Agricultural Urea Misuse का एक चौंकाने वाला मामला हरियाणा के सिरसा जिले से सामने आया है। पिंड पन्नीवाला रुलदू में स्थित करीब दो सौ करोड़ रुपये की लागत वाली ‘E-20 Green Fuels Private Limited‘ फैक्ट्री में खेती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली यूरिया के कथित वाणिज्यिक उपयोग का बड़ा मामला सामने आया है। देखा जाए तो यह फैक्ट्री भारत सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों को इथेनॉल की सप्लाई करती है, जो इसे और भी गंभीर बनाता है।
कृषि विभाग हरियाणा की जांच के बाद, सदर थाना पुलिस ने E-20 फैक्ट्री और दिल्ली की सप्लायर फर्म ‘शुभम इंटरनेशनल’ (बुरारी) के खिलाफ धोखाधड़ी, जरूरी वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) और फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है।
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763 बैग यूरिया बरामद, 757 संदिग्ध
कृषि विभाग की जांच टीम ने फैक्ट्री के स्टोर रूम से यूरिया के कुल 763 बैग बरामद किए हैं। इनमें से ‘एग्रीकल्चर ग्रेड’ (खेती योग्य) वाले इंडियन पोटाश लिमिटेड के 6 पीले बैग (45 किलो) मिले हैं। बाकी बचे 757 बैग (50 किलो) भी पूरी तरह से शक के घेरे में हैं, क्योंकि उन पर से बैच नंबर, निर्माण की तिथि और निर्माता कंपनी जैसी जरूरी जानकारी गायब थी।
समझने वाली बात यह है कि विभाग ने जांच के लिए संदिग्ध खाद के 10 सैंपल भी भरे हैं। यह सैंपल यह तय करेंगे कि वास्तव में इन बैगों में कृषि यूरिया थी या टेक्निकल ग्रेड यूरिया।
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कागजों में हेराफेरी: ऑर्गेनिक कंपोस्ट बनाम टेक्निकल यूरिया
दोष है कि फैक्ट्री में वाणिज्यिक काम के लिए किसानों को मिलने वाली सस्ती और सब्सिडी वाली कृषि यूरिया का इस्तेमाल किया जा रहा था। बिना पहचान वाले 757 बैग मिलने के कारण खरीद और सप्लाई से जुड़े कागजात भी सवालों के घेरे में आ गए हैं।
FIR के मुताबिक, फैक्ट्री के खरीद आदेश (Purchase Order) में माल का असली नाम छिपाने के लिए ‘ऑर्गेनिक कंपोस्ट’ (जैविक खाद) लिखा गया था, जबकि सप्लायर के बिलों में उसी माल को ‘टेक्निकल ग्रेड यूरिया’ दर्शाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस नामकरण में बदलाव से पूरे खरीद रिकॉर्ड पर बड़ा शक पैदा हो गया है।
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शिकायत से शुरू हुई जांच
यह मामला भारतीय किसान एकता (BKE) के प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख की शिकायत के बाद सामने आया। सिरसा के डिप्टी डायरेक्टर (कृषि विभाग) द्वारा गठित जांच कमेटी में उप-मंडल कृषि अधिकारी अमित शर्मा, सहायक पौध सुरक्षा अधिकारी विजेंद्र पाल, गुण नियंत्रण निरीक्षक अमित कुमार और किसान नेता शामिल थे।
जांच के दौरान कृषि अधिकारियों को यूरिया के बैगों से नीम की ‘महक’ आई। ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार खेती के लिए सब्सिडी वाली यूरिया की कालाबाजारी रोकने के लिए उस पर नीम तेल की कोटिंग (Neem Coating) करती है। इस महक के कारण अधिकारियों का शक और पक्का हो गया कि बाकी बैगों में भी कृषि यूरिया ही छुपाई गई है।
प्रशासन की सख्ती के आगे झुका फैक्ट्री प्रबंधन
कृषि अधिकारियों के मुताबिक छापेमारी के दौरान फैक्ट्री प्रबंधन ने कंपनी की नीति का हवाला देते हुए बाहरी मजदूरों को अंदर आने से रोकने की कोशिश की और कहा कि मजदूरों का बीमा होना जरूरी है। पर अधिकारियों ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस की मौजूदगी में सरकारी स्तर पर मजदूर बुलाकर सारा संदिग्ध माल बाहर निकलवाया और उसे सील कर दिया।
थाना सदर के मुखिया अनिल कुमार ने बताया कि कृषि विभाग की शिकायत पर मुकदमा दर्ज करके आगे की जांच शुरू कर दी गई है।
7.5 गुना मुनाफे का खेल: रेटों में बड़ा फर्क
कृषि विभाग की जांच में सामने आया है कि फैक्ट्री में इथेनॉल के उत्पादन के दौरान मशीनों को ठंडा रखने (Cooling System) के लिए रोजाना करीब 10 से 12 बैग, यानी 500 से 600 किलो यूरिया की जरूरत पड़ती है।
| यूरिया का प्रकार | कीमत प्रति बैग (₹) | उपयोग |
|---|---|---|
| कृषि यूरिया (सब्सिडी वाली) | 266.50 | किसानों के लिए |
| टेक्निकल ग्रेड यूरिया | 2,000 | फैक्ट्रियों के लिए |
| मुनाफे का अनुपात | 7.5 गुना | अवैध लाभ |
दोनों के रेटों में मौजूद करीब 7.5 गुना का यह बड़ा फर्क ही इस गैर-कानूनी खेल का मुख्य कारण माना जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक दिन में ही 10-12 बैग के इस्तेमाल से महीने में लाखों रुपये की बचत हो सकती है।
सारा काम पारदर्शी, दोष झूठे: हैरी ग्रोवर (CEO)
दूसरी ओर ‘E-20 Green Fuels’ के CEO हैरी ग्रोवर ने फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि वह इस समय विदेश में हैं। यह एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है और फैक्ट्री का सारा काम पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाता है। इतने बड़े स्तर के उद्योग में छोटे स्तर पर खाद आदि के जरिए पैसे बचाने की कोई वजह नहीं बनती। फैक्ट्री पर लगाए गए सारे दोष बेबुनियाद और झूठे हैं।
केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग
भारतीय किसान एकता (BKE) के प्रदेश अध्यक्ष लखविंदर सिंह औलख ने कहा कि सब्सिडी वाली यूरिया के औद्योगिक उपयोग के कारण असली हकदार किसानों को खाद मिलने में भारी दिक्कत आ रही है और सरकारी खजाने की सब्सिडी का खुलेआम दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने मांग की कि कई सूबों में फैले इस यूरिया खाद घपले की बारीकी से जांच किसी केंद्रीय जांच एजेंसी (जैसे CBI) से करवाई जाए।
मुख्य बातें (Key Points)
- सिरसा में E-20 Green Fuels फैक्ट्री से 763 बैग यूरिया बरामद, 757 संदिग्ध
- कृषि यूरिया (₹266.50) और टेक्निकल यूरिया (₹2000) में 7.5 गुना का फर्क
- खरीद आदेश में ‘ऑर्गेनिक कंपोस्ट’, लेकिन बिल में ‘टेक्निकल यूरिया’ दर्शाया गया
- Essential Commodities Act और Fertilizer Control Order के तहत FIR दर्ज
- BKE ने केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग की













