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The News Air - Breaking News - ECL Model: बैंकों के बैड लोन रूल्स में बड़ा बदलाव, RBI ने जारी की फाइनल गाइडलाइन

ECL Model: बैंकों के बैड लोन रूल्स में बड़ा बदलाव, RBI ने जारी की फाइनल गाइडलाइन

RBI ने बैंकों के लोन अकाउंटिंग सिस्टम में बड़ा सुधार किया है। एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस मॉडल की फाइनल गाइडलाइन जारी, 1 अप्रैल 2027 से लागू होगी नई व्यवस्था। PSU बैंकों के शेयर्स में गिरावट।

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 2 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस
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ECL Model
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ECL Model यानी Expected Credit Loss Model को लेकर Reserve Bank of India ने बैंकों को फाइनल दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। देखा जाए तो यह भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है, जो बैड लोन की समस्या से निपटने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा। दिलचस्प बात यह है कि यह नया सिस्टम 1 अप्रैल 2027 से लागू होने जा रहा है, और अब RBI ने साफ कर दिया है कि इसमें कोई और देरी नहीं होगी।

जैसे ही यह खबर बाजार में आई, State Bank of India और Bank of Baroda जैसे PSU बैंकों के शेयर्स में गिरावट देखने को मिली। समझने वाली बात यह है कि निवेशकों को चिंता है कि नए नियमों के तहत बैंकों को अब पहले से ही ज्यादा provisioning करनी होगी, जिससे उनका मुनाफा कम हो सकता है।

क्या है ECL Model? पुराने सिस्टम से कैसे अलग है

अभी तक बैंकों में “Incurred Loss Model” चलता था। मतलब जब तक लोन डिफॉल्ट नहीं हो जाता, बैंक उसे नुकसान नहीं मानते थे। अगर गौर करें तो यह एक backward-looking system था। किसी ने 90 दिन तक पैसा नहीं लौटाया, तब जाकर उसे NPA (Non-Performing Asset) मानकर provisioning की जाती थी।

लेकिन अब RBI चाहता है कि बैंक भविष्य में होने वाले नुकसान का अनुमान पहले से ही लगाएं। यही है ECL Model का मूल सिद्धांत। यह ग्लोबल अकाउंटिंग स्टैंडर्ड के अनुरूप है और दुनिया भर के बैंक इसी तरीके से काम करते हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 2015 से 2018 के बीच भारतीय बैंकों को भारी नुकसान हुआ था। लेकिन वह नुकसान पहले दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि बैंकों की अकाउंटिंग सिस्टम में खामियां थीं। बाद में जब जांच हुई तब पता चला कि हजारों करोड़ का बैड लोन छिपा हुआ था।

तीन स्टेज ECL Model: कैसे काम करेगा नया सिस्टम

नए ECL Model में लोन को तीन श्रेणियों में बांटा गया है।

स्टेज 1 – परफॉर्मिंग लोन: मान लीजिए किसी बैंक ने Infosys को 100 करोड़ रुपये का कर्ज दिया। अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा है, हर महीने की किस्त समय पर आ रही है। लेकिन अचानक AI का युग आ गया और अमेरिका से ऑर्डर कम होने लगे। अभी Infosys ने कोई डिफॉल्ट नहीं किया है, लेकिन भविष्य में खतरा दिख रहा है।

तो अब बैंक को अगले 12 महीने का expected loss calculate करना होगा। मान लो पहले 10 करोड़ का प्रॉफिट होने वाला था, अब शायद 2 करोड़ का loss हो सकता है। तो उस 2 करोड़ की provisioning अभी से करनी होगी।

स्टेज 2 – अंडर वॉच लोन: अगर किसी ने एक महीने तक पेमेंट नहीं किया। अभी 90 दिन नहीं हुए हैं (जो NPA की सीमा है), लेकिन खतरे के संकेत दिख रहे हैं। इस केस में बैंक को लाइफटाइम expected loss calculate करना होगा और उसी हिसाब से provisioning करनी होगी।

स्टेज 3 – क्रेडिट इम्पेयर्ड लोन: यहां पहले से ही डिफॉल्ट हो चुका है। 90 दिन से ज्यादा हो गए हैं या फिर डिफॉल्ट होने के कगार पर है। इस केस में बैंक को पूरे लाइफटाइम लॉस की provisioning करनी होगी।

NPA का नियम नहीं बदला, बदला है प्रोविजनिंग का तरीका

एक बात साफ कर दें – 90 दिन वाला NPA classification नहीं बदला है। अगर कोई 90 दिन तक principal या interest नहीं चुकाता, तो वह अब भी NPA ही कहलाएगा।

लेकिन जो बदला है वह यह है कि पहले बैंक 90 दिन के बाद provisioning करते थे। अब उन्हें 90 दिन से पहले ही, जैसे ही खतरे के संकेत दिखें, provisioning शुरू करनी होगी। यही है असली बदलाव।

कैसे होगी Provisioning की गणना? तीन फॉर्मूले

Provisioning की रकम तय करने के लिए तीन चीजें देखी जाएंगी:

PD (Probability of Default): डिफॉल्ट होने की कितनी संभावना है? मान लो एक गरीब व्यक्ति ने गाड़ी के लिए लोन लिया और एक आईटी कंपनी में काम करने वाले इंजीनियर ने। तो गरीब व्यक्ति का PD ज्यादा होगा क्योंकि उसकी नौकरी की सुरक्षा कम है।

LGD (Loss Given Default): अगर डिफॉल्ट हो गया तो कितना नुकसान होगा? क्या बैंक कुछ रिकवर कर पाएगा?

EAD (Exposure at Default): डिफॉल्ट के समय कुल कितना पैसा बाकी होगा?

इन तीनों को मिलाकर provisioning का अमाउंट तय होगा। पहले तो यह सिस्टम बहुत आसान था – डिफॉल्ट हुआ तो provisioning करो। लेकिन अब बैंकों को गणित लगाना पड़ेगा।

बैंकों के लिए बड़ी चुनौती: पेपर प्रॉफिट का खेल खत्म

अब तक बैंक क्या करते थे? मान लीजिए किसी कंपनी को 100 करोड़ का लोन दिया और हर साल 10 करोड़ वापस आने थे। तो साल की शुरुआत में ही बैंक मान लेते थे कि हां, 10 करोड़ का प्रॉफिट हो गया। भले ही पैसा अभी आया नहीं था।

यह था पेपर प्रॉफिट। बैलेंस शीट में बड़े-बड़े आंकड़े दिखाए जाते थे। लेकिन तीन महीने बाद पता चलता था कि कंपनी पे नहीं कर पा रही है।

अब यह सब नहीं चलेगा। अगर थोड़ा भी रिस्क बढ़ा, तो interest income कम दिखानी होगी। जब पैसा आएगा, तब देखा जाएगा। यह बहुत बड़ा बदलाव है।

एवरग्रीनिंग ऑफ लोन पर लगेगी रोक

कई बार ऐसा होता है कि कोई अपने लोन को बार-बार renew कराता रहता है। जैसे किसी के पास क्रेडिट कार्ड का 2 लाख रुपये बकाया है। तो वह दूसरे क्रेडिट कार्ड से कैश निकालकर पहले वाले का पेमेंट कर देता है। या फिर कोई कंपनी एक बैंक से लोन लेकर दूसरे बैंक का पुराना लोन चुका देती है।

इसे evergreening of loan कहते हैं। यह बहुत खतरनाक प्रैक्टिस है। बैंकों को अब इसे चेक करना होगा।

और एक सख्त नियम यह है कि अगर किसी ने 6 महीने तक पेमेंट नहीं किया, फिर वापस पे करना शुरू कर दिया, तो भी उसे तुरंत standard category में नहीं रखा जाएगा। जब तक पूरा पेंडिंग अमाउंट चुकता नहीं हो जाता, वह NPA category में ही रहेगा।

PSU बैंकों के शेयर्स में गिरावट क्यों?

जैसे ही यह खबर आई, शेयर बाजार ने नेगेटिवली react किया। क्यों? क्योंकि नए नियमों से बैंकों पर शॉर्ट टर्म में तीन असर होंगे:

प्रॉफिट में कमी: अभी से ज्यादा provisioning करनी होगी, तो दिखने वाला प्रॉफिट घट जाएगा।

कैपिटल पर दबाव: provisioning बढ़ने से बैंक का available capital कम हो जाएगा।

लेंडिंग में कमी: कम capital होगा तो बैंक उतना लोन नहीं दे पाएंगे।

लेकिन लॉन्ग टर्म में फायदा है। बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होगी। वह सदमा जो बैड लोन से बार-बार लगता था, वह कम होगा। lending discipline आएगी – बैंक अब आसानी से रिस्की लोगों को पैसा नहीं देंगे।

ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुरूप बना भारत

दुनिया भर में IFRS 9 (International Financial Reporting Standards) के तहत ECL Model अपनाया जा चुका है। भारत अब तक इससे पीछे था। यह कदम भारतीय बैंकिंग सिस्टम को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाएगा।

खास तौर पर विदेशी निवेशकों के लिए यह अच्छी बात है। उन्हें भारतीय बैंकों की बैलेंस शीट पढ़ने में आसानी होगी क्योंकि वह उसी फॉर्मेट में होगी जो दुनिया भर में चलती है।

बैंकों को अब AI और डेटा एनालिटिक्स की जरूरत होगी

ECL Model लागू करना आसान नहीं है। इसके लिए बैंकों को:

  • बड़े पैमाने पर डेटा एनालिटिक्स करनी होगी
  • AI और machine learning tools चाहिए होंगे
  • Risk assessment के नए model बनाने होंगे
  • स्टाफ को ट्रेनिंग देनी होगी

यह सब करने में खर्चा आएगा। इसे system upgrade cost कहते हैं। यह भी एक कारण है कि शेयर बाजार ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

छोटे बैंकों को ज्यादा मुश्किल होगी

बड़े PSU बैंक तो किसी तरह manage कर लेंगे। उनके पास resources हैं। लेकिन छोटे प्राइवेट बैंक और को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए यह चुनौती होगी।

RBI को इन बैंकों को handholding करनी होगी। शायद कुछ छूट भी दी जा सकती है implementation की timeline में। लेकिन अभी तो RBI का रुख सख्त दिख रहा है।

क्या ग्राहकों पर असर पड़ेगा?

जी हां, indirect तौर पर असर पड़ेगा। अगर बैंकों को ज्यादा provisioning करनी होगी और उनका मुनाफा कम होगा, तो:

  • लोन के interest rates बढ़ सकते हैं
  • लोन approval सख्त हो सकती है
  • जिनकी credit history कमजोर है, उन्हें लोन मिलना मुश्किल होगा

लेकिन राहत की बात यह है कि लंबी अवधि में बैंकिंग सिस्टम मजबूत होगा। बैड लोन कम होंगे। और जब सिस्टम healthy होगा, तो ग्राहकों को भी फायदा ही होगा।

2027 तक बैंकों के पास तैयारी का समय

RBI ने implementation की तारीख 1 अप्रैल 2027 रखी है। यानी अभी लगभग एक साल का समय है। यह समय बैंकों को मिला है तैयारी के लिए।

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इस दौरान बैंकों को:

  • IT systems upgrade करने होंगे
  • स्टाफ को ट्रेनिंग देनी होगी
  • Risk models develop करने होंगे
  • Dry run करके देखना होगा कि system काम कर रहा है या नहीं

समय कम है, लेकिन RBI ने साफ कर दिया है कि अब और देरी नहीं होगी। यह फाइनल deadline है।

विश्लेषण: भारतीय बैंकिंग के लिए ऐतिहासिक कदम

अगर पूरी तस्वीर देखें तो यह बदलाव जरूरी था। 2015-18 के दौर में जो बैड लोन का संकट आया, वह इसलिए आया क्योंकि बैंकों की अकाउंटिंग सिस्टम में पारदर्शिता नहीं थी। समस्याएं छिपाई जा रही थीं।

अब ECL Model से पारदर्शिता आएगी। हर तिमाही में बैंक को यह बताना होगा कि उनका expected loss कितना है। निवेशकों को सही तस्वीर दिखेगी।

हां, शुरुआत में दिक्कत होगी। मुनाफा कम दिखेगा। लेकिन यह एक बार की समस्या है। उसके बाद सिस्टम settle हो जाएगा और भारतीय बैंकिंग सेक्टर वैश्विक स्तर पर अधिक विश्वसनीय बनेगा।


मुख्य बातें (Key Points)
  • RBI ने ECL Model (Expected Credit Loss) की फाइनल गाइडलाइन जारी की है
  • 1 अप्रैल 2027 से यह नया सिस्टम लागू हो जाएगा
  • पुराना “Incurred Loss Model” खत्म होगा, अब “Expected Loss” का दौर आएगा
  • तीन स्टेज में लोन classify होंगे – Performing, Under Watch, और Credit Impaired
  • बैंकों को 90 दिन का इंतजार नहीं करना होगा, खतरे के संकेत दिखते ही provisioning करनी होगी
  • PSU बैंकों के शेयर्स में गिरावट आई क्योंकि शॉर्ट टर्म में प्रॉफिट कम होगा
  • लॉन्ग टर्म में बैंकिंग सिस्टम मजबूत होगा और बैड लोन का खतरा कम होगा
  • ग्लोबल अकाउंटिंग स्टैंडर्ड IFRS 9 के अनुरूप भारत भी आ रहा है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ECL Model क्या है और यह कब लागू होगा?

ECL (Expected Credit Loss) Model एक नई बैंकिंग अकाउंटिंग प्रणाली है जिसमें बैंकों को भविष्य में होने वाले संभावित नुकसान का अनुमान पहले से ही लगाना होगा। RBI ने इसे 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का फैसला किया है। इससे पहले बैंक सिर्फ तभी provisioning करते थे जब लोन डिफॉल्ट हो जाता था।

प्रश्न 2: क्या 90 दिन वाला NPA नियम बदल गया है?

नहीं, 90 दिन वाला NPA classification नहीं बदला है। अगर कोई 90 दिन तक principal या interest नहीं चुकाता तो वह अब भी NPA ही माना जाएगा। जो बदला है वह यह है कि अब बैंकों को 90 दिन का इंतजार नहीं करना होगा provisioning के लिए। जैसे ही डिफॉल्ट के संकेत दिखें, provisioning शुरू करनी होगी।

प्रश्न 3: इस बदलाव का आम लोगों पर क्या असर होगा?

शुरुआत में लोन के interest rates थोड़े बढ़ सकते हैं और लोन approval की प्रक्रिया कुछ सख्त हो सकती है। कमजोर क्रेडिट हिस्ट्री वाले लोगों को लोन मिलना मुश्किल हो सकता है। लेकिन लंबे समय में फायदा होगा क्योंकि बैंकिंग सिस्टम अधिक मजबूत और स्थिर बनेगा।

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