Interstate Water Dispute India – पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है, यह भारत में राज्यों के बीच दशकों से चली आ रही लड़ाई का केंद्र है। देखा जाए तो भारत में दो अलग-अलग राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों के बीच किसी नदी या जल निकाय को लेकर जो विवाद चल रहे हैं, वे केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं हैं – इनमें संपत्ति अधिकारों का टकराव, खाद्य सुरक्षा की चिंताएं, आर्थिक हितों की जंग और एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र की कमी शामिल है।
भारत में 25 प्रमुख नदी बेसिन हैं। और सबसे दिलचस्प बात – ज्यादातर नदियां कई राज्यों से होकर गुजरती हैं। मध्य प्रदेश से नर्मदा का उद्गम होता है, लेकिन वह अरब सागर में खंभात की खाड़ी में जाकर मिलती है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां नदियां राज्य की सीमाएं भी तय करती हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि नदी बेसिन साझा संसाधन (Shared Resources) हैं। इस पानी के संरक्षण, समान बंटवारे और टिकाऊ उपयोग के लिए राज्यों के बीच समन्वय और केंद्र सरकार की पर्याप्त भागीदारी जरूरी है। लेकिन और बस यहीं से शुरू होती है असली कहानी – जब राज्य अपने-अपने हितों को लेकर आमने-सामने आ जाते हैं।
संघीय ढांचे में दोहरी चुनौती
समझने वाली बात यह है कि भारत के संघीय राजनीतिक ढांचे (Federal Political Structure) में अंतरराज्यीय विवाद किसी भी संघीय समाधान की दो स्तरों पर मांग करते हैं।
पहला, जब केवल राज्य शामिल हों। दूसरा, जब केंद्र और राज्य दोनों शामिल हों। यह ढांचा कई मुद्दों और अस्पष्टताओं को जन्म देता है, जिन्हें आज तक पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सका है।
जब से भारत गणतंत्र बना है, अंतरराज्यीय नदियां विवादों की जगह बन गई हैं। अगर गौर करें तो इस लड़ाई में संपत्ति अधिकारों की परस्पर विरोधी धारणाएं, खाद्य सुरक्षा के मुद्दे, आर्थिक साधनों की कमी, एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव – सभी ने ईंधन का काम किया है।
प्रमुख जल विवाद: कौन-कौन से राज्य लड़ रहे
भारत में आज कई बड़े जल विवाद चल रहे हैं, जिनमें से 9 प्रमुख विवादों को सुलझाने के लिए ट्रिब्यूनल्स (Tribunals) यानी विशेष न्यायिक निकाय बनाए गए हैं। आइए इनमें से कुछ प्रमुख विवादों को समझते हैं।
कृष्णा और गोदावरी नदी विवाद:
कृष्णा नदी को लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। वहीं गोदावरी नदी में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ये विवाद कई क्षेत्रों में फैले हुए हैं जो इन सभी राज्यों की सीमा पर उठाए गए हैं। सबसे ताजा विवाद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच है, क्योंकि दोनों राज्यों ने जल बोर्ड और केंद्र सरकार की सहमति के बिना कई परियोजनाएं शुरू कर दी हैं।
यहां केवल Interstate Water Dispute Act ही शामिल नहीं है, बल्कि 2014 का आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम (Andhra Pradesh Reorganisation Act 2014) भी स्वाभाविक रूप से शामिल हो जाता है। इस अधिनियम में अनिवार्य है कि दोनों राज्य किसी भी जल विवाद को लेकर एक केंद्रीय शीर्ष परिषद (Central Apex Council) का हिस्सा होंगे।
कृष्णा चार राज्यों से होकर गुजरने वाली एक पूर्व की ओर बहने वाली नदी है। इन राज्यों में अपनी सहायक नदियों के साथ कृष्णा 33% विशाल भूमि को कवर करती है और एक बड़ा बेसिन बनाती है। इतने समृद्ध संसाधनों के लिए विवाद होते आ रहे हैं।
गोदावरी विवाद क्यों बढ़ गया:
गोदावरी का विवाद भी इन्हीं कारणों से है। लेकिन पानी के बंटवारे में दिक्कतें तब बढ़ गईं जब 2014 में आंध्र प्रदेश से तेलंगाना अलग हुआ। इस दौरान आंध्र प्रदेश का पोलावरम बांध (Polavaram Dam) विवाद की जड़ बन गया।
तेलंगाना को डर था कि भले ही यह बांध आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों को सिंचाई प्रदान करेगा, लेकिन तेलंगाना के खम्मम जिले के बड़े हिस्से को डुबा देगा। ओडिशा ने भी अपनी चिंताएं जताई हैं।
कावेरी से लेकर रवि-ब्यास तक का पेच
इसी तरह कावेरी को लेकर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विवाद है। नर्मदा को लेकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र आपस में लड़ रहे हैं। महादाई, महानदी, रवि और ब्यास को लेकर भी कई राज्य आपस में उलझे हुए हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि इन विवादों में एक दिलचस्प मामला रवि और ब्यास का है। क्योंकि इन दोनों नदियों में अंतरराज्यीय विवाद के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्दा भी है – दोनों नदियां भारत में निकलती हैं और पाकिस्तान की सिंधु नदी (Indus River) में जाकर मिलती हैं।
हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) के मुताबिक दोनों नदियों को भारत नियंत्रित करेगा। तो अंतरराष्ट्रीय संघर्ष इस मामले में लगभग नगण्य है।
लेकिन राज्यों में ये दोनों नदियां पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच समस्या का कारण हैं। यह संघर्ष 2004 में गंभीर हो गया जब पंजाब ने पंजाब समझौतों की समाप्ति अधिनियम 2004 (Punjab Termination of Agreements Act 2004) लागू किया।
इस अधिनियम से रवि और ब्यास के जल बंटवारे से संबंधित सारे समझौते पंजाब में समाप्त कर दिए गए। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) दायर किया कि इस तरह के अधिनियम की संवैधानिक वैधता है या नहीं। यह मामला अब भी विचाराधीन है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में राय दी थी कि ऐसा अधिनियम संविधान के अनुरूप नहीं है।
1956 का Interstate River Water Dispute Act क्या है
देखा जाए तो इन विवादों को सुलझाने के लिए पिछले 70 सालों में कई संवैधानिक कदम उठाए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण है अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 (Interstate River Water Dispute Act 1956) – इसे संक्षेप में ISRWD Act भी कहते हैं।
यह अधिनियम सबसे पहले 28 अगस्त 1956 को लागू किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि यह उसी दिन लागू हुआ जिस दिन भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया था।
इसका उद्देश्य था कि अंतरराज्यीय विवाद जो नदियों और नदी घाटियों को लेकर पैदा होते हैं, उन्हें सुलझाया जाए। यह अधिनियम 2002 और 2019 में संशोधित किया गया है।
कब लागू होता है यह अधिनियम:
यह अधिनियम तब लागू किया जा सकता है जब:
• कोई नदी एक से अधिक राज्य से होकर गुजरती है
• इनमें से किसी भी राज्य के कार्य से दूसरे राज्य को प्रभाव पड़ता है
अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम राज्य क्या होते हैं
समझने वाली बात यह है कि इस अधिनियम के कानूनी अनुप्रयोग को दो स्वतंत्र भागों में देखा जा सकता है।
पहला: जब डाउनस्ट्रीम राज्य के कार्य किसी अपस्ट्रीम राज्य के हितों को प्रभावित करते हों। यह केवल एक मामले में होता है – जब डाउनस्ट्रीम राज्य (यानी वह राज्य जहां नदी बाद में पहुंचती है) अपस्ट्रीम राज्य के साथ साझा सीमा या सीमा के पास बांध या बैराज बना रहा हो। इससे अपस्ट्रीम राज्य का क्षेत्र जलमग्न (डूब) हो सकता है।
उदाहरण से समझें: कृष्णा नदी महाराष्ट्र के महाबलेश्वर से निकलकर कर्नाटक से होते हुए आंध्र प्रदेश में जाकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस मामले में:
• कर्नाटक के लिए केवल महाराष्ट्र अपस्ट्रीम राज्य है
• आंध्र प्रदेश के लिए कर्नाटक और महाराष्ट्र दोनों अपस्ट्रीम राज्य हैं
• आंध्र प्रदेश बाकी दोनों राज्यों के लिए डाउनस्ट्रीम राज्य है
दूसरा: जब अपस्ट्रीम राज्य किसी डाउनस्ट्रीम राज्य के हितों को प्रभावित करे। यह एक से अधिक तरीकों से हो सकता है क्योंकि जिस राज्य से नदी निकलती है, उस राज्य के पास कई विशेषाधिकार होते हैं।
अपस्ट्रीम राज्य नदी के पानी को सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उद्देश्य, भूजल रिचार्जिंग, नदी बेसिन के बाहर सूखे इलाकों में पानी स्थानांतरित करने जैसे कदम उठा सकता है। ऐसे में पानी की गुणवत्ता खराब होती है और डाउनस्ट्रीम राज्य को पानी तो मिलता है लेकिन ज्यादातर उसका कोई उपयोग नहीं रह जाता।
संविधान का अनुच्छेद 262 और कानूनी पहलू
जल विवाद से संबंधित मामलों पर भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 लागू होता है।
अनुच्छेद 262(1) कहता है कि संसद के पास विवादों में दखल देने की शक्ति है।
अनुच्छेद 262(2) में बताया गया है कि उपरोक्त खंड में उल्लिखित विवादों पर सुप्रीम कोर्ट या कोई अन्य न्यायालय अपना अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) प्रयोग नहीं करेगा।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत के संविधान में जल संबंधी विवादों को सुलझाने के लिए चार अधिनियम हैं। इनमें से तीन संघ सूची की प्रविष्टि 56 के तहत हैं:
- नदी बोर्ड अधिनियम 1956
- बेतवा नदी बोर्ड अधिनियम 1976
- ब्रह्मपुत्र बोर्ड अधिनियम 1980
ISRWD Act 1956 अनुच्छेद 262 के तहत राज्य सूची का हिस्सा है।
संघ सूची यानी केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले मामले और राज्य सूची वह है जिसमें राज्य सरकार का नियंत्रण होता है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जल संबंधी विषय सूची 2 यानी राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के मामले होते हैं। लेकिन यह प्रविष्टि सूची 1 की प्रविष्टि 56 के प्रावधानों के अनुसार होती है। और बस यहीं से कानूनों का अस्पष्ट होना शुरू हो जाता है।
तीन बड़ी संरचनात्मक अस्पष्टताएं
भारत में लंबे और जटिल अंतरराज्यीय जल विवादों को समझने के लिए हमें सबसे पहले मौजूदा प्रणाली की कमियों को देखना होगा।
जब भारत को आजादी मिली तब 571 रियासतें थीं जिन्हें राज्य बनाया गया। इस दौरान तीन मौलिक संरचनात्मक अस्पष्टताएं सामने आईं जो अब तक प्रणाली को प्रभावित कर रही हैं:
1. संघीय अधिकार क्षेत्र की अस्पष्टता (Federal Jurisdictional Ambiguity):
आजादी से पहले ब्रिटिश भारत और कई अर्ध-स्वायत्त रियासतें थीं। सरकार की शक्ति भारत सरकार अधिनियम 1919 और 1935 के तहत अत्यधिक केंद्रीकृत थी, जिसमें राज्यों का कोई कहना नहीं होता था। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता था।
स्वतंत्र भारत में विधायी शक्ति केंद्र और राज्यों के बीच बांट दी गई। उद्देश्य था कि जल उपयोग को अनुकूलतम किया जाए और राज्यों के हितों को संतुलित किया जाए।
भारतीय संविधान की अनुसूची 7 दरअसल राज्य के अंदर पानी के उपयोग और अंतरराज्यीय जल को नियंत्रित करने में अंतर करती है। यानी:
• कोई नदी दो राज्यों से होकर गुजरती है और विवाद पैदा होता है = मुख्य रूप से केंद्र सरकार का मुद्दा
• उसी नदी का हिस्सा किसी एक राज्य में है = राज्य सरकार का निर्णय
यह द्वैत संघीय अधिकार क्षेत्र की अस्पष्टता पैदा करता है।
2. ऐतिहासिक-भौगोलिक अस्पष्टता (Historical-Geographical Ambiguity):
लगातार बदलती सीमाएं मौजूदा अधिकार क्षेत्र और संसाधन बंटवारे के समझौतों को बदल देती हैं। इससे अंतरराज्यीय राजनीतिक तनाव बढ़ता है।
उदाहरण: 2014 में जब आंध्र प्रदेश से तेलंगाना अलग हुआ, तो कृष्णा और गोदावरी के सारे समीकरण बदल गए।
3. संस्थागत अस्पष्टता (Institutional Ambiguity):
यह तब पैदा होती है जब यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट शीर्ष निकाय है या ट्रिब्यूनल्स।
ट्रिब्यूनल्स की भूमिका: 9 बने, फिर भी विवाद अनसुलझे
संविधान में जल विवादों को सुलझाने के लिए ट्रिब्यूनल्स का उपयोग किया जाता है। आज तक भारत में 9 ट्रिब्यूनल्स बनाए गए हैं जो पूरे भारत में कई नदियों के पानी के वितरण और टिकाऊ उपयोग को तय करते हैं।
इन ट्रिब्यूनल्स को जल विवाद के मामले में शीर्ष निकाय समझा जा सकता है। संवैधानिक रूप से जल विवाद से सुप्रीम कोर्ट को बाहर रखा गया है। जी हां, अनुच्छेद 262 के तहत सुप्रीम कोर्ट जल विवादों पर कुछ नहीं कह सकती।
ट्रिब्यूनल्स क्यों बनाए गए:
ट्रिब्यूनल्स को विवाद समाधान के लिए उपयोग किया जाता है। हालांकि इनका काम संरचित और समयबद्ध होता है। ट्रिब्यूनल्स को शामिल करने से मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) जैसे संसाधन व्यवहार्य विकल्प बने रहते हैं।
अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बोल सकता और विवाद सीधे शीर्ष न्यायालय के सामने जाते, तो संघर्षों के विरोधाभासी परिणाम (Adversarial Outcomes) आ सकते थे।
राजनीतिक बातचीत की अनदेखी
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि न्यायिक-कानूनी निर्णय पर साहित्य की कमी नहीं है। ट्रिब्यूनल्स के बारे में हमें पढ़ने को मिल जाता है। लेकिन हम राजनीतिक बातचीत और मध्यस्थता पर कम ध्यान देते हैं।
यह भारतीय संघीय ढांचे में राज्यों और राज्य एवं केंद्र के बीच सहमति निर्माण (Consensus Building) का काम कर सकता है।
अंतरराज्यीय जल विवाद में शामिल पक्ष राजनीतिक रूप से सक्रिय इकाइयां होती हैं जो प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक राजनीति की सीमा में आती हैं। इसलिए विवाद समाधान को लेकर चर्चा का डोमेन “तकनीकी विशेषज्ञों को क्या करना चाहिए” से “लोकतांत्रिक रूप से क्या किया जा सकता है” पर स्थानांतरित होना चाहिए।
विवाद क्यों नहीं सुलझ रहे
हैरान करने वाली बात यह है कि इतने कानून, इतने ट्रिब्यूनल्स के बावजूद ये विवाद दशकों से लटके हुए हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:
1. ऐतिहासिक कारण: पुराने समझौते, बदलती सीमाएं, नए राज्यों का गठन
2. संस्थागत कारण: अस्पष्ट कानून, ओवरलैपिंग अधिकार क्षेत्र
3. राजनीतिक कारण: चुनावी राजनीति, क्षेत्रीय भावनाएं, वोट बैंक
4. पानी की बढ़ती कमी: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मीठे पानी की मांग में वृद्धि
5. जलवायु परिवर्तन: बारिश के पैटर्न में बदलाव, सूखे की बढ़ती घटनाएं
आगे की राह: क्या हो सकता है समाधान
देखा जाए तो ये जल विवाद कई सालों से लगातार चले आ रहे हैं। जो भी कानून और ट्रिब्यूनल्स बिठाए गए हैं, वे इन विवादों को सुलझाने में सक्षम साबित नहीं हुए हैं।
चिंता का विषय यह है कि विवाद समाधान में ऐतिहासिक, संस्थागत और राजनीतिक कारणों से देरी के कारण अब भी हैं। पिछले कुछ सालों में पानी की कमी, शहरी और ग्रामीण इलाकों में ताजे पानी की मांग में बढ़ोतरी और राजनीतिक गतिशीलता में मतभेद ने इन समस्याओं को और बढ़ा दिया है।
संभावित समाधान:
• त्वरित ट्रिब्यूनल प्रक्रिया – समय सीमा तय करना
• राज्यों के बीच सीधी बातचीत को प्रोत्साहन
• केंद्र सरकार की सक्रिय मध्यस्थता
• वैज्ञानिक जल प्रबंधन और डेटा शेयरिंग
• नदी बेसिन प्रबंधन दृष्टिकोण
• राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनता की जागरूकता
समझने वाली बात यह है कि जल केवल एक संसाधन नहीं, जीवन है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा सभी राज्यों की जिम्मेदारी है।
मुख्य बातें (Key Points)
• भारत में 25 प्रमुख नदी बेसिन हैं और ज्यादातर नदियां कई राज्यों से होकर गुजरती हैं
• कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा, रवि-ब्यास जैसी नदियों पर दशकों से विवाद चल रहे हैं
• Interstate River Water Dispute Act 1956 मुख्य कानून है, 2002 और 2019 में संशोधित
• आज तक 9 प्रमुख जल विवादों के लिए विशेष ट्रिब्यूनल्स बनाए गए हैं
• संविधान का अनुच्छेद 262 जल विवादों पर सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करता है
• अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम राज्यों के बीच अधिकारों का टकराव मुख्य मुद्दा
• संघीय, ऐतिहासिक-भौगोलिक और संस्थागत अस्पष्टताएं विवादों को बढ़ा रही हैं
• राजनीतिक बातचीत और समझौते की जरूरत, केवल कानूनी समाधान काफी नहीं
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