Jaishankar Energy Warning: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका में हुई G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में साफ कहा कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार को बंधक बनाकर नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने भू-राजनीतिक होड़, एकतरफा प्रतिबंधों और समुद्री रास्तों पर नियंत्रण को इसकी वजह बताया।
यह बयान G20 की दूसरी प्लेनरी सत्र में आया, जिसकी अध्यक्षता अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की। G20 की अध्यक्षता इस बार अमेरिका के पास है।
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‘तीन खतरे जो जयशंकर ने गिनाए’
उनका सबसे बड़ा सवाल था कि क्या कोई देश वास्तव में ऊर्जा सुरक्षा हासिल कर सकता है, अगर उसका तेल और गैस सिर्फ बाजार की ताकतों पर नहीं, राजनीतिक फैसलों पर भी टिका हो। भारत के लिए यह इसलिए अहम है कि वह अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
| खतरा | क्या असर |
|---|---|
| आर्थिक प्रतिबंध | ताकतवर देश प्रतिबंध लगाते हैं, जिससे तेल की खरीद-बिक्री रुकती है |
| समुद्री चोक पॉइंट | स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब-एल-मंदेब जैसे रास्तों पर दिक्कतें |
| ऊर्जा ढांचे पर हमले | पाइपलाइन, गैस प्रतिष्ठानों और तेल सुविधाओं पर हमले |
‘उत्पादन की कमी नहीं, फैसलों का संकट’
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मौजूदा ऊर्जा संकट तेल का उत्पादन घटने से नहीं हो रहा। मान लीजिए दुनिया में 100 मिलियन बैरल रोज बन रहे हैं और मांग भी 100 मिलियन की है, तो सैद्धांतिक रूप से कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
पर वेस्ट एशिया में युद्ध, कई देशों पर प्रतिबंध, जहाजों को रास्ता न मिलना और बीमा की बढ़ती लागत ने परिवहन को संकट बना दिया है। उत्पादन काफी है, पर तेल पहुंच नहीं पा रहा। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बताया गया है। भारत जैसे देश के लिए इसका मतलब चालू खाते और राजकोषीय घाटे पर दबाव है।
‘प्रतिबंध कैसे खेल बिगाड़ते हैं: ईरान और रूस का उदाहरण’
अगर अमेरिका ईरान पर प्रतिबंध लगा दे, तो ईरान तेल बेचना चाहता है और भारत खरीदना चाहता है, फिर भी लेन-देन नहीं हो पाता। ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग से हटा दिया जाता है और कंपनियों पर रोक लग जाती है। इसे प्राइमरी सैंक्शन कहा जाता है।
| तरह का प्रतिबंध | क्या हुआ |
|---|---|
| प्राइमरी | ईरान के तेल और उसके निर्यातकों पर रोक |
| सेकेंडरी | भारत को रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ की धमकी |
भारत की चिंता यह है कि रूस, ईरान, सऊदी अरब, इराक और UAE जैसे सभी बड़े उत्पादकों से उसके संबंध हैं। वह ऊर्जा खरीद के फैसले अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” से करना चाहता है, अमेरिका के कहने से नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका की ओर से डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद बार-बार भारत को रूस से तेल पर टैरिफ की चेतावनी दी गई। फिर जब अमेरिका को खुद डीजल की जरूरत पड़ी तो उसने रूस से सौदा कर प्रतिबंध फिलहाल हटा दिए। यहीं से सवाल उठता है कि जरूरत पड़ने पर नियम बदलने का यह रवैया कितना वाजिब है।
‘LPG का खास जिक्र: रसोई तक पहुंचता खतरा’
जयशंकर ने LPG का खास उल्लेख किया। भारत ऊर्जा बदलाव से गुजर रहा है। पहले लोग लकड़ी, कोयला और उपले जैसे ठोस ईंधन पर निर्भर थे, जिससे प्रदूषण और सेहत को खतरा था। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने घर-घर सिलेंडर पहुंचाया।
पर LPG में एक खास दिक्कत है। कच्चे तेल के लिए आपूर्ति के नए स्रोत जल्दी खोजे जा सकते हैं, रूस, अमेरिका या वेनेजुएला से। LPG के लिए अलग टर्मिनल, भंडारण और वितरण ढांचा चाहिए, इसलिए तुरंत विकल्प नहीं बनाया जा सकता। अगर आपूर्ति टूटी तो सबसे ज्यादा मार कम आय वाले परिवारों पर पड़ेगी, क्योंकि LPG उनकी पहुंच से बाहर हो सकती है। हाल में सरकार ने सिलेंडर बुकिंग पर कुछ सीमा भी लगाई थी।
‘विकसित बनाम विकासशील: किसके पास कितना कवच’
कहा गया कि संकट का बोझ दोनों पर बराबर नहीं पड़ता।
| बिंदु | विकसित देश | विकासशील देश (भारत समेत) |
|---|---|---|
| वित्तीय संसाधन | काफी बेहतर, पूंजी तक आसान पहुंच | सीमित |
| आपूर्ति के विकल्प | आसानी से बदल सकते हैं | जोखिम ज्यादा |
| रणनीतिक भंडार | करीब 90 दिन तक काम चला सकते हैं | भारत का बफर करीब 9 दिन का बताया गया |
ऊर्जा ढांचे पर हमलों का भी जिक्र हुआ। खर्ग आइलैंड पर हमला, ईरान की ओर से सऊदी अरब पर हमले और यमन में हूतियों के सऊदी पर लगातार हमले गिनाए गए। अंत में नुकसान उन्हीं का होता है जिनके पास झटका सहने की गुंजाइश कम है।
‘G20 क्या कर सकता है: उम्मीद और हकीकत’
कहा गया कि G20 दुनिया की 85% GDP का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए वह मिलकर आवाज उठाए तो असर पड़ सकता है। उससे अपेक्षा है कि चोक पॉइंट बंद न हों, ऊर्जा बाजार पारदर्शी रहे और प्रतिबंध मनमाने ढंग से न लगाए जाएं।
भारत की मांग व्यापक है: सस्ती ऊर्जा तक पहुंच, खाद्य सुरक्षा, विकास के लिए वित्त, तकनीक तक पहुंच और जलवायु न्याय।
‘इस चेतावनी के पीछे की बात’
देखा जाए तो यह बयान सिर्फ कूटनीतिक भाषण नहीं है। इसमें भारत की सीधी चिंता झलकती है: तेल की ऊंची कीमत महंगाई और घाटे के रास्ते आम आदमी की जेब तक पहुंचती है, और LPG की कमी सीधे रसोई तक। अगर गौर करें तो जयशंकर ने उसी देश की जमीन पर, जिसकी नीतियों का असर वह गिना रहे थे, यह बात रखी। इससे साफ होता है कि भारत अब ऊर्जा को सिर्फ बाजार का नहीं, रणनीतिक स्वायत्तता का मुद्दा मानता है।
समझने वाली बात है कि ऐसे मंचों पर बोलना आसान है, असली परीक्षा नतीजों की है। यही बात सही मायने में तय करेगी कि यह आवाज असर करती है या नहीं। दिसंबर में प्रस्तावित लीडर्स समिट इसका अगला मौका होगा, जिसमें नरेंद्र मोदी के जाने की संभावना जताई गई है।
‘क्या है पृष्ठभूमि’
अमेरिका ने ईरान के तेल पर प्रतिबंध लगाए, वेस्ट एशिया में युद्ध से आपूर्ति बाधित हुई, और रूस के डीजल पर अमेरिका ने हाल ही में रुख बदला। इन्हीं घटनाओं के बीच भारत ने G20 मंच पर ऊर्जा के राजनीतिक इस्तेमाल पर आपत्ति जताई।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- जयशंकर ने G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में कहा कि ऊर्जा व्यापार को बंधक नहीं बनाना चाहिए।
- उन्होंने तीन खतरे गिनाए: आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री चोक पॉइंट की बाधा और ऊर्जा ढांचे पर हमले।
- संकट उत्पादन की कमी का नहीं, परिवहन और राजनीतिक फैसलों का है, और LPG पर कम आय वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
- G20 से अपेक्षा है कि वह समुद्री सुरक्षा, पारदर्शी ऊर्जा बाजार और मनमाने प्रतिबंधों पर रोक के लिए आवाज उठाए।











