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The News Air - Breaking News - Cash Withdrawal का बड़ा खेल: ₹61,000 करोड़ निकाले, क्या खतरे में है डिजिटल इंडिया?

Cash Withdrawal का बड़ा खेल: ₹61,000 करोड़ निकाले, क्या खतरे में है डिजिटल इंडिया?

अप्रैल के पहले 15 दिनों में भारतीयों ने बैंकों से 61,000 करोड़ रुपये निकाले, 2017 के बाद सबसे बड़ा कैश सर्ज, टैक्स डर और चुनावी खेल के बीच बैंकिंग सिस्टम पर सवाल

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 6 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस, राष्ट्रीय
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Cash Withdrawal
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Cash Withdrawal का एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े संकेत की तरह है। अप्रैल 2026 के शुरुआती 15 दिनों में देश के लोगों ने बैंकों से कुल 61,000 करोड़ रुपये निकाले हैं। यह वही भारत है जहां दुनिया के 46% डिजिटल ट्रांजैक्शन होते हैं, जहां सब्जी वाला भी QR कोड लेकर बैठता है। फिर अचानक इतना बड़ा Cash Withdrawal क्यों?

आरबीआई के डाटा के मुताबिक आज भारत में 42.3 लाख करोड़ रुपये करेंसी सर्कुलेशन में है और यह नोटबंदी के बाद सबसे बड़ा उछाल है जो 15 दिनों में देखा गया है। समझने वाली बात यह है कि Currency with Public यानी लोगों के पास जो कैश है वो अब तक के सबसे उच्चतम स्तर 39 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।

नोटबंदी के बाद सबसे बड़ा कैश सर्ज, 2017 से पहली बार इतना स्पाइक

आपको याद होगा 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर आकर 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा की थी। उसके बाद कई हफ्तों तक लोग ATM के सामने लाइन लगाकर खड़े थे। बुजुर्ग परेशान हुए, लोग परेशान हुए। उसी झटके के बाद कैश सर्कुलेशन क्रैश हो गया था, जो बाद में धीरे-धीरे रिकवर हुआ।

लेकिन अब 2026 में यह सर्ज देखा गया है। इकोनॉमिस्ट कह रहे हैं कि 2017 के बाद यह पहला ऐसा स्पाइक आया है अर्थव्यवस्था में। यानी नोटबंदी के करीब 9 साल बाद कैश की यह मांग पहले कभी इतनी बड़ी तेजी से नहीं बढ़ी। अभी क्यों बढ़ी? यह चिंता का विषय है।

देखा जाए तो यह कोई संयोग नहीं है। वास्तव में यह एक सिग्नल है जो अर्थव्यवस्था की स्थिति को दर्शाता है। लेकिन किस बात का सिग्नल है? क्या लोग घबराए हुए हैं? क्या बैंकिंग सिस्टम पर लोगों का भरोसा कम हो रहा है?

RBI के डाटा में छुपी चिंताजनक तस्वीर

आरबीआई कहता है कि Currency in Circulation पिछले साल के मुकाबले 11.8% बढ़ गई है। लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि लोगों के पास जो कैश है, जो बैंकों के बाहर पैसा है, वो अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।

SBI रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह ट्रेंड अक्टूबर 2025 से बढ़ना शुरू होता है और अप्रैल 2026 तक आते-आते यह सारे रिकॉर्ड तोड़ देता है। सवाल यह उठता है कि जब डिजिटल ट्रांजैक्शन की संख्या यानी वॉल्यूम इतना ज्यादा बढ़ रहा है, तो कैश क्यों बढ़ रहा है?

क्या यह कहीं न कहीं De-financialization तो नहीं हो रहा है? यानी लोग बैंकिंग सिस्टम से अपना पैसा हटाकर कहीं न कहीं सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि कैश का बढ़ना इकोनॉमी में तरक्की को दर्शाता है। लेकिन इसके पीछे तीन खतरनाक नकारात्मक पहलू हैं जो हमें सोचने को मजबूर करते हैं।

पहला कारण: टैक्स पैनिक और डिजिटल डर

जुलाई 2025 में कर्नाटक में लगभग 6000 छोटे व्यापारियों को GST के नोटिस भेजे गए। आधार क्या था? उनका UPI ट्रांजैक्शन का डाटा। सरकार की Data Analytics Wing ने उन लोगों को ट्रैक किया जिनका सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपये से ऊपर था लेकिन वो GST में रजिस्टर्ड नहीं थे।

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। यह बात पैनिक की तरह ट्रेडर्स में फैली। असर क्या हुआ? छोटे व्यापारी डर गए। उनमें घबराहट फैली। बेंगलुरु और मैसूर जैसे शहरों में व्यापारियों ने UPI का बहिष्कार करना शुरू कर दिया।

यह आपने अपने शहरों के आसपास भी महसूस किया होगा। कई बार लोग कहते हैं “हम UPI नहीं लेते, कैश लेते हैं।” लोग वापस Cash Only की तरफ भागना शुरू कर देते हैं ताकि वे सरकार के डिजिटल रडार से बच सकें। दिलचस्प बात यह है कि यह डिजिटल इंडिया की नीति के लिए एक सिस्टमेटिक फेल्योर की तरह काम करता है, जहां पारदर्शिता का डर ही कारण बन जाता है लोगों के कैश रखने का।

दूसरा कारण: चुनाव और काला धन का खेल

चुनाव और काला धन – ये दोनों बहुत ही साथ-साथ चलते हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि राज्यों में जो विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, उनके कारण कैश की डिमांड बढ़ी है। भारत में चुनाव नकदी का खेल भी होते हैं। रैलियों से लेकर वोट बैंक तक काले धन का सबसे बड़ा जरिया आज भी कैश ही होता है।

चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद डाटा यह बताता है कि हर इलेक्शन साइकिल में कैश सर्कुलेशन अचानक बहुत तेजी से स्पाइक करता है। 12% की यह बढ़त कहीं न कहीं चुनाव से भी प्रभावित दिखती है, उस तरफ भी इशारा करती है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग ने हजारों करोड़ रुपये जब्त किए हैं, फिर भी कैश का प्रवाह रुकता नहीं। इसका मतलब साफ है – सिस्टम में कहीं न कहीं खामियां हैं।

तीसरा कारण: बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा घट रहा

जब ब्याज दरें कम होती हैं या स्थिर रहती हैं, तो आम आदमी बैंक में पैसा रखने के बजाय क्या करता है? पैसा निकालकर अपने पास रखना ज्यादा बेहतर समझता है। लेकिन यहां एक और एंगल भी है।

देखिए, FD पर इंटरेस्ट रेट ज्यादा नहीं बढ़े, कम ही हुए तो लोग FD नहीं करा रहे हैं। तो कैश ज्यादा ट्रांजैक्शन में आ रहा है। और दूसरा Precautionary Demand का भी मामला है। मध्यम वर्ग को यह डर है कि बैंकिंग नियमों में लगातार बदलाव हो रहे हैं, सर्विलांस सिस्टम बढ़ रहा है या महंगाई के कारण उनकी बचत पर खतरा है।

सोना-चांदी बेचकर कैश रखने का ट्रेंड

सबसे इंटरेस्टिंग रीजन यह भी है कि 2025-26 में गोल्ड और सिल्वर की कीमतों ने ऐतिहासिक ऊंचाई छुई थी। अब क्या हुआ इससे? लोगों ने घर में रखा सोना-चांदी निकाला, बेचा और उसके बदले कैश प्राप्त किया। लेकिन वो कैश उन्होंने बैंकिंग सिस्टम में नहीं डाला।

यह कैश आया सर्कुलेशन में। जो Precious Metal की Recycling है, वह Currency in Circulation को बढ़ाने का एक बड़ा फैक्टर है। आपने जो ये ग्रोथ देखी सोने के दाम में, चांदी के दाम में, उसने भी अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं मनी इनफ्यूज किया। कैश को लोगों ने रखा।

यह व्यवहार भारतीय घरों की बहुत पुरानी आदत है, जहां गोल्ड को एक Hidden ATM की तरह लोग रखते हैं और काम में लाते हैं। लोग सोना-चांदी बेच रहे हैं, यानी गोल्ड को रिसाइकल कर रहे हैं और उस पैसे को वापस बैंकों में जमा करने के बजाय नगद के रूप में इमरजेंसी फंड की तरह घर में रख रहे हैं। क्योंकि उनको सरकारी तंत्र पर और बैंकिंग व्यवस्था पर उतना ज्यादा भरोसा नहीं है।

आम आदमी के लिए टाइम बम: बैंकों में Liquidity Stress

अगर गौर करें तो जब लोग बैंकों से पैसा निकाल लेते हैं और बैंकों में पैसा कम हो जाता है, तो बैंकों के पास डिपॉजिट कम हो जाते हैं। अब बैंकों के पास जब डिपॉजिट कम हुए तो इससे आती है बैंकों में Liquidity Stress।

अगर आप HDFC और ICICI बैंकों की तरफ देखें तो इनका Credit-Deposit Ratio 80% से ऊपर पहुंच गया है। यानी ये बैंक लोन तो बहुत दे रहे हैं लेकिन इनके पास डिपॉजिट बहुत कम आ रहे हैं। और जब डिपॉजिट कम आएंगे तो क्या होगा?

लोन महंगे होंगे। ब्याज की दरें बढ़ेंगी। अब आपको होम लोन और पर्सनल लोन कम मिलेगा या बहुत महंगा मिलेगा। अगर बैंकों के पास पैसा नहीं होगा तो वे बड़ी कंपनियों को फंड भी नहीं दे पाएंगे। और जब वो फंड नहीं दे पाएंगे तो नौकरी और विकास – इन दोनों पर असर पड़ेगा।

देखिए, सबसे पहले बैंक स्टार्व हो रहे हैं। उनके पास पैसा नहीं आ रहा है तो वो क्रेडिट को महंगा करेंगे। और क्रेडिट महंगा करेंगे तो निश्चित तौर पर ग्रोथ पर असर पड़ेगा और यह फिर आम आदमी के लिए एक दूसरे तरीके से नेगेटिव तरीके से काम करेगा।

ग्रामीण भारत: डिजिटल इंडिया का अधूरा सपना

अब इस पूरी रिपोर्ट में एक और इंटरेस्टिंग फैक्ट है जिसको आपको समझना चाहिए। ये Reuters की रिपोर्ट है जहां बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। ग्रामीण भारत की कमाई बढ़ी है।

मानसून ठीक-ठाक था। अच्छी खबर आई। NABARD का सर्वे यह बताता है कि ग्रामीण इलाकों में Household Income और Well Being बढ़ी है। और जब गांव में पैसा आता है तो वो नॉर्मली UPI से नहीं चलता है। कैश से चलता है। क्यों?

क्योंकि गांव में जो किराना है, जो हाट का व्यापार है, जो मजदूरी है – यह सब नॉर्मली Cash Economy में फंक्शन करते हैं। विडंबना यह भी है कि आज भी गांव के लोग अपनी समृद्धि को सुरक्षित रखने के लिए डिजिटल वॉलेट पर भरोसा नहीं करते, बल्कि भौतिक नगदी पर भरोसा करते हैं या Precious Gems में।

चूंकि सोना-चांदी महंगे थे तो उन्होंने वो नहीं खरीदे। हम डिजिटल इंडिया के 10 साल मना रहे हैं। 10 साल हो गए डिजिटल इंडिया के। लेकिन ग्रामीण भारत का एक बड़ा हिस्सा आज भी कैश इकोनॉमी में ही डील करता है। यह दर्शाता है कि हमारा बैंकिंग ढांचा अभी भी दूरदराज के इलाकों में भरोसा पैदा करने में कामयाब नहीं हुआ है।

61,000 करोड़ का कैश सर्ज: स्वस्थ अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं

तो 61,000 करोड़ का यह जो Cash Withdrawal है, क्या अर्थव्यवस्था के स्वस्थ होने का लक्षण है? क्या ये दिखाता है कि हमारी इकोनॉमी हेल्दी और मजबूत हो रही है? शायद नहीं दिखाता।

यह एक प्रकार से डर, चुनावी खेल, ब्लैक मनी का साइकिल और बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरियों का एक मिलाजुला परिणाम है जो हमें अर्थव्यवस्था में दिखाई दे रहा है।

अगर सरकार ने व्यापारियों में डिजिटल सुरक्षा का भरोसा नहीं जगाया और बैंकिंग लिक्विडिटी को नहीं संभाला, तो यह बढ़ता हुआ कैश हमारी अर्थव्यवस्था को वापस उसी अंधेरे के दौर में ले जा सकता है, जहां से हम निकलना चाहते थे डिजिटल इकोनॉमी के सहारे।

क्या Cash is King फिर से?

महत्वपूर्ण रूप से यह समझिए कि क्या टैक्स नोटिस और UPI ट्रांजैक्शन के डर के कारण UPI को छोड़ना व्यापारियों द्वारा सही है? या क्या हम वास्तव में वापस कैश इकोनॉमी की तरफ बढ़ रहे हैं?

क्या Cash is King – यह हमेशा रहेगा भारतीय अर्थव्यवस्था में? यह सवाल आज की तारीख में बेहद प्रासंगिक हो गया है। डिजिटल इंडिया का सपना तभी पूरा होगा जब सरकार व्यापारियों, किसानों और आम लोगों में भरोसा जगाएगी कि डिजिटल सिस्टम उनके खिलाफ नहीं, बल्कि उनके पक्ष में है।


मुख्य बातें (Key Points)

• अप्रैल 2026 के पहले 15 दिनों में भारत में 61,000 करोड़ रुपये का Cash Withdrawal हुआ, जो 2017 के बाद सबसे बड़ा स्पाइक है

• Currency in Circulation 42.3 लाख करोड़ और Currency with Public 39 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर

• जुलाई 2025 में कर्नाटक में 6000 व्यापारियों को UPI डाटा के आधार पर GST नोटिस भेजे गए, जिससे टैक्स पैनिक फैला

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• HDFC और ICICI बैंकों का Credit-Deposit Ratio 80% से ऊपर, बैंकों में Liquidity Stress बढ़ रहा

• सोने-चांदी की ऊंची कीमतों के कारण लोगों ने Precious Metals बेचकर कैश रखा, बैंकों में जमा नहीं किया


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: अप्रैल 2026 में अचानक इतना ज्यादा Cash Withdrawal क्यों हुआ?

उत्तर: अप्रैल 2026 में 61,000 करोड़ रुपये का Cash Withdrawal तीन मुख्य कारणों से हुआ – पहला, GST नोटिस से व्यापारियों में टैक्स पैनिक, दूसरा, राज्यों में विधानसभा चुनावों के कारण काले धन का प्रवाह, और तीसरा, बैंकिंग सिस्टम पर घटता भरोसा और कम ब्याज दरें। सोने-चांदी की ऊंची कीमतों ने भी लोगों को Precious Metals बेचकर कैश रखने को प्रेरित किया।

प्रश्न 2: कर्नाटक में व्यापारियों को GST नोटिस क्यों मिले?

उत्तर: जुलाई 2025 में कर्नाटक में लगभग 6000 छोटे व्यापारियों को GST नोटिस भेजे गए क्योंकि सरकार की Data Analytics Wing ने उनके UPI ट्रांजैक्शन को ट्रैक किया। जिन व्यापारियों का सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपये से ऊपर था लेकिन वे GST में रजिस्टर्ड नहीं थे, उन्हें नोटिस मिले। इससे व्यापारियों में पैनिक फैला और कई ने UPI बॉयकॉट कर दिया।

प्रश्न 3: बैंकों में Liquidity Stress का आम आदमी पर क्या असर होगा?

उत्तर: जब लोग बैंकों से ज्यादा कैश निकालते हैं तो बैंकों के पास डिपॉजिट कम हो जाते हैं। इससे बैंकों में Liquidity Stress आता है। HDFC और ICICI जैसे बैंकों का Credit-Deposit Ratio 80% से ऊपर पहुंच गया है। इसका असर यह होगा कि होम लोन, पर्सनल लोन महंगे हो जाएंगे, ब्याज दरें बढ़ेंगी और कंपनियों को फंडिंग कम मिलेगी, जिससे नौकरी और आर्थिक विकास प्रभावित होगा।

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