US Oil Tariffs को लेकर दुनिया भर में हलचल मच गई है। अमेरिकी सीनेटरों के एक द्विदलीय समूह ने रूसी तेल की लगातार खरीद को लेकर भारत, चीन और तीन अन्य देशों से आयात पर 100 फीसदी तक टैरिफ (टैक्स) लगाने का प्रस्ताव रखने वाला कानून पेश किया है। यह वाशिंगटन की तरफ से यूक्रेन जंग को लेकर मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की नवीनतम कोशिश है।
चिंता का विषय यह है कि अगर यह कानून पास हो गया, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है।
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‘किन 5 देशों को बनाया गया निशाना?’
देखा जाए तो प्रस्तावित कानून रूसी तेल के पांच सबसे बड़े खरीदारों को निशाना बनाता है। इनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि रूसी प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखने वाले 15 यूरोपीय देशों को इससे छूट दी गई है। कानून बनाने वालों का तर्क है कि उन देशों की खरीदारी उनकी ऊर्जा जरूरतों का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है और वे मॉस्को पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं।
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‘लिंडसे ग्राहम की आखिरी पहल’
यह बिल लिंडसे ग्राहम द्वारा समर्थित आखिरी प्रमुख पहलों में से एक है। मरहूम रिपब्लिकन सीनेटर की मौत से पहले ही व्हाइट हाउस इस प्रस्ताव पर सहमत हो गया था। इसे डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भी स्पॉन्सर किया है।
समझने वाली बात है कि ब्लूमेंथल ने कांग्रेस से इसे जल्दी पास करने की अपील की है। उन्होंने कहा, “अब इस व्यापक पाबंदियों वाले बिल का समय है।”
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‘सिर्फ टैरिफ नहीं, कुछ और भी’
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कानून टैरिफ उपाय से कहीं ज्यादा व्यापक है। ब्लूमेंथल के मुताबिक, यह रूसी अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों पर “पूर्ण रोक लगाने वाली पाबंदियां” लगाएगा। इसमें ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा उद्योग शामिल हैं। साथ ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ओलीगार्कों और व्यापारिक हस्तियों को निशाना बनाने वाली पाबंदियां भी शामिल होंगी।
‘भारत का पक्ष क्या है?’
अगर गौर करें तो भारत ने 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद रूसी कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ाया है। नई दिल्ली का साफ रुख है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हितों से निर्देशित है और इसका मकसद किफायती ऊर्जा सप्लाई सुनिश्चित करना है।
भारत ने लगातार अपनी स्थिति का बचाव किया है। उसका कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य न की गई एकतरफा पाबंदियों का समर्थन नहीं करता। उसके ऊर्जा सोर्सिंग के फैसले बाजार की स्थितियों और घरेलू जरूरतों पर आधारित हैं।
‘टैरिफ कैसे तय होगा?’
हैरान करने वाली बात यह है कि टैरिफ दर 0 से 100 फीसदी तक हो सकती है। इसे इस उद्देश्य से तय किया जाएगा कि निशाना बनाए गए देशों द्वारा रूसी ऊर्जा की लगातार खरीद को सख्ती से हतोत्साहित किया जा सके। इसका मतलब है कि जो देश रूसी तेल खरीदना जारी रखेंगे, उन पर टैरिफ बढ़ेगा।
‘आम आदमी की जेब पर असर’
राहत की बात या चिंता? यह इस पर निर्भर करता है कि कानून कब और कैसे लागू होता है। अगर भारत पर 100% टैरिफ लगा, तो अमेरिका को भारत से होने वाला निर्यात महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर IT सेक्टर, फार्मा, टेक्सटाइल और अन्य निर्यात-आधारित उद्योगों पर पड़ेगा। इससे रुपये पर भी दबाव आ सकता है। सवाल उठता है: क्या भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा? या फिर अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने रुख पर कायम रहेगा?
‘क्या कानून पास होगा?’
समझने वाली बात यह है कि प्रस्तावित कानून को कानून बनने से पहले अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों को पास करना होगा। यह अनिश्चित है कि क्या यह अपने मौजूदा रूप में आगे बढ़ेगा। यह दर्शाता है कि आगे की राह आसान नहीं है।
‘जानें पूरा मामला’
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई पाबंदियां लगाईं। लेकिन भारत और चीन जैसे देशों ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिका लगातार इन देशों पर दबाव बना रहा है। अब यह नया बिल उसी दबाव की रणनीति का हिस्सा है।
मुख्य बातें (Key Points)
- अमेरिकी सीनेटरों ने भारत, चीन समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का बिल पेश किया।
- रूसी तेल खरीद रोकने पर अमेरिका का जोर।
- स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान भी शामिल।
- यूरोपीय देशों को छूट, केवल शीर्ष खरीदारों पर निशाना।













