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The News Air - Breaking News - TATA Vs Mahindra: ₹1 लाख करोड़ की Military Aircraft Deal में टक्कर

TATA Vs Mahindra: ₹1 लाख करोड़ की Military Aircraft Deal में टक्कर

भारत 60 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट खरीदेगा, जिनमें से 48 देश में ही बनेंगे—TATA, Mahindra और HAL में कड़ी प्रतिस्पर्धा शुरू

Ajay Kumar by Ajay Kumar
शुक्रवार, 14 अगस्त 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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India Military
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India Military Aircraft Deal को लेकर अब असली जंग शुरू हो चुकी है। रक्षा मंत्रालय ने करीब ₹1 लाख करोड़ की इस डील के लिए आधिकारिक तौर पर Request for Information (RFI) जारी कर दिया है। देखा जाए तो यह सिर्फ एक खरीद नहीं, बल्कि भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जाने का मौका है। और दिलचस्प बात यह है कि इस रेस में देश की तीन दिग्गज कंपनियां—TATA Advanced Systems, Mahindra Defence और Hindustan Aeronautics Limited—एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी हैं।

भारतीय वायुसेना के पास मौजूदा समय में जो परिवहन विमान हैं, उनमें से अधिकांश 30-40 साल पुराने हो चुके हैं। खासतौर पर Antonov An-32, जिसे 1980 के दशक में रूस से खरीदा गया था, अब अपनी उम्र पूरी कर चुका है। रखरखाव महंगा हो गया है, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता घट रही है, और हादसों का खतरा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यह डील सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता बन गई है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 60 विमानों में से केवल 12 विदेश से सीधे खरीदे जाएंगे, जबकि शेष 48 विमान भारत में ही निर्मित होंगे। यानी Make in India का यह सबसे बड़ा प्रयोग होगा एयरोस्पेस सेक्टर में। अगर गौर करें, तो यह डील सिर्फ विमानों की खरीद नहीं, बल्कि पूरे इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को खड़ा करने की योजना है।

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क्यों जरूरी है ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट?

भारत की भौगोलिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। लद्दाख की ऊंची पहाड़ियां, अरुणाचल प्रदेश की दुर्गम घाटियां, सियाचिन का बर्फीला रेगिस्तान और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह—इन सभी जगहों पर सैनिकों, हथियारों और रसद को तुरंत पहुंचाने के लिए परिवहन विमानों की अहम भूमिका होती है।

समझने वाली बात यह है कि लड़ाकू विमान तो सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन युद्ध जीतने में असली योगदान इन्हीं ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का होता है। ये सैनिकों को मोर्चे पर पहुंचाते हैं, घायलों को निकालते हैं, गोला-बारूद सप्लाई करते हैं और आपदा राहत सामग्री भी पहुंचाते हैं। गलवान घाटी में चीन के साथ जो तनाव हुआ था, उस दौरान इन्हीं विमानों ने रातोंरात हजारों सैनिकों को लद्दाख पहुंचाया था।

परिवहन विमान तीन श्रेणियों में आते हैं: लाइट (20 टन तक), मीडियम (20-30 टन) और हेवी (40 टन से अधिक)। यह टेंडर मीडियम कैटेगरी के लिए है, यानी ऐसे विमान जो 18-30 टन वजन उठा सकें और छोटे, अधूरे बने रनवे से भी उड़ान भर सकें।

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कौन-कौन हैं इस रेस में?

इस डील में तीन बड़े विदेशी निर्माताओं ने अपनी दावेदारी पेश की है, और उनके साथ भारतीय कंपनियां भी जुड़ी हुई हैं:

1. Embraer C-390 Millennium + Mahindra Defence

ब्राजील की कंपनी Embraer ने अपने C-390 Millennium को पेश किया है, जिसकी क्षमता 26 टन है। यह जेट-संचालित आधुनिक विमान है, जिसकी गति अच्छी है और रखरखाव भी आसान माना जाता है। भारत में Mahindra Defence इसके स्थानीय उत्पादन की जिम्मेदारी संभालेगी। देखा जाए तो Mahindra के लिए यह एयरोस्पेस सेक्टर में बड़ी एंट्री का मौका है।

2. Lockheed Martin C-130J Super Hercules + TATA Advanced Systems

अमेरिकी दिग्गज Lockheed Martin का C-130J Super Hercules पहले से ही भारतीय वायुसेना में सेवारत है। इसका मतलब है कि पायलट प्रशिक्षित हैं, रखरखाव की व्यवस्था मौजूद है और स्पेयर पार्ट्स का पूरा इकोसिस्टम तैयार है। TATA Advanced Systems इसके निर्माण में साझेदार होगी। लेकिन यहां एक पेच है—इसकी क्षमता केवल 20 टन है, जो टेंडर की न्यूनतम जरूरत को पूरा तो करती है, लेकिन भविष्य की मांग के लिहाज से कम पड़ सकती है।

3. Airbus A400M Atlas + HAL

यूरोपीय कंपनी Airbus का A400M Atlas सबसे शक्तिशाली विकल्प है, जिसकी अधिकतम क्षमता 37 टन है। यह सबसे भारी वजन उठा सकता है और लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है। संभावना है कि HAL (Hindustan Aeronautics Limited) इसके स्थानीय उत्पादन में भागीदार बने। हालांकि यह विकल्प सबसे महंगा भी है।

48 विमान भारत में क्यों बनाए जाएंगे?

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि केवल 12 विमान आयात किए जाएंगे, जबकि बाकी 48 भारत में निर्मित होंगे। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं।

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पहला, आत्मनिर्भरता। अगर भारत अपने विमान खुद बना सके, तो स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड और रखरखाव के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। राफेल डील में यही दिक्कत आई थी—सारे विमान फ्रांस से आयात करने पड़े, क्योंकि भारत में उत्पादन की योजना समय पर पूरी नहीं हो सकी।

दूसरा, रोजगार और तकनीकी विकास। 48 विमानों का निर्माण मतलब हजारों इंजीनियरों, तकनीशियनों और कुशल श्रमिकों की जरूरत। इससे न केवल प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ेगा, बल्कि सप्लाई चेन में शामिल सैकड़ों छोटी-बड़ी कंपनियों को भी फायदा होगा। इसे अर्थशास्त्री “Industrial Spillover Effect” कहते हैं।

तीसरा, MRO Hub बनना। Maintenance, Repair and Overhaul (MRO) की सुविधाएं अगर भारत में मजबूत हो जाएं, तो पड़ोसी देशों के विमान भी यहां रखरखाव के लिए आ सकते हैं। इससे विदेशी मुद्रा की कमाई होगी।

कौन सा विमान चुना जाएगा?

अभी यह फैसला होना बाकी है। C-130J को फायदा है क्योंकि यह पहले से इस्तेमाल में है, लेकिन इसकी क्षमता कम है। C-390 एक संतुलित विकल्प है—आधुनिक, मध्यम क्षमता वाला और अपेक्षाकृत सस्ता। A400M सबसे शक्तिशाली है, लेकिन महंगा भी।

फैसला तकनीकी क्षमता, कीमत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की शर्तों और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट पर निर्भर करेगा। रक्षा मंत्रालय अगले कुछ महीनों में विस्तृत Request for Proposal (RFP) जारी करेगा, जिसमें सभी शर्तें स्पष्ट होंगी।

क्या यह डील राफेल से अलग होगी?

राफेल डील में सबसे बड़ी समस्या यह रही कि भारत में निर्माण की योजना अधूरी रह गई। आखिरकार सभी 36 विमान फ्रांस से ही मंगाने पड़े, जिससे कीमत बढ़ गई और तकनीकी हस्तांतरण नहीं हो पाया।

इस बार सरकार ने साफ कर दिया है कि 48 विमानों का निर्माण भारत में अनिवार्य है। यह शर्त टेंडर का हिस्सा है, न कि सिर्फ एक इरादा। इसका मतलब है कि जो भी कंपनी जीतेगी, उसे भारत में फैक्ट्री लगानी होगी, भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित करना होगा और सप्लाई चेन को स्थानीय बनाना होगा।

150 ट्रेनर एयरक्राफ्ट भी जरूरी

इस डील में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—150 ट्रेनर एयरक्राफ्ट की खरीद। क्योंकि नए विमान तो आ जाएंगे, लेकिन उन्हें उड़ाएगा कौन? पायलटों को प्रशिक्षित करने के लिए ट्रेनर विमानों की जरूरत होती है, जो सिम्युलेटर से अलग होते हैं। यह डील भी साथ-साथ आगे बढ़ रही है, ताकि पायलट तैयार रहें जब विमान डिलीवर हों।

भारतीय कंपनियों के लिए सुनहरा मौका

TATA Advanced Systems पहले से ही C-295 परिवहन विमानों के निर्माण में Airbus के साथ काम कर रही है। गुजरात में इसकी फैक्ट्री पहले ही शुरू हो चुकी है। अगर C-130J की डील मिलती है, तो TATA का एयरोस्पेस में दबदबा और मजबूत हो जाएगा।

Mahindra Defence के लिए यह पहला बड़ा एयरोस्पेस प्रोजेक्ट हो सकता है। अगर C-390 चुना जाता है, तो Mahindra अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन का हिस्सा बनेगा और भविष्य में निर्यात के अवसर भी खुलेंगे।

HAL पहले से ही Su-30MKI, Light Combat Aircraft (Tejas) और हेलीकॉप्टरों का निर्माण करता है। A400M की डील मिलने से HAL की भारी विमान निर्माण की क्षमता बढ़ेगी।

टाइमलाइन और चुनौतियां

रक्षा खरीद प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है। RFI के बाद RFP आएगा, फिर तकनीकी मूल्यांकन, कीमत की बोली, बातचीत और आखिरकार अनुबंध। इस पूरी प्रक्रिया में आसानी से 2-3 साल लग सकते हैं।

उसके बाद विमानों का निर्माण शुरू होगा। पहले 12 विमान विदेश से आएंगे (शायद 2-3 साल में), और फिर भारत में निर्माण शुरू होगा। कुल मिलाकर, सभी 60 विमानों की डिलीवरी में 8-10 साल लग सकते हैं।

इस बीच Antonov An-32 को किसी तरह चालू रखना होगा, जो एक बड़ी चुनौती है।


मुख्य बातें (Key Points)

  • भारत 60 मध्यम श्रेणी के परिवहन विमान खरीदेगा, जिनमें से 48 देश में ही बनेंगे
  • TATA (C-130J), Mahindra (C-390) और संभवतः HAL (A400M) इस रेस में शामिल हैं
  • यह डील करीब ₹1 लाख करोड़ की है और Make in India का सबसे बड़ा एयरोस्पेस प्रोजेक्ट बन सकती है
  • पुराने Antonov An-32 विमानों को बदलना जरूरी हो गया है क्योंकि वे 30-40 साल पुराने हो चुके हैं
  • 150 ट्रेनर एयरक्राफ्ट की खरीद भी साथ-साथ हो रही है ताकि पायलट समय पर तैयार हों
  • स्थानीय निर्माण से हजारों नौकरियां बनेंगी और भारत MRO Hub बन सकता है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: भारत को 60 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की जरूरत क्यों है?

मौजूदा Antonov An-32 विमान 30-40 साल पुराने हो चुके हैं और इनकी रखरखाव लागत बढ़ती जा रही है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में सैनिकों और रसद की त्वरित आपूर्ति के लिए आधुनिक परिवहन विमान राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत हैं।

Q2: 48 विमान भारत में क्यों बनाए जाएंगे, सभी 60 आयात क्यों नहीं किए जाते?

स्थानीय निर्माण से भारत आत्मनिर्भर बनेगा, रोजगार बढ़ेगा, तकनीकी हस्तांतरण होगा और रखरखाव आसान हो जाएगा। इससे भविष्य में स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता खत्म होगी।

Q3: TATA, Mahindra और HAL में से कौनसी कंपनी की संभावना सबसे ज्यादा है?

अभी फैसला होना बाकी है। TATA के पास C-130J को लेकर अनुभव का फायदा है, Mahindra का C-390 तकनीकी रूप से संतुलित है, और HAL का A400M सबसे शक्तिशाली विकल्प है। अंतिम चयन तकनीकी क्षमता, कीमत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर निर्भर करेगा।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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