Germany Gen Z Protest: जर्मनी के करीब 34 शहरों में बीते दिन बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिनमें जेन-जी यानी नई पीढ़ी के युवा सबसे आगे रहे। दिन भर प्रदर्शन शांतिपूर्ण चले, लेकिन शाम होते-होते कई शहरों में दुकानें लूटी गईं और आगजनी हुई।
प्रदर्शनकारी महंगाई, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं, आर्थिक असुरक्षा और बढ़ते सैन्य खर्च को लेकर नाराज हैं। सवाल उठता है कि दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिने जाने वाले जर्मनी के युवा आखिर इतने गुस्से में क्यों हैं?
🔍 यह भी पढ़ें- Ludhiana में Target Killing की साजिश नाकाम: Germany-Dubai के Handler के इशारे पर काम कर रहे 2 गिरफ्तार, 3 Pistols बरामद
‘दिन में शांति, शाम को आग: कहां क्या हुआ’
प्रदर्शन जर्मनी के लगभग हर कोने में हुए। इनमें बर्लिन, हैमबर्ग, म्यूनिख, फ्रैंकफर्ट और कोलोन जैसे बड़े शहर शामिल रहे।
| शहर | क्या हुआ |
|---|---|
| फ्रैंकफर्ट | दिन भर विशाल भीड़, शाम को नकाबपोशों ने दुकानें लूटीं |
| हैमबर्ग | लगे बैरिकेड्स में आग लगा दी गई |
| कोलोन और बर्लिन | आगजनी की कुछ घटनाएं |
फ्रांस में हुए दंगों में भी यही पैटर्न दिखा था। शाम होते-होते कुछ असामाजिक तत्व भीड़ से जुड़ जाते हैं और मौके का फायदा उठाते हैं। आरोप यह भी है कि घुसपैठियों (इनफिल्ट्रेटर्स) ने जानबूझकर प्रदर्शन भंग किया, जिसके बाद कड़ी कार्रवाई हुई।
‘क्या मांग रहे हैं प्रदर्शनकारी’
| मांग | क्या चाहते हैं |
|---|---|
| शिक्षा | स्कूलों-यूनिवर्सिटियों में बेहतर फंडिंग |
| महंगाई | रहने का खर्च घटे |
| स्वास्थ्य | स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक सेवाएं बेहतर हों |
| सेना | अनिवार्य सैन्य सेवा का विरोध |
| आर्थिक बोझ | अलग-अलग पीढ़ियों में बोझ का न्यायपूर्ण बंटवारा |
| पर्यावरण | जलवायु सुरक्षा और भविष्य पर ज्यादा ध्यान |
इस अभियान के पीछे कोई एक व्यक्ति या संगठन नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक और नागरिक समाज समूहों के युवा साथ आए हैं। जर्मनी के राष्ट्रीय स्कूल-छात्र संगठन ने खुद को इस प्रदर्शन से अलग कर लिया है और 20 नवंबर को अलग प्रदर्शन करेगा।
‘पहली वजह: जेब पर बढ़ता बोझ’
पहली वजह है बढ़ती जीवन-यापन की लागत। यह सिर्फ जर्मनी नहीं, पूरे यूरोप की समस्या है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऊंची औसत आमदनी का मतलब यह नहीं कि हर इंसान आर्थिक रूप से सुरक्षित है।
बर्लिन, म्यूनिख और फ्रैंकफर्ट जैसे बड़े शहरों में किराए बहुत बढ़ गए हैं। स्टूडेंट्स और युवा प्रोफेशनल सस्ते मकान के लिए आपस में ही होड़ में हैं। मकान का खर्च बढ़ने से खर्च करने लायक आमदनी घटती है। कई छात्रों को फीस भरने के लिए पार्ट-टाइम काम करना पड़ रहा है।
‘दूसरी वजह: 2011 में रोकी गई अनिवार्य सैन्य सेवा की वापसी की आहट’
दूसरी बड़ी वजह अनिवार्य सैन्य सेवा का विरोध है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी सैन्यीकरण को लेकर सतर्क रहा है। 2011 तक युवाओं के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य थी, फिर इसे निलंबित कर दिया गया।
पर फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप का सुरक्षा माहौल बदल गया। जर्मनी रूस के सैन्य खतरे और नाटो की जरूरत को देखते हुए अपनी सेना मजबूत कर रहा है। इसी के तहत 1 जनवरी 2026 से नया सैन्य सेवा ढांचा लागू हुआ है।
| वर्ग | नियम |
|---|---|
| 18 साल के जर्मन नागरिक | सरकार की ओर से सवाल: क्या आप सैन्य सेवा देने को तैयार हैं? |
| पुरुष नागरिक | जवाब देना जरूरी |
| महिला नागरिक | जवाब देना स्वैच्छिक |
| योग्य पुरुष | अनिवार्य मेडिकल जांच |
इसका मतलब यह नहीं कि अभी सेवा अनिवार्य हो गई है। यह प्रश्नावली है, और आगे क्या होगा यह हालात पर टिका है। फिर भी युवाओं का तर्क है कि सरकार का जोर सेना पर है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और आर्थिक भविष्य पर होना चाहिए। उन्हें निजी स्वतंत्रता छिनने और पढ़ाई-करियर टूटने का डर है। सरकार का कहना है कि जर्मनी को सैन्य कर्मियों की जरूरत है।
‘चांसलर मर्ज की मुश्किल घड़ी’
चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की सरकार पेचीदा राजनीतिक स्थिति में है। एक तरफ रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव है, दूसरी तरफ युवा नाराज हैं कि इसके लिए सामाजिक सेवाओं में कटौती हो रही है। सरकार के खिलाफ ही यह पूरा आंदोलन खड़ा हुआ है।
‘सिर्फ जर्मनी की कहानी नहीं: पूरा यूरोप उबल रहा है’
| क्षेत्र | देश | मुख्य मुद्दे |
|---|---|---|
| बाल्कन | सर्बिया, बुल्गारिया, अल्बानिया | भ्रष्टाचार, राजनीतिक जवाबदेही, कमजोर शासन |
| दक्षिण-पश्चिम और भूमध्यसागरीय | पुर्तगाल, स्पेन, इटली, ग्रीस | आवास संकट, महंगाई, बेरोजगारी |
| पश्चिमी यूरोप | फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम | शिक्षा और सार्वजनिक सेवाएं |
युवाओं के सवाल एक जैसे हैं: विकसित देशों में आवास इतना महंगा क्यों हो रहा है, ग्रेजुएट को पक्की नौकरी क्यों नहीं मिल रही, और सरकारें स्कूल-यूनिवर्सिटी से ज्यादा रक्षा पर क्यों खर्च कर रही हैं?
‘आगे क्या असर: सर्बिया की मिसाल से सरकारें चौकन्नी’
अगर गौर करें तो यह आंदोलन सिर्फ छात्र प्रदर्शन नहीं रहा। पीढ़ियों के बीच असमानता और संस्थाओं पर घटता भरोसा इसकी जड़ में है। इसलिए यूरोपीय सरकारों पर राजनीतिक दबाव बढ़ेगा और रक्षा खर्च पर बहस तेज होगी।
दिलचस्प बात यह है कि सर्बिया में छात्र प्रदर्शनों ने दो साल के भीतर सरकार को हरा दिया। आमतौर पर छात्र आंदोलनों को राजनीतिक जीत में सालों लगते हैं, इसलिए यह सरकारों के लिए बड़ी चेतावनी है। आगे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने और हिंसा की आशंका भी जताई गई है।
इसका सीधा संदेश यह है कि जो पीढ़ी कमाने और बसने की उम्र में है, उसके मन में भविष्य को लेकर बेचैनी है। यह बेचैनी सिर्फ आर्थिक नहीं, भरोसे की भी है।
‘क्या है पृष्ठभूमि’
जर्मनी ने 2011 में अनिवार्य सैन्य सेवा निलंबित की थी। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बढ़ती चिंताओं के बीच 1 जनवरी 2026 से नया सैन्य सेवा ढांचा आया। रक्षा खर्च बढ़ने, महंगाई और आवास संकट ने मिलकर युवाओं का गुस्सा भड़का दिया।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
- जर्मनी के करीब 34 शहरों में जेन-जी के प्रदर्शन हुए, दिन में शांति रही लेकिन शाम को हिंसा हुई।
- फ्रैंकफर्ट में लूटपाट, हैमबर्ग में बैरिकेड्स में आग और कोलोन-बर्लिन में आगजनी की घटनाएं हुईं।
- मांगें: बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य, कम खर्च, अनिवार्य सैन्य सेवा का विरोध और पीढ़ियों में बोझ का न्यायपूर्ण बंटवारा।
- 1 जनवरी 2026 से नए सैन्य सेवा ढांचे में 18 साल के नागरिकों से इच्छा पूछी जा रही है, अभी सेवा अनिवार्य नहीं है।












