रूस की दो मीडिया फर्मों RT और स्‍पूतनिक पर यूरोपियन यूनियन ने लगाया बैन

यूक्रेन पर रूस के हमले के बीच यूरोप के तमाम देश और अमेरिका भी अपने यहां रूसी संगठनों पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। अब यूरोपियन यूनियन में रूस के दो मीडिया संगठनों पर तत्‍काल प्रभाव से बैन लगाने का फैसला किया गया है। यूरोपियन यूनियन ने ‘RT’ और ‘स्‍पूतनिक’ (Sputnik) को बैन करने का फैसला किया है। कहा गया है कि रूसी सरकार के नियंत्रण वाले ये दोनों चैनल यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि यूरोपियन यूनियन में कोई भी ऑपरेटर ‘RT’ और ‘स्‍पूतनिक’ के कंटेंट को प्रसारित नहीं कर सकेगा। दोनों कंपनियों और उनके यूरोपीय समकक्षों के बीच प्रसारण लाइसेंस और डिस्‍ट्र्रीब्‍यूशन की व्यवस्था भी सस्‍पेंड कर दी जाएगी। यह बैन RT की इंग्लिश यूनिट और ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस व स्पेन में उसके ऑपरेशंस को प्रभावित करेगा।

यूरोपियन यूनियन की विदेश नीति के प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा है कि रूस द्वारा सूचनाओं में हेरफेर और दुष्प्रचार किया जा रहा है। यह यूरोप की सुरक्षा के लिए एक खतरा है। गौरतलब है कि फेसबुक के मालिकाना हक वाली मेटा, गूगल, यूट्यूब और टिकटॉक भी यूरोपियन यूनियन में RT और स्पूतनिक को अपने प्‍लेटफॉर्म पर रोक रहे हैं। ट्विटर ने कहा है कि वह यूरोपीय यूनियन के प्रतिबंध का पालन करेगा।

यूक्रेन पर हमला करने के बाद से रूस को फिल्म और TV उद्योग में बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। याद रहे कि नेटफ्लिक्स ने भी रूस में भविष्‍य के अपने सभी प्रोजेक्‍ट्स और अधिग्रहणों को अस्थायी रूप से रोक दिया है। कान्स फिल्म फेस्टिवल ने भी मंगलवार को एक बयान जारी करके कहा था कि जब तक यूक्रेन संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता है, वह 2022 कान्‍स फेस्टिवल में रूस के ऑफ‍िशियल डेलिगेशन पर बैन लगाएगा।

रूस के खिलाफ जंग में विदेशों में रह रहे यूक्रेनी भी अपने स्‍तर पर कोशिशें कर रहे हैं। पश्चिम की बड़ी टेक कंपनियों में काम करने वाले यूक्रेनी नागरिक अपने देश की मदद के लिए एकजुट हो रहे हैं। वो रूसियों को उनकी सरकार के खिलाफ जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं साथ ही मेडिकल सप्‍लाई को बढ़ाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं। इसके अलावा, इंटरनेट सिक्‍योरिटी कंपनी क्लाउडफ्लेयर, गूगल और एमेजॉन जैसी कंपनियों को भी रूस के हमले का मुकाबला करने के लिए और कोशिश करने को राजी कर रहे हैं। इसके लिए ई-मेल कैंपेन और ऑनलाइन पिटीशन का सहारा लिया जा रहा है।

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