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The News Air - Breaking News - Indian Rupee: ₹95 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर, जानें RBI की पूरी रणनीति

Indian Rupee: ₹95 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर, जानें RBI की पूरी रणनीति

विदेशी निवेशकों की पलायन और ऑफशोर ट्रेडिंग ने रुपये को धकेला ऐतिहासिक निचले स्तर पर, आरबीआई ने बैंकों पर लगाई पूर्ण पाबंदी

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 15 अप्रैल 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस
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Indian Rupee
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Indian Rupee Crisis : भारतीय रुपया अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर ₹95 प्रति डॉलर पर पहुंच गया है। 2025 में जब रुपये को ‘एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी’ घोषित किया गया था, तब विश्लेषक कह रहे थे कि यह ₹90 का आंकड़ा भी पार कर सकता है। लेकिन आज की स्थिति देखें तो ₹90 का स्तर भी अब अच्छा लगने लगा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास $650 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार होने के बावजूद रुपये की गिरावट नहीं रुक पाई।

देखा जाए तो यह सिर्फ एक संख्या नहीं है। ₹95 प्रति डॉलर का मतलब है कि अब आपको एक डॉलर खरीदने के लिए ₹95 खर्च करने होंगे। और इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है—महंगाई के रूप में, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और रोजमर्रा के सामान की बढ़ती कीमतों में।

आम आदमी पर कैसे पड़ता है असर?

समझने वाली बात यह है कि जब रुपया कमजोर होता है तो इम्पोर्टेड इनफ्लेशन यानी आयातित महंगाई सबसे पहले दस्तक देती है। मान लीजिए किसी उत्पाद की कीमत $1000 है और आप उसे बाहर से मंगवा रहे हैं। जब एक्सचेंज रेट ₹80 था, तो आपको ₹80,000 खर्च करने पड़ते थे। लेकिन अब ₹95 के रेट पर वही सामान ₹95,000 में मिलेगा।

अब इसका मल्टीप्लायर इफेक्ट समझिए। भारत की सबसे बड़ी आयातित वस्तु क्रूड ऑयल है, जिसका इस्तेमाल सभी उद्योगों में होता है। जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं। इससे ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है। नतीजा—हर सामान महंगा हो जाता है। और अंत में यह बोझ आम उपभोक्ता पर आ जाता है।

रुपये की गिरावट के पीछे बड़े कारण

अगर गौर करें तो रुपये के ₹95 तक गिरने के पीछे कुछ बड़े फंडामेंटल कारक हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण है पश्चिम एशिया में चल रहा संकट। इजराइल-ईरान तनाव और मध्य पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति ने क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं। चूंकि भारत अपनी तेल जरूरत का 85% आयात करता है, इसलिए महंगा तेल मतलब ज्यादा डॉलर की जरूरत।

दूसरा बड़ा कारण है कैपिटल फ्लाइट यानी विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना। खासकर संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार से अपना पैसा बाहर ले जा रहे हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि जब भारत की सबसे बड़ी आयातित वस्तु महंगी हो रही है, तो यहां की इंडस्ट्रीज उतना मुनाफा नहीं कमा पाएंगी। इसलिए यहां रुकना फायदेमंद नहीं है।

जब ये निवेशक अपना पैसा निकालते हैं तो उन्हें रुपये को डॉलर में बदलना पड़ता है। इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। और जब मांग बढ़ती है तो कीमत भी बढ़ती है। यह एक दुष्चक्र है।

आरबीआई का स्टैंडर्ड प्लेबुक—फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल

आरबीआई के पास एक स्टैंडर्ड प्लेबुक है ऐसे हालात के लिए। जब बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है, तो आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर बाजार में तरलता लाता है। इससे रुपये पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।

दिलचस्प बात यह है कि आरबीआई का उद्देश्य रुपये को पूरी तरह स्थिर करना नहीं, बल्कि उसके उतार-चढ़ाव को स्मूद करना है। ताकि इम्पोर्टर्स, एक्सपोर्टर्स और देश के आम नागरिक इस बदलाव के साथ एडजस्ट कर सकें। आरबीआई इंटरवेंशन करता है, लेकिन बाजार को पूरी तरह कंट्रोल नहीं करता।

आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार पहले $700 बिलियन डॉलर से ऊपर था। लेकिन रुपये को संभालने के लिए लगातार डॉलर बेचने से यह घटकर अब $650 बिलियन डॉलर के आसपास आ गया है। यह दिखाता है कि आरबीआई कितनी मेहनत कर रहा है रुपये को संभालने की।

ऑफशोर मार्केट—जहां आरबीआई का कोई कंट्रोल नहीं

अब यहां से असली कहानी शुरू होती है। आरबीआई का स्टैंडर्ड प्लेबुक तो सिर्फ ऑनशोर यानी भारतीय बाजार में काम करता है। लेकिन एक पैरेलल वर्ल्ड है—ऑफशोर मार्केट। यहां NDF (Non-Deliverable Forwards) की ट्रेडिंग होती है, जहां रुपये पर सट्टेबाजी चलती है।

क्या है यह एनडीएफ मार्केट? यह एक तरह का करेंसी बेट है। मान लीजिए कोई ट्रेडर कहता है कि 3 दिन बाद डॉलर की कीमत ₹85 हो जाएगी। अभी ₹83 है। तो एक कॉन्ट्रैक्ट हो गया। लेकिन यहां कोई रुपये या डॉलर का असली एक्सचेंज नहीं होता। सिर्फ प्रॉफिट या लॉस की सेटलमेंट होती है, वह भी डॉलर में।

अगर 3 दिन बाद डॉलर ₹86 पर पहुंच गया, तो जिसने ₹85 का बेट लगाया था उसे ₹1 प्रति डॉलर का फायदा हुआ। यह फायदा उसे डॉलर में मिलेगा। अगर डॉलर ₹82 पर रह गया, तो ₹3 का नुकसान हुआ। यह भी डॉलर में सेटल होगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पूरी ट्रेडिंग सिंगापुर, लंदन, हांगकांग जैसे शहरों में होती है। आरबीआई का यहां कोई अधिकार नहीं है। और यहां रोजाना $40-50 बिलियन डॉलर की ट्रेडिंग होती है—जो भारत की खुद की घरेलू मार्केट से ज्यादा है!

ऑनशोर बनाम ऑफशोर—दो अलग दुनिया

समझा जाए तो ऑनशोर मार्केट मुंबई में है। यहां आरबीआई की निगरानी है, कैपिटल कंट्रोल्स हैं, और असली रुपये का एक्सचेंज होता है। आरबीआई इसे मैनेज करने की पूरी कोशिश करता है।

वहीं ऑफशोर मार्केट सिंगापुर, लंदन, हांगकांग में है। यहां आरबीआई का कोई कंट्रोल नहीं। सेटलमेंट रुपये में नहीं, बल्कि डॉलर में होती है। सिर्फ रुपये पर स्पेकुलेशन चलती है। यह एक फ्री मार्केट है जो ग्लोबल पेसिमिज्म के हिसाब से रिएक्ट करती है कि “हां, रुपया और गिरेगा”।

इसी स्पेकुलेशन की वजह से ऑफशोर मार्केट में रुपया ज्यादा कमजोर दिखता है। जहां घरेलू बाजार में डॉलर ₹92 पर चल रहा होता है, वहीं ऑफशोर मार्केट में एनडीएफ ट्रेडिंग में यह ₹94 पर चल रहा होता है। यह अंतर ही असली समस्या है।

बैंकों का आर्बिट्राज गेम—मनी मशीन की कहानी

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। जब दो अलग-अलग बाजारों में एक ही चीज की अलग-अलग कीमत हो, तो अवसर बनता है आर्बिट्राज का। भारतीय बैंकों ने यही किया।

कैसे? मान लीजिए ऑनशोर मार्केट में डॉलर की कीमत ₹93 है और ऑफशोर मार्केट में ₹94। तो बैंक क्या करते थे? भारत में सस्ते में डॉलर खरीद लेते थे (₹93 में) और ऑफशोर मार्केट में महंगे में बेच देते थे (₹94 में)। बीच का 50 पैसे से ₹1 तक का प्रॉफिट बिना किसी रिस्क के पॉकेट में।

यह सिग्निफिकेंट पैसा था। और सबसे बड़ी बात—इसमें कोई जोखिम नहीं था। यह शुद्ध आर्बिट्राज था। दो पैरेलल मार्केट्स में एक जगह स्पेकुलेशन होने की वजह से जो अंतर बना, उसका फायदा उठाया गया।

लेकिन समस्या यह थी कि जो आरबीआई रुपये की गिरावट को रोकने के लिए डॉलर बेच रहा था, वही बैंक उन डॉलरों को ऑफशोर मार्केट में बेचकर मुनाफा कमा रहे थे। यानी आरबीआई का प्रयास बेअसर हो रहा था।

आरबीआई ने बैंकों पर लगाई $50 मिलियन की कैपिंग

जब आरबीआई को यह बात समझ आई, तो उसने सख्त कदम उठाया। सभी बैंकों को निर्देश दिया गया कि उनकी फॉरेक्स पोजीशन (विदेशी मुद्रा में निवेश) अधिकतम $50 मिलियन तक ही सीमित रहेगी। इससे ज्यादा नहीं। और जल्द से जल्द इन पोजीशंस को वाइंड अप (बंद) करना होगा।

इस निर्देश के बाद बैंकों ने क्या किया? उन्होंने अपनी $30-40 बिलियन डॉलर की आर्बिट्राज ट्रेडिंग को अनवाइंड करना शुरू कर दिया। मतलब उन्हें घरेलू बाजार में डॉलर बेचने पड़े और ऑफशोर मार्केट से डॉलर खरीदने पड़े।

आरबीआई तो यही चाहता था कि बैंक घरेलू बाजार में डॉलर बेचें। लेकिन साथ ही उन्हें ऑफशोर मार्केट से डॉलर खरीदने भी पड़े। इससे क्या हुआ? ऑफशोर मार्केट में डॉलर की मांग और बढ़ गई। और जो अंतर पहले 50 पैसे का था, वह बढ़कर ₹1 तक हो गया।

कॉर्पोरेट्स ने देखा मौका—और पैसा बनाया

जब यह ₹1 का गैप बना, तो भारतीय कॉर्पोरेट्स ने इसे मौके के रूप में देखा। उन्होंने सोचा कि जो काम बैंक कर रहे थे, वही हम भी कर सकते हैं। और फिर कॉर्पोरेट्स ने ऑफशोर एनडीएफ मार्केट में भारी मात्रा में ट्रेडिंग शुरू कर दी।

हैरान करने वाली बात यह है कि 30 मार्च के आसपास जब आरबीआई ने बैंकों पर पाबंदी लगाई, उसके तुरंत बाद कॉर्पोरेट्स की ट्रेडिंग सात गुना बढ़ गई। एक ही दिन में! यह स्पष्ट संकेत था कि वे उस अंतर का फायदा उठाने के लिए दौड़ पड़े थे।

इससे ऑनशोर मार्केट में डॉलर की मांग फिर से बढ़ गई। और रुपया ₹95 के ऑल टाइम लो लेवल को छू गया। कहीं न कहीं आरबीआई का प्रयास फिर से बेअसर हो गया।

आरबीआई ने लगाई पूर्ण पाबंदी

जब यह मामला आरबीआई की नजर में आया, तो उसने और सख्त कदम उठाया। आरबीआई ने सभी बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे किसी भी प्रकार के क्लाइंट—चाहे वह भारतीय कॉर्पोरेट हो, रेजिडेंट हो या नॉन-रेजिडेंट—के लिए ऑफशोर रुपी बेट्स में भाग नहीं लेंगे।

कंप्लीट बैन लगा दिया गया। क्योंकि जो ट्रेडिंग कॉर्पोरेट्स कर रहे थे, वह भी बैंकों के माध्यम से ही हो रही थी। बैंक अपनी तरफ से नहीं कर रहे थे, लेकिन कॉर्पोरेट्स के ऑर्डर एक्जीक्यूट कर रहे थे। आरबीआई ने कहा—यह भी बंद।

इस तरह उस लीकेज पर पूरी तरह से प्लग लगा दिया गया, ताकि रुपये की वैल्यू पर जो दबाव पड़ा था, वह कम हो सके।

क्या बैंक ही थे असली खिलाड़ी?

यहां पर एक और इंटरेस्टिंग पॉइंट है। आरबीआई अब यह जांच कर रहा है कि कहीं कॉर्पोरेट्स सिर्फ नाम के लिए तो नहीं थे और असली मुनाफा बैंकों ने ही कमाया? मतलब बैंकों ने कॉर्पोरेट्स के नाम पर अपना पैसा रीरूट किया और प्रॉफिट बनाया।

अगर यह सच निकला, तो बैंकों पर और बड़ी कार्रवाई हो सकती है। फिलहाल जांच चल रही है।

फंडामेंटल समस्या अभी भी बरकरार

राहत की बात यह है कि आरबीआई ने स्पेकुलेटिव होल्स को प्लग कर दिया है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि अंडरलाइंग प्रेशर अभी भी है। ईरान का युद्ध और कैपिटल फ्लाइट—ये दोनों फंडामेंटल कारक अभी भी मौजूद हैं।

जब तक पश्चिम एशिया में स्थिति सामान्य नहीं होती और क्रूड ऑयल की कीमतें नहीं घटतीं, तब तक रुपये पर दबाव बना रहेगा। और जब तक विदेशी निवेशक वापस नहीं आते, तब तक डॉलर की मांग बनी रहेगी।

दीर्घकालिक समाधान—आयात निर्भरता घटाना

देखा जाए तो रुपये का ₹95 तक गिरना एक बड़ी चेतावनी है कि भारत को अपनी आयात निर्भरता कम करनी होगी। खासकर क्रूड ऑयल में। हमें अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और उत्पादन को इतना मजबूत करना होगा कि बाहर से कम चीजें मंगवानी पड़ें।

इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन (आयात प्रतिस्थापन) की नीतियां लानी होंगी। रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाना होगा ताकि तेल की निर्भरता कम हो। यह लंबी लड़ाई है, लेकिन जरूरी है।

क्यों भारत में पार्शियल कन्वर्टिबिलिटी है?

एक सवाल यह भी उठता है कि यह पैरेलल प्राइसिंग यूनिवर्स क्यों बनी? इसका जवाब है—भारत का कैपिटल अकाउंट पूरी तरह से कन्वर्टिबल नहीं है। रुपये का फ्री फ्लो मूवमेंट नहीं है। कैपिटल कंट्रोल्स हैं।

इसीलिए ऑफशोर मार्केट में एनडीएफ जैसे इंस्ट्रूमेंट्स बने, जहां रुपये पर बिना असली एक्सचेंज के ट्रेडिंग होती है। यह एक स्ट्रक्चरल मुद्दा है।

आरबीआई का बैलेंसिंग एक्ट

समझने वाली बात यह भी है कि आरबीआई की भूमिका बहुत नाजुक है। उसे रुपये को न तो बहुत कमजोर होने देना है (क्योंकि महंगाई बढ़ेगी), और न ही बहुत मजबूत होने देना है (क्योंकि एक्सपोर्ट महंगे हो जाएंगे)।

आरबीआई इंटरवेंशन करता है ताकि ट्रांजिशन स्मूद हो। जितने भी स्टेकहोल्डर्स हैं—इम्पोर्टर्स, एक्सपोर्टर्स, आम जनता—सभी इस बदलाव के साथ एडजस्ट कर सकें। यह एक बैलेंसिंग एक्ट है।

आगे का रास्ता—पॉलिसी रिफॉर्म्स जरूरी

हैरान करने वाली बात यह है कि $650 बिलियन का फॉरेक्स रिजर्व होने के बावजूद रुपया ₹95 तक गिर गया। इसका मतलब है कि सिर्फ रिजर्व से काम नहीं चलेगा। स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स चाहिए।

भविष्य की नीतियों में इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन, डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बूस्ट करना, रिन्यूएबल एनर्जी, और ऑफशोर मार्केट्स पर बेहतर नियंत्रण—ये सभी पहलू शामिल होने चाहिए।

क्या है करेंट और कैपिटल ट्रांजैक्शन में अंतर?

यहां पर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि भारत के रुपी कन्वर्टिबिलिटी फ्रेमवर्क के तहत कौन-से ट्रांजैक्शन पूरी तरह अनुमत हैं? करेंट अकाउंट ट्रांजैक्शन (जैसे ट्रेड, सर्विसेज) पूरी तरह कन्वर्टिबल हैं। लेकिन कैपिटल अकाउंट ट्रांजैक्शन (जैसे निवेश, लोन) में पार्शियल कन्वर्टिबिलिटी है।

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यही कारण है कि एनडीएफ मार्केट जैसे इंस्ट्रूमेंट्स ऑफशोर में बने, क्योंकि भारत में पूरी छूट नहीं है।


मुख्य बातें (Key Points)

• ₹95 का ऐतिहासिक निचला स्तर: भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ₹95 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, 2025 में एशिया की सबसे खराब करेंसी घोषित

• पश्चिम एशिया संकट और कैपिटल फ्लाइट: ईरान युद्ध से क्रूड ऑयल महंगा, विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, डॉलर की मांग बढ़ रही है

• ऑफशोर NDF मार्केट: सिंगापुर, लंदन, हांगकांग में $40-50 बिलियन रोजाना की रुपी स्पेकुलेशन, आरबीआई का कोई कंट्रोल नहीं

• बैंकों का आर्बिट्राज गेम: भारतीय बैंकों ने ऑनशोर-ऑफशोर प्राइस डिफरेंस से प्रति डॉलर 50 पैसे से ₹1 तक मुनाफा कमाया

• आरबीआई की सख्ती: $50 मिलियन की फॉरेक्स पोजीशन कैपिंग लगाई, फिर सभी ऑफशोर रुपी बेट्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया

• कॉर्पोरेट्स की एंट्री: बैंकों पर पाबंदी के बाद भारतीय कॉर्पोरेट्स ने ट्रेडिंग 7 गुना बढ़ाई, फिर उन पर भी बैन लगा

• आयातित महंगाई का खतरा: रुपये की गिरावट से इम्पोर्टेड इनफ्लेशन बढ़ेगी, पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा के सामान महंगे होंगे


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: रुपया ₹95 प्रति डॉलर पर पहुंचने का आम आदमी पर क्या असर होगा?

रुपये की गिरावट से इम्पोर्टेड इनफ्लेशन बढ़ेगी। क्रूड ऑयल महंगा होगा, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो हर सामान की कीमत बढ़ेगी। विदेश यात्रा, पढ़ाई और इलाज भी महंगे होंगे। आम उपभोक्ता की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।

प्रश्न 2: NDF (Non-Deliverable Forward) मार्केट क्या है और यह रुपये को कैसे प्रभावित करती है?

NDF एक ऑफशोर डेरिवेटिव है जहां रुपये पर सट्टेबाजी होती है बिना असली रुपये के एक्सचेंज के। सिंगापुर, लंदन में यह ट्रेडिंग होती है। जब यहां रुपये पर नेगेटिव सेंटिमेंट होता है तो स्पेकुलेशन से रुपये की वैल्यू और गिरती है। आरबीआई का यहां कोई नियंत्रण नहीं होने से यह बड़ी समस्या है।

प्रश्न 3: आरबीआई ने बैंकों और कॉर्पोरेट्स पर क्या पाबंदी लगाई है?

आरबीआई ने पहले बैंकों की फॉरेक्स पोजीशन $50 मिलियन तक सीमित की। फिर सभी बैंकों को निर्देश दिया कि वे किसी भी क्लाइंट (भारतीय या विदेशी) के लिए ऑफशोर रुपी बेट्स में भाग नहीं लेंगे। यह कंप्लीट बैन है ताकि स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग से रुपये पर पड़ने वाले दबाव को रोका जा सके।

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