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The News Air - Breaking News - ATM Cash Crisis: पैसे खत्म हो रहे या बंद हो रहे एटीएम, जानें असली वजह

ATM Cash Crisis: पैसे खत्म हो रहे या बंद हो रहे एटीएम, जानें असली वजह

भारत में यूपीआई क्रांति के बावजूद कैश का इस्तेमाल ऑल टाइम हाई पर, लेकिन एटीएम लगातार बंद हो रहे – समझें पूरा पैराडॉक्स

Ajay Kumar by Ajay Kumar
रविवार, 7 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, बिज़नेस
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ATM Cash Crisis
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Currency Paradox – यही शब्द सबसे सटीक है भारत की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए। एक तरफ यूपीआई (UPI) और डिजिटल पेमेंट में जबरदस्त उछाल आ रहा है। देश डिजिटल पेमेंट सुपरपावर बनता जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ, जो बात चौंकाने वाली है वह यह कि फिजिकल कैश की मांग घटने के बजाय और भी तेजी से बढ़ रही है।

हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की रिपोर्ट में एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है – एटीएम (ATM) लगातार बंद हो रहे हैं, कई एटीएम में कैश की कमी है, और विड्रॉल (निकासी) भी कम हो रहे हैं। तो आखिर मामला क्या है? क्या भारत कैशलेस बन रहा है या फिर कैश की मांग बढ़ रही है? आइए समझते हैं पूरा पैराडॉक्स।

🔍 यह भी पढ़ें- India Gold Cash Limit: विदेश से कितना Gold लाना है Legal?

करेंसी पैराडॉक्स क्या है: जब डिजिटल बढ़े और कैश भी बढ़े

भारत में पिछले कुछ सालों में यूपीआई पेमेंट, मोबाइल बैंकिंग, क्यूआर कोड पेमेंट और डिजिटल वॉलेट तेजी से बढ़े हैं। लोग छोटी से छोटी खरीदारी भी अब फोन से कर रहे हैं। सब्जी वाला हो या पान की दुकान, हर जगह यूपीआई का झंडा फहरा रहा है।

ऐसे में सहज अनुमान यह होना चाहिए कि लोग अब कम कैश रखेंगे। लेकिन हकीकत ठीक उलट है। आरबीआई का डेटा बताता है कि करेंसी इन सर्कुलेशन (Currency in Circulation) यानी लोगों के हाथों में मौजूद नकदी की मात्रा नाटकीय रूप से बढ़ी है।

आंकड़े देखिए:

वित्तीय वर्षकरेंसी इन सर्कुलेशन (वॉल्यूम – नोट्स की संख्या)करेंसी इन सर्कुलेशन (मूल्य – रुपये में)
2016-17 (डीमोनेटाइजेशन)10,000 करोड़ नोट्स₹13 लाख करोड़
2024-2517,000 करोड़ नोट्स₹41 लाख करोड़

देखा जाए तो यह तीन गुना से भी अधिक वृद्धि है। 10 साल में नोट्स की संख्या और कुल मूल्य दोनों में भारी इजाफा हुआ है।

यही है भारत का करेंसी पैराडॉक्स – डिजिटल पेमेंट बढ़ रहे हैं, फिर भी कैश की मांग घटने का नाम नहीं ले रही।

🔍 यह भी पढ़ें- Cash Withdrawal का बड़ा खेल: ₹61,000 करोड़ निकाले, क्या खतरे में है डिजिटल इंडिया?

करेंसी इन सर्कुलेशन का मतलब क्या है

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि “करेंसी इन सर्कुलेशन” एक तकनीकी शब्द है।

करेंसी इन सर्कुलेशन = आरबीआई द्वारा जारी कुल करेंसी – (आरबीआई की तिजोरी में रखा कैश + बैंकों के पास रखा कैश)

यानी जो फिजिकल मनी इस समय:

  • घरों में रखी है
  • व्यापारियों के पास है
  • किसानों के पास है
  • संस्थानों के पास है
  • आम लोगों की जेब और अलमारी में है

यही करेंसी इन सर्कुलेशन कहलाती है। और यही लगातार बढ़ रही है।

भारत में करेंसी इन सर्कुलेशन 2016-17 में ₹13 लाख करोड़ थी, जो बढ़कर अब ₹41 लाख करोड़ हो गई है। यह तीन गुना वृद्धि है, जो यह साबित करती है कि कैश अभी भी देश की आर्थिक गतिविधियों में गहराई से शामिल है।

🔍 यह भी पढ़ें- Toll Tax Increase April 2026: 1 अप्रैल से हाईवे का सफर महंगा, Cash Payment भी बंद

डिजिटल बढ़ रहा है तो कैश क्यों बढ़ रहा

यह सबसे अहम सवाल है। अगर यूपीआई इतना बढ़ रहा है, तो कैश की जरूरत क्यों बढ़ रही है?

समझने वाली बात यह है: डिजिटल पेमेंट कैश ट्रांजैक्शन को रिप्लेस करता है, न कि कैश होल्डिंग को।

पहले क्या होता था:
मान लीजिए कोई व्यक्ति महीने की शुरुआत में ₹10,000 निकालता था। वह इसे खर्च करता था:

  • सब्जी खरीदने में
  • पेट्रोल-डीजल में
  • रेस्टोरेंट बिल में
  • यूटिलिटी बिल में
  • दुकानों पर खरीदारी में

आज क्या हो रहा है:
वही व्यक्ति अपने सभी छोटे-मोटे खर्चे यूपीआई से कर रहा है। क्यूआर कोड स्कैन कर रहा है। डिजिटल पेमेंट कर रहा है।

लेकिन फिर भी वह अपने घर में ₹20,000-30,000 कैश रख रहा है:

  • आपातकाल के लिए
  • सुरक्षा के लिए
  • मनोवैज्ञानिक संतुष्टि के लिए

यानी:

  • ट्रांजैक्शन डिजिटल में हो रहे हैं
  • लेकिन होल्डिंग (रखने की आदत) कैश में बनी हुई है

यही पैराडॉक्स की जड़ है।

पैसे के तीन काम: यूपीआई सिर्फ एक में मदद करता है

अर्थशास्त्र में पैसे के तीन मुख्य कार्य होते हैं:

1. मीडियम ऑफ एक्सचेंज (Medium of Exchange)
खरीद-फरोख्त के लिए इस्तेमाल। यूपीआई इसे रिप्लेस कर रहा है।

2. यूनिट ऑफ अकाउंट (Unit of Account)
चीजों की कीमत मापने का पैमाना। ₹100 का खाना, ₹1 लाख की सैलरी। डिजिटल पेमेंट से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता।

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3. स्टोर ऑफ वैल्यू (Store of Value)
संपत्ति जमा करने का जरिया। लोग आपातकाल या भविष्य के लिए पैसा जमा करते हैं – कैश में, सोने में, जमीन-जायदाद में।

दिलचस्प बात यह है कि यूपीआई पहले काम में तो मदद कर रहा है, लेकिन तीसरे काम में नहीं। लोग अभी भी वेल्थ स्टोर करने के लिए कैश को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इसीलिए करेंसी इन सर्कुलेशन बढ़ रही है।

भारत में लोग कैश क्यों पसंद करते हैं

कई कारण हैं जो कैश को अभी भी प्रासंगिक बनाए हुए हैं:

1. मनोवैज्ञानिक सुरक्षा (Psychological Security)

लोग “हाथ में पैसा” को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। स्क्रीन पर दिखने वाले ₹5 लाख की तुलना में घर में रखे ₹5 लाख को ज्यादा सुरक्षित समझा जाता है। खासकर बुजुर्ग, ग्रामीण परिवार और छोटे व्यापारी ऐसा सोचते हैं।

2. आपातकालीन तैयारी (Emergency Preparedness)

अचानक बिजली चली जाए, बैंकिंग सिस्टम में खराबी आ जाए, इंटरनेट न चले – ऐसे में कैश ही काम आता है। कोविड महामारी के दौरान लोगों ने इसे महसूस किया। इसलिए लोग घर में कैश रखना पसंद करते हैं।

3. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy)

भारत की बड़ी आर्थिक गतिविधि अनौपचारिक क्षेत्र में है:

  • कृषि
  • निर्माण
  • छोटा खुदरा व्यापार
  • परिवहन

इन सभी में कैश का व्यापक इस्तेमाल होता है। लाखों लेन-देन बैंकिंग चैनल के बाहर होते हैं।

4. ग्रामीण भारत की वास्तविकता

हालांकि यूपीआई ग्रामीण इलाकों में भी पहुंच रहा है, लेकिन अभी भी कई गांवों में:

  • नेटवर्क की समस्या है
  • स्मार्टफोन सबके पास नहीं
  • डिजिटल साक्षरता की कमी है

इसलिए वहां कैश प्रमुख बना हुआ है।

5. ब्लैक मनी का प्रचलन

काले धन की समस्या अभी भी बनी हुई है। हाल ही में ओडिशा के एक इंजीनियर के घर से ₹5.47 करोड़ नकद बरामद हुआ। ऐसे कितने मामले होंगे जो पकड़े नहीं गए? भ्रष्टाचार, अघोषित आय, टैक्स चोरी – सब कैश में होता है।

यही कारण हैं कि कैश की मांग कम नहीं हो रही।

एटीएम ट्रांजैक्शन क्यों गिर रहे हैं

अब दूसरी तरफ देखें। कैश की मांग तो बढ़ रही है, लेकिन एटीएम विड्रॉल लगातार घट रहे हैं।

वित्तीय वर्षएटीएम से निकाला गया कैश (मूल्य)
2022-23₹32 लाख करोड़
2024-25₹28.6 लाख करोड़

यानी लगातार गिरावट। ऐसा क्यों?

1. यूपीआई क्रांति

डीमोनेटाइजेशन के बाद सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दिया। यूपीआई ने क्रांति ला दी। हालांकि मुख्य उद्देश्य काला धन खत्म करना था (जो पूरी तरह सफल नहीं हुआ), लेकिन डिजिटलीकरण में बड़ी सफलता मिली।

2. व्यवहार में बदलाव (Behavioral Shift)

पहले:

  • सैलरी आती थी
  • एटीएम से कैश निकाला जाता था
  • कैश से खर्च होता था

अब:

  • सैलरी बैंक अकाउंट में रहती है
  • यूपीआई से सीधे खर्च किया जाता है
  • एटीएम की जरूरत कम पड़ती है

इसलिए एटीएम ट्रांजैक्शन गिर रहे हैं।

एटीएम की संख्या क्यों घट रही है

सबसे गंभीर बात यह है कि पिछले 3 सालों से एटीएम की संख्या लगातार कम हो रही है।

सालएटीएम की संख्या (पूरे भारत में)
20222,19,000
20252,09,000

10,000 एटीएम बंद हो गए हैं।

ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब है – आर्थिक कारण (Economics)।

एटीएम चलाना महंगा है और फायदा घट रहा है

कोई भी व्यवसाय तभी चलता है जब वह लाभदायक हो। एटीएम चलाने के लिए भारी खर्च आता है:

1. फिक्स्ड कॉस्ट (निश्चित लागत):

  • एटीएम मशीन की कीमत (लाखों रुपये)
  • इंस्टॉलेशन खर्च
  • जगह का किराया (Rental Space)
  • बिजली बिल (24×7 चलता है)

2. सुरक्षा खर्च (Security Cost):

  • सीसीटीवी कैमरे
  • अलार्म सिस्टम
  • निगरानी व्यवस्था
  • सुरक्षा गार्ड (कई बार एटीएम उठाकर ले जाने की घटनाएं होती हैं)

3. कैश लॉजिस्टिक्स:

  • एटीएम में नियमित रूप से कैश भरना पड़ता है
  • ट्रांसपोर्टेशन खर्च
  • बीमा (Insurance)
  • रीप्लेनिशमेंट (दोबारा भरना)
  • विशेषज्ञ कैश मैनेजमेंट कंपनियों को हायर करना पड़ता है

4. रखरखाव (Maintenance):

  • सॉफ्टवेयर अपग्रेड
  • हार्डवेयर सर्विसिंग
  • नेटवर्क मेंटेनेंस
  • तकनीकी सपोर्ट

अब अगर लोग एटीएम से कम पैसा निकालेंगे, तो एटीएम ऑपरेटरों को फायदा नहीं होगा। जितना ज्यादा विड्रॉल, उतना ज्यादा कमीशन। विड्रॉल कम तो फायदा भी कम।

उद्योग की शिकायत:

  • लागत लगातार बढ़ रही है
  • ट्रांजैक्शन घट रहे हैं
  • लाभप्रदता खत्म हो रही है
  • रखरखाव में कमी आ रही है
  • एटीएम बंद करना मजबूरी बन रही है

यही कारण है कि एटीएम बंद हो रहे हैं।

क्या भारत कैशलेस बन जाएगा

बहुत से लोगों ने सोचा था कि यूपीआई और डिजिटल पेमेंट के आने से कैश खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होने वाला।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है:

  • कोई भी अर्थव्यवस्था लेस-कैश (Less Cash) बन सकती है
  • लेकिन पूरी तरह कैशलेस (Cashless) नहीं बन सकती

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और जटिल देश में तो यह और भी मुश्किल है। यहां:

  • अलग-अलग आय वर्ग हैं
  • अलग-अलग शिक्षा स्तर हैं
  • शहरी-ग्रामीण विभाजन है
  • तकनीकी पहुंच में असमानता है

इसलिए कैश हमेशा बना रहेगा। हां, उसका इस्तेमाल कम हो सकता है, लेकिन खत्म नहीं होगा।

वित्तीय समावेशन पर क्या असर पड़ेगा

एटीएम बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी किसे होगी?

  • बुजुर्ग लोग: जो स्मार्टफोन नहीं चलाते
  • प्रवासी मजदूर: जिनके पास डिजिटल साधन नहीं
  • ग्रामीण परिवार: जहां इंटरनेट कमजोर है
  • कम आय वाले मजदूर: जो एटीएम पर निर्भर हैं

समस्याएं:

1. ग्रामीण बहिष्कार (Rural Exclusion):
गांवों में एटीएम कम होंगे तो लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी। समय और पैसा दोनों बर्बाद होगा।

2. खर्च बढ़ेगा:
दूसरे बैंक के एटीएम से पैसा निकालने पर चार्ज लगता है। अगर अपने बैंक का एटीएम दूर है तो मजबूरी में दूसरे का इस्तेमाल करना पड़ेगा।

3. बैंकिंग असमानता:
शहरी इलाकों में तो डिजिटल सुविधाएं हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नुकसान होगा। यह असमानता बढ़ा सकता है।

सरकार और आरबीआई को क्या करना चाहिए

यह एक गंभीर मुद्दा है। कुछ समाधान हो सकते हैं:

1. एटीएम ऑपरेटरों को प्रोत्साहन:
जो ग्रामीण या दूरदराज इलाकों में एटीएम चलाते हैं, उन्हें सब्सिडी या टैक्स छूट दी जाए।

2. बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट मॉडल को मजबूत करना:
गांवों में दुकानों को मिनी-बैंक की तरह काम करने की अनुमति। यहां लोग कैश निकाल सकें।

3. डिजिटल साक्षरता अभियान:
बुजुर्गों और ग्रामीण लोगों को यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग सिखाने के लिए सरकारी कार्यक्रम चलाना।

4. हाइब्रिड मॉडल अपनाना:
कैश और डिजिटल दोनों को समानांतर चलने देना। जबरदस्ती कैशलेस बनाने की कोशिश न करना।

निष्कर्ष: यह संकट नहीं, बदलाव है

अगर गौर करें तो यह कोई बहुत बड़ी चिंता का विषय नहीं है कि “एटीएम से कैश गायब हो रहा है”। असली मुद्दा यह है कि:

  • एटीएम से निकासी कम हो रही है
  • एटीएम ऑपरेटरों को फायदा नहीं हो रहा
  • लाभप्रदता खत्म हो रही है
  • इसलिए एटीएम बंद हो रहे हैं

लेकिन कैश की मांग बढ़ रही है। लोग अभी भी कैश रख रहे हैं, भले ही खर्च डिजिटल से कर रहे हों।

यह एक संक्रमण काल (Transition Phase) है। भारत धीरे-धीरे लेस-कैश इकोनॉमी की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन कैशलेस नहीं बन सकता।

💡 यह भी पढ़ें- ATM Rule Change: 1 अप्रैल से बदलेंगे ATM के नियम, QR Code से निकलेगा पैसा


मुख्य बातें (Key Points)
  • भारत में करेंसी इन सर्कुलेशन ₹13 लाख करोड़ से बढ़कर ₹41 लाख करोड़ हुआ (तीन गुना)
  • यूपीआई बढ़ रहा है फिर भी कैश की मांग ऑल टाइम हाई पर
  • 10,000 एटीएम पिछले 3 सालों में बंद हुए
  • एटीएम विड्रॉल ₹32 लाख करोड़ से घटकर ₹28.6 लाख करोड़ हुआ
  • एटीएम चलाने की लागत बढ़ रही है, फायदा घट रहा
  • ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन खतरे में
  • भारत लेस-कैश बन सकता है, कैशलेस नहीं

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: यूपीआई बढ़ रहा है तो कैश की मांग क्यों बढ़ रही है?

डिजिटल पेमेंट सिर्फ ट्रांजैक्शन (लेन-देन) को रिप्लेस करता है, होल्डिंग (रखने की आदत) को नहीं। लोग खर्च तो यूपीआई से कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा और आपातकाल के लिए घर में कैश रख रहे हैं। इसके अलावा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, ग्रामीण क्षेत्र और काला धन भी कैश मांग बढ़ा रहे हैं।

प्रश्न 2: एटीएम क्यों बंद हो रहे हैं?

एटीएम चलाना महंगा है – मशीन, किराया, बिजली, सुरक्षा, कैश भरना, रखरखाव सभी में खर्च आता है। लेकिन यूपीआई के कारण लोग एटीएम से कम पैसा निकाल रहे हैं। कम निकासी मतलब कम कमीशन। इसलिए एटीएम ऑपरेटरों को फायदा नहीं हो रहा और वे एटीएम बंद कर रहे हैं।

प्रश्न 3: क्या भारत पूरी तरह कैशलेस बन सकता है?

नहीं। भारत “लेस-कैश” (कम कैश) बन सकता है, लेकिन पूरी तरह “कैशलेस” नहीं। यहां विशाल ग्रामीण आबादी है, डिजिटल साक्षरता में कमी है, इंटरनेट की पहुंच सीमित है, और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है। इसलिए कैश हमेशा एक जरूरी साधन बना रहेगा।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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