Falkland Islands Dispute पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा मुद्दा उठा दिया है जो सीधे यूनाइटेड किंगडम के राष्ट्रीय गौरव के साथ छेड़छाड़ करने जैसा है। यूके के लोग और उनके प्रधानमंत्री केयर स्टार्मर पूरी तरह शॉक में हैं।
यहां पर हम बात कर रहे हैं फॉकलैंड आइलैंड्स की। अगर सरल शब्दों में समझें तो मान लीजिए कल ट्रंप यह कह दें कि जो अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप है, जिसको लेकर कोई विवाद नहीं है, वह भारत का हिस्सा नहीं होगा। कुछ इस प्रकार की स्थिति है।
क्या है फॉकलैंड आइलैंड्स विवाद
यहां पर जो फॉकलैंड आइलैंड्स है, यह विवाद है यूके और अर्जेंटीना के बीच में। यह आइलैंड्स अटलांटिक महासागर में साउथ अमेरिका के नीचे के साइड में अर्जेंटीना के जस्ट पास में स्थित हैं। अर्जेंटीना से लगभग 480 किमी की दूरी पर यह फॉकलैंड्स आइलैंड्स हैं और यह बेसिकली दो पार्ट में डिवाइडेड हैं – एक है वेस्ट और दूसरा है ईस्ट।
देखा जाए तो इंपॉर्टेंट इसलिए हो जाता है क्योंकि है तो अर्जेंटीना के काफी नजदीक। लेकिन इसको कंट्रोल अर्जेंटीना नहीं करता है। यह कंट्रोल किया जाता है यूनाइटेड किंगडम के द्वारा एक ब्रिटिश ओवरसीज टेरिटरी के रूप में।
लेकिन अर्जेंटीना अपनी सॉवरेनिटी इसके ऊपर क्लेम करता है। उसका मानना है कि यह नेशनल टेरिटरी का पार्ट है। मतलब यह अर्जेंटीना का पार्ट होना चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह आइलैंड
अगर गौर करें तो यह आइलैंड कई कारणों से महत्वपूर्ण है:
रणनीतिक लोकेशन: यहां पर जो शिपिंग रूट्स हैं, अर्जेंटीना और चिली के नीचे से होकर केप हॉर्न से शिपिंग रूट जाती है, जो इंपॉर्टेंट हो जाता है।
सैन्य अड्डा: यूके जो है अपनी मिलिट्री बेस माउंट प्लेज़ेंट पर कंट्रोल करता है। यह फॉकलैंड आइलैंड्स में एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना है।
प्राकृतिक संसाधन: फिशिंग और पोटेंशियल ऑफशोर ऑयल भी यहां पर बड़ी मात्रा में बताया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि सिंबॉलिक महत्व: यह यूके और अर्जेंटीना दोनों के नेशनल प्राइड का मुद्दा बन जाता है क्योंकि दोनों ही देश इसको अपना मानते हैं।
1982 का युद्ध और UK की जीत
इतिहास की बात करें तो स्पेन इसको कंट्रोल करता था। ब्रिटेन ने अपना कंट्रोल 1833 में इस्टैब्लिश किया था। ब्रिटेन का मानना है कि उसने स्पेन से यह लिया था। अर्जेंटीना का क्लेम यह है कि स्पेन से इंडिपेंडेंस मिलने के बाद इसका जो एक्चुअल राइट है, वो अर्जेंटीना के पास होना चाहिए था।
इसी को लेकर लगातार मुद्दे उठते रहे और फाइनली 1982 में एक युद्ध होता है। अर्जेंटीना इस आइलैंड को इनवेड करने की कोशिश करता है। उस समय यूके की जो प्राइम मिनिस्टर थीं, वो थीं मार्गरेट थैचर। उन्होंने यहां पर मिलिट्री रिस्पॉन्स दिया।
समझने वाली बात यह है कि इसका नतीजा यह निकला कि यूके की जीत हुई और अर्जेंटीना को वहां से विड्रॉ करना पड़ा। युद्ध के बाद आज तक यूके अपनी मिलिट्री प्रेजेंस इस आइलैंड पर रखता है।
2013 में रेफरेंडम – 99.8% लोग UK के साथ
इसको लेकर रेफरेंडम भी हुआ था 2013 में। जैसे 2014 में स्कॉटलैंड को लेकर रेफरेंडम हुआ था, वैसे ही इसमें जो रेफरेंडम हुआ, उसमें वहां के जो लोग हैं, बताया जाता है कि वह ब्रिटेन के अंडर में ही रहना चाहते हैं। 99.8% लोग प्रो-यूके की तरफ थे।
अर्जेंटीना जो है अपना डिप्लोमेटिक प्रेशर बनाए रखता है। उनका कहना है कि नहीं, इससे काम नहीं चलेगा। यह एक्चुअल में हमारा हिस्सा था। यह हमें हमारे अंडर में होना चाहिए।
ट्रेडिशनली अमेरिका का स्टैंड – UK को सपोर्ट
ट्रेडिशनली अगर हम बात करें यूएस की पोजीशन की तो अमेरिका वैसे तो दिखाता है कि हम न्यूट्रल हैं, लेकिन इंप्लिसिट सपोर्ट जो है वो यूके को करता है क्योंकि NATO अलाई है और यूके और यूएस काफी अच्छे खासे मित्र हैं।
1982 में जब युद्ध हुआ था फॉकलैंड आइलैंड को लेकर, तो उस समय भी यूएस की जो इंटेलिजेंस और लॉजिस्टिकल सपोर्ट है, उसने यूके की मदद की थी।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मतलब अगर यूएस के स्टैंड्स में कोई भी शिफ्ट आता है, उसके पोजीशन में, तो यह जियोपॉलिटिकली बहुत ज्यादा एक्सप्लोसिव होगा।
Pentagon का लीक ईमेल – अमेरिका बदल सकता है स्टैंड
अब हुआ क्या है कि यहां पर ऑफिशियली अमेरिका ने कुछ नहीं बोला है। लेकिन जो पेंटागन है, वहां से एक ईमेल लीक हो गया है। एक कॉन्फिडेंशियल पेंटागन कम्युनिकेशन सामने आया है।
जिसमें यह सजेस्ट किया जा रहा है कि यूएस का जो पोजीशन है फॉकलैंड सॉवरेनिटी को लेकर कि यह यूके के अंडर में होना चाहिए, इसको लेकर यूएस रिकंसीडर कर सकता है।
ध्यान रखिएगा, यह ऑफिशियल पॉलिसी नहीं है। बस क्योंकि यहां पर यह ईमेल लीक हुआ, जिसके बारे में यह चर्चा हो रही है कि यूएस अपना पोजीशन चेंज करने वाला है।
ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा
ट्रंप के अंडर में अगर आप देखोगे, जो फॉरेन पॉलिसी है वो अक्सर प्रेशर टैक्टिक्स के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। चाहे वो उनके अलाई ही क्यों न हो। दुश्मन की तो बात छोड़ ही दो।
उनके जो मित्र देश हैं, यूके इतना ज्यादा क्लोज है यूएस के, उसके बावजूद भी यहां पर फॉरेन पॉलिसी का इस्तेमाल करते हैं ट्रंप ताकि यूके को सप्रेस किया जा सके।
अगर गौर करें तो फॉकलैंड का इश्यू इसलिए कहीं न कहीं सामने लाया जा रहा होगा क्योंकि ईरान युद्ध के समय ट्रंप बार-बार बोलते रहे कि NATO के जो अलाइज़ हैं, यूरोप के जो कंट्रीज हैं, उनको भी आना चाहिए, हमें सपोर्ट करना चाहिए। लेकिन उनमें से कोई भी सपोर्ट के लिए नहीं आया।
यूके का सख्त रुख – नॉन-नेगोशिएबल
इसको लेकर ग्लोबल रिएक्शन की बात करें तो ऑब्वियस सी बात है, यूके की तरफ से स्ट्रांग रिजेक्शन दिया गया है कि यह सॉवरेनिटी का मामला है और यह नॉन-नेगोशिएबल है। उन्होंने यहां पर प्रिंसिपल ऑफ सेल्फ डिटरमिनेशन का हवाला दिया है।
कहा है कि इसको लेकर रेफरेंडम हो चुका है। 1982 में ही मामला वैसे तो क्लोज हो गया था। तो अब इसका मामला आना ही नहीं चाहिए।
अर्जेंटीना के लिए अवसर
जहां तक अर्जेंटीना का सवाल है, तो ऑब्वियस सी बात है, उनके लिए तो अपॉर्चुनिटी है। उनके जो प्राइम मिनिस्टर हैं जेवियर मिली, तो उनकी तरफ से यहां पर कहा गया है कि यह दिखाता है कि यूके का जो पोजीशन है, वो यूनिवर्सली सपोर्टेड नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि अर्जेंटीना इसको पुश करने की कोशिश करेगा और इसीलिए अर्जेंटीना का कहना है कि हमें इसको लेकर फर्दर नेगोशिएशंस करना चाहिए।
अमेरिका ने दिया क्लेरिफिकेशन
वैसे जैसे यह मुद्दा सामने आया, इतना एक्सप्लोसिव था जिसकी वजह से यूएस को क्लेरिफिकेशन देना पड़ा। जो मार्को रूबियो हैं, उन्होंने इस रिपोर्ट को डाउन प्ले किया और कहा कि देखो, ऐसा कोई बड़ा बात नहीं है। यह बेसिकली कुछ रिपोर्ट्स वगैरह होंगी। लेकिन इससे अभी हमारी कोई फॉरेन पॉलिसी नहीं है।
समझने वाली बात यह है कि जब भी इस तरह की चीजें होती हैं, आप उसको थोड़ा सा दबाने की कोशिश करते हो। लेकिन डैमेज तो हो चुका था।
मुख्य बातें (Key Points)
- Falkland Islands Dispute यूके और अर्जेंटीना के बीच पुराना विवाद
- Pentagon के लीक ईमेल में अमेरिका की स्थिति बदलने का संकेत
- 1982 के युद्ध में UK की जीत, 2013 में 99.8% ने UK के साथ वोट किया
- ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा, NATO मुद्दों से जुड़ा













