल भी मैदान में












