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The News Air - Breaking News - Mailing Children History: जब डाक से भेजे जाते थे जीवित बच्चे

Mailing Children History: जब डाक से भेजे जाते थे जीवित बच्चे

अमेरिका में साल 1913 से 1920 के बीच चली इस हैरान करने वाली प्रथा की पूरी सच्चाई।

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
शनिवार, 13 जून 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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Mailing Children History
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Mailing Children History: क्या आप कभी सोच सकते हैं कि किसी बच्चे को डाकिया पार्सल की तरह झोले में डालकर किसी दूसरे शहर छोड़ आए? सुनने में यह बिल्कुल असंभव और डरावना लगता है। लेकिन साल 1913 में United States में कुछ ऐसा ही हकीकत में हो रहा था। दरअसल, वहां के US Post Office ने एक नई सेवा शुरू की थी, जिसके बाद लोगों ने नियमों की ढिलाई का फायदा उठाते हुए अपने बच्चों को ही डाक से भेजना शुरू कर दिया।

हैरान करने वाली बात यह है कि यह कोई अवैध काम नहीं था। शुरुआत में डाक विभाग के नियमों में ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी जो इंसान को भेजने से रोके। बस यहीं से शुरू हुई एक अजीब कहानी। माता-पिता अपने बच्चों के कपड़ों पर डाक टिकट चिपकाते थे और डाकिया उन्हें उनके रिश्तेदारों के घर सुरक्षित पहुंचा देता था।

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‘आखिर क्यों बच्चों को डाक से भेजने लगे थे माता-पिता’

अगर गौर करें, तो इस अजीबोगरीब फैसले के पीछे का सबसे बड़ा कारण पैसा था। उस समय ट्रेन टिकट की तुलना में बच्चों को डाक से भेजना बहुत सस्ता पड़ता था। यह सचमुच अनोखा था। अगर बच्चे का वजन 50 पाउंड से कम होता था, तो उसे Parcel Post के जरिए आसानी से भेजा जा सकता था। समझने वाली बात यह है कि गरीब परिवारों के लिए यह यात्रा का सबसे किफायती जरिया बन गया था।

नीचे दी गई तालिका में आप इस प्रथा के दौरान हुए कुछ प्रसिद्ध मामलों की सांख्यिकी देख सकते हैं:

बच्चा (Child Entity)साल (Year)दूरी (Distance)कुल खर्च (Postage Cost)गंतव्य (Destination)
James Beagle19131 मील (लगभग)15 सेंट्स (Cents)दादी का घर (Glen Este, Ohio)
Charlotte May Pierstorff191473 मील53 सेंट्स (Cents)दादा-दादी का घर (Idaho)
Edna Neff1915720 मीलउपलब्ध नहींपिता का घर (Virginia)
‘इतिहास के पन्नों से: James Beagle और May Pierstorff की कहानियां’

इतिहास के पन्नों को पलटें तो कई रोचक मामले सामने आते हैं। साल 1913 में ओहायो के रहने वाले जेसी और बीगल दंपत्ति ने अपने 8 महीने के बेटे James Beagle को उसकी दादी के घर डाक से भेजा था। इसके लिए उन्होंने सिर्फ 15 सेंट के डाक टिकट खरीदे थे। यह इतिहास का पहला ऐसा दर्ज मामला था।

इसके बाद साल 1914 में 4 साल की बच्ची Charlotte May Pierstorff को उसके माता-पिता ने लगभग 73 मील दूर रहने वाले दादा-दादी के घर डाक से भेज दिया। बच्ची के कोट पर ही डाक टिकट लगा दिए गए थे। दिलचस्प बात यह है कि उस समय ट्रेन की मेल कार में ही उसे यात्रा करनी पड़ी थी। यह पूरी तरह से डाक कर्मियों के भरोसे पर टिकी व्यवस्था थी।

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‘डाक विभाग के कर्मचारियों पर अटूट भरोसा’

क्या यह खतरनाक नहीं था? बिल्कुल था। लेकिन उस दौर में ग्रामीण इलाकों के डाकिए लोगों के बेहद करीबी और भरोसेमंद हुआ करते थे। माता-पिता अपने बच्चों को बिना किसी डर के डाकिया को सौंप देते थे। इसका मतलब है कि यह सिर्फ एक सरकारी सेवा नहीं थी, बल्कि आपसी विश्वास की पराकाष्ठा थी।

वैसे तो कई डाकिया बच्चों को गोद में लेकर या सुरक्षित डिब्बों में बैठाकर ले जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे यह खबरें अखबारों में छपने लगीं, चिंता का विषय बनने लगीं। सरकार को समझ आने लगा कि इंसान कोई सामान या जानवर नहीं है जिसे इस तरह भेजा जाए।

‘जून 13, 1920: जब कानूनन बंद करना पड़ा यह अजीब सिलसिला’

आखिरकार डाक विभाग को कड़ा फैसला लेना ही पड़ा। June 13, 1920 को पोस्ट ऑफिस विभाग ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी कि अब किसी भी बच्चे को डाक के जरिए नहीं भेजा जा सकेगा। प्रशासन ने साफ किया कि बच्चे किसी भी श्रेणी के ‘हानिरहित जीवित जानवरों’ की सूची में नहीं आते हैं। इस ऐतिहासिक फैसले से सुरक्षा संबंधी बड़ी खामी को दूर किया गया।

‘कानूनी खामियों और सामाजिक सुरक्षा का आईना’

इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर डालें तो यह इतिहास का एक ऐसा अनोखा पहलू है जो हमें बताता है कि कानून में छोटी सी भी खामी कितनी बड़ी विसंगति पैदा कर सकती है। उस समय का समाज आधुनिक दुनिया से काफी अलग था, जहां आपसी भरोसा सुरक्षा नियमों से कहीं अधिक बड़ा था। लेकिन आज के समय में बाल सुरक्षा और परिवहन नियमों के कड़े होने के पीछे इतिहास के ऐसे ही अजीबो-गरीब अनुभव रहे हैं। यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, वैसे-वैसे लोगों की सुरक्षा को लेकर नीतियां भी अधिक परिपक्व होती गईं।

‘क्या है पृष्ठभूमि’

दरअसल, यह पूरा मामला 1 जनवरी, 1913 को शुरू हुआ था जब अमेरिका में Parcel Post सेवा शुरू की गई थी। इससे पहले डाक विभाग केवल छोटे पत्र और दस्तावेज ही भेजता था, लेकिन इस नई सेवा ने लोगों को भारी वजन के सामान भेजने की इजाजत दे दी। इसी के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने इस नए और सस्ते माध्यम का इस्तेमाल अपने बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेजने के लिए करना शुरू कर दिया था, जिसे आखिरकार साल 1920 में बंद करना पड़ा।

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‘मुख्य बातें (Key Points)’
  • अजीबो-गरीब प्रथा: अमेरिका में साल 1913 से 1920 के बीच लोग अपने बच्चों को डाक पार्सल की तरह भेज देते थे क्योंकि यह ट्रेन टिकट से बहुत सस्ता पड़ता था।
  • पहला ऐतिहासिक मामला: साल 1913 में ओहायो के James Beagle पहले ऐसे बच्चे बने जिन्हें महज 15 सेंट के डाक टिकट लगाकर भेजा गया था।
  • मशहूर सफ़र: 4 साल की बच्ची Charlotte May Pierstorff का 73 मील लंबा सफर सबसे लोकप्रिय रहा, जिसे बाद में कहानियों में भी दर्ज किया गया।
  • आधिकारिक पाबंदी: बढ़ते मामलों और सुरक्षा की चिंताओं को देखते हुए US Post Office ने June 13, 1920 को बच्चों को डाक से भेजने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या वाकई में बच्चों को डाक से भेजा जाता था?

हां, साल 1913 में अमेरिका में पार्सल पोस्ट सेवा शुरू होने के बाद कुछ माता-पिताओं ने अपने बच्चों पर डाक टिकट लगाकर उन्हें डाकिया के जरिए रिश्तेदारों के घर भेजा था।

बच्चों को डाक से भेजना कब बंद किया गया?

अमेरिकी डाक विभाग ने June 13, 1920 को आधिकारिक तौर पर आदेश जारी कर बच्चों को डाक से भेजने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।

लोग बच्चों को डाक से क्यों भेजते थे?

उस समय ट्रेन की सवारी टिकट की तुलना में बच्चों का डाक पार्सल बनाना काफी सस्ता पड़ता था, इसलिए लोग नियमों के लूपहोल का फायदा उठाते थे।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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