Land Dispute यानी सीमा विवाद सिर्फ देशों के बीच ही नहीं, बल्कि भारत के राज्यों के बीच भी एक बड़ी समस्या है। जब आप भारत का नक्शा देखते हैं तो राज्यों के नाम, राजधानियां और भौगोलिक स्थिति तो दिखती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन राज्यों की सीमाएं कौन तय करता है? और सबसे बड़ा सवाल – क्या राज्यों के बीच भी जमीन को लेकर झगड़े होते हैं?
जवाब है – हां। और यह विवाद कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि कुछ मामले तो पांच दशकों से भी ज्यादा पुराने हैं। देखा जाए तो इन Land Dispute में सैकड़ों लोगों की जानें गई हैं, हजारों विस्थापित हुए हैं और आज भी कई मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े हैं।
राज्यों की सीमाएं कौन तय करता है?
दोस्तों, समझने वाली बात यह है कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 3 के तहत संसद को ही राज्यों को बनाने, जोड़ने, विभाजित करने और उनकी सीमाएं तय करने का एकमात्र अधिकार है। राज्य सरकारों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती।
अब कल्पना कीजिए कि संसद ने एक राज्य ‘A’ को ‘B’ और ‘C’ में बांट दिया। इस प्रक्रिया में कई किसान, इमारतें, क्षेत्र और सरकारी परियोजनाएं भी दो राज्यों के बीच बंट जाएंगी। बस यहीं से शुरू होती है असली कहानी – विवाद की। और इन्हें सुलझाने के लिए कई संवैधानिक उपाय, अंतर-राज्य बातचीत, आयोग और संसदीय समितियां बनती हैं। पर सच तो यह है कि दशकों बाद भी कई मामले अनसुलझे हैं।
1947 के बाद कैसे बने राज्य, जानें पूरा इतिहास
भारत की आजादी के समय देश में 571 रियासतें थीं। इन्हें मिलाकर 27 राज्य बनाए गए थे। शुरुआत में राज्यों की ग्रुपिंग राजनीतिक और ऐतिहासिक आधार पर की गई थी, भाषा को आधार नहीं बनाया गया था। लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी थी।
जल्द ही बहुभाषी प्रकृति और 27 राज्यों में आंतरिक मतभेदों को सुलझाने के लिए स्थायी पुनर्गठन की जरूरत महसूस हुई। 1948 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज एस के धार को सरकार ने एक आयोग का प्रमुख बनाया, जो राज्यों को भाषाई आधार पर पुनर्गठित करने की जरूरत देखेगा। हालांकि आयोग ने यह विभाजन प्रशासनिक सुविधा, ऐतिहासिक और भौगोलिक आधार पर करना ठीक समझा।
दिसंबर 1948 में JVP समिति बनी जिसमें जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया थे। इस समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को नकारा। लेकिन कहा कि जनता की मांग पर इस मुद्दे को नए सिरे से देखा जा सकता है।
पोट्टी श्रीरामुलु की मौत ने बदल दिया इतिहास
कुछ साल बीते और 1953 में भाषाई आधार पर पहला राज्य आंध्र प्रदेश बनाया गया, जिसमें तेलुगु भाषी आबादी थी। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह फैसला तब हुआ जब मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी लोगों ने लंबा आंदोलन किया और लंबी भूख हड़ताल की।
इस दौरान 56 दिनों की भूख हड़ताल में पोट्टी श्रीरामुलु की मौत हो गई और सरकार को विभाजन करना पड़ा। साथ ही देश के कई क्षेत्रों में ऐसी ही मांगें उठने लगीं कि भाषाई आधार पर राज्य बनाए जाएं। जवाहरलाल नेहरू ने इन मांगों पर विचार करने के लिए फजल अली के नेतृत्व में एक आयोग नियुक्त किया।
1955 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट देते हुए सलाह दी कि देश को 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने स्टेट रिऑर्गनाइजेशन एक्ट 1956 के तहत 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए।
1956 से अब तक बने 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश
अगर गौर करें तो 1956 के बाद भी राज्यों का निर्माण और विभाजन जारी रहा। 1960 में हिंसा और विरोध के कारण बॉम्बे राज्य को विभाजित कर गुजरात और महाराष्ट्र बनाए गए। 1963 में नागाओं की मांग मानते हुए नागालैंड को राज्य का दर्जा मिला।
1966 में शाह आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंजाब रिऑर्गनाइजेशन एक्ट पास हुआ और हरियाणा बना। चंडीगढ़ इस मामले में पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी रही। 1969 और 1971 में मेघालय और हिमाचल प्रदेश बनाए गए। 1975 में सिक्किम, 1987 में मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा को राज्य का दर्जा मिला।
वर्ष 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड बनाए गए। जून 2014 में आंध्र प्रदेश को विभाजित कर तेलंगाना बना। जनवरी 2020 में दमन और दीव तथा दादरा नगर हवेली को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म कर लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा 2019 में मिला।
आज देश में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश मौजूद हैं। हालांकि चर्चाएं हो रही हैं कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिया जा सकता है।
भाषा के आधार पर बंटवारा क्यों जरूरी था?
दिलचस्प बात यह है कि इस विभाजन में भाषा को आधार बनाना एक शानदार कदम था। क्योंकि इससे स्थानीय नागरिक प्रशासन में बड़ी संख्या में भाग ले सकते थे और सामान्य भाषा में संवाद कर सकते थे। भाषाई और भौगोलिक विशेषताएं साझा करने वाले क्षेत्रों में शासन आसान होता है। इससे स्थानीय भाषा यानी वर्नाकुलर लैंग्वेज का कॉन्सेप्ट भी विकसित हुआ जिसे अंग्रेजों ने लंबे समय तक नजरअंदाज किया था।
लेकिन इन विभाजनों के साथ-साथ कई समस्याएं भी खड़ी हो गईं। क्योंकि ये विभाजन पूरी तरह से संसद के हाथ में है, तो राज्यों की इसमें कोई भागीदारी नहीं होती। ऐसे में राज्यों के मुताबिक सीमाएं बनाना लगभग असंभव है।
असम-नागालैंड का 50 साल पुराना Land Dispute
सभी आयोगों और कानूनों से बने राज्यों में कुछ क्षेत्रों में लंबे समय से चले आ रहे विवाद हैं। इन Land Dispute पर सरकार समय-समय पर कदम उठाती आई है, पर अब भी कोई मजबूत समाधान सामने नहीं आया है।
भारत में कुछ राज्यों के बीच दशकों पुराने सीमा मुद्दे मौजूद हैं। झड़पें और विरोध लगातार होते रहे हैं। पर क्योंकि सहमति नहीं बन पाती है, तो केंद्र सरकार या आयोगों के फैसले लंबित हैं। कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, जिनके फैसलों का इंतजार है।
इस सिलसिले में पहला मामला है असम और नागालैंड का बॉर्डर डिस्प्यूट। 30 जून 2021 को ईस्ट मोजो में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक सीमा पर स्थित एक गांव में फिर तनाव हुआ था। ऐसे ही पहले भी कई बार झड़पों में जानें भी गई हैं। कभी इन राज्यों के निवासियों तो कभी सरकारों के बीच टकराव होता है।
पांच दशक हो चुके हैं, पर असम और नागालैंड का बॉर्डर डिस्प्यूट निर्णायक रूप से खत्म नहीं हुआ है। दोनों राज्य 434 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। पर 1963 में दोनों राज्यों के गठन के बाद से ही नागालैंड आक्रामक तरीके से असम में घुसपैठ कर रहा है। और ऊपरी असम में शिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट जिलों में विशाल भूमि पर घुसपैठ की है।
इस विवाद में पहली झड़प काकोडोंगा रिजर्व फॉरेस्ट में 1965 में हुई थी, जब गोलाघाट जिले में 100 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। इसके बाद से कई बार झड़पें रिपोर्ट हुई हैं।
सुंदरम और शास्त्री आयोग, पर समाधान नहीं
केंद्र सरकार ने सुंदरम आयोग 1971 में और 1985 में शास्त्री आयोग बनाकर इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की थी। दोनों आयोगों की रूलिंग असम के पक्ष में आई और नागालैंड ने समाधान को लागू करने से इनकार कर दिया। वर्तमान में असम का सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लंबित है जिसका फैसला अभी भी प्रतीक्षित है।
महाराष्ट्र-कर्नाटक: बेलगावी को लेकर विवाद
ऐसा ही एक केस 2004 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जो महाराष्ट्र और कर्नाटक का बॉर्डर डिस्प्यूट है। मुद्दा यह है कि महाराष्ट्र कर्नाटक की सीमा पर कर्नाटक के कुछ जिलों जैसे बेलगावी (बेलगाम), उत्तर कन्नड़, बीदर और गुलबर्गा में मौजूद 7000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर दावा करता है।
इस क्षेत्र में बेलगावी, कारवार और निपानी शहर भी आते हैं। महाराष्ट्र का तर्क है कि क्योंकि इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से मराठी भाषी आबादी है, इसलिए इसे महाराष्ट्र का हिस्सा होना चाहिए।
इस विवाद की उत्पत्ति 1956 के रिऑर्गनाइजेशन ऑफ स्टेट्स एक्ट में है, जो भाषाई और प्रशासनिक आधार पर विभाजन करता है। बॉम्बे प्रेसीडेंसी (वर्तमान गुजरात और महाराष्ट्र) एक बहुभाषी प्रांत था, जिसमें वर्तमान कर्नाटक के विजयपुरा, बेलगावी, धारवाड़ और उत्तर कन्नड़ जिले थे।
1948 में बेलगाम नगरपालिका ने अनुरोध किया था कि उसे प्रस्तावित महाराष्ट्र राज्य में जोड़ा जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1956 में बेलगाम और 10 तालुका मैसूर राज्य को दिए गए। मैसूर राज्य ही 1973 में नाम बदलने के बाद कर्नाटक बना।
महाजन आयोग की सिफारिश भी नहीं मानी गई
रिऑर्गनाइजेशन ऑफ स्टेट्स कमीशन ने 50% से अधिक कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मैसूर यानी कर्नाटक में जोड़ा था। पर विरोधियों का कहना रहा है कि इन क्षेत्रों में मराठी भाषी कन्नड़ भाषियों से ज्यादा हैं।
बॉम्बे सरकार ने सितंबर 1957 में अपनी मांग केंद्र के सामने रखी और करीब एक दशक बाद 1966 में केंद्र सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश मेहर चंद महाजन के नेतृत्व में महाजन आयोग बनाया।
1967 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि 264 गांव महाराष्ट्र (पूर्व बॉम्बे) को दिए जाएं और बेलगाम और 247 गांव कर्नाटक में ही रहें। यह रिपोर्ट महाराष्ट्र ने खारिज कर दी और एक अलग समीक्षा की मांग की। हालांकि कर्नाटक ने रिपोर्ट मानी पर इंप्लीमेंटेशन अब तक नहीं हुआ।
इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों ने भी समय-समय पर राजनीतिक एजेंडा बनाया है। कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना और बीजेपी ने अपने हर चुनावी घोषणापत्र में इस विवाद को रखा है। आज तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
गुजरात-राजस्थान: मांगद हिल विवाद
ऐसा ही एक विवाद गुजरात और राजस्थान के बीच भी है। यह विवाद मांगद हिल को लेकर है। इस पर गुजरात आधा दावा करता है, पर राजस्थान का कहना है कि यह पहाड़ी उनकी है। यह विवाद चार दशक पुराना है।
गुजरात के कई भूस्वामियों ने शिकायत दर्ज की है जो कहते हैं कि राजस्थान की जमीनें सटी हुई हैं और वे अवैध अतिक्रमण करते हैं। फिलहाल विवाद हल नहीं हुआ है।
केरल-कर्नाटक: कसारगोड जिला विवाद
ऐसा ही भाषाई आधार पर एक विवाद कसारगोड जिले को लेकर है। जहां कन्नड़ भाषी आबादी ज्यादा है पर यह केरल का हिस्सा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एम के महाजन ने 1967 में सिफारिश की थी कि इसे कर्नाटक को दिया जाए। पर आज भी यह जिला केरल का हिस्सा है।
असम-मेघालय विवाद: सैकड़ों की गईं जानें
इन उदाहरणों के अलावा असम और मेघालय का भी एक लंबा Land Dispute है। इसमें सैकड़ों लोगों की जानें गई हैं और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है।
यह 1971 में तब शुरू हुआ जब मेघालय ने असम रिऑर्गनाइजेशन एक्ट को चुनौती दी। इस एक्ट ने मिकिर हिल्स का पार्ट 1 और 2 असम को दिया था। पर मेघालय का कहना है कि ये पहाड़ियां यूनाइटेड खासी और जयंतिया हिल्स का हिस्सा हैं। लंबे विवाद हैं और इन्हें सुलझाना जरूरी है। वर्तमान में केंद्र दोनों राज्यों के मुद्दों को हल करने की बात कर रहा है।
असम-अरुणाचल प्रदेश: तीन दशक पुराना विवाद
इसके अलावा असम और अरुणाचल प्रदेश का भी एक तीन दशक पुराना बॉर्डर डिस्प्यूट है। नॉर्थ ईस्ट रिऑर्गनाइजेशन एक्ट 1971 का उपयोग करके असम से अरुणाचल प्रदेश को 1987 में अलग किया गया और राज्य का दर्जा दिया गया।
जबकि अरुणाचल प्रदेश ने आवंटित क्षेत्र को स्वीकार किया, हालांकि असमियों की घुसपैठ की शिकायतें रिपोर्ट होती रहीं। सितंबर 2006 में असम सरकार ने मामला सुप्रीम कोर्ट में दायर किया और शीर्ष अदालत ने एक लोकल कमीशन नियुक्त की है जो नागालैंड, असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं की पहचान करेगी। मामला अब भी लंबित है।
ओडिशा-पश्चिम बंगाल: कनिका सैंड्स आइलैंड पर विवाद
इसका एक उदाहरण है ओडिशा और पश्चिम बंगाल सरकारों के बीच बंगाल की खाड़ी में मौजूद कनिका सैंड्स आइलैंड का। इस द्वीप पर दोनों सरकारें दावा करती थीं।
2010 में कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट ने टेंडर नोटिस में उल्लेख किया था कि उनकी बंदरगाह सीमा अब कनिका सैंड्स आइलैंड पर भी है। ओडिशा सरकार ने इस कदम का विरोध किया और अधिसूचना के जरिए कहा कि ये द्वीप ओडिशा तट के पास हैं, इसलिए इस पर टेंडर देने के लिए उन्हें अनुमति लेनी चाहिए।
हालांकि 2013 में शिपिंग मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया और ओडिशा के पक्ष में फैसला करते हुए द्वीप को पारादीप पोर्ट ट्रस्ट के दायरे में दिया।
कैसे हो सकता है समाधान? जानें संवैधानिक उपाय
इतने लंबे समय तक विवादित क्षेत्र में कई समाधान किए जा सकते हैं। पर इसकी शर्त यह है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरकार द्वारा मजबूत कार्यान्वयन किया जाए।
सबसे सरल और सीधा रास्ता है कि विवाद जिन दो या दो से अधिक राज्यों के बीच है, संवाद से हल किया जाए। भारत के राज्य एक ही देश का हिस्सा हैं और अलग समृद्धि से पहले भारतीय समृद्धि का फोकस होना जरूरी है।
यदि अंतर-राज्य संवाद से समाधान नहीं होता है तो भारतीय संविधान कई तरह से तंत्र प्रदान करता है, जिससे सीमा या भूमि विवादों पर टिकाऊ फैसले लिए जा सकते हैं।
आर्टिकल 3 में भारतीय संविधान ने संसद को राज्य को बनाने, जोड़ने, विभाजित करने और सीमा तय करने का एकमात्र जिम्मेदार निकाय घोषित किया है। संसद द्वारा बनाए गए राज्य ही आधिकारिक तौर पर मान्य हैं।
हालांकि इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट भी हस्तक्षेप कर सकती है और विवाद को केस टू केस आधार पर सुलझाने के तरीके निकाल सकती है। कई मामलों में यदि विवाद सीमा पर मौजूद किसी विशिष्ट मंत्रालय की परियोजना से जुड़ा है तो संबंधित मंत्रालय भी विवाद सुलझाने के लिए आगे आ सकती है।
क्या है आगे का रास्ता?
दोस्तों, ये लंबे समय से चल रहे Land Dispute हैं जिन्हें सुलझाना जरूरी है। वर्तमान में केंद्र दोनों राज्यों के मुद्दों को हल करने की बात कर रही है। लेकिन जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति और मजबूत कार्यान्वयन नहीं होगा, तब तक ये विवाद यूं ही चलते रहेंगे।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सिर्फ नक्शे पर लकीरों का मामला नहीं है। इन विवादों में आम लोगों की जानें जाती हैं, परिवार विस्थापित होते हैं और विकास रुक जाता है। इसलिए जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इन मुद्दों का स्थायी समाधान निकालें।
मुख्य बातें (Key Points)
• भारत में कई राज्यों के बीच दशकों पुराने सीमा विवाद (Land Dispute) चल रहे हैं
• असम-नागालैंड का विवाद 50 साल पुराना है, 434 किमी लंबी सीमा पर झगड़ा
• महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच बेलगावी को लेकर 7000 वर्ग किमी क्षेत्र पर विवाद, 2004 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित
• संविधान के आर्टिकल 3 के तहत संसद को राज्यों की सीमा तय करने का एकमात्र अधिकार है
• 1956 के स्टेट रिऑर्गनाइजेशन एक्ट से भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ, लेकिन इससे कई विवाद भी खड़े हो गए












